एक बड़े फेज-3 ट्रायल में Tuberculosis (टीबी) वैक्सीन रणनीति के नतीजों से मिला-जुला संकेत मिला है। जहां कुल मिलाकर टीबी से बचाव सीमित रहा, वहीं कुछ खास मरीज समूहों में गंभीर (एक्स्ट्रापल्मोनरी) टीबी के खिलाफ बेहतर सुरक्षा देखी गई।
PreVenTB नाम का यह ट्रायल भारत के 18 केंद्रों पर किया गया, जिसमें 12,717 लोगों को शामिल किया गया। ये सभी ऐसे लोग थे जो टीबी मरीजों के संपर्क में थे।
प्रतिभागियों को तीन समूहों में बांटा गया:
करीब 38 महीनों तक यह देखा गया कि वैक्सीन टीबी को रोकने में कितनी प्रभावी है।
ट्रायल में पाया गया:
यानी वैक्सीन का असर बहुत ज्यादा मजबूत नहीं था और आंकड़ों में अनिश्चितता (confidence interval) भी दिखी।
सबसे अहम बात यह रही कि फेफड़ों की टीबी (Pulmonary TB) के खिलाफ कोई खास सुरक्षा नहीं दिखी, जबकि यही सबसे आम और फैलने वाला रूप है।
एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी (जो फेफड़ों के बाहर होती है) में बेहतर नतीजे सामने आए:
खासतौर पर जिन लोगों का ट्यूबरक्युलिन स्किन टेस्ट पॉजिटिव था (यानी पहले से इम्यून प्रतिक्रिया मौजूद थी), उनमें वैक्सीन ज्यादा असरदार रही।
बच्चों (6–14 साल) में भी बेहतर सुरक्षा के संकेत मिले, हालांकि इस पर और रिसर्च की जरूरत है।
दोनों वैक्सीन को सुरक्षित पाया गया।
यह स्टडी बताती है कि:
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। इसी साल मार्च के महीने में बोस्टन में अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन (AHA) की एक कॉन्फ्रेंस हुई। इसमें ताइवान की ‘नेशनल यांग मिंग चियाओ तुंग यूनिवर्सिटी’ ने रिसर्च पेश की। इसके मुताबिक, बेली फैट (तोंद) के कारण हार्ट डिजीज, खासकर हार्ट फेल्योर का रिस्क बढ़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, मोटापा एपिडेमिक बन गया है। एपिडेमिक यानी ऐसी बीमारी, जो दुनिया में बहुत तेजी से फैल रही है। मोटापे के कारण जानलेवा बीमारियों से पूरी दुनिया में हर साल 28 लाख एडल्ट्स की मौत होती है। इस वजह से हार्ट फेल्योर का खतरा नई रिसर्च के मुताबिक, बेली फैट से हार्ट फेल्योर का खतरा बढ़ सकता है। बेली फैट के कारण हार्ट फेल्योर की सबसे बड़ी वजह इंफ्लेमेशन है- बेली फैट से शरीर में इंफ्लेमेशन बढ़ता है। इससे ब्लड वेसल्स डैमेज होती हैं। इससे हार्ट टिशू प्रभावित होते हैं। इसलिए हार्ट फेल्योर का खतरा बढ़ता है। कैसे पता चलता है बैली फैट का BMI (बॉडी मास इंडेक्स) और बेली फैट दोनों सेहत के लिए जरूरी पैरामीटर्स हैं, लेकिन इन दोनों से अलग-अलग चीजें पता चलती हैं। BMI-यह मोटापे का पता लगाने के लिए जरूरी पैरामीटर है। इसमें लंबाई और वजन का रेशियो निकालकर तय किया जाता है कि व्यक्ति मोटा है या नहीं। हालांकि, BMI से यह नहीं पता चलता है कि शरीर में फैट कहां जमा है। इससे यह भी पता कर सकते हैं कि- कोई अंडरवेट है। नॉर्मल है। ओवरवेट है। या ओबीज कैटेगरी में है। बेली फैट- बेली फैट का मतलब पेट के आसपास जमा चर्बी है। इसे वेस्ट साइज मापकर पता किया जा सकता है। कमर का साइज स्वस्थ व्यक्ति की लंबाई के आधे से कम होना चाहिए। उदाहरण के लिए अगर किसी की लंबाई 170 