रांची। अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत रांची रेल मंडल के पिस्का और मुरी रेलवे स्टेशनों का पुनर्विकास पूरा हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से देशभर के 75 पुनर्विकसित रेलवे स्टेशनों का उद्घाटन किया, जिनमें झारखंड के ये दोनों स्टेशन भी शामिल हैं। अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस इन स्टेशनों का उद्देश्य यात्रियों को सुरक्षित, सुगम और आधुनिक यात्रा अनुभव उपलब्ध कराना है। पिस्का स्टेशन पर आधुनिक सुविधाओं के साथ स्थानीय संस्कृति की झलक पुनर्विकसित पिस्का रेलवे स्टेशन को स्थानीय कला, संस्कृति और विरासत के अनुरूप नया स्वरूप दिया गया है। स्टेशन भवन का आकर्षक फसाड इसकी पहचान को दर्शाता है। यहां आधुनिक प्रतीक्षालय, बेहतर प्रकाश व्यवस्था, उन्नत प्लेटफॉर्म, नए प्लेटफॉर्म शेल्टर, स्वच्छ पेयजल, आधुनिक शौचालय और पर्याप्त बैठने की व्यवस्था की गई है। यात्रियों की सुविधा के लिए डिजिटल सूचना प्रणाली, इल्यूमिनेटेड साइनेज और आईपी आधारित सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं। दिव्यांगजन और वरिष्ठ नागरिकों के लिए लिफ्ट, रैंप, टैक्टाइल पाथ, हैंडरेल, व्हीलचेयर और दिव्यांग-अनुकूल शौचालय जैसी विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। मुरी स्टेशन पर भी यात्रियों को मिलेगा बेहतर सफर का अनुभव मुरी रेलवे स्टेशन का भी आधुनिक तरीके से कायाकल्प किया गया है। यहां प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी के अलग-अलग प्रतीक्षालय, आधुनिक एग्जीक्यूटिव लाउंज, विकसित प्लेटफॉर्म, नए शेल्टर और बेहतर प्रकाश व्यवस्था की सुविधा दी गई है। स्टेशन पर स्वच्छ पेयजल, आधुनिक शौचालय, पर्याप्त बैठने की व्यवस्था, डिजिटल यात्री सूचना प्रणाली और सीसीटीवी आधारित सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है। स्टेशन परिसर में विकसित एप्रोच रोड, सर्कुलेटिंग एरिया और पार्किंग की सुविधा यात्रियों की आवाजाही को और आसान बनाएगी। यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा पर विशेष जोर पिस्का स्टेशन के उद्घाटन समारोह में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार मुख्य अतिथि रहे, जबकि मुरी स्टेशन पर राज्यसभा सांसद प्रदीप कुमार वर्मा, सिल्ली विधायक अमित कुमार महतो और रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। रेलवे अधिकारियों के अनुसार, दोनों स्टेशनों का पुनर्विकास यात्रियों की सुविधा, सुरक्षा और सुगम आवागमन को ध्यान में रखकर किया गया है। आधुनिक सुविधाओं से लैस इन स्टेशनों के शुरू होने से रांची रेल मंडल के यात्रियों को बेहतर यात्रा अनुभव मिलेगा।
रांची। राजधानी रांची के धुर्वा स्थित ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर में आयोजित रथयात्रा महोत्सव-2026 श्रद्धा, आस्था और सांस्कृतिक उल्लास के माहौल में संपन्न हुआ। भगवान जगन्नाथ, माता सुभद्रा और भगवान बलभद्र की भव्य रथयात्रा में हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। पूरे मंदिर परिसर में “जय-जय जगन्नाथ” के जयघोष गूंजते रहे और भक्तों ने पूरे उत्साह के साथ रथयात्रा में अपनी सहभागिता निभाई। राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने की पूजा-अर्चना रथयात्रा महोत्सव में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार और मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने विशेष रूप से हिस्सा लिया। दोनों ने भगवान जगन्नाथ, माता सुभद्रा और भगवान बलभद्र की विधिवत पूजा-अर्चना कर राज्य की सुख, शांति, समृद्धि और खुशहाली की कामना की। पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने भगवान जगन्नाथ के रथ की रस्सी खींचकर रथयात्रा का शुभारंभ किया। मंदिर के लिए भव्य तोरणद्वार की घोषणा इस अवसर पर मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने जगन्नाथपुर मंदिर के