आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में “परफेक्ट हेल्थ” पाने की चाहत लोगों को तेजी से सप्लीमेंट्स की ओर धकेल रही है। Ashwagandha, Magnesium और Vitamin D जैसे सप्लीमेंट्स इन दिनों खासा ट्रेंड में हैं। लेकिन सवाल यह है–क्या वास्तव में हर किसी को इनकी जरूरत है?
अमेरिका के आंकड़ों के मुताबिक, आधे से ज्यादा वयस्क किसी न किसी प्रकार का सप्लीमेंट लेते हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। बाजार में करीब 1 लाख से ज्यादा तरह के सप्लीमेंट्स मौजूद हैं–विटामिन्स से लेकर “डिटॉक्स” और “सुपरफूड” तक।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि इनमें से ज्यादातर सप्लीमेंट्स किसी सख्त मेडिकल अप्रूवल प्रक्रिया से नहीं गुजरते, जिससे इनके प्रभाव और सुरक्षा पर सवाल उठते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, सप्लीमेंट्स का काम केवल “पूरक” होना है, यानी जो पोषण आपकी डाइट से नहीं मिल पा रहा, उसे पूरा करना।
कुछ डॉक्टरों के अनुसार, कुछ सप्लीमेंट्स पर अपेक्षाकृत ज्यादा भरोसा किया जा सकता है:
हालांकि, इनकी डोज हर व्यक्ति के लिए अलग होती है और बिना डॉक्टर की सलाह के लेना सही नहीं माना जाता।
Ashwagandha जैसे हर्बल सप्लीमेंट्स को तनाव कम करने और ऊर्जा बढ़ाने के लिए खूब प्रमोट किया जा रहा है, खासकर सोशल मीडिया पर।
लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि सोशल मीडिया पर मिली जानकारी अक्सर अधूरी या भ्रामक हो सकती है।
एक अध्ययन के अनुसार, हर साल हजारों लोग सप्लीमेंट्स के साइड इफेक्ट्स के कारण अस्पताल पहुंचते हैं।
विशेषज्ञों का साफ कहना है:
क्योंकि कोई भी गोली अच्छी जीवनशैली की जगह नहीं ले सकती।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रोसेशिया एक आम लेकिन अक्सर गलत समझी जाने वाली स्किन कंडीशन है। आमतौर पर इसे लालिमा, फ्लशिंग और हल्की त्वचा पर दिखने वाले लक्षणों से जोड़ा जाता है, लेकिन मेलानिन-रिच यानी ब्राउन या डार्क स्किन पर इसकी पहचान काफी अलग और जटिल हो सकती है। यही वजह है कि कई लोग महीनों तक इसका गलत इलाज करते रहते हैं। ब्राउन स्किन पर कैसे दिखता है रोसेशिया डर्मेटोलॉजिस्ट्स के अनुसार, गहरे रंग की त्वचा में रोसेशिया की पहचान लाल रंग से नहीं, बल्कि जलन, गर्माहट, संवेदनशीलता और छोटे-छोटे बंप्स से होती है। कई बार यह हल्के पर्पल या ब्राउन डिसकलरेशन के रूप में भी दिख सकता है। इसी वजह से इसे अक्सर एक्ने (Acne) या “सेंसिटिव स्किन” समझ लिया जाता है, जिससे गलत ट्रीटमेंट शुरू हो जाता है। गलत ट्रीटमेंट कैसे बढ़ाता है समस्या जब त्वचा पर बंप्स और रिएक्शन दिखते हैं, तो लोग अक्सर: हार्श एक्सफोलिएटिंग एसिड्स स्ट्रॉन्ग फेसवॉश एक्ने ट्रीटमेंट प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने लगते हैं। इससे स्किन और ज्यादा इरिटेट हो जाती है और रोसेशिया की इंफ्लेमेशन