रांची। भारतीय पासपोर्ट को लेकर विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के बयान के बाद देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने केंद्र सरकार से सवाल किया है कि यदि पासपोर्ट केवल यात्रा (ट्रैवल) दस्तावेज है और नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया में इसे सबसे पहले स्वीकार किए जाने वाले दस्तावेजों में क्यों शामिल किया गया है। JMM ने सोशल मीडिया पर उठाए सवाल जेएमएम ने सोशल मीडिया के माध्यम से केंद्र सरकार पर विरोधाभासी रुख अपनाने का आरोप लगाया। पार्टी ने कहा कि एक ओर विदेश मंत्रालय पासपोर्ट को केवल ट्रैवल डॉक्यूमेंट बता रहा है, वहीं दूसरी ओर SIR प्रक्रिया में इसे नागरिकता संबंधी प्रमुख दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। पार्टी ने सरकार से इस मुद्दे पर स्पष्टता देने की मांग की है। कांग्रेस और विपक्ष ने भी घेरा इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत और राजद नेता रोहिणी आचार्य ने भी केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो पासपोर्ट जारी करने से पहले होने वाली पुलिस सत्यापन और दस्तावेजों की जांच का औचित्य क्या है। साथ ही उन्होंने पूछा कि आखिर भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कौन-सा दस्तावेज अंतिम रूप से मान्य माना जाएगा। विदेश मंत्रालय ने क्या कहा? पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है, लेकिन यह भारतीय नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं है। मंत्रालय के अनुसार, किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्धारण संबंधित कानूनों और वैधानिक दस्तावेजों के आधार पर किया जाता है। नागरिकता का अंतिम प्रमाण क्या है? कानूनी विशेषज्ञों और पूर्व न्यायिक फैसलों के अनुसार, पासपोर्ट, आधार कार्ड या वोटर आईडी अपने-आप में नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं हैं। भारतीय नागरिकता का निर्धारण मुख्य रूप से नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिककरण, जन्म प्रमाणपत्र, नागरिकता प्रमाणपत्र तथा अन्य वैधानिक दस्तावेजों के आधार पर किया जाता है। इसी मुद्दे को लेकर अब राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है।
रांची। झारखंड में राज्यसभा चुनाव के बाद से ही सियासी हलचल जारी है। जदयू विधायक सरयू राय की ओर से पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ये सुझाव दिया गया कि वो कांग्रेस से नाता तोड़ लें। सरयू राय का कहना है कि कांग्रेस और भाजपा के बिना भी राज्य में गठबंधन की सरकार आराम से चल सकती है। जेएमएम के 34, राजद के 4, भाकपा-माले के 2 विधायकों को मिलाकर संख्या 40 तक पहुंच जाएगी। इसके अलावा जदयू और जेएलकेएम के एक विधायक के समर्थन से ये आंकड़ा 42 तक पहुंच जाएगा, जो बहुमत से लिए पर्याप्त है। सरयू राय ने क्या अमित शाह से अनुमति ली है? जदयू विधायक और पूर्व मंत्री सरयू राय के इस सुझाव के बाद जेएमएम की ओर से तो कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन कांग्रेस भड़क गई है। कांग्रेस की ओर से सरयू राय के सुझाव के बयान पर कड़ा पलटवार किया है। झारखंड प्रदेश कांग्रेस के महासचिव और मीडिया विभाग के संयोजक लाल किशोर नाथ शाहदेव ने तीखा सवाल दागते हुए कहा कि झारखंड में सरकार बनाने का जो फॉर्मूला सरयू राय दे रहे हैं, क्या उसके लिए उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से अनुमति ले ली है? झारखंड में बीजेपी का मंसूबा सफल नहीं होगा-कांग्रेस... कांग्रेस महासचिव ने कहा कि राज्यसभा चुनाव के बाद भाजपा और एनडीए नेताओं की सत्तालोलुपता भी साफ देखी जा सकती