नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत में बच्चों और किशोरों में बढ़ते मोटापे को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) से जुड़े नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (NIN) ने बच्चों के बीच बढ़ते ओवरवेट और मोटापे की समस्या से निपटने के लिए नई नीति रूपरेखा जारी की है। इसमें जंक फूड, गलत खानपान और बच्चों को लक्षित विज्ञापनों पर नियंत्रण जैसे कदमों का सुझाव दिया गया है। 4.1 करोड़ बच्चों पर मोटापे का खतरा, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने जताई चिंता रिपोर्ट के अनुसार, भारत में करीब 4.1 करोड़ (41 मिलियन) बच्चे और किशोर ओवरवेट या मोटापे की समस्या से प्रभावित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में बढ़ता वजन भविष्य में डायबिटीज, हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है। ICMR-NIN के नेतृत्व में तैयार नीति दस्तावेज में कहा गया है कि बच्चों के खानपान के माहौल में बदलाव करना जरूरी है, क्योंकि केवल व्यक्तिगत स्तर पर खानपान सुधारने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जंक फूड पर नियंत्रण और स्कूल कैंटीन के लिए नए नियमों का सुझाव ICMR की ओर से तैयार प्रस्ताव में स्कूलों के आसपास और स्कूल कैंटीन में ज्यादा चीनी, नमक और वसा वाले खाद्य पदार्थों की उपलब्धता को नियंत्रित करने की बात कही गई है। इसके अलावा स्कूलों में पौष्टिक भोजन को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे अक्सर विज्ञापनों और आसानी से उपलब्ध फास्ट फूड के कारण अस्वस्थ खानपान की ओर आकर्षित होते हैं। इसलिए बच्चों को लक्षित करने वाले खाद्य विज्ञापनों पर भी सख्ती की जरूरत बताई गई है। जंक फूड महंगा करने और आसान लेबलिंग की सिफारिश ICMR-NIN की नीति रूपरेखा में जंक फूड पर अतिरिक्त टैक्स लगाने, खाद्य पदार्थों के लेबल को आसान भाषा में समझने योग्य बनाने और उपभोक्ताओं को सही जानकारी देने जैसे सुझाव शामिल हैं। इसका उद्देश्य लोगों को ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक विकल्प चुनने के लिए प्रेरित करना है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में मोटापे को रोकने के लिए परिवार, स्कूल और सरकार तीनों स्तरों पर प्रयास जरूरी हैं। नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित भोजन और स्क्रीन टाइम कम करना भी महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं। सरकार और स्वास्थ्य संस्थानों के सामने बड़ी चुनौती बच्चों में बढ़ता मोटापा अब केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य की समस्या नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का बोझ तेजी से बढ़ सकता है। ICMR की नई पहल का उद्देश्य बच्चों के लिए ऐसा खाद्य वातावरण तैयार करना है, जहां उन्हें स्वस्थ विकल्प आसानी से मिल सकें और कम उम्र से ही बेहतर जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सके।
मानसून के दौरान बुखार के मामले तेजी से बढ़ जाते हैं। बारिश, जलभराव, बढ़ी हुई नमी और दूषित पानी के कारण वायरल संक्रमण, डेंगू और टायफाइड जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। चूंकि इन तीनों बीमारियों में बुखार एक सामान्य लक्षण है, इसलिए कई बार लोग इन्हें सामान्य वायरल समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सही समय पर बीमारी की पहचान और इलाज गंभीर जटिलताओं से बचा सकता है। मानसून में क्यों बढ़ते हैं बुखार के मामले? बारिश के मौसम में कई जगहों पर पानी जमा हो जाता है, जिससे मच्छरों के पनपने की संभावना बढ़ जाती है। वहीं, दूषित भोजन और पीने का पानी टायफाइड जैसी बैक्टीरियल बीमारियों का जोखिम बढ़ाते हैं। अधिक नमी और बंद वातावरण में वायरल संक्रमण भी तेजी से फैलते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार: डेंगू संक्रमित एडीज मच्छर के काटने से फैलता है। टायफाइड दूषित भोजन और