नई रिसर्च ने शराब सेवन को लेकर एक अहम चेतावनी दी है। अध्ययन के अनुसार, कम या कभी-कभार शराब पीना भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे Hyperuricaemia का खतरा बढ़ सकता है। यह स्थिति शरीर में यूरिक एसिड के बढ़े स्तर को दर्शाती है, जो आगे चलकर गठिया (गाउट) और हृदय व मेटाबॉलिक बीमारियों का कारण बन सकती है।
यह एक बड़े स्तर का रेट्रोस्पेक्टिव कोहोर्ट अध्ययन था, जिसमें 5,153 जापानी प्रतिभागियों के डेटा का विश्लेषण किया गया।
इन सभी में शुरुआत में हाइपरयूरिसीमिया नहीं था और इन्हें औसतन 5.5 वर्षों तक फॉलो किया गया।
अध्ययन में पाया गया कि जैसे-जैसे शराब की मात्रा बढ़ती है, वैसे-वैसे हाइपरयूरिसीमिया का जोखिम भी बढ़ता जाता है।
पुरुषों में:
महिलाओं में:
सबसे अहम बात यह रही कि कम या कभी-कभार शराब पीने वालों में भी जोखिम बढ़ा हुआ पाया गया।
विश्लेषण में यह भी सामने आया कि शराब का प्रभाव “डोज-डिपेंडेंट” है–यानी जितनी अधिक मात्रा, उतना ज्यादा खतरा।
शराब शरीर में यूरिक एसिड को कई तरीकों से बढ़ाती है:
यह स्टडी उस धारणा को चुनौती देती है कि “थोड़ी-बहुत शराब सुरक्षित होती है।”
विशेषज्ञों का मानना है कि खासकर उन लोगों को, जिन्हें गाउट या मेटाबॉलिक समस्याओं का खतरा है, शराब सेवन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
डॉक्टरों को अब मरीजों के इलाज और सलाह में शराब सेवन को एक अहम जोखिम कारक के रूप में शामिल करना चाहिए।
यह विशेष रूप से उन मरीजों के लिए जरूरी है, जिनमें पहले से Gout या दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई रिसर्च ने शराब सेवन को लेकर एक अहम चेतावनी दी है। अध्ययन के अनुसार, कम या कभी-कभार शराब पीना भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे Hyperuricaemia का खतरा बढ़ सकता है। यह स्थिति शरीर में यूरिक एसिड के बढ़े स्तर को दर्शाती है, जो आगे चलकर गठिया (गाउट) और हृदय व मेटाबॉलिक बीमारियों का कारण बन सकती है। क्या है स्टडी का आधार? यह एक बड़े स्तर का रेट्रोस्पेक्टिव कोहोर्ट अध्ययन था, जिसमें 5,153 जापानी प्रतिभागियों के डेटा का विश्लेषण किया गया। इन सभी में शुरुआत में हाइपरयूरिसीमिया नहीं था और इन्हें औसतन 5.5 वर्षों तक फॉलो किया गया। शराब और जोखिम का सीधा संबंध अध्ययन में पाया गया कि जैसे-जैसे शराब की मात्रा बढ़ती है, वैसे-वैसे हाइपरयूरिसीमिया का जोखिम भी बढ़ता जाता है। पुरुषों में: न पीने वालों में दर: 33.7 प्रति 1,000 व्यक्ति-वर्ष रोजाना 66 ग्राम या अधिक सेवन करने वालों में: 92.7 महिलाओं में: न पीने वालों में दर: 6.1 ज्यादा सेवन करने वालों में: 13.4 सबसे अहम बात यह रही कि कम या कभी-कभार शराब पीने वालों में भी जोखिम बढ़ा हुआ पाया गया। डोज-डिपेंडेंट असर विश्लेषण में यह भी सामने आया कि शराब का प्रभाव “डोज-डिपेंडेंट” है–यानी जितनी अधिक मात्रा, उतना ज्यादा खतरा। शराब शरीर में यूरिक एसिड को कई तरीकों से बढ़ाती है: प्यूरीन मेटाबॉलिज्म को बढ़ाना किडनी से यूरिक एसिड के उत्सर्जन को कम करना क्या कहता है पब्लिक हेल्थ मैसेज? यह स्टडी उस धारणा को चुनौती देती है कि “थोड़ी-बहुत शराब सुरक्षित