सनातन धर्म

Devotee applying sacred tilak on forehead during Hindu religious ritual and worship.
माथे पर तिलक लगाने की परंपरा क्यों है? जानिए धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व

सनातन धर्म में तिलक केवल एक धार्मिक चिन्ह नहीं, बल्कि आस्था, ऊर्जा और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। पूजा-पाठ, यज्ञ, दान और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में तिलक का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार तिलक धारण करने से व्यक्ति को शुभ फल प्राप्त होते हैं और उसकी आध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि होती है। शास्त्रों में तिलक का महत्व धार्मिक ग्रंथों में तिलक को अत्यंत पवित्र माना गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मपर्व में उल्लेख मिलता है कि स्नान, दान, तप, हवन, देवपूजन और पितरों से जुड़े कर्म यदि तिलक लगाए बिना किए जाएं तो उनका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। यही कारण है कि वैदिक परंपरा में पूजा और धार्मिक अनुष्ठान से पहले तिलक धारण करने की परंपरा रही है। किस अंगुली से तिलक लगाने का क्या फल मिलता है? स्कंदपुराण में तिलक लगाने की विधि और उसके प्रभाव का विस्तार से वर्णन किया गया है। अनामिका (रिंग फिंगर) से तिलक लगाने पर शांति और मानसिक संतुलन की प्राप्ति होती है। मध्यमा अंगुली से तिलक करने पर आयु वृद्धि का फल बताया गया है। अंगूठे से लगाया गया तिलक स्वास्थ्य और बल प्रदान करने वाला माना जाता है। तर्जनी अंगुली से तिलक लगाने को मोक्ष प्राप्ति से जोड़ा गया है। देवी-देवताओं के अनुसार अलग-अलग तिलक हिंदू धर्म में विभिन्न संप्रदायों और उपासना पद्धतियों के अनुसार तिलक के स्वरूप भी अलग-अलग होते हैं। विष्णु भक्तों का ऊर्ध्व तिलक भगवान विष्णु के उपासक माथे पर दो सीधी रेखाओं वाला ऊर्ध्व तिलक धारण करते हैं, जो भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। शक्ति उपासकों का तिलक मां शक्ति की आराधना करने वाले साधक प्रायः दो बिंदुओं या विशेष स्वरूप का तिलक लगाते हैं, जो शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक होता है। शिव भक्तों का त्रिपुंड भगवान शिव के भक्त भस्म से तीन आड़ी रेखाओं वाला त्रिपुंड धारण करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि त्रिपुंड धारण कर जप, तप और पूजा करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है। तिलक का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व माथे के बीच का भाग, जहां तिलक लगाया जाता है, शरीर का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा केंद्र माना जाता है। योग और ध्यान परंपरा में इसे आज्ञा चक्र कहा जाता है। यह स्थान दोनों भौंहों के बीच स्थित होता है और मानसिक एकाग्रता तथा चेतना से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि इस स्थान पर चंदन, कुमकुम या भस्म का तिलक लगाने से मन को शांति मिलती है, एकाग्रता बढ़ती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि माथे के इस हिस्से पर हल्का दबाव मानसिक तनाव को कम करने और ध्यान केंद्रित करने में सहायक हो सकता है। केवल परंपरा नहीं, आस्था और ऊर्जा का प्रतीक तिलक सनातन संस्कृति की एक महत्वपूर्ण पहचान है। यह व्यक्ति की धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। पूजा, व्रत और शुभ कार्यों में तिलक लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी श्रद्धालु इसे शुभता, सकारात्मकता और ईश्वरीय कृपा का प्रतीक मानते हैं।  

surbhi मई 26, 2026 0
Hindu funeral ritual being performed near a cremation pyre before sunset as per Garuda Purana beliefs.
सूर्यास्त के बाद क्यों नहीं किया जाता अंतिम संस्कार? जानिए Garuda Purana में क्या है मान्यता

हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर संस्कार का विशेष महत्व माना गया है। सनातन परंपरा के अनुसार प्रत्येक धार्मिक कार्य को विधि-विधान और निर्धारित नियमों के साथ करना जरूरी माना जाता है। यही वजह है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार भी पूरी श्रद्धा और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाता है। Garuda Purana में मृत्यु, आत्मा और मोक्ष से जुड़े कई नियमों और मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। इन्हीं मान्यताओं के अनुसार सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार करना अशुभ माना गया है। अंतिम संस्कार का क्या है धार्मिक महत्व? हिंदू मान्यता के अनुसार मृत्यु केवल शरीर का अंत है, जबकि आत्मा अमर मानी जाती है। अंतिम संस्कार को आत्मा की मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है। धार्मिक विश्वास है कि यदि दाह संस्कार सही विधि-विधान, मंत्रों और परंपराओं के अनुसार न किया जाए, तो आत्मा को शांति नहीं मिलती और उसे मोक्ष प्राप्त करने में बाधा आ सकती है। सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार क्यों नहीं किया जाता? Garuda Purana और अन्य धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार: सूर्य देव प्रकाश, ऊर्जा और सकारात्मकता के प्रतीक माने जाते हैं। दिन के समय किए गए संस्कारों को शुभ और देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त माना जाता है। रात का समय नकारात्मक शक्तियों और अशुभ प्रभावों से जुड़ा माना गया है। इसी वजह से माना जाता है कि सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार करने से आत्मा को मोक्ष प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है। यही कारण है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु रात में हो जाए, तो शव को अगले दिन सूर्योदय तक सुरक्षित रखा जाता है। इसके पीछे वैज्ञानिक और व्यावहारिक कारण भी हैं धार्मिक मान्यताओं के अलावा इसके पीछे कुछ व्यावहारिक वजहें भी बताई जाती हैं। प्राचीन समय में: रात में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था नहीं होती थी जंगलों और श्मशान घाटों में सुरक्षा का खतरा रहता था अंतिम संस्कार की प्रक्रिया सही ढंग से पूरी करना कठिन होता था इन्हीं कारणों से दिन के समय अंतिम संस्कार करने की परंपरा विकसित हुई, जो आज भी कई परिवारों में निभाई जाती है। परंपरा और आस्था का प्रतीक सनातन धर्म में अंतिम संस्कार केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और मोक्ष से जुड़ा पवित्र संस्कार माना जाता है। इसलिए आज भी अधिकांश लोग सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से बचते हैं और पारंपरिक मान्यताओं का पालन करते हैं।  

surbhi मई 22, 2026 0
Artistic depiction of Yamraj, Chitragupta and souls traveling through the mystical path of Yamlok after death.
Narad Puran: मृत्यु के बाद यमलोक में कैसे मिलता है पाप और पुण्य का फल? जानिए रहस्यमयी यात्रा का वर्णन

