ओपिनीयन

CBSE Digital India
CBSE विवाद ने खोली डिजिटल भारत की पोल

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) वर्ष 2026 की कक्षा 12वीं की परीक्षा के मूल्यांकन को लेकर एक बहुत बड़े राष्ट्रीय विवाद के घेरे में है। परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद शुरू हुआ यह विवाद केवल छात्रों और अभिभावकों के गुस्से तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें तकनीकी हैकिंग, डेटा लीक के आरोप, विपक्षी दलों का राजनीतिक हमला और अंततः न्यायालय का हस्तक्षेप व बोर्ड के शीर्ष अधिकारियों पर गाज गिरने तक की घटनाएं शामिल हो चुकी हैं। दरअसल यह पूरा मामला ऑन स्क्रीन मार्किंग से जुड़ा है। इसमें दिखी खामियों को लेकर पूरे देश में छात्र नाराज हैं। इस विवाद के कारण बोर्ड के चेयरमैन और सेक्रेट्ररी तक को बदल दिया गया है। इस पूरे मामले में हैकर्स और हैकिंग को मुख्य वजह बताया जा रहा है।  विवाद की मुख्य वजह इस पूरे विवाद की जड़ में सीबीएसई द्वारा पहली बार इतने बड़े पैमाने पर लागू की गई एक नई तकनीक है, जिसे On-Screen Marking (OSM) यानी डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली कहा जाता है। क्या है OSM प्रणाली?  इस व्यवस्था के तहत छात्रों की फिजिकल उत्तर पुस्तिकाओं (हार्डकॉपी) को स्कैन करके एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया जाता है। इसके बाद देश भर के शिक्षक कंप्यूटर या टैबलेट की स्क्रीन पर ही कॉपियों को जांचते हैं और वहीं नंबर देते हैं। सीबीएसई का उद्देश्य बोर्ड का दावा था कि इस प्रणाली से कॉपियों को जांचने में समय कम लगेगा, टोटल करने की गलतियां (Totalling Errors) खत्म होंगी, पारदर्शिता बढ़ेगी और परिणाम जल्दी जारी किए जा सकेंगे। इस कार्य का टेंडर हैदराबाद की एक निजी कंपनी 'कोएम्प्ट एडुटेक' (Coempt EduTeck) को दिया गया था। 12वीं के रिजल्ट के साथ विवाद शुरू मई 2026 के मध्य में जब सीबीएसई ने कक्षा 12वीं के परिणाम घोषित किए, तो देशभर के लगभग 17 लाख से अधिक छात्रों और उनके परिवारों को बड़ा झटका लगा। राष्ट्रीय स्तर पर पास होने वाले छात्रों का प्रतिशत गिरकर 85.20% पर आ गया, जो पिछले 7 वर्षों में सबसे कम था। अपेक्षा से बहुत कम अंक सालभर बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले मेधावी छात्रों को भी बेहद कम और अप्रत्याशित अंक मिले। इसके बाद छात्रों ने सोशल मीडिया पर अपने गुस्से का इजहार करना शुरू कर दिया। क्या-क्या गड़बड़ियां आईं सामने? जब छात्रों ने उत्तर पुस्तिकाओं के वेरिफिकेशन और पुनर्मूल्यांकन (Revaluation) के लिए आवेदन किया और अपनी जांची हुई कॉपियों की स्कैन कॉपी देखी, तो हैरान कर देने वाली कमियां सामने आईं। धुंधली (Blurred) स्कैन कॉपियां हजारों छात्रों ने शिकायत की कि जो डिजिटल कॉपियां उन्हें या परीक्षकों को दिखाई गईं, वे इतनी धुंधली और अस्पष्ट थीं कि एक भी शब्द पढ़ना नामुमकिन था। इसके बावजूद परीक्षकों ने उन पर लाल पेन के टिक लगाकर मनमाने नंबर दे दिए थे। मिसिंग पेजेस (गायब पन्ने) कई उत्तर पुस्तिकाओं के बीच के पन्ने या सप्लीमेंट्री शीट स्कैन होने से छूट गए थे, जिससे उन प्रश्नों का मूल्यांकन ही नहीं हो सका। कॉपियों की अदला-बदली (Mix-up) विवाद तब और भड़क गया जब वेदांत श्रीवास्तव नामक छात्र ने सोशल मीडिया पर सबूत साझा करते हुए बताया कि पुनर्मूल्यांकन पोर्टल पर जो भौतिकी (Physics) की कॉपी अपलोड की गई थी, वह उसकी थी ही नहीं। वह किसी अन्य छात्र की लिखावट थी और उसमें उन सवालों के जवाब थे जो उसने हल ही नहीं किए थे। बाद में सीबीएसई ने इसे 'तकनीकी त्रुटि' मानकर छात्र को सही कॉपी भेजी। सुरक्षा में चूक: हैकिंग का दावा और 'डेटा ब्रीच'.. यह मामला तब और गंभीर हो गया जब इसमें तकनीकी सुरक्षा और साइबर सुरक्षा से जुड़े बड़े खुलासे हुए।  मास्टर पासवर्ड से बाईपास (हैकिंग) निसर्ग अधिकारी नामक एक एथिकल हैकर ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि सीबीएसई के ओएसएम पोर्टल के फ्रंटएंड कोड में एक गंभीर खामी (Vulnerability) थी। एक 'मास्टर पासवर्ड' के जरिए ओटीपी (OTP) सुरक्षा को बाईपास करके सीधे पेपर-चेकिंग डैशबोर्ड में दाखिल हुआ जा सकता था और नंबरों के साथ छेड़छाड़ संभव थी। डेटा लीक का आरोप मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि करीब 20 लाख छात्रों की कॉपियों का डेटा सार्वजनिक डोमेन में असुरक्षित (AWS क्लाउड बकेट के गलत कॉन्फ़िगरेशन के कारण) उपलब्ध था, जिसे कोई भी एक्सेस कर सकता था। यह देश का एक बहुत बड़ा डेटा ब्रीच था। सीबीएसई का बचाव सीबीएसई ने शुरुआत में इन दावों को खारिज किया और कहा कि जिस पोर्टल में खामी की बात कही जा रही है वह केवल सैंपल टेस्टिंग के लिए था, मुख्य डेटाबेस सुरक्षित है। हालांकि, बाद में बोर्ड ने माना कि कमजोरियों को ठीक कर लिया गया है और आईआईटी व सरकारी साइबर सुरक्षा टीमों को तैनात किया गया है। अब तक क्या-क्या कार्रवाई हुई?  इस विवाद के राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ने के बाद सरकार और न्यायिक व्यवस्था में हड़कंप मच गया। अब तक इस मामले में कई बड़े कदम उठाए जा चुके हैं। शीर्ष अधिकारियों पर गिरी गाज विवाद की गंभीरता और छात्रों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया। मई के आखिरी दिनों में सीबीएसई के तत्कालीन चेयरमैन और सचिव को उनके पदों से तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया और उनका तबादला कर दिया गया। सरकार ने पूरे मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन भी किया है। मामला पहुंचा दिल्ली हाईकोर्ट छात्र संगठन एनएसयूआई (NSUI) और कई प्रभावित छात्रों ने दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) में याचिकाएं दायर की हैं। कोर्ट से मांग की गई है कि इस पूरे डिजिटल मूल्यांकन घोटाले और अनियमितताओं की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए ताकि 12वीं के छात्रों का भविष्य बर्बाद न हो। पुनर्मूल्यांकन पोर्टल का दोबारा खुलना विवाद के कारण सीबीएसई को अपनी पुनर्मूल्यांकन (Revaluation) की तारीखों को आगे बढ़ाना पड़ा। नया शेड्यूल जारी कर 1 जून 2026 से 6 जून 2026 तक के लिए ऑनलाइन पोर्टल खोला गया है, जहां छात्र अपने आधार नंबर के जरिए लॉगिन करके उत्तर पुस्तिकाओं की दोबारा जांच के लिए आवेदन कर सकते हैं। कंपनी का भुगतान रोका गया सीबीएसई ने साफ किया है कि ओएसएम सिस्टम का संचालन करने वाली कंपनी 'कोएम्प्ट एडुटेक' को अभी तक कोई भुगतान (Payment) नहीं जारी किया गया है। पुनर्मूल्यांकन और सप्लीमेंट्री परीक्षाओं की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कंपनी पर भारी जुर्माना (Penalty) लगाने पर विचार किया जा रहा है। बिना पूरी तैयारी मतलब हैकर्स को आमंत्रण सीबीएसई का यह विवाद यह दर्शाता है कि बिना पूरी तैयारी, पायलट प्रोजेक्ट और फुल-प्रूफ टेस्टिंग के इतने संवेदनशील और बड़े पैमाने पर टेक्नोलॉजी को लागू करने के क्या गंभीर परिणाम हो सकते हैं। बिना तैयारी के उठाये गये कदम के कारण ही हैकर्स को मौका मिलता है। जहां एक तरफ देश की सबसे बड़ी शिक्षा व्यवस्था को डिजिटल बनाने की कोशिश की जा रही थी, वहीं तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर बरती गई लापरवाही ने लाखों छात्रों के करियर को अधर में लटका दिया है। फिलहाल छात्र अपनी कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन और हाईकोर्ट के फैसले पर नजरें टिकाए हुए हैं। हैकिंग क्या है और हैकर्स कौन होते है हैकिंग (Hacking) और हैकर्स (Hackers) आज के डिजिटल युग के दो ऐसे शब्द हैं, जिन्हें सुनते ही अक्सर लोगों के दिमाग में किसी का बैंक अकाउंट खाली होना या किसी वेबसाइट का बंद होना आता है। लेकिन, विज्ञान और तकनीक की दुनिया में इसका दायरा बहुत बड़ा है। भारत में सीबीएसई की 12वीं की कॉपियों के मूल्यांकन को लेकर उलझा विवाद इसका सबसे ताजा और सटीक उदाहरण है, जहां इससे देश के लाखों छात्र प्रभावित हैं।  