पटना, एजेंसियां। बिहार की राजनीति का चर्चित 10 सर्कुलर रोड बंगला आखिरकार खाली हो रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने गुरुवार को अपने सरकारी आवास से सामान हटाना शुरू कर दिया है। लालू प्रसाद यादव के परिवार का सामान अब नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के सरकारी आवास 1 पोलो रोड में शिफ्ट हो रहा है। पिछले कई दिनों से इस बंगले को लेकर सियासी विवाद जारी था।
दरअसल, पटना स्थित 10 सर्कुलर रोड का सरकारी आवास पिछले 21 वर्षों से पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के पास था। बिहार सरकार के भवन निर्माण विभाग ने यह बंगला राज्य सरकार के मंत्री नंदकिशोर राम को आवंटित कर दिया है। वहीं, राबड़ी देवी को बिहार विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते 39 हार्डिंग रोड स्थित दूसरा सरकारी आवास आवंटित किया गया था, लेकिन उन्होंने लंबे समय तक 10 सर्कुलर रोड खाली नहीं किया। बिहार की राजनीति में यह बंगला लंबे समय से राजद का पावर सेंटर रहा है।
सरकार की ओर से बंगला खाली करने के लिए राबड़ी देवी को 15 दिनों का समय दिया गया था, जिसकी समय-सीमा 15 जून को समाप्त हो गई। इसके बाद 16 जून को उन्होंने लालू प्रसाद यादव के स्वास्थ्य का हवाला देते हुए सरकार को समय बढ़ाने के लिए पत्र लिखा था। हालांकि अब 18 जून से बंगले से सामान हटाने का काम शुरू हो गया है और ट्रकों व अन्य वाहनों के जरिए सामान 1 पोलो रोड स्थित तेजस्वी यादव के सरकारी आवास में पहुंचाया जा रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
पटना, एजेंसियां। बिहार की राजनीति का चर्चित 10 सर्कुलर रोड बंगला आखिरकार खाली हो रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने गुरुवार को अपने सरकारी आवास से सामान हटाना शुरू कर दिया है। लालू प्रसाद यादव के परिवार का सामान अब नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के सरकारी आवास 1 पोलो रोड में शिफ्ट हो रहा है। पिछले कई दिनों से इस बंगले को लेकर सियासी विवाद जारी था। राजद का पावर सेंटर था दरअसल, पटना स्थित 10 सर्कुलर रोड का सरकारी आवास पिछले 21 वर्षों से पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के पास था। बिहार सरकार के भवन निर्माण विभाग ने यह बंगला राज्य सरकार के मंत्री नंदकिशोर राम को आवंटित कर दिया है। वहीं, राबड़ी देवी को बिहार विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते 39 हार्डिंग रोड स्थित दूसरा सरकारी आवास आवंटित किया गया था, लेकिन उन्होंने लंबे समय तक 10 सर्कुलर रोड खाली नहीं किया। बिहार की राजनीति में यह बंगला लंबे समय से राजद का पावर सेंटर रहा है। 15 दिनों का समय दिया गया था सरकार की ओर से बंगला खाली करने के लिए राबड़ी देवी को 15 दिनों का समय दिया गया था, जिसकी समय-सीमा 15 जून को समाप्त हो गई। इसके बाद 16 जून को उन्होंने लालू प्रसाद यादव के स्वास्थ्य का हवाला देते हुए सरकार को समय बढ़ाने के लिए पत्र लिखा था। हालांकि अब 18 जून से बंगले से सामान हटाने का काम शुरू हो गया है और ट्रकों व अन्य वाहनों के जरिए सामान 1 पोलो रोड स्थित तेजस्वी यादव के सरकारी आवास में पहुंचाया जा रहा है।
सिवान, एजेंसियां। बिहार में सिपाही भर्ती परीक्षा के दौरान फर्जीवाड़े का बड़ा मामला सामने आया है। सिवान जिले में केंद्रीय चयन पर्षद (सिपाही भर्ती) द्वारा आयोजित परीक्षा के दौरान दो फर्जी अभ्यर्थियों को गिरफ्तार किया गया। दोनों आरोपी दूसरे अभ्यर्थियों के स्थान पर परीक्षा देने पहुंचे थे। पुलिस ने उनके पास से फर्जी दस्तावेज, एक ही परीक्षा के दो अलग-अलग प्रवेश पत्र और अन्य संदिग्ध कागजात बरामद किए हैं। दो परीक्षा केंद्रों से हुई गिरफ्तारी यह कार्रवाई 17 जून को प्रथम और द्वितीय पाली की परीक्षा के दौरान सरस्वती शिशु मंदिर परीक्षा केंद्र और दाउद मेमोरियल उर्दू गर्ल्स हाई स्कूल परीक्षा केंद्र पर की गई। परीक्षा केंद्रों पर तैनात दंडाधिकारी और पुलिस टीम ने संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर दोनों अभ्यर्थियों को पकड़ लिया। पूछताछ में उन्होंने अपनी वास्तविक पहचान बताई और परीक्षा में फर्जी तरीके से शामिल होने की बात स्वीकार की। पहले भी दे चुके थे परीक्षा गिरफ्तार आरोपियों की पहचान पटना जिले के पीरपुरा थाना क्षेत्र निवासी सियाराम कुमार और जहानाबाद जिले के मखदूमपुर थाना क्षेत्र निवासी गौतम कुमार के रूप में हुई है। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि दोनों आरोपी 14 जून को मोतिहारी और गोपालगंज में आयोजित इसी भर्ती परीक्षा में भी शामिल हो चुके थे। इससे पुलिस को संगठित परीक्षा गिरोह की आशंका है। नेटवर्क की जांच में जुटी पुलिस तलाशी के दौरान दोनों के पास से एक ही परीक्षा के दो अलग-अलग प्रवेश पत्र मिले, जिनमें जन्मतिथि अलग-अलग दर्ज थी। सभी संदिग्ध दस्तावेज जब्त कर लिए गए हैं। सिवान पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस अब इस फर्जीवाड़े से जुड़े पूरे नेटवर्क की तलाश में जुटी है। सिवान के एसपी पुरन कुमार झा ने कहा कि परीक्षा की शुचिता बनाए रखना पुलिस की प्राथमिकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि परीक्षा में किसी भी तरह की अनियमितता या संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस नियंत्रण कक्ष के हेल्पलाइन नंबर 9031683607 या निकटतम थाने को दें।
कोसी एक्सप्रेस के एसी कोच में तोड़फोड़ और भभुआ इंटरसिटी में यात्रियों के बेहोश होने की घटनाओं ने रेलवे की पूर्व-तैयारियों की पोल खोल दी है; डैमेज कंट्रोल में जुटी रेलवे ने 26 स्पेशल ट्रेनों का किया ऐलान। बिहार में जब भी कोई बड़ी सरकारी भर्ती परीक्षा होती है, तो परिवहन व्यवस्था का चरमराना जैसे एक आम बात हो गई है। मंगलवार को राज्य में आयोजित सिपाही और मद्य निषेध भर्ती परीक्षा के दूसरे दिन यही पुराना और खौफनाक मंजर एक बार फिर देखने को मिला। नौकरी की आस में निकले हजारों युवाओं की भीड़ ने पटना और आसपास से गुजरने वाली ट्रेनों को अपने कब्जे में ले लिया, जिसका सबसे बड़ा खामियाजा उन आम यात्रियों को भुगतना पड़ा, जिनका इस परीक्षा से कोई लेना-देना नहीं था। हालात इस कदर बेकाबू हो गए कि नियमित ट्रेनों का सफर एक बुरे सपने में बदल गया। हटिया से पूर्णिया कोर्ट जाने वाली कोसी एक्सप्रेस इसका सबसे बड़ा शिकार बनी। परीक्षार्थियों की भारी भीड़ जब जबरन एसी कोच में घुसी, तो क्षमता से अधिक दबाव के कारण एसी सिस्टम फेल हो गया। भीड़ का हुड़दंग यहीं नहीं रुका; बी-4 कोच में सवार कुछ छात्रों ने दो खिड़कियों और बाथरूम के शीशे तक तोड़ डाले। इसके अलावा, राजेंद्रनगर स्टेशन पर भी जबरन शीशा निकालने की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था को खुलेआम चुनौती दी। उधर, भभुआ इंटरसिटी एक्सप्रेस का हाल और भी डरावना था। ट्रेन में क्षमता से कई गुना अधिक लोगों के सवार होने से बोगियों के अंदर उमस और गर्मी इतनी बढ़ गई कि कुछ यात्रियों के बेहोश होने की नौबत आ गई। रास्ते के स्टेशनों पर खड़े यात्री ट्रेन में चढ़ने के लिए तरसते रहे। जब भीड़ से परेशान लोगों ने राहत के लिए बार-बार चेन पुलिंग कर ट्रेन को रोकने की कोशिश की, तो हालात और बिगड़ गए और नाराज लोगों द्वारा पथराव की घटना भी सामने आई। यह स्थिति तब उत्पन्न हुई है जब रेलवे पुलिस पहले से ही अलर्ट मोड पर थी। शनिवार देर रात और रविवार सुबह पाटलिपुत्र जंक्शन पर छात्रों के भारी हंगामे और पथराव के बाद पटना जंक्शन सहित सभी प्रमुख स्टेशनों पर सुरक्षा बढ़ा दी गई थी। लेकिन जनसैलाब के आगे यह सारी चाक-चौबंद व्यवस्था पूरी तरह असहाय और बौनी साबित हुई। अब डैमेज कंट्रोल करते हुए रेलवे प्रशासन ने आपातकालीन कदम उठाने शुरू किए हैं। दानापुर मंडल में सुरक्षा तंत्र को मजबूत करते हुए 150 अतिरिक्त आरपीएफ (RPF) जवानों की तत्काल तैनाती की गई है। एक वरिष्ठ कमांडेंट अधिकारी की देखरेख में दानापुर में एक विशेष कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है, जहां से सीसीटीवी के जरिए हर संदिग्ध गतिविधि पर पैनी नजर रखी जा रही है। इसके साथ ही, बुधवार की संभावित भीड़ को नियंत्रित करने और परीक्षार्थियों की सुरक्षित वापसी के लिए रेलवे ने 26 स्पेशल ट्रेनें चलाने का दावा किया है। हालांकि, ये कदम राहत देने वाले हैं, लेकिन ये तस्वीरें एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि प्रशासन पहले से ही इस भारी आवाजाही का सटीक आकलन कर पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं करता, ताकि आम यात्रियों को इस दहशत और घुटन से बचाया जा सके।