है, लेकिन वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव में झारखंड की जनता ने भाजपा को सत्ता से दूर रखने का जनादेश दिया था और आने वाले समय में भी बीजेपी का नापाक मंसूबा झारखंड में सफल नहीं होगा। सरयू राय को क्या पूरे एनडीए का समर्थन है? लाल किशोर नाथ शाहदेव ने कहा कि सरयू राय को सबसे पहले जनता को यह बताना चाहिए कि वे किस गठबंधन और किस पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर आए हैं। उन्होंने कहा कि वे जिस समर्थन की बात कर रहे हैं, क्या उनके साथ पूरा एनडीए गठबंधन भी इस ओर कदम बढ़ा रहा है, या फिर यह सिर्फ उनकी व्यक्तिगत कल्पना मात्र है? लाल किशोर नाथ शाहदेव ने कहा कि विपक्ष चाहे जितने हथकंडे अपना ले, चुनी हुई सरकार को गिराने की उनकी मंशा कभी कामयाब नहीं होगी। सरयू राय के फॉर्मूला की कोई विश्वसनीयता नहीं... कांग्रेस महासचिव ने कहा कि राजनीति में नए साथियों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन क्या इंडी गठबंधन के अन्य घटक दल राजद और भाकपा-माले भी इस बात से सहमत हैं? उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष लगातार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को अस्थिर करने की साजिश रच रहा है। लाल किशोर नाथ शाहदेव ने साफ तौर पर कहा कि सरयू राय जो फॉर्मूला पेश कर रहे हैं, उसकी कोई विश्वसनीयता नहीं है।
रांची। झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। इस बीच नामांकन पत्रों की स्क्रूटनी के दौरान एक दिलचस्प मोड़ आ गया है। एक ओर सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के प्रत्याशियों ने तकनीकी परीक्षा आसानी से पास कर ली है, वहीं निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी का नामांकन नाम-विवाद के कारण अधर में लटक गया है। नाथवानी के दस्तावेजों में नाम के हेर-फेर को लेकर दर्ज कराई गई आपत्ति के बाद चुनाव अधिकारी ने उनके नामांकन को होल्ड पर रख दिया है, जिस पर अब बुधवार सुबह फैसला होना है। नाम के आगे-पीछे का फेर, थम गई नाथवानी की रेस दस्तावेजों की जांच के दौरान निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी के कागजातों में एक तकनीकी त्रुटि सामने आई। शिकायत के मुताबिक, कुछ दस्तावेजों में उनका नाम परिमल नाथवानी दर्ज है, तो कुछ जगहों पर इसे नाथवानी परिमल लिखा गया है। इस तकनीकी उलटफेर को आधार बनाकर उनके नामांकन पर आपत्ति दर्ज कराई गई। मामला गरमाते ही रिटर्निंग ऑफिसर ने फिलहाल नामांकन को होल्ड पर डाल दिया है। पहुंचे नाथवानी, भाजपा नेता जुटे रास्ता निकालने मे विवाद की भनक लगते ही परिमल नाथवानी तुरंत विधानसभा सचिवालय पहुंचे। उन्होंने विधानसभा के प्रभारी सचिव सह रिटर्निंग ऑफिसर रंजीत कुमार के समक्ष उपस्थित होकर अपनी स्थिति स्पष्ट की। इस दौरान रिटर्निंग ऑफिसर के कक्ष में कानूनी पहलुओं को लेकर लंबी मैराथन बैठक और विचार-विमर्श का दौर चला। दिलचस्प बात यह रही कि निर्दलीय उम्मीदवार होने के बावजूद भाजपा के कई वरिष्ठ नेता भी इस दौरान सचिवालय पहुंचे और पूरी प्रक्रिया पर पैनी नजर बनाए रखी, जिससे इस चुनाव के सियासी समीकरणों को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। बैजनाथ राम और प्रणव झा की राह आसान उधर, जेएमएम उम्मीदवार बैजनाथ राम के नामांकन पत्रों की जांच पूरी हो चुकी है और उसे वैध पाया गया है। इसके साथ ही, कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा का पर्चा भी पूरी तरह सही मिला, जिससे उनकी उम्मीदवारी को हरी झंडी मिल गई है। अब बुधवार सुबह 11 बजे होगी सुनवाई रिटर्निंग ऑफिसर ने निर्देश दिया है कि दर्ज आपत्ति पर अंतिम सुनवाई बुधवार सुबह 11 बजे होगी। इस दौरान परिमल नाथवानी या उनके अधिकृत एजेंट को खुद उपस्थित रहना होगा। अब सबकी नजरें कल की सुनवाई पर टिकी हैं कि क्या चुनाव आयोग इस नाम-विवाद को महज एक लिपिकीय (तार्किक) भूल मानकर नाथवानी का नामांकन वैध करता है, या फिर यह तकनीकी पेंच उनकी उम्मीदवारी के लिए कोई बड़ा रोड़ा बनेगा।