इसे ऐसे भी समझा जा सकता है।  हैकिंग क्या है? (What is Hacking?) किसी कंप्यूटर, स्मार्टफोन, नेटवर्क या डिजिटल सिस्टम की कमियों (Vulnerabilities) का पता लगाकर, उसमें अनधिकृत रूप से (यानी बिना अनुमति के) प्रवेश करना या उस पर नियंत्रण पाना हैकिंग कहलाता है। सकारात्मक पहलू: यदि यह काम किसी सिस्टम की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए किया जाए, तो इसे 'एथिकल हैकिंग' (Ethical Hacking) कहते हैं।  नकारात्मक पहलू: यदि यह काम चोरी, जासूसी या किसी को नुकसान पहुंचाने के इरादे से किया जाए, तो यह एक साइबर अपराध (Cyber Crime) है। हैकर्स कौन होते हैं? (Who are Hackers?) हैकर्स वे लोग होते हैं, जिन्हें कंप्यूटर प्रोग्रामिंग, कोडिंग, नेटवर्किंग और ऑपरेटिंग सिस्टम का बहुत गहरा और एडवांस ज्ञान होता है। ये ऐसे विशेषज्ञ होते हैं जो किसी सॉफ्टवेयर या सुरक्षा चक्र की सीमाओं को तोड़कर उसके अंदर का रास्ता खोज निकालते हैं।3. हैकर्स के प्रकार (Types of Hackers)काम करने के तरीके और इरादे (Intent) के आधार पर हैकर्स को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जाता है: 1.    व्हाइट हैट हैकर (White Hat Hackers) इन्हें 'एथिकल हैकर' भी कहा जाता है। ये कानूनी रूप से और किसी कंपनी या सरकार की अनुमति लेकर उनके सिस्टम की सुरक्षा की जांच करते हैं। उद्देश्य: सिस्टम की कमियों को ढूंढकर उन्हें ठीक करना, ताकि कोई चोर (साइबर अपराधी) उसका फायदा न उठा सके। काम: ये सुरक्षा सलाहकार या साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट के रूप में बड़ी कंपनियों में काम करते हैं। 2.    ब्लैक हैट हैकर (Black Hat Hackers) इन्हें आम भाषा में 'साइबर अपराधी' या 'क्रैकर्स' कहा जाता है। ये बिना किसी अनुमति के दूसरों के सिस्टम में जबरन घुसते हैं। उद्देश्य: व्यक्तिगत लाभ, पैसों की उगाही (रैंसमवेयर), डेटा चोरी करना, या किसी संस्था को नुकसान पहुंचाना। काम: क्रेडिट कार्ड फ्रॉड, बैंक डकैती, और वायरस फैलाना। 3.    ग्रे हैट हैकर (Grey Hat Hackers) ये व्हाइट और ब्लैक हैट हैकर्स का मिश्रण होते हैं। ये किसी दुर्भावना से काम नहीं करते, लेकिन बिना अनुमति के किसी के सिस्टम को हैक कर लेते हैं। उद्देश्य: ये केवल अपनी कला दिखाने या मजे के लिए ऐसा करते हैं। अक्सर ये किसी सिस्टम को हैक करने के बाद उसके मालिक को उसकी कमी के बारे में बता देते हैं और कभी-कभी इसे ठीक करने के बदले पैसों की मांग भी करते हैं। 4.    हैकर्स हैकिंग क्यों करते हैं? (Motives behind Hacking) आर्थिक लाभ (Financial Gain): बैंक खातों से पैसे चुराना या कंपनियों का डेटा चुराकर उन्हें ब्लैकमेल करना। जासूसी (Espionage): एक देश द्वारा दूसरे देश की खुफिया सरकारी जानकारियों या मिलिट्री डेटा को चुराना। हैक्टिविज्म (Hacktivism): किसी राजनीतिक, सामाजिक या धार्मिक विचारधारा के विरोध में किसी सरकारी या बड़ी वेबसाइट को हैक करके अपना संदेश प्रदर्शित करना। मनोरंजन या चुनौती (Fun/Challenge): कुछ नौसिखिए हैकर्स केवल अपनी क्षमता को परखने या दूसरों को प्रभावित करने के लिए हैकिंग करते हैं। 5.    हैकिंग से बचने के बुनियादी नियम यदि आप अपने डिजिटल जीवन (मोबाइल और कंप्यूटर) को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें: मजबूत पासवर्ड: हमेशा कठिन पासवर्ड (जैसे: $P@ssw0rd!23$) का उपयोग करें और समय-समय पर बदलते रहें। टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA): अपने सोशल मीडिया और बैंक अकाउंट्स में 'टू-स्टेप वेरिफिकेशन' हमेशा चालू रखें। संदिग्ध लिंक्स से बचें: ईमेल या व्हाट्सएप पर आए किसी भी अनजान या लॉटरी वाले लिंक पर क्लिक न करें। सॉफ्टवेयर अपडेट: अपने फोन और कंप्यूटर के ऑपरेटिंग सिस्टम (OS) और ऐप्स को हमेशा अपडेट रखें, क्योंकि अपडेट्स में सुरक्षा की कमियों को सुधारा जाता है। भारत के पास अपना सर्वर नहीं, डाटा विदेश मे यह माना जाता है कि भारत के पास अपना कोई सर्वर ही नहीं है, लेकिन तकनीकी सच्चाई थोड़ी अलग और गहरी है। वास्तव में भारत के पास सर्वर और डेटा सेंटर्स की कोई कमी नहीं है, लेकिन हमारी असली निर्भरता विदेशी कंपनियों जैसे अमेज़न, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट के क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर पर है। भारत का डेटा संप्रभुता (Data Sovereignty) संकट यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि भारत के पास अपने सर्वर नहीं हैं। भारत सरकार का राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) देश के भीतर कई बड़े डेटा सेंटर्स संचालित करता है, जहां सरकारी विभागों, आधार (UIDAI), और डिजिटल इंडिया का महत्वपूर्ण डेटा स्टोर किया जाता है। इसके अलावा, भारत में निजी डेटा सेंटर्स का बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। असली समस्या सर्वर के न होने की नहीं, बल्कि विदेशी क्लाउड सर्वर पर अत्यधिक निर्भरता की है। भारत का अधिकांश कमर्शियल, सोशल मीडिया और निजी कंपनियों का डेटा अमेरिकी या अन्य विदेशी कंपनियों के सर्वर (जो अक्सर विदेशों में स्थित होते हैं) पर होस्ट किया जाता है। डेटा विदेश में रखने के मुख्य कारण क्लाउड कंप्यूटिंग का एकाधिकार: अमेज़न (AWS), माइक्रोसॉफ्ट (Azure), और गूगल (Google Cloud) जैसी कंपनियों के पास दुनिया का सबसे उन्नत और किफायती इंफ्रास्ट्रक्चर है। भारतीय स्टार्टअप्स और कंपनियों के लिए अपने निजी सर्वर लगाने के बजाय इन विदेशी कंपनियों की सेवाएं लेना बहुत सस्ता और आसान पड़ता है। सॉफ्टवेयर और ऐप्स का विदेशी होना भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले ऐप्स (जैसे व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स) अमेरिकी कंपनियों के हैं। इन ऐप्स का यूजर डेटा स्वाभाविक रूप से उनके अपने वैश्विक सर्वर्स पर ही जाता है। हार्डवेयर निर्माण में कमी सर्वर्स के लिए जरूरी अत्याधुनिक माइक्रोचिप्स, सेमीकंडक्टर्स और प्रोसेसर का निर्माण भारत में नहीं होता। हम आज भी इसके लिए ताइवान, चीन और अमेरिका पर निर्भर हैं। विदेशों में डेटा रखने से हैकिंग और सुरक्षा के खतरे जब भारत के नागरिकों का संवेदनशील डेटा (जैसे वित्तीय जानकारी, व्यक्तिगत विवरण और मेडिकल रिकॉर्ड) विदेशी धरती पर मौजूद सर्वर्स पर स्टोर होता है, तो कई गंभीर सुरक्षा चुनौतियां खड़ी होती हैं: डेटा लीक और साइबर हमले (Data Breaches): विदेशी सर्वर्स पर लगातार बड़े साइबर हमले होते रहते हैं। यदि किसी विदेशी कंपनी का सर्वर हैक होता है, तो करोड़ों भारतीयों का डेटा डार्क वेब पर बिकने के लिए आ जाता है। भू-राजनीतिक जोखिम (Geopolitical Risk): यदि भविष्य में भारत का किसी देश के साथ कूटनीतिक विवाद या युद्ध होता है, तो वह देश भारतीय डेटा तक हमारी पहुंच को ब्लॉक कर सकता है या उस डेटा का इस्तेमाल भारत के खिलाफ जासूसी (Espionage) के लिए कर सकता है। कानूनी पेचीदगियां: यदि विदेश में स्थित किसी सर्वर से डेटा चोरी होता है, तो भारतीय कानून (जैसे आईटी एक्ट) वहां सीधे तौर पर लागू नहीं होते। अपराधियों को पकड़ना और कानूनी कार्रवाई करना बेहद जटिल हो जाता है। सरकार के कदम और आगे की राह भारत सरकार इस खतरे को समझ चुकी है और स्थिति को बदलने के लिए लगातार प्रयास कर रही है: डेटा स्थानीयकरण (Data Localization): भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार ने नियम बनाए हैं कि भारतीय नागरिकों का वित्तीय और बैंकिंग डेटा अनिवार्य रूप से भारत की भौगोलिक सीमा के भीतर ही स्टोर होना चाहिए। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act): इस कानून के जरिए सरकार ने नागरिकों के डेटा की सुरक्षा और उसके विदेशी ट्रांसफर पर कड़े नियम लागू किए हैं। घरेलू डेटा सेंटर्स को बढ़ावा: भारत में मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों को बड़े डेटा सेंटर हब के रूप में विकसित किया जा रहा है, ताकि विदेशी कंपनियों को भी अपने सर्वर भारत में ही लगाने के लिए मजबूर किया जा सके। विदेशी टेक दग्गजों पर निर्भरता खत्म होना जरूरी भारत के पास सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर की क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन विदेशी टेक दिग्गजों पर निर्भरता रातों-रात खत्म नहीं की जा सकती।  भारतीय प्रतिभाएं जा रही विदेश और देश विदेश टेक दिग्गजों पर निर्भर 'ब्रेन ड्रेन' (Brain Drain) यानी भारतीय प्रतिभाओं का विदेशों में पलायन और भारत की विदेशी टेक दिग्गजों (जैसे गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न) पर अत्यधिक निर्भरता, एक ऐसा चक्र है, जो देश की आर्थिक और तकनीकी संप्रभुता के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। एक तरफ हमारे बेहतरीन इंजीनियर और वैज्ञानिक विदेशों को समृद्ध कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हमारा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर विदेशी कंपनियों के हाथों में है। यह एक गंभीर स्थिति है और इसका प्रभावो देश के आम नागरिक पर पड़ रहा है।  भारतीय प्रतिभाओं का पलायन: आंकड़े और हकीकत भारत दुनिया में सबसे ज्यादा इंजीनियर और टेक प्रोफेशनल्स पैदा करने वाले देशों में से एक है। आईआईटी (IIT), एनआईटी (NIT) और अन्य शीर्ष संस्थानों से निकलने वाले देश के सबसे शानदार दिमाग हर साल विदेशों का रुख करते हैं। ग्लोबल कंपनियों के शीर्ष पर भारतीय:  आज दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों की कमान भारतीय मूल के दिग्गजों के हाथों में है। सुंदर पिचई (Alphabet/Google), सत्या नडेला (Microsoft) और अरविंद कृष्णा (IBM) इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। पलायन के मुख्य कारण:  बेहतर पैकेज और जीवन स्तर: विदेशों  में मिलने वाला आर्थिक पैकेज और 'क्वालिटी ऑफ लाइफ' भारत के मुकाबले कहीं बेहतर है। रिसर्च के लिए संसाधनों की कमी: भारत में अत्याधुनिक रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) इंफ्रास्ट्रक्चर और फंडिंग की आज भी भारी कमी है, जो इनोवेटर्स को बाहर जाने पर मजबूर करती है। विदेशी टेक दिग्गजों पर भारत की निर्भरताः इस प्रतिभा पलायन का सीधा असर यह हुआ है कि भारत आज एक बहुत बड़ा उपभोक्ता (Consumer) तो बन गया है, लेकिन तकनीकी रूप से 'आत्मनिर्भर' नहीं हो पाया है। हमारी निर्भरता मुख्य रूप से इन क्षेत्रों में है: क्लाउड और डेटा स्टोरेज: जैसा कि हमने पहले देखा, भारत की अधिकांश कंपनियों और स्टार्टअप्स का डेटा अमेज़न (AWS), गूगल क्लाउड या माइक्रोसॉफ्ट एज़्योर पर होस्ट होता है। ऑपरेटिंग सिस्टम और सॉफ्टवेयर: भारत के 95% से अधिक स्मार्टफोन 'एंड्रॉयड' (गूगल) या 'आईओएस' (एप्पल) पर चलते हैं। कंप्यूटरों में माइक्रोसॉफ्ट विंडोज का एकाधिकार है। हार्डवेयर और सेमीकंडक्टर: सर्वर्स, राउटर्स, और कंप्यूटर चिप्स (Semiconductors) के लिए भारत पूरी तरह विदेशी आयात पर निर्भर है। भारत के आम आदमी पर असर भारतीय प्रतिभाओं का बाहर जाना और विदेशी तकनीक पर निर्भर रहना देश के लिए कई तरह के जोखिम पैदा करता है: आर्थिक नुकसान (Capital Outflow):  भारतीय कंपनियां और सरकार हर साल अरबों डॉलर विदेशी टेक कंपनियों को उनकी सेवाओं (सॉफ्टवेयर लाइसेंस, क्लाउड स्टोरेज) के लिए चुकाती हैं। यह पैसा देश के विकास में लग सकता था, जिससे आम लोगों को लाभ होता, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा। साइबर सुरक्षा और संप्रभुता का खतरा: जब मुख्य तकनीकी ढांचा विदेशी कंपनियों के नियंत्रण में होता है, तो देश का संवेदनशील डेटा सुरक्षित नहीं रहता। युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति में ये कंपनियां अपनी सेवाएं रोक भी सकती हैं। इनोवेशन का नुकसान:  भारत के पास अपनी समस्याओं जैसे कृषि, स्थानीय स्वास्थ्य और ग्रामीण शिक्षा के समाधान के लिए स्वदेशी और कस्टमाइज्ड तकनीक विकसित करने की गति धीमी हो जाती है। क्या बदल रही है स्थिति?  पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार और घरेलू उद्योगों ने इस कमी को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए हैं: स्टार्टअप इकोसिस्टम का उदय: भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है। फ्लिपकार्ट, जोमैटो, और यूपीआई (UPI) जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म्स ने देश में ही उच्च स्तर के रोजगार और इनोवेशन पैदा किए हैं, जिससे कई प्रोफेशनल्स अब भारत में रुक रहे हैं या वापस लौट रहे हैं। सेमीकंडक्टर मिशन:  भारत सरकार ने देश के भीतर ही माइक्रोचिप्स और सेमीकंडक्टर बनाने के लिए अरबों डॉलर के प्रोत्साहन (PLI Scheme)  की घोषणा की है, ताकि हार्डवेयर के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके। स्वदेशी विकल्प: 'डेटा स्थानीयकरण' (Data Localization) और 'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' (जैसे UPI, ONDC) के जरिए भारत विदेशी कंपनियों के एकाधिकार को चुनौती दे रहा है। देश को कैसे मिलेगा भारतीय प्रतिभाओं का लाभ भारतीय प्रतिभाओं का विदेशों में डंका बजना गर्व की बात है, लेकिन यह तब तक अधूरा है जब तक उस प्रतिभा का लाभ खुद भारत को न मिले। भारत को केवल 'सुपर-कंज्यूमर' बनने के बजाय 'सुपर-क्रिएटर' बनना होगा। इसके लिए देश के भीतर ही रिसर्च, बेहतर वेतन और विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर देना अनिवार्य है, ताकि देश की प्रतिभा देश के ही काम आ सके।  डेटा ही इस सदी का 'नया तेल' (New Oil) है। जब तक भारत पूरी तरह से 'डेटा आत्मनिर्भर' नहीं बन जाता और अपने घरेलू क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत नहीं करता, तब तक साइबर सुरक्षा और हैकिंग का यह अदृश्य खतरा देश पर मंडराता रहेगा।

