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Red Fort Terror Plot Foiled

आतंक की साजिश नाकाम: कौन है शब्बीर लोन, जिसने लाल किला को बनाया था निशाना?

surbhi मार्च 30, 2026 0
Shabbir Ahmed Lone arrest by Delhi Police in terror plot targeting Red Fort
Shabbir Lone Terror Plot Red Fort

देश की सुरक्षा एजेंसियों को एक बड़ी कामयाबी मिली है। दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने एक ऐसे आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश किया है, जो राजधानी दिल्ली समेत कई बड़े शहरों को दहलाने की साजिश रच रहा था। इस मामले में गिरफ्तार हुआ मुख्य आरोपी शब्बीर अहमद लोन अब जांच एजेंसियों के रडार पर है।

कौन है शब्बीर अहमद लोन?

जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर के कंगन इलाके का रहने वाला शब्बीर अहमद लोन एक संदिग्ध आतंकी है, जिसका संबंध पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से बताया जा रहा है। जांच एजेंसियों के अनुसार, वह संगठन के शीर्ष आतंकियों जैसे हाफिज सईद और जकी-उर-रहमान लखवी के संपर्क में रहा है।

ISI से जुड़ा नेटवर्क और बांग्लादेश कनेक्शन

जांच में सामने आया है कि यह पूरा मॉड्यूल पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के समर्थन से चलाया जा रहा था। इसका संचालन बांग्लादेश से किया जा रहा था, जहां से भारत में आतंकियों की भर्ती, फंडिंग और साजिशों को अंजाम दिया जा रहा था।

फरवरी 2026 में इसी नेटवर्क से जुड़े 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें 7 बांग्लादेशी नागरिक थे। ये सभी फर्जी दस्तावेजों के जरिए भारत में छिपे हुए थे।

कैसे रची जा रही थी साजिश?

जांच एजेंसियों के मुताबिक:

  • फर्जी आधार कार्ड बनवाकर आतंकियों को भारत में छिपाया गया
  • एन्क्रिप्टेड ऐप्स के जरिए संपर्क बनाए रखा गया
  • दिल्ली समेत कई शहरों में रेकी की गई
  • खास तौर पर लाल किला जैसे हाई-प्रोफाइल टारगेट को निशाना बनाने की योजना थी

पहले भी रहा है आपराधिक रिकॉर्ड

शब्बीर लोन को साल 2007 में भी हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया था। सजा काटने के बाद वह जमानत पर बाहर आया और फिर बांग्लादेश भाग गया, जहां से उसने दोबारा आतंकी नेटवर्क खड़ा किया।

समय रहते टला बड़ा हमला

जांच एजेंसियों का मानना है कि अगर समय पर कार्रवाई नहीं होती, तो देश में बड़ा आतंकी हमला हो सकता था। इस गिरफ्तारी ने एक बड़े खतरे को टाल दिया है और सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता को साबित किया है।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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यूपी एटीएस ने 'गजवा ए हिंद' की साजिश की नाकाम , पाकिस्तान से जुड़े 4 संदिग्ध गिरफ्तार