सेंटीमीटर है तो फिट व्यक्ति की कमर का साइज 85 सेंटीमीटर से कम होना चाहिए। BMI आसान और सस्ता तरीका BMI को लंबे समय से मोटापे का पता लगाने के लिए जरूरी टूल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। यह इसलिए पॉपुलर हो गया क्योंकि आसान और सस्ता है। इससे रिस्क ट्रेंड समझने में मदद मिलती है, लेकिन यह उतना साइंटिफिक नहीं है। इसलिए इसकी लिमिट्स हैं- फैट और मसल का फर्क नहीं कर पाता कोई व्यक्ति (जैसे एथलीट) बहुत मस्कुलर हो सकता है। BMI उसे ओवरवेट दिखा सकता है, जबकि वह फिट हो सकता है। फैट कहां जमा है, पता नहीं चलता BMI नहीं बता सकता कि फैट पूरे शरीर में है या पेट में ज्यादा है। जबकि बेली फैट ज्यादा खतरनाक होता है। बैली फैट ज्यादा खतरनाक विशेषज्ञों के मुताबिक, BMI से सिर्फ लंबाई के रेशियो में वजन का पता चलता है। इससे यह नहीं पता चलता है कि शरीर में फैट कहां जमा है। नई रिसर्च, स्टडीज में बेली फैट को ज्यादा खतरनाक माना गया है। बेली फैट और विसरल फैट एक ही बैली फैट और विसरल फैट अलग नहीं होते, बल्कि आपस में जुड़े हुए हैं, समझिए कैसे- बेली फैट क्या होता है? पेट के आसपास की चर्बी को बेली फैट कहते हैं। यह दो तरह का होता है- स्किन के नीचे जमा फैट (सबक्यूटेनियस फैट) इंटरनल ऑर्गन्स के आसपास जमा फैट (विसरल फैट) विसरल फैट क्या है? यह बेली फैट का ही एक प्रकार है। यह इंटरनल ऑर्गन्स में जमा होता है। लिवर, आंत और अन्य अंगों के आसपास होता है। यह जरूरी नहीं है कि विसरल फैट हमेशा बाहर से दिखाई देगा। पेट पर जमा चर्बी हार्ट को कैसे नुकसान पहुंचाती है? बेली फैट अंदर-ही-अंदर हार्ट को कई तरह से नुकसान पहुंचाता है। विसरल फैट का रिस्क हर किसी को होता है, लेकिन कुछ लोगों में इसका रिस्क ज्यादा होता है। बेली फैट कम कैसे करे बेली फैट कम करने की कोई एक ट्रिक नहीं है। यह पूरी लाइफस्टाइल पर डिपेंड करता है। कुछ अच्छी आदतें अपनाकर इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसमें हेल्दी और लो डाइट, नियमित व्यायाम और योग शामिल हैं। बेली फैट कम करने के लिए क्या खाएं और क्या न खाएं? बेली फैट कम करने में डाइट का रोल सबसे अहम है। कोई क्या खाता-पीता है, इससे तय होता है कि शरीर में मसल्स बढ़ेगा या फैट। इसलिए समझिए क्या खाना चाहिए और क्या नहीं- क्या खाएं? 1. प्रोटीन वेज- दाल, राजमा, छोले, पनीर और दही। नॉन वेज- अंडे, चिकन और फिश। 2. फाइबर फल/सब्जियां- पालक, लौकी, सेब और अमरूद। मोटे अनाज- ओट्स और ब्राउन राइस। 3. हेल्दी फैट ड्राई फ्रूट्स- बादाम और अखरोट। सीड्स- अलसी और चिया सीड्स। 4. प्रोबायोटिक फूड डेयरी प्रोडक्ट- दही और छाछ। 5. पानी दिन में 2.5-3 लीटर। नारियल पानी। क्या न खाएं? 1.मीठा मिठाई, केक और चीनी। कोल्ड ड्रिंक और पैकेज्ड जूस। 2. रिफाइंड कार्ब मैदा-नान, पिज्जा और ब्रेड। पैकेज्ड बिस्किट और नमकीन। 3. प्रोसेस्ड और जंक फूड चिप्स और फ्राइड फूड। पैकेज्ड स्नैक्स।