Narada Purana में जीवन, मृत्यु, कर्म और परलोक से जुड़े कई गूढ़ रहस्यों का विस्तार से वर्णन मिलता है। पुराणों के अनुसार मनुष्य को मृत्यु के बाद अपने कर्मों के आधार पर फल प्राप्त होता है। अच्छे कर्म करने वाले जीव जहां सुखपूर्वक धर्मलोक की यात्रा करते हैं, वहीं पाप कर्म करने वालों को कठोर यातनाएं सहनी पड़ती हैं। नारद पुराण में यमलोक के मार्ग और वहां मिलने वाले दंड एवं सुखों का अत्यंत विस्तृत और रहस्यमयी वर्णन किया गया है। छियासी हजार योजन लंबा बताया गया है यमलोक का मार्ग नारद पुराण के अनुसार यमलोक का मार्ग लगभग 86,000 योजन तक फैला हुआ है। मान्यता के अनुसार एक योजन लगभग 13 किलोमीटर के बराबर माना जाता है। इस हिसाब से यह दूरी करीब 11 लाख किलोमीटर से भी अधिक बताई गई है। कहा गया है कि: धर्म और दान-पुण्य करने वाले लोग इस मार्ग को सुखपूर्वक पार कर लेते हैं पाप कर्म करने वाले जीव अत्यंत कष्ट झेलते हुए यात्रा करते हैं पापी जीवों के बारे में वर्णन मिलता है कि उनके कंठ सूख जाते हैं, वे भय और पीड़ा से रोते-चिल्लाते हैं और Yamdoot उन्हें चाबुक और अस्त्रों से दंडित करते हुए आगे ले जाते हैं। यमलोक के मार्ग में मिलती हैं भयानक यातनाएं पुराण में यमलोक के रास्ते को बेहद कठिन और भयावह बताया गया है। मार्ग में: जलती हुई अग्नि तपती रेत कांटेदार वृक्ष तीखी धार वाली चट्टानें अंधेरी गुफाएं सुई जैसे कांटे मौजूद रहते हैं। कहीं बाघों की डरावनी गर्जना सुनाई देती है तो कहीं जीवों को रस्सियों और अंकुशों से खींचा जाता है। पाप कर्म करने वाले जीव इन यातनाओं को सहते हुए अपने कर्मों पर पछतावा करते हैं। पुराणों के अनुसार इस यात्रा में न छाया मिलती है और न पानी। पुण्यात्माओं को मिलते हैं दिव्य सुख नारद पुराण में यह भी बताया गया है कि जिन्होंने जीवन में धर्म, दया और दान किया हो, उन्हें यमलोक की यात्रा में विशेष सुख प्राप्त होते हैं। उदाहरण के तौर पर: अन्न दान करने वालों को स्वादिष्ट भोजन मिलता है जल दान करने वालों को उत्तम पेय प्राप्त होते हैं वस्त्र दान करने वालों को दिव्य वस्त्र मिलते हैं दीपदान करने वालों के मार्ग प्रकाशित रहते हैं गोदान करने वालों को विशेष सुख प्राप्त होते हैं जो व्यक्ति माता-पिता की सेवा करता है, ब्राह्मणों और जरूरतमंदों की सहायता करता है तथा सभी जीवों के प्रति दया भाव रखता है, उसे धर्मराज के लोक में सम्मान प्राप्त होता है। धर्मराज पुण्यात्माओं का करते हैं सम्मान Yama पुण्यात्माओं का स्वागत मित्र की तरह करते हैं। पुराण के अनुसार धर्मराज कहते हैं कि मानव जीवन पाकर भी जो व्यक्ति धर्म और पुण्य नहीं करता, उससे बड़ा पापी कोई नहीं। नारद पुराण में धर्म, दान और भगवान के स्मरण को जीवन का सबसे बड़ा साधन बताया गया है। चित्रगुप्त याद दिलाते हैं कर्मों का हिसाब वहीं पाप कर्म करने वाले जीवों को यमदूत भयावह रूप में दिखाई देते हैं। पुराण में वर्णन है कि उनकी आंखें लाल होती हैं और वे प्रलयकाल के बादलों जैसी गर्जना करते हैं। इसके बाद Chitragupta जीवों को उनके कर्मों का पूरा हिसाब याद दिलाते हैं और उसी अनुसार उन्हें नरक की यातनाएं भोगनी पड़ती हैं। पुराणों के अनुसार पापों का फल भोगने के बाद जीव फिर पृथ्वी पर विभिन्न योनियों में जन्म लेते हैं। क्या संदेश देता है नारद पुराण? नारद पुराण का मुख्य संदेश यह है कि: मनुष्य को हमेशा धर्म और सद्कर्म करने चाहिए दया, सेवा और दान जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं हर कर्म का फल अवश्य मिलता है मानव जीवन को केवल भौतिक सुखों में नहीं गंवाना चाहिए पुराणों के अनुसार धर्म का मार्ग ही अंततः जीव को सुख, सम्मान और मोक्ष की ओर ले जाता है।  

surbhi मई 19, 2026 0
Udhayanidhi Stalin speaking in Tamil Nadu Assembly during controversy over his Sanatan Dharma remarks.
उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म वाले बयान पर फिर विवाद, बीजेपी ने साधा निशाना