पानी के सेवन से होता है। सामान्य सर्दी-जुकाम संक्रमित व्यक्ति के संपर्क और बंद जगहों में आसानी से फैल सकता है। सामान्य सर्दी-जुकाम के लक्षण अगर बुखार के साथ नाक बहना, छींक आना, गले में हल्का दर्द और खांसी जैसी समस्याएं हैं, तो यह सामान्य वायरल संक्रमण हो सकता है। इसके सामान्य लक्षण हैं: हल्का या कम बुखार नाक बहना या बंद होना छींक आना गले में खराश हल्की खांसी ऐसे संक्रमण आमतौर पर 3 से 7 दिनों में ठीक हो जाते हैं। डेंगू के लक्षण कैसे अलग होते हैं? डेंगू में बुखार अचानक तेज़ होता है और शरीर पर इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है। मुख्य लक्षण: अचानक 39–40 डिग्री सेल्सियस तक तेज बुखार तेज सिरदर्द आंखों के पीछे दर्द मांसपेशियों और जोड़ों में तेज दर्द अत्यधिक कमजोरी त्वचा पर लाल चकत्ते मतली या उल्टी डेंगू के खतरे के संकेत यदि निम्न लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें: मसूड़ों या नाक से खून आना लगातार उल्टी पेट में तेज दर्द चक्कर आना अत्यधिक कमजोरी टायफाइड के लक्षण क्या हैं? टायफाइड साल्मोनेला टाइफी बैक्टीरिया से होने वाला संक्रमण है। इसके लक्षण धीरे-धीरे बढ़ते हैं और समय पर इलाज न मिलने पर गंभीर रूप ले सकते हैं। मुख्य लक्षण: लगातार बना रहने वाला तेज बुखार कमजोरी भूख कम लगना पेट दर्द कब्ज या दस्त सिरदर्द थकान विशेषज्ञों के अनुसार, मानसून में दूषित पानी पीने से टायफाइड का खतरा काफी बढ़ जाता है। सर्दी, डेंगू और टायफाइड में क्या है अंतर? बीमारी बुखार प्रमुख लक्षण सामान्य सर्दी हल्का नाक बहना, छींक, खांसी, गले में खराश डेंगू अचानक बहुत तेज शरीर और जोड़ों में दर्द, चकत्ते, कमजोरी टायफाइड लगातार बढ़ने वाला पेट संबंधी समस्याएं, भूख कम लगना, लगातार बुखार कब करानी चाहिए जांच? डॉक्टरों के अनुसार, निम्न स्थितियों में तुरंत जांच करानी चाहिए: बुखार 2–3 दिन से अधिक बना रहे। अचानक बहुत तेज बुखार आए। शरीर और जोड़ों में असहनीय दर्द हो। भूख लगातार कम हो जाए। पेट दर्द, दस्त या कब्ज की शिकायत हो। त्वचा पर लाल चकत्ते दिखाई दें। नाक या मसूड़ों से खून आने लगे। डॉक्टर कैसे करते हैं बीमारी की पुष्टि? डेंगू की जांच NS1 एंटीजन टेस्ट डेंगू IgM/IgG टेस्ट कम्प्लीट ब्लड काउंट (CBC) टायफाइड की जांच ब्लड कल्चर टायफाइड एंटीबॉडी टेस्ट CBC और अन्य जांच वायरल सर्दी-जुकाम लक्षणों का मूल्यांकन शारीरिक जांच जरूरत पड़ने पर अन्य जांच मानसून में इन 7 उपायों से करें बचाव घर के आसपास पानी जमा न होने दें। मच्छरों से बचाव के लिए रिपेलेंट का इस्तेमाल करें। पूरे बाजू के कपड़े पहनें। केवल साफ और सुरक्षित पानी पिएं। ताजा और स्वच्छ भोजन करें। खाना खाने से पहले हाथ अच्छी तरह धोएं। बुखार होने पर स्वयं दवा लेने की बजाय डॉक्टर से सलाह लें। निष्कर्ष मानसून के दौरान होने वाले हर बुखार को सामान्य वायरल मानकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। यदि तेज बुखार, शरीर में असहनीय दर्द, पेट संबंधी परेशानी या लगातार कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। समय पर सही निदान और उपचार से डेंगू और टायफाइड जैसी गंभीर बीमारियों से होने वाली जटिलताओं से बचा जा सकता है। नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी प्रकार के बुखार या गंभीर लक्षण होने पर योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