होती है।” विशेषज्ञों का मानना है कि खासकर उन लोगों को, जिन्हें गाउट या मेटाबॉलिक समस्याओं का खतरा है, शराब सेवन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। डॉक्टरों के लिए क्या संकेत? डॉक्टरों को अब मरीजों के इलाज और सलाह में शराब सेवन को एक अहम जोखिम कारक के रूप में शामिल करना चाहिए। यह विशेष रूप से उन मरीजों के लिए जरूरी है, जिनमें पहले से Gout या दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा है।
नई दिल्ली: दुनिया अभी तक कोविड-19 जैसी महामारी के असर से पूरी तरह उबर नहीं पाई है, ऐसे में एक नई स्टडी ने वैज्ञानिकों और पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स की चिंता बढ़ा दी है। शोध में पाया गया है कि Influenza D virus इंसानी श्वसन तंत्र की कोशिकाओं को संक्रमित करने में सक्षम है और शुरुआती इम्यून प्रतिक्रिया से बच निकलने की क्षमता रखता है। क्या है Influenza D Virus? Influenza D virus आमतौर पर मवेशियों–खासकर गाय और सूअर–में पाया जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में इसके इंसानों तक पहुंचने (zoonotic spillover) की संभावना पर रिसर्च तेज हुई है, खासकर उन लोगों में जो पशुपालन या कृषि से जुड़े हैं। रिसर्च में क्या सामने आया? वैज्ञानिकों ने 2011 से 2020 के बीच पशुओं से लिए गए वायरस सैंपल्स पर अध्ययन किया। इन सैंपल्स को मानव फेफड़ों की कोशिकाओं और श्वसन तंत्र जैसे लैब मॉडल्स पर टेस्ट किया गया। नतीजे चौंकाने वाले थे: वायरस ने इंसानी कोशिकाओं में प्रभावी रूप से खुद को रिप्लिकेट किया कुछ मामलों में इसका स्तर Influenza A virus के बराबर पाया गया इम्यून सिस्टम को कैसे चकमा देता है? इस वायरस की सबसे बड़ी चिंता इसकी “चुपके से हमला” करने की क्षमता है। यह शरीर के शुरुआती इम्यून रिस्पॉन्स को कमजोर कर देता है खासतौर पर Interferon signaling को कम सक्रिय करता है इससे शरीर को वायरस का पता देर से चलता है हालांकि, अगर शरीर में पहले से एंटीवायरल एक्टिविटी बढ़ाई जाए, तो यह वायरस कमजोर पड़ जाता है। क्या महामारी का खतरा है? फिलहाल ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि यह वायरस इंसानों में तेजी से फैल रहा है। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि: बहुत छोटे जेनेटिक बदलाव इसे इंसानों में फैलने लायक बना सकते हैं इसकी मौजूदा क्षमता “स्पिलओवर” का संकेत देती है किन लोगों को ज्यादा खतरा? पशुपालक डेयरी और फार्म वर्कर्स मवेशियों के संपर्क में रहने वाले लोग इन समूहों में पहले ही एंटीबॉडी पाए जाने के संकेत मिले हैं। आगे क्या जरूरी? विशेषज्ञों का कहना है कि: पशुओं में फैल रहे वायरस की निगरानी बढ़ानी होगी इंसान और पशु के बीच संपर्क वाले क्षेत्रों पर खास ध्यान देना होगा समय रहते रिसर्च और तैयारी जरूरी है