रांची। झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां सोमवार को चरम पर रहीं। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि पर सत्तारूढ़ गठबंधन के उम्मीदवारों ने अपना नामांकन पत्र जमा कर दिया। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की ओर से बैद्यनाथ राम और कांग्रेस की ओर से प्रणव झा ने राज्यसभा चुनाव के लिए अपनी दावेदारी पेश की। दोनों उम्मीदवारों के नामांकन के साथ ही राज्य की राजनीति में चुनावी माहौल और गर्म हो गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मौजूदगी रही खास नामांकन प्रक्रिया के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी मौजूद रहे। उन्होंने दोनों प्रत्याशियों का स्वागत करते हुए गठबंधन की मजबूती और एकजुटता का संदेश दिया। उनके साथ गठबंधन के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री की मौजूदगी राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन की एकजुटता का स्पष्ट संकेत है। जीत को लेकर उम्मीदवारों ने जताया भरोसा नामांकन दाखिल करने के बाद बैद्यनाथ राम और प्रणव झा ने अपनी जीत को लेकर विश्वास जताया। दोनों नेताओं ने कहा कि उन्हें गठबंधन के सभी विधायकों का समर्थन प्राप्त है और वे राज्य के हितों को राज्यसभा में मजबूती से उठाने का प्रयास करेंगे। उन्होंने महागठबंधन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का भरोसा भी दिया। समर्थकों की रही भारी मौजूदगी नामांकन केंद्र के बाहर सुबह से ही समर्थकों और कार्यकर्ताओं की भीड़ देखने को मिली। चुनावी नारों और उत्साह के बीच दोनों उम्मीदवारों ने अपना नामांकन दाखिल किया। इस दौरान गठबंधन के नेताओं ने विपक्ष को भी एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की। अब चुनावी समीकरणों पर टिकी निगाहें नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब राजनीतिक दलों और पर्यवेक्षकों की नजर आगामी चुनावी प्रक्रिया पर टिकी है। राज्यसभा सीटों के लिए संख्या बल और समर्थन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर गतिविधियां और तेज होने की संभावना है। गठबंधन को उम्मीद है कि उसके उम्मीदवार आसानी से जीत दर्ज करेंगे, जबकि विपक्ष भी अपनी रणनीति पर नजर बनाए हुए है।
रांची। झारखंड में आगामी राज्यसभा चुनाव से पहले इंडिया ब्लॉक के भीतर शामिल झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे और उम्मीदवार चयन को लेकर सहमति नहीं बन पाई है, जिससे गठबंधन में खींचतान तेज हो गई है। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस ने जहां अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी है, वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा का कहना है कि यह फैसला बिना आपसी सहमति के लिया गया है, जिससे पार्टी के भीतर नाराजगी बढ़ी है। JMM दोनों राज्यसभा सीटों पर उतार सकती है प्रत्याशी वहीं JMM ने स्पष्ट कर दिया है कि वह दोनों राज्यसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार सकती है, जिससे आने वाले दिनों में राजनीतिक समीकरण और अधिक जटिल हो सकते हैं। राजनीतिक समीकरणों के अनुसार, विधानसभा में झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास मजबूत बल संख्या है, जिससे एक सीट पर उसकी जीत लगभग पक्की मानी जा रही है। लेकिन दूसरी सीट को लेकर