बढ़ सकती है। रोसेशिया के कारण क्या हैं यह एक क्रॉनिक इंफ्लेमेटरी कंडीशन है, जो कई कारणों से ट्रिगर होती है: जेनेटिक्स (सबसे बड़ा कारण) धूप (UV radiation) गर्मी और पसीना मसालेदार खाना और अल्कोहल स्ट्रेस हार्श स्किनकेयर प्रोडक्ट्स कुछ मामलों में Demodex mites (त्वचा में पाए जाने वाले सूक्ष्म कीट) भी इंफ्लेमेशन को बढ़ा सकते हैं। सही पहचान क्यों जरूरी है रोसेशिया कई अन्य स्किन समस्याओं जैसे: सेबोरहाइक डर्मेटाइटिस कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस ऑटोइम्यून कंडीशंस के साथ ओवरलैप कर सकता है। इसलिए सही डायग्नोसिस के लिए डर्मेटोलॉजिस्ट से जांच जरूरी है। डर्मेटोलॉजिस्ट क्या ट्रीटमेंट सुझाते हैं एक प्रभावी ट्रीटमेंट प्लान आमतौर पर सिंपल और स्किन-फ्रेंडली होता है: 1. बेसिक स्किनकेयर जेंटल क्लींजर फ्रेगरेंस-फ्री मॉइश्चराइज़र रोज़ाना सनस्क्रीन 2. मेडिकेशन Azelaic acid Metronidazole Ivermectin इनमें Azelaic acid खासतौर पर फायदेमंद है क्योंकि यह इंफ्लेमेशन के साथ-साथ पोस्ट-इंफ्लेमेटरी पिग्मेंटेशन को भी कम करने में मदद करता है। 3. लेजर थेरेपी कुछ मामलों में लेजर से रंगत में बदलाव और दाग कम किए जा सकते हैं, लेकिन डार्क स्किन पर यह ट्रीटमेंट केवल अनुभवी विशेषज्ञ से ही करवाना चाहिए। ट्रिगर्स को ट्रैक करना जरूरी रोसेशिया को कंट्रोल करने का सबसे बड़ा तरीका है: अपने ट्रिगर्स को पहचानना स्किन को ओवर-ट्रीट न करना सिंपल और कंसिस्टेंट रूटीन फॉलो करना
नई दिल्ली: कार्डियक सर्जरी के बाद मरीजों की रिकवरी को बेहतर बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली High-Flow Nasal Oxygen Therapy को लेकर एक बड़े क्लीनिकल ट्रायल में चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं। इस अध्ययन में पाया गया कि यह थेरेपी मरीजों के रिकवरी परिणामों में कोई खास सुधार नहीं करती। 1200 से ज्यादा मरीजों पर हुआ अध्ययन यह मल्टीसेंटर, रैंडमाइज्ड क्लीनिकल ट्रायल 17 कार्डियक सर्जरी केंद्रों में किया गया, जिसमें 1,280 वयस्क मरीज शामिल थे। इन मरीजों में Chronic Obstructive Pulmonary Disease, अस्थमा, मोटापा या धूम्रपान का इतिहास जैसे जोखिम कारक मौजूद थे। क्या थी जांच की प्रक्रिया? मरीजों को दो समूहों में बांटा गया– एक समूह को High-Flow Nasal Oxygen Therapy दिया गया दूसरे समूह को सामान्य ऑक्सीजन थेरेपी (Standard Oxygen Therapy) दोनों समूहों को सर्जरी के बाद कम से कम 16 घंटे तक संबंधित उपचार दिया गया। अध्ययन का मुख्य लक्ष्य यह देखना था कि 90 दिनों के भीतर मरीज कितने दिन घर पर स्वस्थ रहते हैं (DAH90)। नतीजे: कोई बड़ा अंतर नहीं अध्ययन के नतीजों में दोनों समूहों के बीच कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया। दोनों समूहों में DAH90 का मीडियन 0 दिन रहा अतिरिक्त रेस्पिरेटरी सपोर्ट की जरूरत में भी कोई खास कमी नहीं देखी