Udhayanidhi Stalin ने एक बार फिर सनातन धर्म को लेकर विवादित बयान दिया है। तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में अपने पहले भाषण के दौरान उन्होंने कहा कि “सनातन धर्म लोगों को बांटता है, इसलिए इसे समाप्त हो जाना चाहिए।” उनके इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। बीजेपी ने इसे हिंदू विरोधी मानसिकता बताते हुए डीएमके पर तीखा हमला बोला है। तमिल थाई वझुथु मुद्दे का भी किया जिक्र विधानसभा में अपने संबोधन के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने “तमिल थाई वझुथु” के कथित अपमान का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि तमिल संस्कृति और पहचान का सम्मान किया जाना चाहिए। हालांकि, उनके सनातन धर्म संबंधी बयान ने ज्यादा राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा की और सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस पर बहस तेज हो गई। बीजेपी बोली- जनता माफ नहीं करेगी Shehzad Poonawalla ने डीएमके और उदयनिधि स्टालिन पर तीखा हमला करते हुए कहा कि विपक्षी दल वोट बैंक की राजनीति के लिए सनातन धर्म के खिलाफ नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में चुनावी हार के बावजूद डीएमके ने कोई सबक नहीं सीखा है और पार्टी अब भी सनातन धर्म का अपमान कर रही है। पूनावाला ने कहा कि “तमिलनाडु की जनता उन्हें माफ नहीं करेगी।” 2023 में भी दिया था ऐसा ही बयान यह पहला मौका नहीं है जब उदयनिधि स्टालिन के बयान पर विवाद हुआ हो। सितंबर 2023 में भी उन्होंने सनातन धर्म की तुलना “डेंगू और मलेरिया” जैसी बीमारियों से करते हुए कहा था कि इसे खत्म कर देना चाहिए। उस बयान पर देशभर में राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ था और कई नेताओं ने उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। बीजेपी ने बताया वोट बैंक राजनीति का हिस्सा बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि विपक्षी दलों द्वारा बार-बार सनातन धर्म को निशाना बनाना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ दल धार्मिक भावनाओं को भड़काकर वोट बैंक मजबूत करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछले बयान पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की थी और इसे नफरती भाषण बताया गया था। राजनीतिक बयानबाजी से बढ़ा विवाद उदयनिधि स्टालिन के इस बयान के बाद तमिलनाडु समेत देशभर में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। बीजेपी और डीएमके के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, जबकि सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है।  

surbhi मई 13, 2026 0
Tarpan rituals on Vaishakh Amavasya with traditional Hindu offerings and copper vessel
Vaishakh Amavasya 2026: तर्पण करते समय भूलकर भी न करें ये गलतियां, पितरों की कृपा पाने के लिए जानें जरूरी नियम