कांग्रेस और JMM के बीच सीधा टकराव देखा जा रहा है। इस पूरे विवाद के बीच सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर बातचीत और समाधान की कोशिशें जारी हैं, लेकिन फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं है और टकराव के संकेत बने हुए हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि जल्द सहमति नहीं बनी तो इसका असर राज्यसभा चुनाव परिणाम और गठबंधन की एकजुटता पर भी पड़ सकता है। इस विवाद ने झारखंड की सियासत में नए राजनीतिक समीकरणों की अटकलों को भी जन्म दे दिया है।
रांची। राज्यसभा चुनाव को लेकर जारी सरगर्मी के बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अपने एक प्रत्याशी की घोषणा कर दी है। पार्टी विधायक बैजनाथ राम को अपना पहला उम्मीदवार बनाया है। पार्टी का कहना है कि देर शाम तक दूसरे प्रत्याशी की भी घोषणा हो सकती है। मालूम हो कि आज शाम ही प्रदेश कांग्रेस प्रभारी के राजू मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी बात रखने वाले थे, लेकिन उससे पहले ही झामुम ने प्रत्याशी के नाम की घोषणा कर दी है।
रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाले चुनाव से पहले महागठबंधन में मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। कांग्रेस द्वारा बोकारो निवासी प्रणव झा को राज्यसभा उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने दोनों सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की मंशा जाहिर की है। इससे गठबंधन के भीतर राजनीतिक तनाव बढ़ गया है और आने वाले दिनों में सियासी समीकरण बदलने की संभावना जताई जा रही है। कांग्रेस के फैसले पर उठे सवाल कांग्रेस ने गुरुवार देर रात प्रणव झा को उम्मीदवार घोषित किया। इसके बाद पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह सवाल उठने लगे। राजनीतिक हलकों में प्रणव झा को "पैराशूट उम्मीदवार" बताया जा रहा है। उनका जन्म भले ही झारखंड में हुआ हो, लेकिन राज्य की सक्रिय राजनीति में उनकी भूमिका सीमित रही है। बताया जा रहा है कि उनके नाम पर अंतिम फैसला कांग्रेस आलाकमान ने लिया, जिससे प्रदेश कांग्रेस के कुछ नेताओं में नाराजगी है। फुरकान अंसारी ने जताई नाराजगी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और गोड्डा के पूर्व सांसद फुरकान अंसारी ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने संकेत दिया कि वर्षों तक पार्टी के लिए काम करने के बावजूद उनके नाम पर विचार नहीं किया गया। उनकी प्रतिक्रिया ने यह साफ कर दिया कि उम्मीदवार चयन को लेकर कांग्रेस के भीतर भी असंतोष मौजूद है। झामुमो की बैठक में दोनों सीटों पर दावा शुक्रवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास पर झामुमो की अहम बैठक हुई, जिसमें पार्टी के सांसद, विधायक, मंत्री और वरिष्ठ नेता शामिल हुए। बैठक के बाद नेताओं ने स्पष्ट किया कि झामुमो राज्यसभा की दोनों सीटों पर अपना दावा पेश करेगा। नेताओं का कहना है कि राज्य में झामुमो सबसे बड़ा दल है, इसलिए दोनों सीटों पर उसका स्वाभाविक अधिकार बनता है। हफीजुल हसन और बैद्यनाथ राम के बयान मंत्री हफीजुल हसन ने कहा कि पार्टी का रुख पहले से स्पष्ट है और दोनों सीटों पर झामुमो उम्मीदवार उतारना चाहता है। वहीं विधायक बैद्यनाथ राम ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सहमति के बिना उम्मीदवार घोषित कर दिया। उन्होंने कहा कि पार्टी के सभी सांसदों और विधायकों ने दोनों सीटों पर झामुमो उम्मीदवार उतारने की इच्छा जताई है। हेमंत सोरेन के फैसले पर टिकी निगाहें राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस और झामुमो अपने-अपने उम्मीदवार मैदान में उतारते हैं तो महागठबंधन की एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। फिलहाल अंतिम निर्णय के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को अधिकृत किया गया है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि गठबंधन आपसी सहमति से समाधान निकालता है या राज्यसभा चुनाव में टकराव की स्थिति बनती है।
रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए 18 जून को चुनाव होगा। इसको लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। भाजपा ने अपना प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर दी है। पार्टी की चुनाव समिति की बैठक में प्रत्याशी उतारने का फैसला हुआ। इसी बीच सत्तारूढ़ झामुमो ने भारत निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर चुनाव में हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका जताई है। भाजपा की चुनाव समिति की बैठक में कहा गया कि पार्टी को चुनाव लड़ना चाहिए। एक सीट पर सशक्त उम्मीदवार देना चाहिए। पार्टी और उसके सहयोगी दलों को मिलाकर 24 वोट हैं। जीत के लिए सिर्फ चार वोट की जरूरत है। सभी विधायकों से राष्ट्रहित में आग्रह किया जाए कि वे पीएम नरेंद्र मोदी को और मजबूत करें, जिससे झारखंड सहित पूरे देश का विकास हो। बैठक में पार्टी की रणनीति को लेकर भी चर्चा हुई। साथ ही जेएलकेएम विधायक जयराम महतो, आजसू, जदयू व लोजपा (आर) के विधायकों व प्रदेश अध्यक्षों के साथ भी बैठक करने पर सहमति बनी। दावा-पार्टी का कार्यकर्ता ही चुनाव लड़ेगा बैठक के बाद प्रदेश महामंत्री अमर बाउरी ने कहा कि कोई बाहरी नहीं, पार्टी का कार्यकर्ता ही राज्यसभा चुनाव लडेगा। झामुमो के हॉर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा देने की आशंका पर उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ही महागठबंधन का अपने विधायकों पर से भरोसा खत्म हो गया है। झारखंड में राज्यसभा चुनाव में खरीद-फरोख्त की शुरुआत महागठबंधन की पार्टियों ने ही की थी। झामुमो ने आयोग को लिखा पत्र इधर, झामुमो के महासचिव विनोद पांडेय ने चुनाव आयोग को पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका जताई है। कहा है कि गठबंधन के पास दोनों सीटें जीतने के लिए पर्याप्त विधायक हैं। लेकिन, एनडीए के पास सिर्फ 24 विधायक हैं, जो एक सीट जीतने के लिए काफी नहीं है। ऐसे में भाजपा के प्रत्याशी उतारने पर विधायकों को प्रभावित करने के लिए आर्थिक प्रलोभन, बाहरी दबाव या अन्य अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। झामुमो ने आयोग से निष्पक्ष, पारदर्शी और भयमुक्त माहौल में राज्यसभा चुनाव कराने के लिए विशेष निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है। पार्टी ने सीबीआई, ईडी, राज्य खुफिया निदेशालय, केंद्रीय सतर्कता आयोग और राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को भी सतर्क रखने का आग्रह किया है। मतलब साफ है, झारखंड में राज्यसभा की एक सीट को लेकर सियासी घमासान स्क्रिप्ट तैयार दिख रही है। आनेवाले दिनों रोमांचक संघर्ष की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