Unknown जून 4, 2026 0
Rajya sabha election
राज्यसभा का रण – JMM का 'खेला' या कांग्रेस से 'मेल-मिलाप'?

रांची। झारखंड की सियासत में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल तैर रहा है—क्या झारखंड मुक्ति मोर्चा, अपनी सहयोगी पार्टी कांग्रेस को राज्यसभा की एक सीट देगी? निर्वाचन आयोग ने झारखंड की दो राज्यसभा सीटों पर 18 जून को चुनाव कराने का एलान कर दिया है। अधिसूचना 1 जून को जारी होने वाली है। एक तरफ जहां सत्ताधारी 'इंडिया' गठबंधन के पास नंबर गेम में पूरी ताकत है, वहीं पर्दे के पीछे शह और मात का ऐसा खेल शुरू हो चुका है, जिसने रांची से लेकर दिल्ली तक हलचल तेज कर दी है। इस बीच, भारतीय जनता पार्टी ने केवल 21 विधायक होने के बावजूद अपना उम्मीदवार उतारने का एलान करके सबको चौंका दिया है। बीजेपी के इस कदम से सत्ताधारी गठबंधन में ऐसी खलबली मची है कि झामुमो को सीधे चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ा है। आइए देखते हैं इस पूरे सियासी गणित और सीट शेयरिंग के पेच पर हमारी यह विशेष ग्राउंड रिपोर्ट।  राज्यसभा की 2 सीटों के लिए होंगे चुनाव  झारखंड की दो राज्यसभा सीटें खाली हो रही हैं। पहली सीट झारखंड के आंदोलनकारी नेता और झामुमो के सर्वेसर्वा रहे स्वर्गीय शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली हुई है। वहीं दूसरी सीट बीजेपी के निवर्तमान सांसद दीपक प्रकाश की है, जिनका कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो रहा है। जीत के लिए 28 वोट की जरूरत नियमों के मुताबिक, इस चुनाव में जीत के लिए एक उम्मीदवार को कम से कम 28 प्रथम वरीयता के वोटों यानी First Preference Votes की जरूरत है। झारखंड विधानसभा में विधायकों की कुल संख्या 81 है। अब जरा नजर डालिए विधानसभा के मौजूदा नंबर गेम पर।   विधानसभा का नंबर गेम कुल सीटें: 81 जीत के लिए जरूरी वोट (प्रति सीट): 28 सत्तारूढ़ 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन: 56 विधायक झामुमो (JMM): 34 कांग्रेस (Congress): 16 राजद (RJD): 04 माले (CPI-ML): 02 (बाहरी समर्थन) विपक्षी एनडीए (NDA) गठबंधन: 24 विधायक भाजपा (BJP): 21 आजसू (AJSU): 01 जदयू (JD-U): 01 लोजपा-आर (LJP-R): 01 इंडी गठबंधन के पास 56 वोट गणित बिल्कुल साफ है। 'इंडिया' गठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं। यानी 28 गुणा 2 बराबर 56! सत्तारूढ़ गठबंधन चाहे तो बेहद आसानी से दोनों की दोनों सीटें अपनी झोली में डाल सकता है। लेकिन, पेच यहीं फंसता है। सवाल यह है कि ये दो सीटें गठबंधन के अंदर किस-किसके खाते में जाएंगी? क्या झामुमो अपनी सहयोगी कांग्रेस को एक सीट सौंपेगी, या अपनी पार्टी की ताकत के दम पर दोनों सीटों पर खुद के उम्मीदवार उतारेगी? कांग्रेस का एक सीट पर दावा इस पूरे मामले पर कांग्रेस का रुख साफ है। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ताओं का कहना है कि वे इस बार एक सीट पर अपना दावा ठोक रहे हैं और इसके लिए गठबंधन के शीर्ष नेताओं से बातचीत हो रही है। लेकिन, झामुमो के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि चूंकि एक सीट झामुमो के अपने नेता शिबू सोरेन की रही है, इसलिए उस पर झामुमो का स्वाभाविक दावा है। वहीं दूसरी सीट पर भी 34 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते झामुमो अपना दावा छोड़ना नहीं चाहती।   इस संबंध में कांग्रेस प्रवक्ता राकेश सिन्हा का कहना है कि "गठबंधन में सभी सहयोगियों का सम्मान होता है। कांग्रेस ने हमेशा राज्य के विकास और गठबंधन धर्म का पालन किया है। हमारा लक्ष्य स्पष्ट है कि हम एक सीट पर चुनाव लड़ें, इसके लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जी और झामुमो के नेतृत्व के साथ जल्द ही समन्वय बैठक होगी और कोई बीच का रास्ता निकाल लिया जाएगा।" वहीं, झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव सह केंद्रीय प्रवक्ता  सुप्रियो भट्टाचार्य का कहना है कि "संख्या बल किसके पास है, यह पूरा देश देख रहा है। हमारे पास 56 विधायकों का अटूट बहुमत है। उम्मीदवार कौन होगा, यह गठबंधन के नेता बैठकर तय करेंगे। लेकिन, यह तय है कि दोनों सीटें 'इंडिया' गठबंधन ही जीतेगा। बीजेपी के पास नंबर नहीं हैं, फिर भी वो उम्मीदवार उतारने की बात कर रहे हैं, जो उनके मंसूबों को साफ करता है।" बीजेपी की एंट्री से खेल हुआ रोचको कांग्रेस और झामुमो अभी आपसी सीट शेयरिंग का फॉर्मूला सुलझा भी नहीं पाए थे कि बीजेपी ने इस रेस में एंट्री मारकर खेल को सस्पेंस से भर दिया है। बीजेपी प्रदेश चुनाव समिति की बैठक में प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी की मौजूदगी में यह फैसला लिया गया कि बीजेपी अपना प्रत्याशी मैदान में उतारेगी। बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि उनके पास अपने और सहयोगियों के मिलाकर 24 वोट हैं और उन्हें जीत के लिए सिर्फ 4 और वोटों की दरकार है। बीजेपी का यह आत्मविश्वास झामुमो के खेमे में डर पैदा करने के लिए काफी था। यही वजह रही कि झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर केंद्रीय जांच एजेंसियों (CBI, ED, CVC) और राज्य के एंटी-करप्शन ब्यूरो को चुनाव के दौरान विशेष सतर्कता बरतने की मांग कर डाली। झामुमो को अंदेशा है कि बीजेपी यहाँ 'बिहार फॉर्मूला' दोहरा सकती है।   क्या है बिहार फॉर्मूला? हाल ही में बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों पर चुनाव के दौरान एनडीए के पास चार सीटों का स्पष्ट बहुमत था, जबकि राजद के पास एक सीट का सुरक्षित आंकड़ा (41 विधायक) था। लेकिन, बीजेपी ने पांचवें उम्मीदवार के तौर पर एक बड़ा दांव खेला। ऐन वक्त पर कांग्रेस और राजद के कुछ विधायकों की अनुपस्थिति और क्रॉस-वोटिंग के कारण एनडीए वह पांचवीं सीट भी झटकने में कामयाब रहा था।  बीजेपी के मूवमेंट पर झामुमो की नजर  बीजेपी के इसी 'सीक्रेट प्लान' और हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका से सत्ताधारी दल फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। बीजेपी के प्रदेश महामंत्री अमर कुमार बाउरी ने झामुमो के इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में हर पार्टी को चुनाव लड़ने का अधिकार है  और अगर गठबंधन को अपने विधायकों पर इतना ही भरोसा है, तो वे डरे हुए क्यों हैं? क्या होगा असर लेकिन, इस शोर के बीच बड़ा सवाल वही खड़ा है—क्या झामुमो कांग्रेस को सीट देगा? राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इसके तीन मुख्य पहलू हैं: विधानसभा चुनाव का असर: पिछले विधानसभा चुनाव में झामुमो ने 34 सीटें जीतकर प्रचंड प्रदर्शन किया है, जबकि कांग्रेस 16 सीटों पर सिमट गई थी। झामुमो इस वक्त खुद को 'बड़े भाई' की मजबूत भूमिका में देख रहा है। सहानुभूति और हक: एक सीट शिबू सोरेन की थी, जिसे झामुमो किसी भी कीमत पर अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहेगा। कांग्रेस का दबाव: कांग्रेस आलाकमान का दबाव है कि राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन को मजबूत दिखाने के लिए झारखंड में उसे एक सीट मिलनी चाहिए। यदि झामुमो कांग्रेस को नजरअंदाज करता है, तो दोनों दलों के बीच मनमुटाव बढ़ सकता है, जिसका असर सरकार चलाने पर भी पड़ सकता है। विपक्ष इसी अंदरूनी कलह और असंतोष की दरार में अपनी जीत की उम्मीदें तलाश रहा है। यदि झामुमो दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारता है, तो नाराज कांग्रेस विधायकों के टूटने या क्रॉस वोटिंग का खतरा बढ़ जाएगा। और अगर झामुमो एक सीट कांग्रेस को दे देता है, तो गठबंधन पूरी तरह सुरक्षित होकर दोनों सीटें आसानी से निकाल सकता है। ..तो कुल मिलाकर तस्वीर यह है कि संख्या बल के आधार पर पलड़ा भले ही झामुमो और कांग्रेस के गठबंधन का भारी हो, लेकिन बीजेपी के दांव ने इस चुनाव को बेहद दिलचस्प बना दिया है। क्या मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बड़ा दिल दिखाते हुए कांग्रेस को एक सीट सौंपेंगे और गठबंधन को सुरक्षित करेंगे? या फिर झामुमो दोनों सीटों पर अड़कर एक बड़ा सियासी जोखिम उठाएगा? 1 जून को नोटिफिकेशन जारी होने के बाद नामांकन के साथ ही इस सस्पेंस से पूरी तरह पर्दा उठ जाएगा।

Unknown मई 27, 2026 0
Parimal Nathwani
नाथवाणी की चर्चा से गरमाई झारखंड की सियासत