हिंदू धर्म में अमावस्या का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है, खासकर पितरों की शांति और मोक्ष के लिए। वर्ष 2026 में वैशाख अमावस्या आज यानी 17 अप्रैल, शुक्रवार को मनाई जा रही है। इस दिन तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या के दिन किए गए पितृ कर्म सीधे पितरों तक पहुंचते हैं। लेकिन कई बार लोग अनजाने में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिससे तर्पण का पूरा फल नहीं मिल पाता। ऐसे में जरूरी है कि तर्पण करते समय कुछ खास सावधानियों का पालन किया जाए। तर्पण करते समय इन बातों का रखें ध्यान 1. सही दिशा का चुनाव करें तर्पण करते समय हमेशा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। शास्त्रों में दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना गया है। अन्य दिशा में किया गया तर्पण निष्फल हो सकता है। 2. काले तिल का प्रयोग जरूरी तर्पण के जल में काले तिल डालना अनिवार्य माना गया है। बिना तिल के किया गया तर्पण पितरों तक नहीं पहुंचता। ध्यान रखें कि केवल काले तिल का ही उपयोग करें। 3. तांबे के पात्र का उपयोग करें पितरों को जल अर्पित करने के लिए तांबे के बर्तन का प्रयोग श्रेष्ठ माना गया है। स्टील, प्लास्टिक या कांच के बर्तन से तर्पण करना शास्त्रों में उचित नहीं माना गया है। 4. शुभ समय का रखें ध्यान तर्पण का सबसे उपयुक्त समय दोपहर (मध्याह्न) का होता है। सुबह स्नान के बाद मध्याह्न में तर्पण करना शुभ माना जाता है, जबकि सूर्यास्त के बाद तर्पण वर्जित है। 5. संयमित व्यवहार अपनाएं अमावस्या के दिन क्रोध, विवाद और अपशब्दों से बचें। तर्पण करने वाले व्यक्ति को मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज जैसे तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। पितरों को प्रसन्न करने के लिए करें ये उपाय पीपल की पूजा करें अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाएं और सरसों के तेल का दीपक जलाएं। मान्यता है कि पीपल में देवताओं और पितरों का वास होता है। पंचबलि भोग लगाएं भोजन बनाने के बाद गाय, कुत्ते, कौवे, चींटियों और देवताओं के लिए अन्न का अंश निकालना शुभ माना जाता है। दान का विशेष महत्व इस दिन तिल, गुड़, अनाज और वस्त्र का दान करने से पितर प्रसन्न होते हैं। इससे वंश वृद्धि, सुख-समृद्धि और आरोग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वैशाख अमावस्या का दिन पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर होता है। इस दिन विधि-विधान से तर्पण और दान-पुण्य करने से जीवन में सकारात्मकता और शांति का संचार होता है। ऐसे में शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन कर आप पितरों की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।  

surbhi अप्रैल 17, 2026 0
Devotees performing Ganesh Puja with idol, flowers, and lamps seeking blessings for prosperity and success.
Ganesh Puja: क्यों प्रथम पूजनीय हैं भगवान गणेश? जानिए पूजा के 7 प्रमुख आध्यात्मिक लाभ

