रांची। झारखंड की दो राज्यसभा सीटों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। एक सीट शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली है, जबकि दूसरी सीट भाजपा सांसद दीपक प्रकाश का कार्यकाल 21 जून 2026 को पूरा होने के बाद खाली होगी। ताजा राजनीतिक समीकरणों के अनुसार, विधानसभा में संख्या बल के आधार पर सत्ताधारी गठबंधन दोनों सीटें जीतने की स्थिति में दिख रहा है, लेकिन JMM और कांग्रेस के बीच दावेदारी की खींचतान ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।
झारखंड विधानसभा की मौजूदा तस्वीर में JMM, कांग्रेस, राजद और माले मिलाकर सत्ता पक्ष के पास पर्याप्त संख्या है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक उम्मीदवार को जीत के लिए 27–28 वोट की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में एक सीट पर JMM की जीत लगभग तय मानी जा रही है, जबकि दूसरी सीट पर कांग्रेस भी अपना दावा मजबूत कर रही है। यही वजह है कि गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आने लगी है।
कांग्रेस का साफ संकेत है कि वह कम-से-कम एक सीट पर अपना उम्मीदवार उतारना चाहती है। दूसरी ओर, JMM दोनों सीटों पर दावा ठोक रही है। हाल के महीनों में असम चुनाव में तालमेल न बनने और अन्य राजनीतिक घटनाक्रमों ने दोनों दलों के रिश्तों में हल्की खटास की चर्चा को और हवा दी है। अगर यह मतभेद बढ़ता है, तो दूसरी सीट पर मुकाबला रोचक हो सकता है।
भाजपा ने अभी तक अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं। लेकिन अगर वह दूसरी सीट पर उम्मीदवार उतारती है और क्रॉस-वोटिंग या रणनीतिक समर्थन जुटाने में सफल रहती है, तो मुकाबला कांटे का हो सकता है। फिलहाल पूरा खेल इस बात पर टिका है कि JMM और कांग्रेस साथ बैठकर फॉर्मूला निकालते हैं या नहीं। यही तय करेगा कि झारखंड में राज्यसभा चुनाव सिर्फ औपचारिकता रहेगा या बड़ा राजनीतिक मुकाबला बनेगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
हजारीबाग। हजारीबाग जिले के चौपारण प्रखंड में रसोई गैस की भारी किल्लत से आम लोगों का जनजीवन प्रभावित हो गया है। एचपी गैस एजेंसी पर मनमानी और लापरवाही के आरोप लगे हैं, जिसके कारण उपभोक्ताओं को पिछले कई दिनों से घरेलू गैस के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा था। बताया जा रहा है कि एजेंसी का कार्यालय और गोदाम करीब 10 से 15 दिनों तक बंद रहा, जिससे लोगों में नाराजगी बढ़ गई। लंबी कतारों में खड़े रहे उपभोक्ता गैस नहीं मिलने से परेशान उपभोक्ता लगातार एजेंसी के चक्कर लगा रहे थे। एजेंसी के बाहर लोगों की लंबी कतारें देखने को मिलीं, जहां महिलाएं और बुजुर्ग तक कड़ी धूप में गैस सिलेंडर लेकर खड़े नजर आए। उपभोक्ताओं का कहना है कि उन्हें हर दिन सिर्फ आश्वासन दिया जा रहा था, लेकिन गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा था। प्रशासन के दबाव के बाद खुला एजेंसी कार्यालय शिकायत मिलने के बाद चौपारण के अंचल अधिकारी (सीओ) संजय यादव निरीक्षण के लिए गैस एजेंसी पहुंचे। वहां उन्होंने पाया कि एजेंसी का ऑफिस और गोदाम दोनों बंद हैं। एजेंसी संचालक और मैनेजर का मोबाइल नंबर भी स्विच ऑफ मिला। इसके बाद प्रशासन की सख्ती बढ़ी और शुक्रवार को एजेंसी ने अपना कार्यालय खोलकर गैस वितरण शुरू किया। कालाबाजारी और घपले के आरोप ग्राहकों ने एजेंसी पर गैस वितरण में घपले और कालाबाजारी के गंभीर आरोप लगाए हैं। उपभोक्ता सुनीता देवी ने बताया कि डीएसी (DAC) नंबर आने के बावजूद भी गैस नहीं दी जा रही थी और 10 दिन बाद आने को कहा जा रहा था। लोगों का आरोप है कि एजेंसी की मनमानी और कथित कालाबाजारी के कारण यह संकट पैदा हुआ। जांच के बाद होगी कार्रवाई एसडीओ जोहान टुडू ने कहा कि एजेंसी बंद रहने की शिकायतों की जांच कराई जा रही है। यदि जांच में नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो एजेंसी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