झारखंड में राज्यसभा की सीटें भले ही मात्र दो हैं, लेकिन इन दो सीटों पर होनेवाला चुनाव हमेशा ही सियासी भूचाल मचाता रहा है। आगामी 18 जून को फिर से राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव होनेवाले हैं और इसे लेकर अभी से ही यहां की राजनीतिक सियासत गरमा गई है। खास तौर एक नाम यहां जो सियासी गलियारे में तैर रहा है, वह है परिमल नथवाणी का। इस नाम की चर्चा से ही यहां सियासी भूचाल आ गया है। इस नाम से सिर्फ बीजेपी ही नहीं, बल्कि कांग्रेस और अन्य दलों के इच्छुक नेताओं की नींद उड़ी हुई है। जिस भी पार्टी के जो नेता इस चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने के इच्छुक हैं, वे जानते हैं कि झारखंड के राज्यसभा चुनाव में यदि परिमल नथवाणी की एंट्री हुई, तो उन्हें रोकना आसान नहीं होगा। साथ ही उनकी एंट्री से हॉर्स ट्रेडिंग को भी बढ़ावा मिलेगा। संभवतः यही कारण है कि उनका नाम सुनते ही यहां के इच्छुक नेताओं के मुंह का स्वाद बिगड़ जा रहा है। झारखंड से दो बार राज्यसभा सांसद रहे परिमल नथवाणी के फिर से चुनाव लड़ने की चर्चा से सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। बता दें कि भारत निर्वाचन आयोग ने झारखंड में राज्यसभा की 2 सीटों पर होने वाले चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान कर दिया है। आयोग की ओर से चुनाव कार्यक्रम का ऐलान करने के साथ ही झारखंड में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। सीता सोरेन भी रेस मे सियासी सरगर्मी के बीच पूर्व विधायक सीता सोरेन भी राज्यसभा चुनाव की रेस में हैं। समय-समय पर वह अपनी इच्छा व्यक्त करती रहती हैं। हाल में उनकी ओर से पाकुड़ में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा गया कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा नेतृत्व की इच्छा हुई, तो वो राज्यसभा चुनाव मैदान में उतरने को तैयार हैं।   कांग्रेस की ओर से एक सीट पर दावेदारी दूसरी तरफ कांग्रेस भी एक सीट पर दावा कर रही है। कांग्रेस नेताओं ने गठबंधन में भी अपनी बात रखी है। कांग्रेस के कई सीनियर नेता इस बार राज्यसभा पहुंचने की फिराक में हैं। परंतु परिमल नाथवाणी की संभावित एंट्री से सभी का जायका बिगड़ रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद प्रदीप बलमुचू ने नथवाणी को लेकर खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। कांग्रेस से धीरज प्रसाद साहू, पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश ठाकुर, पूर्व मंत्री बंधु तिर्की और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय के नाम की चर्चा है। और ये सभी नेता नहीं चाहते कि नथवाणी चुनाव मैदान में उतरें।  प्रत्याशी को लेकर अभी कोई घोषणा नही प्रत्याशी को लेकर राजनीतिक दलों ने अभी कोई घोषणा नहीं की है। सत्ताधारी दलों झामुमो, कांग्रेस और राजद के बीच अभी सहमति बनाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। वर्तमान स्थिति के अनुसार एकजुटता दिखाने पर सत्ताधारी गठबंधन दोनों सीटें निकाल सकता है। दूसरी ओर संख्य बल में कम होने के बावजूद बीजेपी एक सीट पर दावा कर रही है। इससे ही सभी को कुछ न कुछ खटक रहा है।  झारखंड की 2 सीटों के लिए 18 जून को चुनाव चुनाव आयोग के अनुसार, झारखंड की 2 सीटों के लिए 18 जून को चुनाव होंगे। झारखंड में एक राज्यसभा सीट पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के निधन के बाद से 2025 से ही खाली है। वहीं राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश का कार्यकाल भी 21 जून को खत्म होने वाला रहा है। चुनाव का पूरा कार्यक्रम तिथि    चुनाव कार्यक्रमः 1 जून 2026    अधिसूचना जारी 8 जून    नामांकन की अंतिम तारीख 9 जून    नामांकन पत्रों की जांच 11 जून    नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख 18 जून 2026    सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक मतदान 18 जून    शाम 5 बजे वोटों की गिनती 20 जून    चुनावी प्रक्रिया पूरी

Unknown मई 23, 2026 0
Mamata Banerjee Exit
दीदी, स्टालिन व वाम की विदाई

मई 2026 के विधानसभा चुनाव परिणाम भारतीय राजनीति के इतिहास में एक अमिट अध्याय की तरह दर्ज किए जाएंगे। इन नतीजों ने न केवल सत्ता के समीकरणों को बदला है, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय मतदाता अब 'भावुकता' से अधिक 'अकाउंटेबिलिटी' (जवाबदेही) को प्राथमिकता दे रहा है। पांच राज्यों के इन नतीजों में सबसे अधिक धमक पश्चिम बंगाल की रही, जहां डेढ़ दशक से अजेय मानी जा रही ममता बनर्जी की सत्ता का किला ढह गया। यह केवल एक दल की जीत या हार नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक युग का अंत और नए नैरेटिव का उदय है।   बंगाल: 'परिवर्तन' का चक्र पूरा हुआ पश्चिम बंगाल में भाजपा का शानदार प्रदर्शन और स्पष्ट बहुमत हासिल करना इस चुनाव की सबसे बड़ी हेडलाइन है। 2011 में जिस 'परिवर्तन' के नारे के साथ ममता बनर्जी ने वामपंथ के 34 साल के शासन को उखाड़ा था, 15 साल बाद जनता ने उसी नारे का इस्तेमाल उनके खिलाफ किया। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, संदेशखाली जैसी घटनाओं से उपजा जनाक्रोश और प्रशासनिक तंत्र में 'सिंडिकेट राज' की शिकायतों ने टीएमसी के 'मां, माटी, मानुष' के नारे को खोखला कर दिया।   भाजपा के लिए यह जीत केवल चुनावी सफलता नहीं, बल्कि उसके दशकों के वैचारिक संघर्ष की परिणति है। 'सोनार बांग्ला' का सपना और विकास के वादों ने बंगाल के ग्रामीण अंचलों में पैठ बनाई, जहां कभी वामपंथ का कब्ज़ा हुआ करता था। महिलाओं और युवाओं का जिस तरह से भाजपा की ओर झुकाव बढ़ा, उसने ममता बनर्जी के सबसे मजबूत 'वोट बैंक' में सेंध लगा दी।   वामपंथ का सूर्यास्त और नए सितारों का उदय इन चुनावों ने भारतीय राजनीति के एक और बड़े सच को उजागर किया है—वामपंथ का पूर्ण अवसान। केरल, जो वामपंथी विचारधारा का आखिरी गढ़ था, वहां से भी उनकी विदाई ने 'लाल राजनीति' के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। अब देश के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार का न होना यह दर्शाता है कि उनकी नीतियां आधुनिक भारत की आकांक्षाओं से मेल नहीं खा पा रही हैं। दूसरी ओर, तमिलनाडु में 'थलपति' विजय की पार्टी (TVK) का चौंकाने वाला प्रदर्शन यह संकेत है कि दक्षिण भारत अब परिवारवाद और पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के चक्रव्यूह से बाहर निकलना चाहता है। विजय ने जिस तरह से युवाओं को आकर्षित किया, उसने डीएमके और एआईएडीएमके जैसे दिग्गजों को आत्ममंथन पर मजबूर कर दिया है।   विकास की हैट्रिक और क्षेत्रीय संदेश असम में भाजपा की लगातार तीसरी जीत (हैट्रिक) यह सिद्ध करती है कि सीमावर्ती राज्यों में सुरक्षा और बुनियादी ढांचे का विकास चुनाव जीतने के सबसे ठोस हथियार हैं। वहीं, असम में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की बढ़ती सक्रियता और कुछ सीटों पर दूसरे नंबर पर रहना यह बताता है कि क्षेत्रीय दल अब अपनी सीमाओं को लांघकर नए क्षेत्रों में अपनी पहचान तलाश रहे हैं। आगामी लोकसभा चुनाव का ट्रेलर 2026 के ये नतीजे 2029 के आगामी लोकसभा चुनावों का 'ट्रेलर' माने जा सकते हैं। बंगाल की जीत ने भाजपा को एक मनोवैज्ञानिक बढ़त दी है, जबकि विपक्ष के लिए यह अस्तित्व बचाने की लड़ाई बन गई है। जनता ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सत्ता किसी की जागीर नहीं है। चाहे वह बंगाल की 'दीदी' हों या केरल के कामरेड, अगर शासन में पारदर्शिता और जनता से जुड़ाव की कमी होगी, तो लोकतंत्र की सुनामी बड़े से बड़े दुर्ग को ढहाने में संकोच नहीं करेगी। आज का भारत परिणाम चाहता है  और 2026 का यह महा-जनादेश उसी 'रिजल्ट ओरिएंटेड' राजनीति की एक बड़ी जीत है।

Unknown मई 5, 2026 0
Women reservation
महिला आरक्षण: सशक्तिकरण की राह या राजनीति का रण?