मेलबर्न: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज की मौजूदगी में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। दोनों देशों ने रक्षा, परमाणु ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा, साइबर तकनीक, अंतरिक्ष, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग को नई ऊंचाई देने पर सहमति जताई। दोनों नेताओं ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति, स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत करने की प्रतिबद्धता भी दोहराई। रक्षा साझेदारी को मिलेगा नया आयाम शिखर वार्ता के बाद ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा कि दोनों देशों ने रक्षा और सुरक्षा सहयोग पर संयुक्त घोषणा जारी की है। इसके तहत रक्षा संबंधों को और व्यावहारिक बनाया जाएगा तथा दोनों देशों की सेनाओं के बीच समन्वय बढ़ाया जाएगा। समझौते के तहत नियमित संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा मामलों पर रणनीतिक परामर्श और दोनों सेनाओं की इंटरऑपरेबिलिटी (साझा संचालन क्षमता) को मजबूत करने पर सहमति बनी है। परमाणु ऊर्जा और स्वच्छ ऊर्जा पर बढ़ेगा सहयोग भारत और ऑस्ट्रेलिया ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने का भी फैसला किया है। दोनों देश स्वच्छ ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) और ग्रीन एनर्जी सप्लाई चेन के विकास पर मिलकर काम करेंगे। दोनों नेताओं ने कहा कि ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन भविष्य की साझेदारी के प्रमुख स्तंभ होंगे। समुद्री सुरक्षा और साइबर क्षेत्र पर भी जोर बैठक में हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र की समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष तकनीक और महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत बनाने पर भी चर्चा हुई। दोनों देशों ने इन क्षेत्रों में संयुक्त परियोजनाओं और तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई। आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एंथनी अल्बनीज ने आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त लड़ाई जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई। दोनों नेताओं ने कहा कि किसी भी रूप में आतंकवाद स्वीकार्य नहीं है और इसके खिलाफ वैश्विक स्तर पर समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता है। व्यापार और निवेश को मिलेगा बढ़ावा वार्ता में दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। शिक्षा, कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, पर्यटन और उच्च तकनीक वाले क्षेत्रों में नई साझेदारियों को बढ़ावा देने पर सहमति बनी। दोनों नेताओं ने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के मजबूत होते आर्थिक और रणनीतिक संबंध आने वाले वर्षों में दोनों देशों के लिए नए अवसर पैदा करेंगे। इंडो-पैसिफिक पर साझा रणनीति बैठक के दौरान दोनों देशों ने स्वतंत्र, खुला और समावेशी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई। नेताओं ने कहा कि क्षेत्रीय और वैश्विक चुनौतियों का समाधान सैन्य टकराव के बजाय संवाद, सहयोग और कूटनीति के माध्यम से किया जाना चाहिए। भारत और ऑस्ट्रेलिया का मानना है कि रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाकर क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और वैश्विक स्थिरता को नई दिशा दी जा सकती है।
हाल ही में आध्यात्मिक गुरु Sri Sri Ravi Shankar ने सोशल मीडिया पर एक संदेश साझा किया— "Reverse Ageing With Your Breath!"। इसके बाद सुदर्शन क्रिया (Sudarshan Kriya) एक बार फिर चर्चा में आ गई। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक उम्र को वास्तव में पीछे नहीं ले जाती, लेकिन तनाव कम करके स्वस्थ जीवन और बेहतर उम्रदराज़ी (Healthy Ageing) में सहायक हो सकती है। क्या है सुदर्शन क्रिया? सुदर्शन क्रिया एक विशेष लयबद्ध श्वास (Rhythmic Breathing) तकनीक है, जिसे श्री श्री रविशंकर ने वर्ष 1981 में विकसित किया था। इस अभ्यास में धीमी, मध्यम और तेज गति से सांस लेने की निश्चित प्रक्रिया अपनाई जाती है। इस तकनीक को प्रशिक्षित शिक्षकों द्वारा सिखाया जाता है और इसका उद्देश्य शरीर, मन और भावनाओं के बीच संतुलन स्थापित करना माना जाता है। सांस और भावनाओं का क्या है संबंध? श्री श्री रविशंकर के अनुसार, हर भावना का संबंध सांस लेने के तरीके से होता है। तनाव, चिंता और गुस्से की स्थिति में