नई दिल्ली, एजेंसियां। आज के तेज़-रफ्तार जीवन में एंग्जाइटी (चिंता) एक आम समस्या बनती जा रही है। काम का दबाव, डिजिटल जीवनशैली और अनियमित दिनचर्या के कारण मानसिक तनाव तेजी से बढ़ रहा है, जिसका असर न केवल मानसिक बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते इस समस्या पर ध्यान न दिया जाए, तो यह गंभीर रूप ले सकती है। ऐसे में किन किन उपायों से एंग्जाइटी से उभरा जा सकता हैं। सबसे पहला योग योग को सदियों से मन और शरीर के संतुलन का सबसे प्रभावी तरीका माना गया है। नियमित योगाभ्यास से न केवल तनाव कम होता है बल्कि मन को स्थिरता और शांति भी मिलती है। • बालासन : यह आसन शरीर और मन को गहरा आराम देता है। यह मांसपेशियों के तनाव को कम करता है और मानसिक थकान दूर करने में मदद करता है। • शवासन : शवासन पूर्ण विश्राम का आसन है, जो शरीर और दिमाग दोनों को शांत करता है। यह एंग्जाइटी और तनाव को कम करने में बेहद प्रभावी माना जाता है। • प्राणायाम: सांसों के नियंत्रण की यह प्रक्रिया मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। नियमित प्राणायाम से मन शांत रहता है और ऊर्जा का स्तर संतुलित होता है। • वज्रासन : वज्रासन ध्यान और प्राणायाम के लिए एक बेहतरीन आसन है।यह मन को स्थिर करता है और मानसिक तनाव को कम करने में मदद करता है। खाना खाने के बाद भी इसे किया जा सकता है, जो पाचन में भी सुधार करता है। • भुजंगासन : यह आसन छाती को खोलता है और सांस लेने की क्षमता को बेहतर बनाता है। भुजंगासन करने से मूड बेहतर होता है और तनाव कम होता है। दूसरा आयुर्वेदिक उपचार आयुर्वेद में कई ऐसी जड़ी-बूटियां बताई गई हैं जो चिंता और तनाव को प्राकृतिक रूप से कम करने में मदद करती हैं। • ब्राह्मी: यह मस्तिष्क को शांत करती है और स्मरण शक्ति बढ़ाने में सहायक होती है। ब्राह्मी चिंता के लक्षणों को कम करने में प्रभावी मानी जाती है और इसे चूर्ण, कैप्सूल या तेल के रूप में लिया जा सकता है। • जटामांसी: अनिद्रा और मानसिक तनाव के लिए यह एक उपयोगी औषधि है। यह मस्तिष्क की कार्यक्षमता को बेहतर बनाती है और मन को स्थिरता देती है। • तुलसी: तुलसी को एक शक्तिशाली एंटी-स्ट्रेस हर्ब माना जाता है। यह न केवल चिंता कम करती है बल्कि इम्यून सिस्टम को भी मजबूत बनाती है। इसे चाय में या सीधे पत्तों के रूप में लिया जा सकता है। तीसरा घरेलू उपाय: आसान और असरदार एंग्जाइटी को नियंत्रित करने के लिए कुछ सरल घरेलू उपाय भी बेहद कारगर साबित हो सकते हैं। • गहरी सांस लेना: 4-4-6 तकनीक (सांस लेना, रोकना और छोड़ना) तुरंत राहत देती है। • नियमित व्यायाम: तेज चलना, दौड़ना या योग करने से एंडोर्फिन हार्मोन निकलते हैं, जो तनाव कम करते हैं। • संतुलित आहार: कैफीन का सेवन कम करें, क्योंकि यह घबराहट बढ़ा सकता है। • हर्बल चाय: कैमोमाइल या ग्रीन टी मन को शांत करने में मदद करती है। • अच्छी नींद: रोज़ 7-8 घंटे की नींद लेना मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। • प्राकृतिक संपर्क: घास या मिट्टी पर नंगे पैर चलना मन को सुकून देता है। • अरोमाथेरेपी: लैवेंडर या रोजमेरी के तेल की खुशबू तनाव को कम करती है। एंग्जाइटी आज की जीवनशैली की एक सामान्य लेकिन गंभीर समस्या है। हालांकि, योग, आयुर्वेद और सरल घरेलू उपायों के माध्यम से इसे प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है। यदि इन उपायों को नियमित रूप से अपनाया जाए, तो मानसिक शांति और बेहतर जीवन गुणवत्ता प्राप्त की जा सकती है।