लखनऊ, एजेंसियां। उत्तर प्रदेश एंटी टेररिस्ट स्क्वाड (ATS) ने एक बड़ी आतंकी साजिश का पर्दाफाश करते हुए चार संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। एजेंसी के अनुसार, यह गिरोह कथित तौर पर पाकिस्तान-आधारित हैंडलरों के संपर्क में था और देश में आगजनी, तोड़फोड़ तथा दहशत फैलाने की योजना बना रहा था। अधिकारियों ने बताया कि आरोपियों का मकसद संवेदनशील प्रतिष्ठानों, रेलवे संपत्तियों और सार्वजनिक वाहनों को निशाना बनाकर डर और आर्थिक नुकसान का माहौल बनाना था।   सोशल मीडिया और विदेशी नंबरों से जुड़ा था नेटवर्क जांच में सामने आया है कि आरोपी कथित तौर पर Telegram, Signal और Instagram जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिए पाकिस्तान हैंडलरों और कुछ कट्टरपंथी नेटवर्क से जुड़े हुए थे। एटीएस के मुताबिक, मुख्य आरोपी साकिब उर्फ “डेविल” इस नेटवर्क का अहम हिस्सा था। पूछताछ में यह भी सामने आया कि छोटी-छोटी आगजनी की घटनाओं के वीडियो कथित तौर पर हैंडलरों को भेजे जाते थे और बदले में QR कोड के जरिए भुगतान किया जाता था।   लखनऊ, गाजियाबाद और अलीगढ़ में रेकी के आरोप एटीएस के अनुसार, आरोपियों ने लखनऊ, गाजियाबाद और अलीगढ़ समेत कई शहरों में महत्वपूर्ण संस्थानों, रेलवे सिग्नल बॉक्स, सरकारी वाहनों और अन्य प्रतिष्ठानों की रेकी की थी। अधिकारियों का दावा है कि कुछ लोकेशन और वीडियो भी सीमा पार बैठे हैंडलरों को भेजे गए। 2 अप्रैल को रेलवे सिग्नल सिस्टम के पास आगजनी या विस्फोट जैसी घटना को अंजाम देने की तैयारी की बात भी सामने आई, लेकिन उससे पहले ही एटीएस ने कार्रवाई कर दी।   ज्वलनशील पदार्थ और मोबाइल फोन बरामद तलाशी के दौरान एटीएस ने आरोपियों के पास से ज्वलनशील पदार्थ, सात मोबाइल फोन, पर्चे और अन्य सामग्री बरामद की है। अधिकारियों ने आरोपियों के खिलाफ संबंधित धाराओं और गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (UAPA) समेत विभिन्न प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया है। फिलहाल उनसे पूछताछ जारी है और यह पता लगाया जा रहा है कि इस नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल थे।