बीजिंग: चीन में हुई एक बड़ी स्टडी ने मेटाबॉलिक बीमारियों को लेकर एक दिलचस्प और चौंकाने वाला ट्रेंड सामने रखा है। 2026 की इस राष्ट्रीय स्तर की रिसर्च के अनुसार, कम सामाजिक-आर्थिक स्थिति (Low Socioeconomic Status) वाले लोगों में जहां हाई ब्लड प्रेशर और मोटापे का खतरा ज्यादा है, वहीं डायबिटीज और डिस्लिपिडेमिया (खून में फैट का असंतुलन) के मामले अपेक्षाकृत कम पाए गए। क्या कहती है स्टडी? यह शोध 2 लाख से ज्यादा लोगों पर आधारित था, जिसमें सामाजिक-आर्थिक स्थिति को शिक्षा, रहने की स्थिति और वैवाहिक स्थिति के आधार पर मापा गया। विश्लेषण में पाया गया कि सबसे निचले सामाजिक-आर्थिक वर्ग में मेटाबॉलिक बीमारियों का कुल प्रचलन सबसे ऊंचे वर्ग की तुलना में 87.1% अधिक था। किन बीमारियों का खतरा ज्यादा? सामाजिक-आर्थिक स्तर में हर एक अंक की गिरावट पर हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension) का खतरा लगभग 10% बढ़ा मोटापे (Obesity) का जोखिम भी करीब 10% बढ़ा लेकिन डायबिटीज में उल्टा ट्रेंड कम सामाजिक-आर्थिक वर्ग में डायबिटीज (Diabetes) का जोखिम लगभग 3% कम डिस्लिपिडेमिया का खतरा करीब 7% कम पाया गया यह ट्रेंड पारंपरिक सोच से अलग है, जहां आमतौर पर कम आय वर्ग में सभी बीमारियों का खतरा ज्यादा माना जाता है। पुरुष और महिलाओं में अलग असर स्टडी में जेंडर के आधार पर भी बड़ा अंतर सामने आया: महिलाओं में कम सामाजिक-आर्थिक स्थिति से मोटापा और हाई BP का खतरा ज्यादा जुड़ा पुरुषों में यह स्थिति डायबिटीज, मोटापा और डिस्लिपिडेमिया के कम जोखिम से जुड़ी पाई गई
नई दिल्ली, एजेंसियां। गर्मियों का मौसम आते ही आम की डिमांड बढ़ जाती है। फलों का राजा कहलाने वाला आम न सिर्फ स्वाद में लाजवाब होता है, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है। इसमें विटामिन A, C और फाइबर भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर को पोषण देने के साथ-साथ गर्मी से राहत भी देते हैं। ऐसे में आम से बनी कुछ खास रेसिपी इस मौसम को और भी मजेदार बना सकती हैं घर पर बनाएं ये 5 टेस्टी रेसिपी गर्मियों में आम से कई तरह के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किए जा सकते हैं। आम की लस्सी सबसे लोकप्रिय रेसिपी में से एक है, जिसे दही और आम के गूदे से तैयार किया जाता है। यह ठंडक देने के साथ-साथ पाचन के लिए भी फायदेमंद होती है। वहीं, आम पन्ना एक पारंपरिक पेय है, जो लू से बचाने में मदद करता है और शरीर को हाइड्रेट रखता है। इसके अलावा आम का शेक भी बच्चों और बड़ों दोनों का पसंदीदा ड्रिंक है, जो एनर्जी से भरपूर होता है। खाने के साथ भी बढ़ाएं स्वाद अगर आप खाने के साथ कुछ अलग ट्राई करना चाहते हैं, तो आम का अचार एक बेहतरीन विकल्प है। यह लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है और खाने का स्वाद कई गुना बढ़ा देता है। वहीं, मीठे के शौकीनों के लिए मैंगो कुल्फी एक परफेक्ट डेजर्ट है। इसे घर पर आसानी से तैयार किया जा सकता है और यह गर्मी में ठंडक का बेहतरीन एहसास देती है। स्वाद के साथ सेहत का भी ख्याल इन सभी रेसिपीज में स्वाद के साथ सेहत का भी ध्यान रखा गया है। आम से बनी ये डिशेज शरीर को तरोताजा रखती हैं और गर्मी के असर को कम करने में मदद करती हैं। ऐसे में इस सीजन में आम को अपनी डाइट में शामिल करना एक स्मार्ट और टेस्टी विकल्प साबित हो सकता है।