संवाददाता भारत में महिला आरक्षण का मुद्दा केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि दशकों पुरानी राजनीतिक रस्साकशी का केंद्र रहा है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023) के पारित होने के बाद भी, 2026 तक आते-आते यह विषय और अधिक जटिल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गया है। पेश है राजनीति की परत खोलती ये रिपोर्टः भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 'महिला आरक्षण' एक ऐसा शब्द है जो संसद की दहलीज पर पिछले तीन दशकों से गूंज रहा है। सितंबर 2023 में संसद के विशेष सत्र के दौरान नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संवैधानिक संशोधन) का पारित होना एक ऐतिहासिक घटना थी। लेकिन आज, 2026 में, इसके क्रियान्वयन की समयसीमा और शर्तों ने इसे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक बड़े राजनीतिक युद्ध के मैदान में धकेल दिया है। 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' और वर्तमान गतिरोध कानूनः लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित किया जा चुका है। परंतु अप्रैल 2026 में केंद्र की मोदी सरकार जो संशोधन प्रस्ताव लेकर आई, उसका विरोध शुरू हो गया है। इतना ही नहीं, नारी शक्ति वंदन विधेयक संशोधन प्रस्ताव लोकसभा में पास भी नहीं हो सका।   संशोधन में  इस कानून के साथ दो प्रमुख शर्तें जुड़ी हैं:  अगली जनगणना (Census): आरक्षण लागू होने से पहले नई जनगणना का होना अनिवार्य है। परिसीमन (Delimitation): जनगणना के आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाएगा, जिसके बाद ही सीटें आरक्षित होंगी। राजनीतिक विवाद की जड़: विपक्षी दलों का तर्क है कि सरकार ने आरक्षण को "भविष्य की तारीख" (Post-2029) पर धकेल कर महिलाओं के साथ वादाखिलाफी की है। वहीं, सरकार का कहना है कि यह एक पारदर्शी और संवैधानिक प्रक्रिया है, ताकि कोई कानूनी अड़चन न आए। हालिया घटनाक्रम-131वां संशोधन विधेयकः हाल ही में (अप्रैल 2026), केंद्र सरकार ने 131वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया, जिसका उद्देश्य जनगणना और परिसीमन की कड़ी को सरल बनाना था, ताकि आरक्षण को 2029 के चुनावों तक लागू किया जा सके।  सरकार का प्रस्ताव:  लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव दिया गया, ताकि किसी भी मौजूदा सांसद की सीट कम किए बिना महिलाओं को 33% कोटा दिया जा सके। विपक्ष का विरोध और हार:  विपक्षी दलों ने इस 'लिंकेज' (सीटों की संख्या बढ़ाना और परिसीमन) का कड़ा विरोध किया। परिणामस्वरुप, यह विधेयक लोकसभा में आवश्यक बहुमत प्राप्त करने में विफल रहा, जिसे प्रधानमंत्री ने "लोकतंत्र के लिए दुखद" और विपक्ष की "महिला विरोधी मानसिकता" करार दिया। राजनीति के मुख्य केंद्र बिंदुः 'आरक्षण के भीतर आरक्षण' (OBC कोटा) कांग्रेस समेत अधिकांश विपक्षी दलों की मुख्य मांग है कि 33% कोटे के भीतर OBC महिलाओं के लिए अलग से उप-कोटा (Sub-quota) सुनिश्चित किया जाए।"बिना ओबीसी आरक्षण के, यह बिल केवल सवर्ण महिलाओं तक सीमित रह जाएगा।" - यह विपक्ष का प्रमुख नैरेटिव बन चुका है, जिससे सरकार को पिछड़ा वर्ग की राजनीति के मोर्चे पर रक्षात्मक होना पड़ रहा है। दक्षिण बनाम उत्तर भारत का विवादः लोकसभा सीटों के विस्तार और परिसीमन ने क्षेत्रीय राजनीति को गर्मा दिया है। तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है, इसलिए आबादी के आधार पर सीटें बढ़ने से उत्तर भारतीय राज्यों का वर्चस्व बढ़ेगा और दक्षिणी राज्यों का राजनीतिक वजन कम होगा। जाति जनगणना (Caste Census) की मांगः विपक्ष ने महिला आरक्षण को जाति जनगणना से जोड़ दिया है। उनका तर्क है कि जब तक यह पता नहीं चलेगा कि किस जाति की कितनी आबादी है, तब तक आरक्षण का वास्तविक लाभ हाशिए पर खड़ी महिलाओं तक नहीं पहुंचेगा। सांख्यिकीय आईना की वर्तमान स्थितिः भले ही कानून बन गया हो, लेकिन विधायी संस्थाओं में महिलाओं की उपस्थिति अभी भी चिंताजनक है: लोकसभा में 543    सांसद हैं, जिनमें 74 महिलाएं हैं। महिलाओं का प्रतिशत मात्र 13.6% है, जो चिंताजनक है। केंद्र की मोदी सरकार 33 प्रतिशत तक पहुंचाने की कोशिश का दावा कर रही है।   आगामी चुनाव और नैरेटिव की जंग 2029 के आम चुनाव अब दूर नहीं हैं। बीजेपी इसे 'नारी शक्ति' के सम्मान और विपक्ष द्वारा बाधा डालने के रूप में पेश कर रही है। दूसरी ओर, 'इंडिया' (I.N.D.I.A.) गठबंधन इसे 'चुनावी जुमला' और 'परिसीमन का डर' दिखाकर मतदाताओं को गोलबंद कर रहा है। महिला आरक्षण आज केवल सशक्तिकरण का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह संघवाद (Federalism), सामाजिक न्याय (Social Justice) और क्षेत्रीय संतुलन की एक जटिल पहेली बन गया है। जब तक जनगणना और परिसीमन पर राजनीतिक सर्वसम्मति नहीं बनती, तब तक आधी आबादी का पूरा हक फाइलों और चुनावी रैलियों तक ही सीमित रहने की आशंका है। यदि जनगणना 2027 तक पूरी हो जाती है, तो परिसीमन आयोग को अपना काम खत्म करने में कम से कम 2 साल लगेंगे। ऐसे में 2029 के चुनाव में महिला आरक्षण का लागू होना एक बड़ी चुनौती और राजनीतिक संभावना, दोनों है।

Unknown मई 1, 2026 0
Jharkhand Treasury scam
Jharkhand Treasury scam: झारखंड ट्रेजरी घोटाले का बढ़ता दायरा

झारखंड में ट्रेजरी घोटाला रूकने का नाम ही नहीं ले रहा। हर दिन एक नये कोषागार में गड़बड़ी के खुलासे हो रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक घोटाले की आंच राज्य के 15 जिलों तक पहुंच गई और गड़बड़ी की राशि का आंकड़ा 150 करोड़ पार कर चुका है। मतलब बड़ा घोटाला है ये,  पिछले एक दशक से चल रहा था और राज्य को दीमक की तरह चाट रहा था। झारखंड ट्रेजरी घोटाला-2026 एक बड़े वित्तीय संकट और प्रशासनिक विफलता के रूप में उभरा है। यह घोटाला मुख्य रूप से पुलिस विभाग और कोषागार (Treasury) के बीच डेटा हेरफेर और फर्जी वेतन निकासी से जुड़ा है। कैसे होता रहा घोटाला यह घोटाला कोई एकमुश्त डकैती नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर बैठे लोगों द्वारा किया गया एक डिजिटल फ्रॉड है। जांच में ये खुलासे हुएः डेटा हेरफेर: पुलिस विभाग के अकाउंटेंट और कंप्यूटर ऑपरेटरों ने विभागीय कंप्यूटर डेटा में हेरफेर किया। फर्जी वेतन निकासी: मृत पुलिसकर्मियों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों या काल्पनिक नामों के आधार पर फर्जी बैंक खाते जोड़े गए और सालों तक उनमें वेतन और भत्ते (TA/DA) भेजे गए। OTP का खेल: आहरण एवं संवितरण अधिकारियों (DDO) के मोबाइल पर आने वाले OTP का दुरुपयोग कर डिजिटल हस्ताक्षर के जरिए अवैध भुगतान को मंजूरी दी गई। पारिवारिक खातों का उपयोग: मुख्य आरोपियों ने सरकारी पैसा सीधे अपनी पत्नियों या रिश्तेदारों के खातों में ट्रांसफर किया। घोटाले की व्यापकता और प्रभावित जिले शुरुआत में यह मामला बोकारो से शुरू हुआ था, लेकिन अब इसकी आंच राज्य के 15 जिलों तक फैल चुकी है: हजारीबाग: यहां सबसे बड़ी अवैध निकासी करीब ₹15-28 करोड़ की बात सामने आई है। बोकारो: करीब ₹6 करोड़ से ज्यादा का गबन पकड़ा गया है। चाईबासा (पश्चिम सिंहभूम): यहां के पुलिस कोषागार से लगभग ₹26 लाख की अवैध निकासी की पुष्टि हुई है। अन्य जिले: रांची, पलामू, जमशेदपुर, देवघर और रामगढ़ भी जांच के दायरे में हैं। अनुमान है कि यह आंकड़ा ₹150 करोड़ से लेकर ₹500 करोड़ तक जा सकता है। जांच की वर्तमान स्थिति (Status of Investigation)... सरकार ने इस मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए कई स्तरों पर जांच शुरू की है: CID और SIT पूरे मामले की जांच सीआईडी (CID) की विशेष जांच टीम (SIT) कर रही है। हजारीबाग, बोकारो और चाईबासा में कई एफआईआर (FIR) दर्ज की जा चुकी हैं। प्रमुख गिरफ्तारियां अब तक कई छोटे-बड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें बोकारो के अकाउंटेंट कौशल कुमार पांडे, चाईबासा के सिपाही अकाउंटेंट देवनारायण मुर्मू और उनके सहयोगी शामिल हैं। 21 से अधिक बैंक खाते फ्रीज   सीआईडी ने 21 से अधिक संदिग्ध बैंक खातों को फ्रीज कर दिया है और आरोपियों की संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया शुरू की है। हाई-लेवल कमेटी कर रही जांच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देश पर आईएएस अधिकारियों और एजी (AG) ऑफिस के विशेषज्ञों की एक संयुक्त कमेटी बनाई गई है, जो सभी 24 जिलों की 33 ट्रेजरी का ऑडिट कर रही है। घोटाले का असर वेतन पर रोक: जांच के कारण राज्य के लगभग 70,000 से 80,000 पुलिसकर्मियों का वेतन मार्च 2026 से रुक गया था, क्योंकि डेटा वेरिफिकेशन की प्रक्रिया चल रही है। इसके अलावा अन्य विभागों का वेतन भुगतान भी लंबित है।  विपक्ष का हमला बीजेपी ने इसे "सफेदपोशों" का संरक्षण प्राप्त घोटाला बताते हुए CBI जांच की मांग की है। बाबूलाल मरांडी और अन्य नेताओं ने सरकार पर प्रशासनिक ढिलाई के आरोप लगाए हैं। प्रशासनिक बदलाव   सरकार ने आदेश दिया है कि 3 साल से अधिक समय से एक ही ट्रेजरी या विभाग में जमे कर्मचारियों का तुरंत तबादला किया जाए। जांच की आंच कहां तक पहुंची? वर्तमान में जांच केवल निचले स्तर के क्लर्कों या अकाउंटेंट तक ही सीमित नहीं है। सीआईडी इस बात की जांच कर रही है कि क्या इतने बड़े पैमाने पर निकासी बिना उच्च अधिकारियों (DDO और ट्रेजरी ऑफिसर्स) की मिलीभगत के संभव थी? यह भी खुलासा हुआ है कि राज्य के पांच जिलों के एसपी के खाते में पैसे ट्रांसफर हुए हैं।   जांच अब उस 'सिंडिकेट' को खोजने की ओर बढ़ रही है, जो राज्य भर के कोषागारों में एक ही पैटर्न पर फ्रॉड कर रहा था। यदि बड़े अधिकारियों की संलिप्तता के प्रमाण मिलते हैं, तो आने वाले दिनों में कुछ कड़े प्रशासनिक निलंबन देखने को मिल सकते हैं।