रांची। रांची से बड़ी राजनीतिक हलचल के बीच झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन आज से पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के समर्थन में चुनावी प्रचार अभियान की शुरुआत कर रहे हैं। दोनों नेता 18 से 20 अप्रैल तक विभिन्न जिलों में टीएमसी उम्मीदवारों के पक्ष में जनसभाएं करेंगे। पुरुलिया से होगी प्रचार की शुरुआत 18 अप्रैल को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन रांची से हेलीकॉप्टर के जरिए पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के काशीपुर सहित कई क्षेत्रों में पहुंचेंगे। यहां वे तीन अलग-अलग स्थानों पर जनसभाओं को संबोधित करेंगे और स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ राजनीतिक परिस्थितियों पर भी अपनी बात रखेंगे। कार्यक्रम के बाद उनका शाम तक रांची लौटने का कार्यक्रम है। तीन दिन तक जारी रहेगा प्रचार अभियान पार्टी के केंद्रीय सचिव अभिषेक प्रसाद पिंटू के अनुसार, 19 और 20 अप्रैल को भी हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों में टीएमसी उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार करेंगे। इस दौरान कई चुनावी रैलियां और जनसभाएं आयोजित की जाएंगी। झामुमो और टीएमसी के बीच मजबूत रणनीतिक गठबंधन झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने पहले ही पश्चिम बंगाल चुनाव में टीएमसी को समर्थन देने की घोषणा कर दी थी और इस बार कोई प्रत्याशी नहीं उतारा है। इसी रणनीति के तहत पार्टी के शीर्ष नेता सीधे चुनावी मैदान में उतरकर टीएमसी के प्रचार में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। प्रभाव वाले क्षेत्रों पर फोकस पार्टी नेताओं का मानना है कि जिन क्षेत्रों में हेमंत और कल्पना सोरेन प्रचार करेंगे, वहां झामुमो का भी प्रभाव देखा जाता है। ऐसे में इसका सीधा लाभ टीएमसी उम्मीदवारों को मिल सकता है। राजनीतिक जानकार इसे विपक्षी एकता और क्षेत्रीय दलों के सहयोग की रणनीति के रूप में देख रहे हैं।
रांची। झारखंड की दो राज्यसभा सीटों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। एक सीट शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली है, जबकि दूसरी सीट भाजपा सांसद दीपक प्रकाश का कार्यकाल 21 जून 2026 को पूरा होने के बाद खाली होगी। ताजा राजनीतिक समीकरणों के अनुसार, विधानसभा में संख्या बल के आधार पर सत्ताधारी गठबंधन दोनों सीटें जीतने की स्थिति में दिख रहा है, लेकिन JMM और कांग्रेस के बीच दावेदारी की खींचतान ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। क्या है सीटों का गणित झारखंड विधानसभा की मौजूदा तस्वीर में JMM, कांग्रेस, राजद और माले मिलाकर सत्ता पक्ष के पास पर्याप्त संख्या है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक उम्मीदवार को जीत के लिए 27–28 वोट की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में एक सीट पर JMM की जीत लगभग तय मानी जा रही है, जबकि दूसरी सीट पर कांग्रेस भी अपना दावा मजबूत कर रही है। यही वजह है कि गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। कांग्रेस बनाम JMM, असली पेच दूसरी सीट पर कांग्रेस का साफ संकेत है कि वह कम-से-कम एक सीट पर अपना उम्मीदवार उतारना चाहती है। दूसरी ओर, JMM दोनों सीटों पर दावा ठोक रही है। हाल के महीनों में असम चुनाव में तालमेल न बनने और अन्य राजनीतिक घटनाक्रमों ने दोनों दलों के रिश्तों में हल्की खटास की चर्चा को और हवा दी है। अगर यह मतभेद बढ़ता है, तो दूसरी सीट पर मुकाबला रोचक हो सकता है। क्या BJP खेल बिगाड़ सकती है? भाजपा ने अभी तक अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं। लेकिन अगर वह दूसरी सीट पर उम्मीदवार उतारती है और क्रॉस-वोटिंग या रणनीतिक समर्थन जुटाने में सफल रहती है, तो मुकाबला कांटे का हो सकता है। फिलहाल पूरा खेल इस बात पर टिका है कि JMM और कांग्रेस साथ बैठकर फॉर्मूला निकालते हैं या नहीं। यही तय करेगा कि झारखंड में राज्यसभा चुनाव सिर्फ औपचारिकता रहेगा या बड़ा राजनीतिक मुकाबला बनेगा।
