नई दिल्ली, एजेंसियां। सावन सोमवार के व्रत में लोग फल, दूध, मखाना, साबूदाना, कुट्टू और सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजन खाते हैं। हालांकि फलाहार के नाम पर साबूदाना वड़ा, कुट्टू की पूरी और आलू के पकौड़े जैसी तली-भुनी चीजों का ज्यादा सेवन सेहत के लिए परेशानी बढ़ा सकता है।
साबूदाना वड़ा, कुट्टू की पूरी और पकौड़ों को ज्यादा तेल में तलने से इनमें कैलोरी और वसा की मात्रा बढ़ जाती है। इससे व्रत के दौरान पेट भारी होना, अपच और एसिडिटी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए फलाहार में कम तेल में तैयार किए गए व्यंजनों को प्राथमिकता देना बेहतर है।
डीप फ्राई किए गए साबूदाना वड़े की जगह साबूदाना खिचड़ी और कुट्टू की पूरी के बजाय कुट्टू का चीला या सिंघाड़े के आटे की रोटी बेहतर विकल्प हो सकते हैं। इससे व्रत की डाइट अपेक्षाकृत हल्की रखी जा सकती है।
व्रत में ताजे फल, दूध, दही, मखाना और नारियल पानी जैसे विकल्प शामिल किए जा सकते हैं। लंबे समय तक कुछ न खाने से कमजोरी या चक्कर की समस्या हो सकती है, इसलिए स्वास्थ्य और दिनचर्या के अनुसार पर्याप्त तरल लेना जरूरी है।
डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, किडनी, लिवर या हृदय संबंधी बीमारी वाले लोगों को बिना डॉक्टर की सलाह के लंबे समय तक व्रत रखने या अचानक डाइट बदलने से बचना चाहिए। लंबे समय तक खाना न खाने से कुछ लोगों में लो ब्लड शुगर, कमजोरी और डिहाइड्रेशन हो सकता है।
डायबिटीज मरीजों को खासतौर पर लंबे अंतराल और ज्यादा मीठे फलाहार से सावधान रहना चाहिए। वहीं ज्यादा नमक वाला और तला-भुना भोजन ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए भी परेशानी बढ़ा सकता है।
सावन में बारिश और नमी के कारण भोजन जल्दी खराब हो सकता है। ऐसे में व्रत के दौरान ताजा, साफ-सुथरा और अच्छी तरह तैयार भोजन ही खाना चाहिए।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। गर्भावस्था के दौरान अचानक किसी खास चीज को खाने की तेज इच्छा होना आम बात है। कभी मीठा तो कभी नमकीन या खट्टा खाने का मन करना प्रेग्नेंसी क्रेविंग कहलाता है। हालांकि, हर तरह की क्रेविंग को पूरा करना जरूरी नहीं है। गर्भावस्था में खान-पान ऐसा होना चाहिए, जिससे मां और बच्चे दोनों को पर्याप्त पोषण मिल सके। हार्मोन में बदलाव से बढ़ सकती है क्रेविंग गर्भावस्था के दौरान शरीर में प्रोजेस्टेरोन, एस्ट्रोजन और ह्यूमन कोरियोनिक गोनाडोट्रोपिन (hCG) जैसे हार्मोन में तेजी से बदलाव होता है। ये बदलाव मस्तिष्क के उन हिस्सों को प्रभावित कर सकते हैं, जो भूख, स्वाद और गंध को नियंत्रित करते हैं। इसी वजह से गर्भवती महिला को अचानक किसी खास स्वाद या खाद्य पदार्थ की इच्छा हो सकती है। इसके अलावा, गर्भ में बच्चे के विकास के लिए शरीर को आयरन, कैल्शियम, फोलिक एसिड, प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों की जरूरत बढ़ जाती है। हालांकि, किसी खास क्रेविंग को सीधे किसी पोषक तत्व की कमी का निश्चित संकेत मानना सही नहीं है। मिट्टी या चॉक खाने का मन हो तो सावधान कुछ गर्भवती महिलाओं को मिट्टी, चॉक, बर्फ या दूसरी अखाद्य चीजें खाने की इच्छा हो सकती है। इसे पाइका (Pica) कहा जाता है। ऐसी क्रेविंग कभी-कभी आयरन की कमी से जुड़ी हो सकती है। अगर गर्भावस्था में अखाद्य चीजें खाने की इच्छा हो रही है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉक्टर से सलाह लेकर आवश्यक जांच और उपचार कराना बेहतर है। हर क्रेविंग पूरी करना क्यों सही नहीं? गर्भावस्था में बार-बार चिप्स, मिठाई, मीठे पेय, फास्ट फूड