सांस तेज और छोटी हो जाती है, जबकि शांत मन की अवस्था में सांस स्वतः गहरी और धीमी होती है। इसी सिद्धांत के आधार पर माना जाता है कि यदि सांसों की गति को नियंत्रित किया जाए, तो मानसिक स्थिति पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। तनाव का उम्र बढ़ने से क्या संबंध है? स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक रहने वाला तनाव (Chronic Stress) केवल मानसिक स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि पूरे शरीर को प्रभावित करता है। लगातार तनाव रहने से— नींद की गुणवत्ता खराब हो सकती है। शरीर में सूजन (Inflammation) बढ़ सकती है। उच्च रक्तचाप का खतरा बढ़ सकता है। हृदय और अन्य दीर्घकालिक बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। शरीर की जैविक उम्र (Biological Ageing) पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में तनाव कम करने वाली तकनीकें शरीर को बेहतर तरीके से रिकवर करने में मदद कर सकती हैं। शोध क्या कहते हैं? अब तक हुए कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि सुदर्शन क्रिया से: तनाव और चिंता कम हो सकती है। मूड बेहतर हो सकता है। नींद की गुणवत्ता में सुधार आ सकता है। भावनात्मक संतुलन मजबूत हो सकता है। समग्र मानसिक स्वास्थ्य को लाभ मिल सकता है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके दीर्घकालिक प्रभावों को पूरी तरह समझने के लिए बड़े स्तर पर और अधिक शोध की आवश्यकता है। क्या सुदर्शन क्रिया वास्तव में उम्र कम कर सकती है? विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि अभी तक ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो कि सुदर्शन क्रिया या कोई भी ब्रीदिंग तकनीक वास्तविक (Chronological) उम्र को कम या उल्टा कर सकती है। लेकिन नियमित श्वास अभ्यास तनाव कम करने, मानसिक शांति बढ़ाने और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने में मददगार हो सकता है। यही कारण है कि इसे स्वस्थ उम्रदराज़ी (Healthy Ageing) का एक सहायक अभ्यास माना जा रहा है। बेहतर उम्रदराज़ी के लिए क्या जरूरी है? विशेषज्ञों के अनुसार स्वस्थ जीवन के लिए केवल ब्रीदिंग एक्सरसाइज ही पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ इन बातों का पालन भी जरूरी है— संतुलित और पौष्टिक भोजन नियमित व्यायाम पर्याप्त और अच्छी नींद तनाव का प्रभावी प्रबंधन सकारात्मक सामाजिक संबंध नियमित स्वास्थ्य जांच सुदर्शन क्रिया इन आदतों के साथ मिलकर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में सहायक भूमिका निभा सकती है।
अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) में इबोला वायरस का प्रकोप लगातार गंभीर होता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस प्रकोप में अब तक 500 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। बढ़ते मामलों के बीच WHO ने वैश्विक स्तर पर महामारी से निपटने की तैयारियों को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। अब तक कितने मामले सामने आए? WHO के मुताबिक, मई के मध्य में प्रकोप घोषित होने के बाद से DRC में अब तक: 1,561 पुष्ट इबोला संक्रमण के मामले 506 लोगों की मौत 254 मरीज स्वस्थ हुए 354 संदिग्ध मामलों की जांच जारी इसके अलावा पड़ोसी युगांडा में भी इबोला के 20 पुष्ट मामले सामने आए हैं, जिनमें 2 लोगों की मौत हुई है, जबकि 16 मरीज ठीक हो चुके हैं। Bundibugyo स्ट्रेन बना बड़ी चुनौती इस बार का प्रकोप इबोला के दुर्लभ Bundibugyo स्ट्रेन के कारण फैल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्ट्रेन के लिए फिलहाल कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है, जिससे स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो गई है। हालांकि, DRC में दो संभावित उपचारों की क्लीनिकल ट्रायल शुरू की गई है। इसमें: MBP134 मोनोक्लोनल एंटीबॉडी Remdesivir एंटीवायरल दवा की