आदिवासी मुद्दों पर स्थानीय नेतृत्व को बताया अहम, कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन पर भी कसा तंज असम विधानसभा चुनाव को लेकर झारखंड की सियासत में हलचल तेज हो गई है। जदयू नेता और जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कई अहम टिप्पणियां की हैं। वे आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में विश्व जल दिवस के कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे, जहां मीडिया से बातचीत में उन्होंने यह बयान दिया। “स्थानीय मुद्दे ही तय करते हैं चुनाव” सरयू राय ने कहा कि असम के आदिवासी भले ही झारखंड या ओडिशा से गए हों, लेकिन अब वे पूरी तरह स्थानीय समाज में घुल-मिल चुके हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वहां के मतदाता बाहरी हस्तक्षेप के बजाय स्थानीय मुद्दों और नेतृत्व को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में बाहरी राजनीतिक दलों की भूमिका सीमित रह सकती है। हेमंत सोरेन के दौरे पर उठाए सवाल राय ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के असम दौरे को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यह कदम “बदले की राजनीति” का हिस्सा हो सकता है। उनके मुताबिक, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पहले झारखंड आ चुके हैं, ऐसे में यह राजनीतिक प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा सकता है। कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन पर तंज असम चुनाव में संभावित कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन को लेकर भी सरयू राय ने कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इतनी “दिमागी दिवालिया” नहीं है कि बिना सोचे-समझे हवा का रुख देखकर गठबंधन कर ले। हेमंत सोरेन पर नरम रुख भी हालांकि, सरयू राय ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पूरी तरह आलोचना करना सही नहीं होगा। उन्होंने माना कि सोरेन संभवतः असम में रह रहे आदिवासी समुदाय के मुद्दों को उठाकर राजनीतिक आधार मजबूत करना चाहते हैं और अन्य राज्यों में जीत हासिल कर अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की कोशिश कर रहे हैं।
रांचीः असम समेत 5 राज्यों में में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई है। इस बीच झारखंड के मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के अध्यक्ष हेमंत सोरेन की सक्रियता ने पूर्वोत्तर की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। यह साफ हो गया है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन झारखंड के बाद अब हिमंता बिस्वा शर्मा को उन्ही के गढ़ असम में चुनौती देने जा रहे हैं। पिछले सप्ताह ही असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और लोकसभा सांसद गौरव गोगोई से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मुलाकात भी हुई थी। इस बैठक को असम चुनाव के संदर्भ में विपक्षी दलों के संभावित तालमेल और रणनीतिक समन्वय की दिशा में अहम माना जा रहा है। कई सीटों पर उम्मीदवार उतार सकता है झामुमो झारखंड मुक्ति मोर्चा प्रमुख हेमंत सोरेन ने असम विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर उम्मीदवार उतारने का संकेत दिया है। इसे लेकर वो पिछले एक महीने में दो बार असम का दौरा कर चुके हैं। हेमंत सोरेन असम में रहने वाले जनजातीय और चाय बागान में मजदूरी करने वाले झारखंड के आदिवासी वोट बैंक की मदद से संगठन का विस्तार करना चाहते हैं। हिमंता बिस्वा सरमा को घेरने की कोशिश हेमंत सोरेन ने वर्ष 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान ही यह ऐलान किया था कि वो असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को भी चुनाव के वक्त जवाब देंगे। उस दौरान