विकास को लेकर महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने कहा कि मंदिर की पहचान और भव्यता को और बढ़ाने के लिए मंदिर से जुड़ने वाली सड़क पर भव्य तोरणद्वार का निर्माण कराया जाएगा। उनका कहना था कि यह ऐतिहासिक मंदिर झारखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है और इसे पर्यटन के मानचित्र पर और अधिक मजबूती से स्थापित करने के लिए राज्य सरकार लगातार प्रयास करेगी। मुख्यमंत्री ने कहा मुख्यमंत्री ने कहा कि रथयात्रा महोत्सव का श्रद्धालु पूरे वर्ष इंतजार करते हैं और हर साल उमड़ने वाली भीड़ इस आयोजन के बढ़ते धार्मिक महत्व का प्रमाण है। उन्होंने आश्वस्त किया कि आने वाले वर्षों में इस मेले को और अधिक व्यवस्थित, सुरक्षित और भव्य बनाया जाएगा। रथयात्रा महोत्सव में मंत्री, सांसद, विधायक, प्रशासनिक अधिकारी तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक सहभागिता से भरपूर इस आयोजन ने राजधानी रांची को भक्तिमय माहौल से सराबोर कर दिया।
रांची। 14वीं संयुक्त असैनिक सेवा (JPSC) प्रारंभिक परीक्षा-2025 के परिणाम को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) के केंद्रीय वरीय उपाध्यक्ष एवं छात्र आंदोलनकारी नेता देवेन्द्र नाथ महतो ने मंगलवार को लोकभवन में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से मुलाकात कर परीक्षा परिणाम में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया। उन्होंने राज्यपाल को विस्तृत ज्ञापन सौंपते हुए परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच की मांग की। 'युवाओं के भविष्य और आयोग की साख का सवाल' देवेन्द्र नाथ महतो ने कहा कि यह मामला केवल परीक्षा परिणाम तक सीमित नहीं है, बल्कि झारखंड के लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य, झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की विश्वसनीयता और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा से जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि भर्ती प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की अनियमितता छात्रों के भविष्य के साथ अन्याय है और इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने राज्यपाल से निष्पक्ष और पारदर्शी हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि पूरी प्रक्रिया में जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। CBI जांच और मुख्य परीक्षा रोकने की मांग ज्ञापन में JLKM ने 14वीं JPSC पीटी परीक्षा-2025 की पूरी चयन प्रक्रिया की स्वतंत्र एजेंसी या CBI से जांच कराने की मांग की है। साथ ही परिणाम पर आयोग के संवैधानिक सदस्यों के हस्ताक्षर नहीं होने, श्रेणीवार कट-ऑफ अंक सार्वजनिक नहीं किए जाने तथा सोशल मीडिया पर वायरल ओएमआर शीट की सत्यता की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई गई है। संगठन ने 18, 19 और 20 जुलाई 2026 को प्रस्तावित मुख्य परीक्षा को जांच पूरी होने और पारदर्शिता सुनिश्चित होने तक स्थगित करने की भी मांग की है। इसके अलावा अभ्यर्थियों को प्रमाण-पत्र तैयार करने और परीक्षा की तैयारी के लिए पर्याप्त समय देने की बात कही गई। राज्यपाल ने लिया ज्ञापन, कार्रवाई का भरोसा देवेन्द्र नाथ महतो ने स्पष्ट किया कि JLKM किसी राज्य या अभ्यर्थी के खिलाफ नहीं, बल्कि पारदर्शी और निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया के पक्ष में खड़ा है। उन्होंने बताया कि राज्यपाल ने पूरे मामले को गंभीरता से सुना, ज्ञापन स्वीकार किया और आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल में गुणा भगत, संजय महतो, विराट महतो और मनीष साहू भी मौजूद रहे। अब इस मामले में सरकार और JPSC की अगली कार्रवाई पर अभ्यर्थियों की नजर टिकी हुई है।