सनातन धर्म में हर शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से करना परंपरा का अहम हिस्सा है। “श्री गणेश” से कार्य प्रारंभ करने का अर्थ ही है कि उस कार्य में सफलता, शुभता और बाधा-रहित मार्ग की कामना की जा रही है। गणपति को ऋद्धि-सिद्धि, बुद्धि, विवेक और शुभ-लाभ का देवता माना जाता है, इसलिए उन्हें “प्रथम पूजनीय” का दर्जा प्राप्त है। गणपति प्रथम पूजनीय क्यों हैं? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार सभी देवी-देवताओं के बीच यह प्रतियोगिता हुई कि जो सबसे पहले पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाएगा, वही प्रथम पूजनीय होगा। जहां अन्य देवता अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर ब्रह्मांड की यात्रा पर निकल पड़े, वहीं भगवान गणेश ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए अपने माता-पिता–भगवान शिव और माता पार्वती–की परिक्रमा की। गणेश जी के अनुसार, माता-पिता ही उनका संपूर्ण ब्रह्मांड हैं। उनकी इस सूझबूझ से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें प्रथम पूजनीय होने का वरदान दिया। गणपति पूजा के 7 प्रमुख लाभ 1. नवग्रह दोषों से मुक्ति गणेश जी की विधिपूर्वक पूजा करने से कुंडली के नवग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। 2. सफलता और समृद्धि की प्राप्ति लंबोदर रूप में पूजे जाने वाले गणपति की कृपा से जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और आर्थिक उन्नति मिलती है। 3. विघ्नों का नाश विघ्नहर्ता गणेश की आराधना से कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और योजनाएं सफलतापूर्वक पूर्ण होती हैं। 4. नकारात्मकता और दोषों का अंत गणपति की पूजा व्यक्ति के भीतर के अहंकार को समाप्त कर उसे विनम्र बनाती है, साथ ही नकारात्मक शक्तियों को भी दूर करती है। 5. बुद्धि और विवेक का आशीर्वाद गणेश जी को ज्ञान और बुद्धि का देवता माना जाता है। उनकी कृपा से व्यक्ति सही निर्णय लेने में सक्षम होता है। 6. वास्तु दोष से मुक्ति घर में गणपति की मूर्ति या चित्र रखने से वास्तु दोष दूर होते हैं और सकारात्मक वातावरण बना रहता है। 7. सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति सच्चे मन से की गई गणपति पूजा जीवन के कष्टों को दूर कर इच्छाओं की पूर्ति करती है और घर में सुख-समृद्धि बनाए रखती है। भगवान गणेश की पूजा केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, सकारात्मक और सफल बनाने का मार्ग भी मानी जाती है। उनकी आराधना व्यक्ति को मानसिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक रूप से सशक्त बनाती है।  

surbhi अप्रैल 15, 2026 0
Lord Vishnu during Varuthini Ekadashi
Varuthini Ekadashi 2026: वरुथिनी एकादशी व्रत के 11 नियम, जिनका पालन किए बिना अधूरा रह जाता है पुण्यफल

वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली पवित्र Varuthini Ekadashi का सनातन परंपरा में विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत भगवान Vishnu को समर्पित होता है और मान्यता है कि इसे विधि-विधान से करने पर साधक के जीवन के दुख दूर होते हैं और मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं। धार्मिक ग्रंथों में इसे अत्यंत फलदायी व्रत बताया गया है, जो बड़े-बड़े यज्ञों से भी अधिक प्रभावशाली माना जाता है। इस व्रत का पूर्ण पुण्यफल तभी प्राप्त होता है, जब इसके नियमों का पूरी निष्ठा से पालन किया जाए। आइए जानते हैं वरुथिनी एकादशी से जुड़े 11 प्रमुख नियम: वरुथिनी एकादशी व्रत के 11 जरूरी नियम व्रत के नियमों का पालन एक दिन पहले संध्याकाल से ही शुरू कर देना चाहिए और पारण तक जारी रखना चाहिए। एकादशी व्रत में अन्न का सेवन वर्जित है। फलाहार करें और व्रत से एक दिन पहले ही चावल खाना बंद कर दें। इस दिन गंगा या अन्य पवित्र नदी में स्नान करना शुभ माना जाता है। यदि संभव न हो तो स्नान के जल में गंगाजल मिलाएं। केवल शरीर ही नहीं, मन को भी पवित्र रखें। किसी के प्रति गलत विचार न लाएं। व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है। चावल और तामसिक भोजन से पूरी तरह परहेज करें तथा जमीन पर शयन करें। अगले दिन शुभ मुहूर्त में विधिपूर्वक पारण करना अनिवार्य है, तभी व्रत पूर्ण माना जाता है। एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए, इसलिए उन्हें पहले ही तोड़कर रख लें। भगवान विष्णु के साथ माता Lakshmi की पूजा भी करें। अपनी क्षमता अनुसार जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या फल का दान करें। दिनभर वाद-विवाद से बचें और मन में श्रीहरि के मंत्रों का जप करते रहें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन नियमों का पालन करने से साधक को न केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है बल्कि जीवन में सुख-समृद्धि भी आती है। हालांकि, यह जानकारी पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है।  

surbhi अप्रैल 13, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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