और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ खाने से अनावश्यक कैलोरी बढ़ सकती है। इससे वजन बढ़ने और कुछ गर्भावस्था संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। ऐसे खाद्य पदार्थों की जगह पोषक और संतुलित विकल्प लेना बेहतर है। गर्भावस्था में केवल अधिक खाना ही नहीं, बल्कि पौष्टिक और संतुलित भोजन करना ज्यादा जरूरी है। क्रेविंग हो तो अपनाएं ये हेल्दी विकल्प मीठा खाने का मन हो तो फल, खजूर या किशमिश जैसे विकल्प लिए जा सकते हैं। तली-भुनी चीजों की जगह भुने मखाने, नट्स या अन्य पौष्टिक स्नैक्स बेहतर विकल्प हो सकते हैं। दिनभर में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में संतुलित भोजन लेने और पर्याप्त पानी पीने से भी अचानक होने वाली भूख या क्रेविंग को संभालने में मदद मिल सकती है। डॉक्टर ने यदि आयरन, फोलिक एसिड या अन्य सप्लीमेंट्स बताए हैं, तो उन्हें उनकी सलाह के अनुसार लेना चाहिए। कब डॉक्टर से संपर्क करें? अगर क्रेविंग इतनी ज्यादा हो कि सामान्य और संतुलित भोजन प्रभावित होने लगे, अखाद्य चीजें खाने की इच्छा हो या खान-पान और वजन को लेकर चिंता हो, तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। हर गर्भवती महिला की पोषण संबंधी जरूरत अलग हो सकती है। इसलिए अपनी स्वास्थ्य स्थिति और गर्भावस्था के चरण के अनुसार डॉक्टर या योग्य पोषण विशेषज्ञ की सलाह से डाइट प्लान बनाना सबसे सुरक्षित विकल्प है।
तेज बुखार को अक्सर मौसम बदलने या वायरल संक्रमण से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन अगर बुखार के साथ लगातार तेज सिरदर्द, उल्टी, गर्दन में अकड़न, रोशनी से परेशानी या भ्रम जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। ये मेनिन्जाइटिस के संकेत हो सकते हैं। मेनिन्जाइटिस में मस्तिष्क और स्पाइनल कॉर्ड को ढकने वाली झिल्लियों में सूजन हो जाती है। यह वायरस, बैक्टीरिया, फंगस या अन्य संक्रमणों के कारण हो सकता है। इनमें बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस विशेष रूप से गंभीर माना जाता है और तेजी से बिगड़ सकता है। मेनिन्जाइटिस कितना खतरनाक है? मेनिन्जाइटिस के शुरुआती लक्षण कई बार सामान्य वायरल बुखार जैसे लगते हैं। यही वजह है कि लोग इलाज में देरी कर देते हैं। बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस तेजी से गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है और इसके कारण दौरे, बेहोशी, सुनने की क्षमता प्रभावित होना, स्थायी न्यूरोलॉजिकल नुकसान और मृत्यु तक का खतरा हो सकता है। इसलिए संदिग्ध लक्षण दिखाई देने पर तत्काल चिकित्सकीय जांच जरूरी है। इन शुरुआती लक्षणों पर रखें नजर मेनिन्जाइटिस में शुरुआत में ये लक्षण दिखाई दे सकते हैं: तेज बुखार लगातार या बहुत तेज सिरदर्द उल्टी या मतली ठंड लगना शरीर में दर्द अत्यधिक थकान गर्दन में अकड़न अगर बुखार और सिरदर्द के साथ गर्दन अकड़ने लगे या तेज रोशनी सहन न हो, तो इसे सामान्य बुखार मानकर घर पर इलाज करते रहना उचित नहीं है। ये चेतावनी संकेत दिखें तो तुरंत अस्पताल जाएं कुछ लक्षण गंभीर संक्रमण की ओर इशारा कर सकते हैं: गर्दन में तेज अकड़न, असहनीय सिरदर्द, बार-बार उल्टी, रोशनी से परेशानी, भ्रम या बेहोशी, दौरे और त्वचा पर लाल-बैंगनी चकत्ते। विशेष रूप से मेनिंगोकोकल संक्रमण में त्वचा पर असामान्य चकत्ते गंभीर चेतावनी हो सकते हैं। वायरल और बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस में अंतर वायरल मेनिन्जाइटिस कई मामलों में अपेक्षाकृत कम गंभीर होता है और कुछ मरीज बिना विशेष उपचार के भी ठीक हो सकते हैं। इसके विपरीत बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस मेडिकल इमरजेंसी है। इसमें तत्काल चिकित्सकीय मूल्यांकन और उचित एंटीबायोटिक उपचार की जरूरत पड़ सकती है। इलाज में देरी होने पर गंभीर जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए घर पर केवल लक्षणों के आधार पर यह तय करना सही नहीं है कि संक्रमण वायरल है या बैक्टीरियल। किन लोगों में ज्यादा खतरा? मेनिन्जाइटिस का जोखिम कुछ समूहों में अधिक हो सकता है, जिनमें: नवजात और छोटे बच्चे किशोर और युवा बुजुर्ग कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोग कुछ गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोग भीड़भाड़ वाले स्थानों या हॉस्टल में रहने वाले लोग जिनका आवश्यक टीकाकरण पूरा नहीं हुआ है बचाव कैसे करें? मेनिन्जाइटिस से हर मामले में पूरी तरह बचाव संभव नहीं है, लेकिन जोखिम कम किया जा सकता है। समय पर टीकाकरण, हाथों की स्वच्छता, खांसते-छींकते समय मुंह ढकना और संक्रमित व्यक्ति के निकट संपर्क से बचना महत्वपूर्ण कदम हैं। सबसे जरूरी बात: समय बर्बाद न करें तेज बुखार के साथ सिर्फ उल्टी होना मेनिन्जाइटिस साबित नहीं करता, क्योंकि इसके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। लेकिन अगर बुखार के साथ तेज सिरदर्द, गर्दन में अकड़न, रोशनी से परेशानी, भ्रम, दौरे या असामान्य चकत्ते दिखाई दें, तो तुरंत अस्पताल जाना जरूरी है। खासकर बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस में बीमारी तेजी से गंभीर हो सकती है। इसलिए ऐसे लक्षणों में खुद से इलाज करने या इंतजार करने के बजाय डॉक्टर से तत्काल संपर्क करना सबसे सुरक्षित कदम है।
चेन्नई, एजेंसियां। अभिनेत्री शकीला ने हाल ही में अपनी सेहत को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि लंबे समय तक मोबाइल पर गेम खेलने और वीडियो देखने की आदत के कारण उन्हें गर्दन में गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा और आखिरकार करीब ₹3 लाख की सर्जरी करानी पड़ी। शकीला ने अस्पताल से घर लौटने के बाद अपने YouTube चैनल पर वीडियो साझा कर इसकी जानकारी दी। घंटों करवट लेकर खेलती थीं मोबाइल गेम शकीला के मुताबिक वह बिस्तर पर करवट लेकर लगातार करीब चार घंटे तक मोबाइल गेम खेलती थीं। गेमिंग के बाद वह YouTube और Instagram पर घंटों रील्स और वीडियो भी देखती थीं। लंबे समय तक गर्दन को एक ही स्थिति में रखने के कारण उनकी समस्या गंभीर होती चली गई। ₹3 लाख में करानी पड़ी गर्दन की सर्जरी समस्या बढ़ने के बाद शकीला को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी गर्दन की बड़ी सर्जरी की गई। रिपोर्टों के अनुसार इस ऑपरेशन पर करीब ₹3 लाख खर्च हुए। सर्जरी के बाद उन्हें नेक कॉलर पहनने की सलाह दी गई है और फिलहाल उन्हें रोजमर्रा के कुछ कामों में भी मदद की जरूरत पड़ रही है। बच्चों और फोन यूजर्स को दी चेतावनी शकीला ने अपने अनुभव के बाद लोगों से मोबाइल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल न करने की अपील की। उन्होंने खास तौर पर माता-पिता को बच्चों को लंबे समय तक मोबाइल न देने की सलाह दी। उनका कहना है कि फोन उपयोगी है, लेकिन इसका इस्तेमाल जरूरत के मुताबिक ही किया जाना चाहिए। विशेषज्ञों ने भी सही पोस्चर पर दिया जोर स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार समस्या सिर्फ फोन से नहीं, बल्कि लंबे समय तक गलत पोस्चर में फोन इस्तेमाल करने से बढ़ सकती है। स्क्रीन को आंखों के करीब ऊंचाई पर रखना, लगातार एक ही मुद्रा में न रहना और बीच-बीच में ब्रेक लेना गर्दन पर पड़ने वाले दबाव को कम कर सकता है।