रांची। जमशेदपुर के चर्चित हिमांशु सिंह हत्याकांड को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। सोमवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का एक शिष्टमंडल प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू के नेतृत्व में राजभवन पहुंचा और राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से मुलाकात कर मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की। प्रतिनिधिमंडल में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता शामिल थे। भाजपा नेताओं ने राज्यपाल को ज्ञापन सौंपते हुए कहा कि इस संवेदनशील मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच केवल केंद्रीय एजेंसी से ही संभव है। पुलिस की कार्यशैली पर भाजपा ने उठाए गंभीर सवाल भाजपा ने अपने ज्ञापन में दावा किया कि 27 जून 2026 को जमशेदपुर के आदित्यपुर क्षेत्र में करणी सेना से जुड़े हिमांशु सिंह की पुलिस की मौजूदगी में हत्या कर दी गई। आरोप है कि हमलावरों ने पुलिस वैन से हिमांशु को बाहर खींचकर धारदार हथियार से हमला किया, जबकि पुलिस मौके पर मौजूद होने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं कर सकी। इस घटना में घायल प्रत्युष सिंह का इलाज कोलकाता में चल रहा है। भाजपा का कहना है कि पुलिस की मौजूदगी में इस तरह की वारदात राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। पार्टी ने आरोप लगाया कि अपराधियों में कानून का भय समाप्त हो चुका है और कई मामलों में पुलिस जांच की दिशा बदलने का प्रयास करती रही है। निष्पक्ष जांच की उठाई मांग ज्ञापन में भाजपा ने कहा कि पुलिस द्वारा जिन तथ्यों को सामने लाया जा रहा है, उनकी भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। पार्टी ने यह भी कहा कि जिस कारोबारी का नाम इस मामले में जोड़ा जा रहा है, उसके संबंध में सामने आए तथ्यों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। भाजपा का दावा है कि पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने और दोषियों के साथ-साथ लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए सीबीआई जांच जरूरी है। भाजपा नेताओं ने राज्यपाल से आग्रह किया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए शीघ्र हस्तक्षेप किया जाए ताकि पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके और राज्य में कानून-व्यवस्था पर जनता का विश्वास कायम रहे। अब इस मामले में राज्यपाल के स्तर पर होने वाली कार्रवाई और सरकार की अगली प्रतिक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हैं।
रांची। झारखंड में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की राह खुल गई है। राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने राज्य सरकार द्वारा भेजे गए सूचना आयुक्तों के पैनल पर अपनी सहमति दे दी है। राज्य सरकार की ओर से स्वीकृति के लिए भेजे गए चारों नामों को मंजूरी मिल गई है। स्वीकृत पैनल में अनुज कुमार सिंह, तनुज खत्री, अमूल नीरज खलखो और शिवपूजन पाठक के नाम शामिल हैं। राज्यपाल के प्रधान सचिव नितिन कुलकर्णी ने इस संबंध में राज्य सरकार को औपचारिक रूप से सूचित कर दिया है। अब कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग चारों को सूचना आयुक्त नियुक्त किए जाने संबंधी अधिसूचना जारी करेगा। अब बरसों के लंबे इंतजार के बाद राज्य को चार सूचना आयुक्त मिल जायेंगे।
रांची। धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर मंगलवार को राजधानी रांची के कोकर स्थित समाधि स्थल पर श्रद्धा और सम्मान का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार और मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन सहित कई जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और आम नागरिकों ने समाधि स्थल पहुंचकर पुष्प अर्पित किए तथा महान जननायक को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। सुबह से ही समाधि स्थल पर लोगों का तांता लगा रहा। विभिन्न सामाजिक संगठनों, छात्र समूहों और आदिवासी समाज के