रामगढ़। झारखंड के रामगढ़ जिले के पतरातु प्रखंड में पानी की गंभीर किल्लत ने स्थानीय लोगों का सब्र काट दिया। कोतो पंचायत और न्यू मार्केट के सैकड़ों ग्रामीण बाल्टी, डेगची और अन्य बर्तन लेकर प्रखंड कार्यालय पहुंचे और जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। ग्रामीणों का कहना था कि इलाके में लंबे समय से पानी की समस्या बनी हुई है, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा। ग्रामीण अपने बर्तन लेकर पहुंचे प्रदर्शन में ग्रामीण अपने हाथों में खाली बाल्टी और बर्तन लेकर पहुंचे थे। उनका कहना था कि जब घरों में पानी नहीं है, तो ये बर्तन उनकी परेशानी का प्रतीक बन गए हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी और समाजसेवी जयप्रकाश सिंह, ननकी सिंह और मुखिया निधि सिंह ने टोकीसुद जलमीनार के संवेदक पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया और उनकी ब्लैकलिस्टिंग की मांग की। समाजसेवी राहुल कुमार ने कहा समाजसेवी राहुल कुमार ने कहा, “पानी कोई खैरात नहीं है, बल्कि हर नागरिक का अधिकार है। अगर जल्द समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।” उन्होंने प्रशासन पर जल संकट को गंभीरता से लेने और तुरंत कार्रवाई करने की अपील की। ग्रामीणों ने प्रखंड विकास अधिकारी मनोज कुमार गुप्ता को रामगढ़ उपायुक्त के नाम संबोधित ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में स्थायी समाधान की मांग की गई है ताकि इलाके में पानी की समस्या का अंत हो सके। आंदोलन में सैकड़ों लोग शामिल हुए इस आंदोलन में सैकड़ों लोग शामिल हुए, जिनमें महिला और पुरुष दोनों की अच्छी संख्या थी। स्थानीय वार्ड सदस्य और प्रतिनिधियों के साथ आम लोग भी बढ़-चढ़कर शामिल हुए। प्रदर्शन ने यह स्पष्ट कर दिया कि पानी की कमी पूरे इलाके में गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है।ग्रामीणों को उम्मीद है कि प्रशासन उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई करेगा और जल संकट से राहत दिलाएगा। वहीं, अगर समाधान समय पर नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में आंदोलन और तेज हो सकता है। इस घटना ने स्थानीय प्रशासन के लिए चेतावनी भी प्रस्तुत कर दी है कि जनता की समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
रांची। झारखंड के साहिबगंज अवैध खनन मामले में फरार आरोपी राजेश यादव उर्फ दाहू यादव की अग्रिम जमानत याचिका पर शुक्रवार को झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब अदालत के आदेश का इंतजार है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद नहीं किया सरेंडर अंग्रेज़ी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2023 में दाहू यादव को पीएमएलए कोर्ट में सरेंडर करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद वह फरार रहा और अब जमानत याचिका गंभीर स्थिति में है। ED की लगातार कार्रवाई और समन प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दाहू यादव को कई बार समन भेजा, लेकिन वह एक बार भी पेश नहीं हुआ। इसके बाद ED ने अन्य आरोपियों के खिलाफ भी केस दर्ज किया और जांच तेज कर दी। 1250 करोड़ के अवैध खनन का नेटवर्क साहिबगंज में 1250 करोड़ रुपये के अवैध खनन का मामला सामने आया। ED की जांच में कई बड़े नाम शामिल पाए गए, जिनमें पंकज मिश्रा, बच्चू यादव, सुनील यादव और पशुपति यादव शामिल हैं। एजेंसी ने इनके खिलाफ प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट दाखिल किया। जब्त किए गए बैंक खाते, नकद और अवैध उपकरण जांच के दौरान ED ने 37 बैंक खातों में जमा 11.88 करोड़ रुपये जब्त किए। इसके अलावा, छापेमारी में 5.34 करोड़ रुपये नकद, दस्तावेज और अवैध रूप से चल रहे पांच स्टोन क्रशर बरामद हुए। साथ ही पांच अवैध हथियार और कारतूस भी मिले। छापेमारी और केस की शुरुआत ED ने साहिबगंज, बरहेट, राजमहल, मिर्जा चौकी और बरहरवा समेत 19 जगहों पर छापेमारी की। इस पूरे मामले की शुरुआत बरहरवा थाने में दर्ज केस संख्या 85/2020 से हुई थी, जो बाद में मनी लॉन्ड्रिंग जांच के रूप में सामने आया।