प्रभावशीलता और सुरक्षा का परीक्षण किया जा रहा है। WHO प्रमुख ने दी चेतावनी WHO के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने कहा कि कांगो में जारी इबोला प्रकोप इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अगली महामारी का खतरा कभी भी सामने आ सकता है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक काल्पनिक स्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक संकट है, जो बताता है कि दुनिया को महामारी से निपटने की तैयारियां लगातार मजबूत रखनी होंगी। कैसे फैलता है इबोला वायरस? इबोला वायरस संक्रमित व्यक्ति के: खून, शरीर के अन्य तरल पदार्थ, या संक्रमित व्यक्ति के निकट संपर्क से फैलता है। यह एक गंभीर वायरल बीमारी है, जिसकी मृत्यु दर काफी अधिक हो सकती है। मानवीय संकट भी गहराया संयुक्त राष्ट्र की मानवीय एजेंसी OCHA के अनुसार, इटुरी (Ituri) प्रांत के विस्थापित शिविरों में खराब स्वच्छता, साफ पानी की कमी और सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण संक्रमण का खतरा बढ़ गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2.73 लाख से अधिक विस्थापित लोग गंभीर मानवीय संकट का सामना कर रहे हैं। वहीं राहत कार्यों के लिए आवश्यक धनराशि की भी कमी बनी हुई है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं और बचाव अभियान पर असर पड़ रहा है।
एक बड़े फेज-3 ट्रायल में Tuberculosis (टीबी) वैक्सीन रणनीति के नतीजों से मिला-जुला संकेत मिला है। जहां कुल मिलाकर टीबी से बचाव सीमित रहा, वहीं कुछ खास मरीज समूहों में गंभीर (एक्स्ट्रापल्मोनरी) टीबी के खिलाफ बेहतर सुरक्षा देखी गई। क्या था ट्रायल? PreVenTB नाम का यह ट्रायल भारत के 18 केंद्रों पर किया गया, जिसमें 12,717 लोगों को शामिल किया गया। ये सभी ऐसे लोग थे जो टीबी मरीजों के संपर्क में थे। प्रतिभागियों को तीन समूहों में बांटा गया: VPM1002 Immuvac प्लेसीबो (डमी) करीब 38 महीनों तक यह देखा गया कि वैक्सीन टीबी को रोकने में कितनी प्रभावी है। कुल सुरक्षा क्यों रही सीमित? ट्रायल में पाया गया: VPM1002 लेने वालों में 1.68% को टीबी हुआ प्लेसीबो समूह में 2.13% Immuvac समूह में 2.09% यानी वैक्सीन का असर बहुत ज्यादा मजबूत नहीं था और आंकड़ों में अनिश्चितता (confidence interval) भी दिखी। सबसे अहम बात यह रही कि फेफड़ों की टीबी (Pulmonary TB) के खिलाफ कोई खास सुरक्षा नहीं दिखी, जबकि यही सबसे आम और फैलने वाला रूप है। कहां दिखा बेहतर असर? एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी (जो फेफड़ों के बाहर होती है) में बेहतर नतीजे सामने आए: VPM1002 ने लगभग 50% तक सुरक्षा दिखाई कुछ मरीजों में यह प्रभाव 60% से ज्यादा भी रहा खासतौर पर जिन लोगों का ट्यूबरक्युलिन स्किन टेस्ट पॉजिटिव था (यानी पहले से इम्यून प्रतिक्रिया मौजूद थी), उनमें वैक्सीन ज्यादा असरदार रही। बच्चों (6–14 साल) में भी बेहतर सुरक्षा के संकेत मिले, हालांकि इस पर और रिसर्च की जरूरत है। क्या सुरक्षित है वैक्सीन? दोनों वैक्सीन को सुरक्षित पाया गया। लगभग एक-तिहाई लोगों में हल्की स्थानीय प्रतिक्रिया (जैसे इंजेक्शन साइट पर दर्द/सूजन) देखी गई कोई गंभीर साइड इफेक्ट सामने नहीं आया इसका क्या मतलब है? यह स्टडी बताती है कि: अभी तक कोई भी टीबी वैक्सीन सभी प्रकार की टीबी से पूरी सुरक्षा नहीं दे पा रही लेकिन कुछ खास मरीज समूहों में गंभीर टीबी को रोकने में मदद मिल सकती है भविष्य में “टारगेटेड वैक्सीनेशन” (विशेष समूहों पर केंद्रित रणनीति) ज्यादा प्रभावी हो सकती है