हिमंता बिस्वा सरमा भाजपा और एनडीए प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित करने के लिए कई दिनों तक झारखंड में ही कैंप कर रहे थे। साथ ही हेमंत सोरेन सरकार की नीतियों पर सवाल उठा रहे थे। अब हेमंत सोरेन असम जाकर वहां बीजेपी सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। असम चुनाव को लेकर विपक्षी एकता की कोशिश असम में जेएमएम के बढ़ते प्रभाव के बीच कांग्रेस के महासचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह और झारखंड प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी के. राजू के साथ गौरव गगोई की बैठक भी रांची में हुई थी। राजनीतिक हलकों में इसे असम चुनाव को लेकर विपक्षी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि रांची से ही विपक्षी एकता की कोशिश शुरू हो गई है। सीट बंटवारे पर प्रारंभिक बातचीत जानकारी के अनुसार बैठक में असम विधानसभा चुनाव, झारखंड में चल रही विभिन्न विकास योजनाओं के क्रियान्वयन और समसामयिक राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा हुई। इसके साथ ही असम में झामुमो और कांग्रेस के बीच संभावित सीट बंटवारे और चुनावी तालमेल को लेकर भी प्रारंभिक बातचीत की चर्चा है। एक नए समीकरण की संभावनाओं को बल दरअसल, पिछले लगभग डेढ़ महीने के भीतर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने असम में दो बड़ी जनसभाओं को संबोधित किया है। फरवरी में तिनसुकिया जिले में आयोजित आदिवासी महासभा की रैली और इसके बाद विश्वनाथ जिले में हुई सभा में उमड़ी भीड़ ने वहां की राजनीति में एक नए समीकरण की संभावनाओं को बल दिया है। इन सभाओं में उन्होंने खास तौर पर चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासी समुदाय की पहचान, सम्मान और अधिकारों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। झामुमो का मानना है कि असम में झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से जाकर बसे लाखों आदिवासी समुदाय राजनीतिक रूप से एक महत्वपूर्ण शक्ति हैं, जिनकी आवाज अभी तक मुख्यधारा की राजनीति में अपेक्षित रूप से नहीं उठाई गई है। इसी सामाजिक आधार पर पार्टी वहां अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश कर रही है। झामुमो की नजर देश की 12 करोड़ आदिवासी वोट बैंक पर झामुमो के महासचिव और राज्य सरकार के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का कहना है कि पार्टी का लक्ष्य देश के लगभग 12 करोड़ आदिवासियों की मजबूत आवाज बनना है। उनके अनुसार असम में मिल रहे जनसमर्थन से यह संकेत मिलता है कि वहां के आदिवासी समाज में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर नई उम्मीदें पैदा हो रही हैं। कांग्रेस भी इसे भली भांति समझ रही है। इसलिए वह झारखंड के नेताओं को आगे कर रही है। गौरव गोगोई ने रांची में मीडिया जानकारी दी थी कि कांग्रेस नेतृत्व ने असम विधानसभा चुनाव के लिए झारखंड कांग्रेस नेता बंधु तिर्की को वरीय पर्यवेक्षक बनाया है। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर भाजपा को चुनौती देने की रणनीति तैयार की जा रही है और इसी सिलसिले में झारखंड के नेताओं के साथ भी विचार-विमर्श किया जा रहा है। बहरहाल, रांची में कांग्रेस नेताओं और हेमंत सोरेन की यह मुलाकात केवल औपचारिक शिष्टाचार से आगे बढ़कर असम चुनाव की संभावित रणनीति के एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखी जा रही है। वैसे भी असम में झामुमो की सक्रियता से सबसे ज्यादा चिंता कांग्रेस की ही बढ़ी हुई है। इसलिए कांग्रेस झामुमो की अनदेखी करने की स्थिति में नहीं है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।