लोगों ने बड़ी संख्या में पहुंचकर भगवान बिरसा मुंडा के संघर्ष, बलिदान और समाज सुधार के कार्यों को याद किया। पूरे परिसर में श्रद्धा और सम्मान का माहौल बना रहा। राज्यपाल ने संघर्ष और बलिदान को किया याद राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने भगवान बिरसा मुंडा को महान स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासी समाज के प्रेरणास्रोत के रूप में याद किया। उन्होंने कहा कि बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी शासन और शोषण के खिलाफ संघर्ष कर समाज को नई दिशा दी। जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए उनका आंदोलन आज भी प्रेरणा देता है। राज्यपाल ने कहा कि उनका जीवन युवाओं के लिए साहस, नेतृत्व और समर्पण का उदाहरण है। मुख्यमंत्री ने बताया सामाजिक न्याय का प्रतीक मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने भी समाधि स्थल पर श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि भगवान बिरसा मुंडा केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि संघर्ष, स्वाभिमान और सामाजिक न्याय के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि झारखंड की पहचान और गौरव में बिरसा मुंडा का योगदान अतुलनीय है। राज्य सरकार उनके सपनों को साकार करने और आदिवासी समाज के सर्वांगीण विकास के लिए लगातार प्रयासरत है। आदर्शों पर चलने का लिया संकल्प श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शामिल लोगों ने धरती आबा के आदर्शों को अपनाने और उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के दौरान लोगों ने उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया। बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर पूरा झारखंड उनके प्रति कृतज्ञता और सम्मान से भावुक नजर आया।
रांची। रांची में स्थित ICFAI University का छठा दीक्षांत समारोह मंगलवार को गरिमामय माहौल में आयोजित किया गया। कार्यक्रम डोरंडा स्थित JAP के शौर्य सभागार में संपन्न हुआ, जिसमें झारखंड के राज्यपाल सह कुलाधिपति संतोष कुमार गंगवार मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस अवसर पर छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच उत्साह का माहौल देखने को मिला। 292 छात्रों को प्रदान की गई डिग्रियां दीक्षांत समारोह में वर्ष 2025 में पास आउट हुए कुल 292 छात्रों को डिग्रियां प्रदान की गईं। यह पल छात्रों और उनके परिवारों के लिए बेहद खास रहा, जब वर्षों की मेहनत का परिणाम उन्हें औपचारिक रूप से मिला। समारोह के दौरान छात्रों के चेहरे पर खुशी और गर्व साफ झलक रहा था। मेधावी छात्रों को मिला विशेष सम्मान कार्यक्रम में 8 शोधार्थियों को पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई, जबकि 10 छात्रों को स्वर्ण पदक और 10 छात्रों को रजत पदक देकर सम्मानित किया गया। मंच पर सम्मान प्राप्त करते समय छात्रों का उत्साह देखने लायक था। यह उपलब्धि उनके शैक्षणिक उत्कृष्टता का प्रमाण बनी। कुलपति और अधिकारियों की उपस्थिति समारोह में विश्वविद्यालय के कुलपति कर्नल डॉ. रणजीत सिंह सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। उन्होंने छात्रों को उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं और उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। नई शुरुआत का प्रतीक बना समारोह दीक्षांत समारोह केवल डिग्री प्राप्त करने का अवसर नहीं, बल्कि छात्रों के जीवन में एक नई शुरुआत का संकेत भी है। अब ये छात्र अपने-अपने क्षेत्रों में करियर की नई राह पर आगे बढ़ेंगे और समाज में अपनी पहचान बनाएंगे। उत्साह और अनुशासन से भरा आयोजन पूरे कार्यक्रम के दौरान अनुशासन और उत्साह का माहौल बना रहा। छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों ने मिलकर इस खास दिन को यादगार बना दिया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।