ब्रेन कैंसर के सबसे खतरनाक प्रकार Glioblastoma (GBM) के इलाज को लेकर वैज्ञानिकों ने एक बड़ी सफलता हासिल की है। एक नई रिसर्च में ऐसी थेरेपी विकसित की गई है, जिसने प्रीक्लिनिकल मॉडल में अधिकांश मामलों में ट्यूमर को पूरी तरह खत्म कर दिया—वह भी बिना किसी विषाक्त प्रभाव (toxicity) या दोबारा लौटने (recurrence) के। कैसे काम करती है नई थेरेपी? इस अभिनव उपचार में Synthetic Super-Enhancers (SSEs) नामक तकनीक का उपयोग किया गया। यह तकनीक कैंसर स्टेम सेल्स के अपने जीन कंट्रोल सिस्टम को टारगेट करती है, जिससे केवल ट्यूमर कोशिकाओं पर असर होता है और स्वस्थ कोशिकाएं सुरक्षित रहती हैं। शोध के दौरान: सिर्फ एक बार थेरेपी देने पर 83% मामलों में ट्यूमर पूरी तरह खत्म हो गया 11 महीनों तक कोई साइड इफेक्ट या ट्यूमर की वापसी नहीं देखी गई दोबारा कैंसर सेल डालने पर भी नया ट्यूमर नहीं बना, जो लंबे समय तक सुरक्षा का संकेत देता है डबल एक्शन: ट्यूमर खत्म और इम्यून सिस्टम एक्टिव इस उपचार की खासियत इसका ड्यूल मैकेनिज्म है। इसमें: एक हिस्सा सीधे कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करता है दूसरा हिस्सा शरीर के इम्यून सिस्टम को सक्रिय करता है यह प्रक्रिया एक तरह के इन-सिटू वैक्सीन की तरह काम कर सकती है, जो शरीर को कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और भविष्य में उनसे लड़ने के लिए तैयार करती है। मरीजों के टिश्यू पर भी सफल परीक्षण शोधकर्ताओं ने इस तकनीक को GBM मरीजों के असली टिश्यू सैंपल्स पर भी परखा। नतीजों में पाया गया कि: थेरेपी ने केवल ट्यूमर कोशिकाओं को निशाना बनाया स्वस्थ ब्रेन सेल्स को कोई नुकसान नहीं पहुंचा यह पहलू बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि ब्रेन कैंसर के इलाज में आसपास के स्वस्थ टिश्यू को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होती है। आगे क्या? वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज ब्रेन कैंसर के इलाज में गेम-चेंजर साबित हो सकती है। अब टीम जल्द ही मानव परीक्षण (clinical trials) शुरू करने की योजना बना रही है, जिससे इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता को और बेहतर तरीके से समझा जा सके।
यूरोप में किए गए एक बड़े अध्ययन ने Severe Asthma के मरीजों में मौजूद अन्य बीमारियों (comorbidities) के खास पैटर्न की पहचान की है। इस रिसर्च से पता चलता है कि गंभीर अस्थमा केवल एक फेफड़ों की बीमारी नहीं, बल्कि कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के साथ जुड़ी एक जटिल स्थिति है। क्या है Severe Asthma और Multimorbidity? Severe asthma ऐसे मरीजों में देखा जाता है, जहां: लक्षण लगातार बने रहते हैं बार-बार अटैक (exacerbations) आते हैं हाई-डोज दवाओं के बावजूद फेफड़ों की क्षमता कम रहती है अक्सर इन मरीजों में कई दूसरी बीमारियां भी साथ होती हैं, जिसे “multimorbidity” कहा जाता है। क्या कहता है यूरोप का बड़ा अध्ययन? 11 यूरोपीय देशों के 2,690 मरीजों पर किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि: अलग-अलग बीमारियां रैंडम तरीके से नहीं जुड़तीं बल्कि कुछ तय पैटर्न (clusters) में एक साथ दिखाई देती हैं ये पैटर्न अलग-अलग क्षेत्रों में भी समान पाए गए तीन प्रमुख ‘क्लस्टर’ सामने आए रिसर्च में तीन स्थिर पैटर्न (clusters) की पहचान हुई: 1. स्टेरॉयड से जुड़ा क्लस्टर Osteoporosis (हड्डियों की कमजोरी) वजन बढ़ना (steroid-induced weight gain) यह लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं के असर को दर्शाता है 2. एलर्जिक क्लस्टर Eczema Allergic Rhinitis यह एलर्जी से जुड़ी प्रोफाइल को दर्शाता है 3. अपर एयरवे क्लस्टर Chronic Sinusitis Nasal Polyps यह नाक और साइनस से जुड़ी समस्याओं को दिखाता है अन्य बीमारियों में दिखी विविधता कुछ अन्य स्थितियां जैसे: मोटापा (Obesity) Bronchiectasis Acid Reflux (GERD) मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं इनका पैटर्न स्थिर नहीं रहा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि severe asthma हर मरीज में अलग तरह से प्रकट हो सकता है। इलाज और परिणामों पर असर अध्ययन में पाया गया कि: स्टेरॉयड से जुड़ा पैटर्न सबसे खराब परिणामों से जुड़ा था ज्यादा दवाओं की जरूरत फेफड़ों की खराब कार्यक्षमता ज्यादा अटैक Maximal multimorbidity ग्रुप में: कई बीमारियां एक साथ Biologic therapies की ज्यादा जरूरत डॉक्टरों के लिए क्या संकेत? यह रिसर्च बताती है कि: मरीजों को सिर्फ अस्थमा के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी पूरी स्वास्थ्य स्थिति को देखकर इलाज करना चाहिए स्टेरॉयड पर निर्भर मरीजों में जल्दी वैकल्पिक इलाज (steroid-sparing therapies) पर विचार करना जरूरी है हर मरीज के लिए पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट जरूरी है
अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारी की शुरुआती पहचान आसान बनाने के लिए वैज्ञानिक लगातार नए तरीके खोज रहे हैं। हाल के वर्षों में लार (Saliva) में मौजूद बायोमार्कर्स को एक आसान और गैर-आक्रामक (non-invasive) टेस्ट के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन नई रिसर्च से पता चलता है कि इनकी सटीकता अभी भरोसेमंद नहीं है। क्या कहती है नई रिसर्च? Alzheimer’s disease की पहचान के लिए किए गए एक बड़े सिस्टमेटिक रिव्यू में 3118 स्टडीज की जांच की गई, जिनमें से केवल 18 स्टडीज ही मानकों पर खरी उतरीं। इन स्टडीज में मुख्य रूप से दो तरह के सैलिवरी मार्कर्स पर ध्यान दिया गया: Amyloid beta (Aβ42) Lactoferrin इनकी जांच sensitivity (संवेदनशीलता), specificity (विशिष्टता) और AUC (accuracy measure) के आधार पर की गई। सबसे बड़ी समस्या: परिणामों में भारी अंतर रिव्यू में पाया गया कि अलग-अलग स्टडीज के नतीजों में काफी अंतर (variability) है, जिससे इन टेस्ट्स की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं। मुख्य कारण: सैंपल लेने के तरीके अलग-अलग कुछ स्टडीज में फास्टिंग (खाली पेट) नहीं थी कहीं stimulated saliva (उत्तेजित लार) इस्तेमाल हुई स्टोरेज और प्रोसेसिंग के तरीके अलग-अलग यही वजह है कि कई स्टडीज में यह टेस्ट अल्जाइमर और स्वस्थ लोगों के बीच फर्क तक नहीं कर पाया। किन चीजों से बेहतर रिजल्ट मिले? रिसर्च में कुछ ऐसे फैक्टर भी सामने आए जिनसे टेस्ट की सटीकता बेहतर हुई: सैंपल से पहले फास्टिंग Unstimulated saliva का उपयोग −80°C पर सैंपल स्टोर करना हालांकि, कलेक्शन का समय, सेंट्रीफ्यूगेशन और अन्य तकनीकी प्रक्रियाओं का असर स्पष्ट नहीं पाया गया। अभी क्यों नहीं है पूरी तरह भरोसेमंद? सबसे बड़ी कमी यह सामने आई कि किसी भी स्टडी ने सैलिवा टेस्टिंग के लिए तय मानकों (standard guidelines) का पूरी तरह पालन नहीं किया। इस वजह से: हर स्टडी का तरीका अलग रहा रिजल्ट्स में एकरूपता नहीं आई क्लिनिकल उपयोग (hospital use) के लिए भरोसा नहीं बन पाया आगे क्या है रास्ता? विशेषज्ञों का मानना है कि: एक समान (standardized) टेस्टिंग प्रक्रिया जरूरी है बड़े स्तर पर नई स्टडीज करनी होंगी तभी यह तय हो पाएगा कि सैलिवरी मार्कर्स भविष्य में अल्जाइमर की शुरुआती पहचान में मददगार होंगे या नहीं
अमेरिका में हुई एक नई रिसर्च के मुताबिक, Metabolic Dysfunction-Associated Steatotic Liver Disease से पीड़ित लोग अगर महीने में कम से कम एक बार भी ‘बिंज ड्रिंकिंग’ करते हैं, तो उनमें एडवांस्ड लीवर फाइब्रोसिस का खतरा तीन गुना तक बढ़ सकता है। क्या है यह स्टडी? यह अध्ययन National Health and Nutrition Examination Survey (NHANES) के 2017–2023 के डेटा पर आधारित है। इसमें 8,000 से अधिक लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिनमें विभिन्न प्रकार की लीवर बीमारियों से पीड़ित मरीज शामिल थे। शोधकर्ताओं ने ‘बिंज ड्रिंकिंग’ को इस तरह परिभाषित किया: महिलाओं के लिए: एक दिन में 4 या उससे ज्यादा ड्रिंक पुरुषों के लिए: एक दिन में 5 या उससे ज्यादा ड्रिंक और यह आदत महीने में कम से कम एक बार चौंकाने वाले नतीजे स्टडी में पाया गया कि: MASLD के मरीज जो बिंज ड्रिंकिंग करते हैं, उनमें एडवांस्ड लीवर फाइब्रोसिस का खतरा करीब 3 गुना ज्यादा होता है। ऐसे मरीजों में गंभीर फाइब्रोसिस का खतरा 1.69 गुना