Unknown मई 1, 2026 0
Asha Bhosle tribute
गायकी के एक युग का अंत - आशा भोसले

भारतीय संगीत जगत ने एक ऐसा सितारा खो दिया है, जिसकी चमक सदियों तक महसूस की जाती रहेगी। आशा भोसले के निधन ने हिंदी सिनेमा को गहरे शोक में डुबो दिया है। स्वर-साम्राज्ञी ने मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली। 11 अप्रैल को चेस्ट इन्फेक्शन के चलते उन्हें भर्ती कराया गया था, लेकिन 12 अप्रैल को मल्टी ऑर्गन फेलियर के कारण यह अमर स्वर सदा के लिए मौन हो गया। उनके जाने की खबर से फिल्म और संगीत जगत स्तब्ध है मानो एक युग, एक एहसास और एक धड़कन अचानक थम गई हो।   सुरों की मल्लिका आशा भोसले आशा भोसले की आवाज केवल सुरों का मेल नहीं थी, बल्कि भावनाओं की जीवंत अभिव्यक्ति थी। उनके गीतों में प्यार की मिठास, विरह की पीड़ा, खुशी की खनक और दर्द की गहराई एक साथ सुनाई देती थी। “ये क्या जगह है दोस्तों” (उमराव जान) से लेकर “पिया तू अब तो आ जा” (कारवां) तक, उन्होंने हर शैली में अपनी अद्वितीय छाप छोड़ी। यही वजह है कि उनके गीत केवल सुने नहीं जाते, बल्कि महसूस किए जाते हैं।   उनका जन्म  8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में जन्मी आशा भोसले महान संगीतकार दीनानाथ मंगेशकर की पुत्री थीं। वह लता मंगेशकर की छोटी बहन थीं और दोनों ने मिलकर सात दशकों तक हिंदी प्लेबैक सिंगिंग की दुनिया पर राज किया। आशा ने 20 भाषाओं में लगभग 12,000 गीत गाकर एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया, जिसकी बराबरी करना लगभग असंभव है। उन्होंने 10 वर्ष की आयु में मराठी फिल्म “माझा बल” से अपने करियर की शुरुआत की और आठ दशकों से अधिक समय तक संगीत की दुनिया में सक्रिय रहीं।   करियर के शुरुआती दौर  अपने करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने संघर्ष किया, लेकिन संगीत निर्देशक ओ.पी. नैयर के साथ काम करने के बाद उन्हें नई पहचान मिली। बाद में आर.डी. बर्मन के साथ उनका सहयोग बेहद सफल रहा, जिसने हिंदी फिल्म संगीत को कई यादगार गीत दिए। “दम मारो दम”, “चुरा लिया है तुमने” और “मेरा कुछ सामान” जैसे गीत आज भी श्रोताओं के दिलों में बसे हुए हैं।   आशा भोसले का निजी जीवन आशा भोसले का निजी जीवन भी उतना ही रोचक रहा। उन्होंने कम उम्र में गणपतराव भोसले से विवाह किया और बाद में आर.डी. बर्मन के साथ जीवन बिताया। उनकी गायकी की बहुमुखी प्रतिभा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने ग़ज़ल, कैबरे, रोमांटिक और शास्त्रीय हर शैली में महारत हासिल की। उन्हें उनकी गायकी के लिए  दादासाहेब फाल्के, पद्म विभूषण, राष्ट्रीय पुरस्कार और अन्य संगीत सम्मानों सहित कई पुरस्कारों से नवाजा गया।    आखिरी बार की झलक  उन्होंने आखिरी बार गोरिल्लाज़ के एल्बम 'द माउंटेन' में अपनी आवाज़ दी थी, जहां उन्होंने "द शैडोई लाइट" गाना गाया था। यह गाना 27 फरवरी, 2026 को रिलीज़ हुआ था। अपनी सिग्नेचर आइवरी-गोल्ड साड़ी, हीरे के गहने और बालों में एक सफेद गुलाब लगाए हुए, उन्होंने हाल ही में अर्जुन तेंदुलकर की शादी में मीडिया कैमरों के सामने पोज दिया, जो संभवतः उनकी आखिरी सार्वजनिक उपस्थिति थी। आज जब उनका स्वर खामोश हो गया है, तो संगीत की दुनिया में एक गहरा सन्नाटा है। फिर भी उनकी विरासत अमर है। उनके गीत, उनकी शैली और उनकी आत्मा हर धुन में जीवित रहेगी। उनकी यादें लाखों प्रशंसकों के दिलों में बसी हुई हैं क्योंकि अभी ना जाओ छोड़ कर, के दिल अभी भरा नहीं।

Unknown मई 1, 2026 0
Jagannathpur crime update
जगन्नाथपुर मंदिर में लूटपाट और हत्या के बाद उठ रहे कई सवाल