गई इससे साफ हुआ कि High-Flow Nasal Oxygen Therapy रिकवरी को तेज करने या जटिलताओं को कम करने में प्रभावी साबित नहीं हुई। क्या बदलेंगे इलाज के तरीके? यह अध्ययन डॉक्टरों के लिए एक अहम संकेत देता है कि सर्जरी के बाद नियमित रूप से HFNOT का इस्तेमाल जरूरी नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि सामान्य ऑक्सीजन थेरेपी (SOT) अधिकांश मरीजों के लिए पर्याप्त और प्रभावी है। आगे की रिसर्च की जरूरत हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि यह अध्ययन केवल हाई-रिस्क मरीजों में प्रोफिलैक्टिक उपयोग पर केंद्रित था। इसलिए यह संभव है कि कुछ विशेष परिस्थितियों या मरीजों के समूह में HFNOT का फायदा मिल सकता है।
एक बड़े फेज-3 ट्रायल में Tuberculosis (टीबी) वैक्सीन रणनीति के नतीजों से मिला-जुला संकेत मिला है। जहां कुल मिलाकर टीबी से बचाव सीमित रहा, वहीं कुछ खास मरीज समूहों में गंभीर (एक्स्ट्रापल्मोनरी) टीबी के खिलाफ बेहतर सुरक्षा देखी गई। क्या था ट्रायल? PreVenTB नाम का यह ट्रायल भारत के 18 केंद्रों पर किया गया, जिसमें 12,717 लोगों को शामिल किया गया। ये सभी ऐसे लोग थे जो टीबी मरीजों के संपर्क में थे। प्रतिभागियों को तीन समूहों में बांटा गया: VPM1002 Immuvac प्लेसीबो (डमी) करीब 38 महीनों तक यह देखा गया कि वैक्सीन टीबी को रोकने में कितनी प्रभावी है। कुल सुरक्षा क्यों रही सीमित? ट्रायल में पाया गया: VPM1002 लेने वालों में 1.68% को टीबी हुआ प्लेसीबो समूह में 2.13% Immuvac समूह में 2.09% यानी वैक्सीन का असर बहुत ज्यादा मजबूत नहीं था और आंकड़ों में अनिश्चितता (confidence interval) भी दिखी। सबसे अहम बात यह रही कि फेफड़ों की टीबी (Pulmonary TB) के खिलाफ कोई खास सुरक्षा नहीं दिखी, जबकि यही सबसे आम और फैलने वाला रूप है। कहां दिखा बेहतर असर? एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी (जो फेफड़ों के बाहर होती है) में बेहतर नतीजे सामने आए: VPM1002 ने लगभग 50% तक सुरक्षा दिखाई कुछ मरीजों में यह प्रभाव 60% से ज्यादा भी रहा खासतौर पर जिन लोगों का ट्यूबरक्युलिन स्किन टेस्ट पॉजिटिव था (यानी पहले से इम्यून प्रतिक्रिया मौजूद थी), उनमें वैक्सीन ज्यादा असरदार रही। बच्चों (6–14 साल) में भी बेहतर सुरक्षा के संकेत मिले, हालांकि इस पर और रिसर्च की जरूरत है। क्या सुरक्षित है वैक्सीन? दोनों वैक्सीन को सुरक्षित पाया गया। लगभग एक-तिहाई लोगों में हल्की स्थानीय प्रतिक्रिया (जैसे इंजेक्शन साइट पर दर्द/सूजन) देखी गई कोई गंभीर साइड इफेक्ट सामने नहीं आया इसका क्या मतलब है? यह स्टडी बताती है कि: अभी तक कोई भी टीबी वैक्सीन सभी प्रकार की टीबी से पूरी सुरक्षा नहीं दे पा रही लेकिन कुछ खास मरीज समूहों में गंभीर टीबी को रोकने में मदद मिल सकती है भविष्य में “टारगेटेड वैक्सीनेशन” (विशेष समूहों पर केंद्रित रणनीति) ज्यादा प्रभावी हो सकती है