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नई दिल्ली, एजेंसियां।  केंद्र सरकार ने हाल ही में दावा किया कि भारत नक्सल मुक्त हो गया है। गृह मंत्री अमित शाह ने 30 मार्च को लोकसभा में कहा कि देश अब नक्सलवाद के खतरे से काफी हद तक मुक्त है। लेकिन, क्या यह दावा वाकई सच है या केवल राजनीतिक बयानबाजी है? क्या आंकड़े और घटनाक्रम वाकई नक्सल खतरे को समाप्त करने का संकेत देते हैं, या यह सिर्फ सरकारी आंकड़ों के सहारे बनाई गई एक सकारात्मक छवि है? नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई का असर अब साफ दिखाई दे रहा है। पिछले छह वर्षों में बड़ी संख्या में नक्सलियों ने या तो आत्मसमर्पण किया है या उन्हें गिरफ्तार किया गया है। बड़ी संख्या में नक्सली मारे भी गये हैं।  सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो 1 जनवरी 2020 से 31 जनवरी 2026 तक कुल 4340 नक्सलियों ने सरेंडर किया, जबकि 3644 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया है। वहीं, इस दौरान सुरक्षा बलों ने 666 नक्सलियों को मार गिराया। सरेंडर करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास पर भी सरकार खास ध्यान दे रही है। अब तक 2937 माओवादियों का पुनर्वास किया जा चुका है। इनमें 1496 इनामी नक्सली और 1441 बिना इनाम वाले नक्सली शामिल हैं। इनामी नक्सलियों के पुनर्वास पर सरकार ने कुल 5 करोड़ 64 लाख रुपये खर्च किए हैं। सरकार द्वारा चलाए गए अभियान और फोर्स की मुस्तैदी के कारण पिछले एक साल में प्रदेश में कई बड़े नक्सल लीडर्स ने अपने हथियार डाले हैं। वहीं दूसरी ओर जिन लीडर्स ने विचारधारा को जिंदा रखने के लिए फोर्स के सामने चुनौती बनने की कोशिश की, वो मिट्टी में मिल चुके हैं। लेकिन, क्या यह पुनर्वास नीति वास्तव में प्रभावी है? क्या यह सुनिश्चित कर पा रही है कि नक्सल विचारधारा फिर से नहीं उभरेंगा? क्या आदिवासी इलाकों में विकास और रोजगार की कमी को देखते हुए नक्सली  फिर से नहीं सक्रिय  हो पाएंगे? खासकर झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों  की बात करे तो क्या यहां की वास्तविक स्थिति सरकार के दावे से मेल खाती है? छत्तीसगढ़ का बस्तर अब नक्सल मुक्त होकर लाल आतंक के घोर अंधियारे से निकल चुका है। जिस बस्तर में कभी गोलियों की आवाज सन्नाटे को चीरती थी,वहां अब विकास की  बयार बह रही है। बस्तर के जिन जिलों में नक्सली गतिविधियां थी, वहां पर सुरक्षा कैम्प खुल चुके हैं और बचे हुए कुछ माओवादी अपनी जान बचाकर भाग चुके हैं।  केंद्र सरकार ने संसद में इस बात का ऐलान किया कि अब देश नक्सलवाद की समस्या से मुक्त हो चुका है।    वहीं झारखंड के सारंडा जिला  में सुरक्षा एजेंसियों का अभियान अब अपने अंतिम और निर्णायक चरण में पहुंच चुका है। राज्य का लगभग 95 प्रतिशत इलाका नक्सल मुक्त हो चुका है, जबकि बचे हुए इलाकों, खासकर सारंडा वन क्षेत्र में सुरक्षा बलों का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। भले ही केंद्र सरकार ने नक्सलवाद के पूरे सफाए का दावा किया है, लेकिन हकीकत यह है कि झारखंड में नक्सलियों का अस्तित्व अभी भी बरकरार है। राज्य का सारंडा क्षेत्र आज भी इनाम घोषित नक्सलियों का पनाहगाह बना हुआ है। झारखंड पुलिस मुख्यालय के अनुसार सारंडा में एक करोड़ के इनामी नक्सली असीम मंडल उर्फ आकाश और मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर के साथ लगभग 48 नक्सली मौजूद हैं। पिछले छह महीनों से उनकी कोई बड़ी गतिविधि सामने नहीं आई है।  खुफिया विभाग को सूचना मिली है कि एक करोड़ का इनामी मिसिर बेसरा कभी भी सरेंडर कर सकता है और पुलिस मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारी उनके परिवार के संपर्क में हैं।  झारखंड पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट और 30 मार्च 2026 की अपडेटेड लिस्ट के अनुसार राज्य में इनामी नक्सलियों की संख्या अभी भी 48 है।  आंकड़ों के अनुसार झारखंड में अभी भी 1 करोड़ के दो नक्सली, 25 लाख के दो नक्सली,15 लाख के आठ नक्सली,10 लाख के आठ नक्सली,5 लाख के 16 नक्सली, 2 लाख के पांच नक्सली और 1 लाख  के सात  नक्सली सक्रिय है।  यह लिस्ट दर्शाती है कि नक्सल संगठन अभी भी झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा के बॉर्डर क्षेत्रों में सक्रिय हैं।  ऐसी स्थिति में क्या यह दावा करना सही होगा कि भारत नक्सल मुक्त हो गया है? या सिर्फ आंकड़ों और दावों का खेल है? झारखंड और छत्तीसगढ़ इन संवेदनशील क्षेत्रों का हाल देखते हुए नक्सल मुक्त कहना कितना उचित है।

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Vedic Alamanc: l वैदिक पंचांग l 04 अप्रैल 2026, शनिवार l

दिनांक - 04 अप्रैल 2026 दिन - शनिवार विक्रम संवत 2083 शक संवत -1948 अयन - उत्तरायण ऋतु - वसंत ॠतु मास - वैशाख पक्ष - कृष्ण  तिथि - द्वितीया सुबह 10:08 तक तत्पश्चात तृतीया नक्षत्र - स्वाती रात्रि 09:35 तक तत्पश्चात विशाखा योग - हर्षण दोपहर 02:17 तक तत्पश्चात वज्र राहुकाल - सुबह 09:36 से सुबह 11:09 तक सूर्योदय - 05:43 सूर्यास्त -  06:15 दिशाशूल - पूर्व दिशा मे व्रत पर्व विवरण-   विशेष - द्वितीया को बृहती (छोटा  बैगन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*

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surbhi मार्च 31, 2026 0

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अगर भविष्य में रश्मिका और विजय जीवनसाथी बनते हैं, तो क्या आपको उनकी जोड़ी पसंद होगी?