और एडवांस्ड फाइब्रोसिस का खतरा 2.76 गुना अधिक पाया गया। जितनी ज्यादा मात्रा में एक बार में शराब पी जाती है, लीवर को उतना ही ज्यादा नुकसान होता है। किन लोगों में ज्यादा खतरा? रिसर्च के अनुसार: युवाओं और पुरुषों में बिंज ड्रिंकिंग की आदत ज्यादा देखी गई MASLD के लगभग 15.9% मरीज इस तरह की पीने की आदत रखते हैं लीवर फाइब्रोसिस कैसे मापा गया? शोधकर्ताओं ने लीवर की कठोरता (liver stiffness) के आधार पर बीमारी की गंभीरता तय की: 8 kPa या उससे ज्यादा: महत्वपूर्ण फाइब्रोसिस 12 kPa या उससे ज्यादा: एडवांस्ड फाइब्रोसिस रिसर्च से क्या संकेत मिले? अभी तक लीवर बीमारी की श्रेणियों में केवल औसत शराब सेवन को ध्यान में रखा जाता था, लेकिन यह स्टडी बताती है कि ‘कभी-कभार ज्यादा पीना’ भी उतना ही खतरनाक है। शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर बिंज ड्रिंकिंग को ध्यान में रखकर मरीजों को दोबारा वर्गीकृत किया जाए, तो MetALD (MASLD + Alcohol) के मामलों की संख्या अमेरिका में दोगुनी से भी ज्यादा हो सकती है। क्या है इसका मतलब? यह रिसर्च साफ संकेत देती है कि: “कभी-कभी ज्यादा पीना” भी सुरक्षित नहीं है लीवर रोग के मरीजों को शराब से पूरी तरह बचना चाहिए डॉक्टरों को मरीजों की पीने की आदतों का और गहराई से आकलन करना चाहिए
एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन में यह सामने आया है कि Natural Killer Cells (NK Cells) हार्ट अटैक के बाद दिल को होने वाले नुकसान को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। यह खोज Myocardial Infarction के बाद शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया को समझने में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। हार्ट अटैक और इम्यून सिस्टम का कनेक्शन दुनियाभर में हार्ट अटैक हार्ट फेलियर का एक प्रमुख कारण है। अब तक माना जाता था कि दिल को नुकसान केवल ब्लड सप्लाई रुकने (इस्कीमिया) से होता है, लेकिन नई रिसर्च बताती है कि शरीर का इम्यून सिस्टम भी इस नुकसान को बढ़ा सकता है। खासतौर पर NK Cells जैसे साइटोटॉक्सिक इम्यून सेल्स की भूमिका अब तक स्पष्ट नहीं थी। कैसे बढ़ता है दिल को नुकसान? रिसर्च के अनुसार, हार्ट अटैक के तुरंत बाद NK Cells तेजी से एक्टिव हो जाते हैं और दिल के क्षतिग्रस्त हिस्से तक पहुंच जाते हैं। एक्टिव होने के बाद ये सेल्स Granzyme B नामक जहरीला प्रोटीन छोड़ते हैं, जो दिल की मांसपेशियों की कोशिकाओं को Apoptosis के जरिए नष्ट कर देता है। इससे होता है: दिल की कोशिकाओं का ज्यादा नुकसान दिल की संरचना में खराब बदलाव (वेंट्रिकुलर रिमॉडलिंग) दिल की कार्यक्षमता में गिरावट प्रयोगों से मिले ठोस सबूत रिसर्च में यह भी साबित हुआ कि NK Cells केवल मौजूद नहीं होते, बल्कि सक्रिय रूप से नुकसान पहुंचाते हैं। जब NK Cells को हटाया या कम किया गया, तो दिल की कोशिकाओं की मौत कम हुई और हार्ट फंक्शन बेहतर हुआ। वहीं, NK Cells को ज्यादा एक्टिव करने पर दिल को नुकसान और बढ़ गया और हार्ट फेलियर का खतरा तेजी से बढ़ा। दिल से बाहर भी असर यह अध्ययन यह भी बताता है कि NK Cells केवल दिल तक सीमित नहीं हैं। ये बोन मैरो को भी प्रभावित करते हैं और शरीर में अन्य इम्यून सेल्स के उत्पादन को बढ़ाते हैं, जिससे पूरे शरीर में सूजन बढ़ सकती है। मानव हृदय ऊतकों के विश्लेषण में भी ऐसे ही संकेत मिले, जिससे यह संभावना मजबूत होती है कि यह मैकेनिज्म इंसानों में भी लागू हो सकता है। भविष्य की इलाज की दिशा हालांकि यह अध्ययन अभी मुख्य रूप से जानवरों पर आधारित है, लेकिन यह एक नई उम्मीद जगाता है। अगर NK Cells को नियंत्रित किया जाए, तो: हार्ट अटैक के बाद नुकसान कम किया जा सकता है दिल की रिकवरी बेहतर हो सकती है हार्ट फेलियर का खतरा घटाया जा सकता है फिलहाल, इस दिशा में और रिसर्च की जरूरत है ताकि इसे सुरक्षित रूप से मरीजों पर लागू किया जा सके।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।