रांची। रांची के ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर में हुई चोरी और गार्ड बिरसा मुंडा की निर्मम हत्या ने झारखंड की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, इस घटना के बाद एक और चर्चा तेज हो गई है कि क्या बीजेपी इस मुद्दे पर उस आक्रामकता के साथ नहीं उतरी, जिसके लिए वह जानी जाती है? बीजेपी की 'चुप्पी' के मायने राजधानी रांची के धुर्वा स्थित ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर में हाल ही में हुई डकैती और सुरक्षा गार्ड बिरसा मुंडा की हत्या ने न केवल सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है, बल्कि राज्य की राजनीति में भी एक नया विमर्श छेड़ दिया है। विधानसभा से महज कुछ सौ मीटर की दूरी पर स्थित इस अति-सुरक्षित क्षेत्र में मंदिर के गर्भगृह की सुरक्षा में तैनात गार्ड को पत्थर से कुचलकर मार दिया गया और दान पेटी से करीब 3 लाख रुपये लूट लिए गए। इस घटना के बाद बड़ी संख्या लोग जुटे। हल्ला-हंगामा और प्रदर्शन हुआ। कांग्रेस नेता अजय नाथ शाहदेव वहां पहुंचे और मृतक के परिजनों को सांत्वना दिया। साथ ही दोषियों की जल्द गिरफ्तारी की मांग की। लेकिन, इतने बड़े घटनाक्रम के बाद भी किसी बड़े बीजेपी नेता का घटना स्थल पर नहीं पहुंचना कई सवाल खड़े करता है। हालांकि नेता विपक्ष बाबूलाल मरांडी ने प्रेस कांफ्रेस ने घटना का दोष सरकार पर मढ़ कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी। पर भाजपा की सक्रियता नहीं दिखी।  जनता के बीच एक बड़ा सवाल यह उठा कि "मंदिर" और "हिंदुत्व" के मुद्दों पर तुरंत सड़क पर उतरने वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस बार वैसी सक्रिय क्यों नहीं दिखी? क्या बीजेपी ने इस मुद्दे पर 'वॉकओवर' दे दिया है या पर्दे के पीछे की राजनीति कुछ और है? क्या सच में बीजेपी 'गायब' रही? सोशल मीडिया और स्थानीय चर्चाओं में यह बात उठी कि बीजेपी के बड़े नेता घटना के तुरंत बाद मौके पर क्यों नहीं पहुंचे। लेकिन, हकीकत के पन्ने पलटें तो तस्वीर थोड़ी अलग नजर आती है।   घटना के 24-48 घंटों के भीतर बीजेपी ने अपनी रणनीति बदली प्रतिनिधिमंडल का दौरा: बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू, केंद्रीय मंत्री संजय सेठ और पूर्व नेता प्रतिपक्ष अमर कुमार बाउरी ने मृतक बिरसा मुंडा के परिजनों से मुलाकात की। मुआवजे की मांग पार्टी ने राज्य सरकार से पीड़ित परिवार को 50 लाख रुपये का मुआवजा और एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग की। आर्थिक सहायता बीजेपी ने अपनी ओर से पीड़ित परिवार को ₹50,000 की तत्काल सहायता राशि प्रदान की।  'कूद कर' न आने के पीछे के संभावित कारण आमतौर पर मंदिरों में तोड़फोड़ या हमले की स्थिति में बीजेपी इसे 'सांप्रदायिक' रंग देकर आक्रामक हो जाती है। करीब दो साल पहले बरियातू के एक दिर में हुई चोरी के बाद कई बीजेपी नेता सड़क पर उतर आये थे। रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ, तत्कालीन विधायक समरीलाल भी प्रदर्शन में शामिल रहे थे। लेकिन, इस मामले में बीजेपी की आक्रामकता थोड़ी संतुलित दिखी, इसके पीछे कुछ ठोस कारण हो सकते हैं: आरोपियों की पृष्ठभूमि पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि हत्या और लूट में शामिल तीनों आरोपी (देव कुमार, विकास महली और आयुष दत्ता) स्थानीय हैं और वे मंदिर के पास की ही बस्ती के रहने वाले हैं। जब अपराध "सांप्रदायिक" न होकर "आपराधिक" (लोकल गैंग द्वारा नशे के लिए की गई लूट) हो, तो राजनीतिक ध्रुवीकरण की गुंजाइश कम हो जाती है। पीड़ित की पहचान मृतक गार्ड बिरसा मुंडा आदिवासी समुदाय से थे। बीजेपी ने इसे "हिंदू मंदिर पर हमला" बनाने के बजाय "आदिवासी सुरक्षा" और "लॉ एंड ऑर्डर" का मुद्दा बनाया। पार्टी ने हेमंत सोरेन सरकार को घेरते हुए कहा कि "स्वयं को आदिवासी हितैषी बताने वाली सरकार में ही आदिवासी सुरक्षित नहीं हैं।"   पुलिस की त्वरित कार्रवाई रांची पुलिस ने 24 घंटे के भीतर तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। जब पुलिस तत्परता दिखाती है, तो विपक्ष के पास सड़क पर लंबे समय तक बैठने का मुद्दा कमजोर पड़ जाता है। बीजेपी का नया वार: 'मंदिर का कांग्रेसीकरण'... बीजेपी ने इस मुद्दे पर सीधे सड़क पर दंगा करने के बजाय एक नया राजनीतिक मोर्चा खोला है। प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू ने आरोप लगाया कि जगन्नाथपुर मंदिर समिति का "कांग्रेसीकरण" कर दिया गया है। बीजेपी का आरोप है कि "स्थानीय लोगों को मंदिर प्रबंधन से बाहर रखा गया है और समिति में राजनीतिक नियुक्तियां की गई हैं, जिससे सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। मंदिर परिसर नशेड़ियों का अड्डा बन गया है।"   कानून-व्यवस्था पर सवाल भले ही बीजेपी ने इसे सांप्रदायिक मुद्दा नहीं बनाया, लेकिन पार्टी ने इसे "समानांतर सरकार" चलने का सबूत करार दिया है। विधानसभा के इतने करीब हत्या होना यह दर्शाता है कि अपराधियों के मन में पुलिस का खौफ खत्म हो चुका है। बीजेपी ने मंदिर समिति और न्यास बोर्ड की भूमिका पर भी सवाल खड़ा किया है। क्योंकि, इतने बड़े मंदिर की दान पेटी की सुरक्षा के लिए केवल एक बुजुर्ग गार्ड के भरोसे पूरी व्यवस्था छोड़ दी गई थी, जबकि दान पेटी में तीन लाख रुपये होने की बात कही जा रही है।  चुप्पी या रणनीति? यह कहना गलत होगा कि बीजेपी इस मामले में बिल्कुल नहीं पहुंची, लेकिन यह सच है कि विरोध का स्वर 'मंदिर के अपमान' से ज्यादा 'सरकार की विफलता' पर केंद्रित रहा। बीजेपी अब झारखंड में "आदिवासी बनाम सरकार" के नैरेटिव पर काम कर रही है। चूंकि पीड़ित आदिवासी था और आरोपी स्थानीय अपराधी, इसलिए बीजेपी ने इसे धर्म के बजाय सुशासन के चश्मे से जनता के सामने पेश किया है। जगन्नाथपुर मंदिर कांड ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आस्था के केंद्र भी अब सुरक्षित नहीं हैं। यदि सरकार और प्रशासन ने मंदिरों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में यह मुद्दा और भी बड़ा राजनीतिक रूप ले सकता है।

Unknown मई 1, 2026 0
AAP crisis 2026
“आप” का क्या होगा?

संवाददाता आम आदमी पार्टी (AAP) भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ऐसी घटना की तरह उभरी, जिसने पारंपरिक राजनीति के व्याकरण को बदल दिया। 'भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन' की कोख से जन्मी यह पार्टी महज एक दशक में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने में सफल रही। हालांकि, वर्तमान में पार्टी अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी, अंदरूनी कलह और 'टूट' ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आम आदमी पार्टी का अंत निकट है? आइए इस रिपोर्ट में समझने की कोशिश करते हैं कि आम आदनी पार्टी की आज वास्तविक स्थिति क्या है?    वैचारिक संकट और नेतृत्व का अभाव आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी, दोनों ही अरविंद केजरीवाल का व्यक्तित्व रहा है। पार्टी 'कट्टर ईमानदारी' और 'दिल्ली मॉडल' के इर्द-गिर्द बुनी गई थी। वर्तमान में जब मुख्यमंत्री समेत पार्टी के शीर्ष नेता (मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और सत्येंद्र जैन) कानूनी लड़ाइयों में उलझे हैं, तो पार्टी के सामने नेतृत्व का एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। राजनीति में जब किसी पार्टी का 'चेहरा' ही संकट में हो, तो कैडर के बीच भ्रम और टूटने का डर स्वाभाविक हो जाता है। इधर, बीते माह अप्रैल में राघव चड्ढा समेत 7 राज्यसभा सांसदों के आम आदमी पार्टी (AAP) छोड़ने और भाजपा में शामिल होने से पार्टी पर बेहद गहरा सांगठनिक और संसदीय प्रभाव पड़ा है। इस घटनाक्रम को AAP के इतिहास का सबसे बड़ा 'विभाजन' माना जा रहा है। राज्यसभा में संख्या बल का भारी नुकसान इस टूट से राज्यसभा में आम आदमी पार्टी की स्थिति पूरी तरह बदल गई है। राज्यसभा में 70% की गिरावट AAP के राज्यसभा सांसदों की संख्या 10 से घटकर केवल 3 रह गई है। अब सदन में केवल संजय सिंह, एन.डी. गुप्ता और बलबीर सिंह सीचेवाल ही पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। NDA की मजबूती इन सांसदों के भाजपा में विलय से राज्यसभा में भाजपा की अपनी संख्या 113 और NDA की कुल संख्या 148 हो गई है, जिससे केंद्र सरकार के लिए कानून पास कराना और आसान हो गया है। दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) का प्रभाव नही चूँकि राज्यसभा में पार्टी के कुल 10 में से दो-तिहाई (7 सांसद) एक साथ अलग हुए हैं, इसलिए तकनीकी रूप से उन पर 'दलबदल विरोधी कानून' लागू नहीं हुआ। उन्होंने संवैधानिक प्रावधानों के तहत भाजपा में अपनी इकाई का 'विलय' कर लिया, जिससे उनकी सदस्यता बरकरार रही। पार्टी के प्रमुख चेहरों का जाना पार्टी छोड़ने वाले सांसदों में केवल राघव चड्ढा ही नहीं, बल्कि कई अन्य प्रभावशाली नाम भी शामिल हैं।  संदीप पाठक: जो पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री और चुनावी रणनीतियों के मुख्य सूत्रधार माने जाते थे। स्वाति मालिवाल और हरभजन सिंह: जैसे लोकप्रिय चेहरों के जाने से पार्टी की सार्वजनिक छवि और पहुंच पर असर पड़ा है। अन्य सांसद: अशोक मित्तल, राजिंदर गुप्ता और विक्रम साहनी। सिद्धांतों पर सवाल इस्तीफा देते हुए राघव चड्ढा ने आरोप लगाया कि पार्टी अपने मूल सिद्धांतों और नैतिकता से भटक गई है और अब केवल "व्यक्तिगत लाभ" के लिए काम कर रही है। नेतृत्व पर दबाव पिछले विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद इस टूट ने पार्टी को तोड़कर रख दिया है। पार्टी के भीतर अनुशासन और नेतृत्व की पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संजय सिंह ने इसे भाजपा का 'ऑपरेशन लोटस' करार देते हुए जाने वाले सांसदों को "गद्दार" कहा है। विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. पर असर AAP के सांसदों के जाने से राज्यसभा में विपक्षी ब्लॉक की ताकत 84 से घटकर 77 रह गई है। इससे संसद के भीतर सरकार को घेरने की विपक्ष की क्षमता कमजोर हुई है। यह टूट आम आदमी पार्टी के लिए एक अस्तित्वगत संकट (Existential Crisis) जैसा है, जिसने न केवल संसद में उसका कद छोटा किया है, बल्कि उसके सांगठनिक ढांचे को भी हिला कर रख दिया है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी उभरती हुई पार्टी के नेतृत्व पर प्रहार होता है, तो विपक्षी दल उसके विधायकों और सांसदों को तोड़ने की कोशिश करते हैं। दिल्ली और पंजाब, दो ऐसे राज्य हैं जहाँ 'आप' की पूर्ण बहुमत की सरकारें हैं। दिल्ली में स्थिति दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की पकड़ मजबूत है, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में मिली हार  ने प्रशासन और पार्टी संगठन के बीच एक खाई पैदा कर दी है। पंजाब का परिदृश्य आम आदमी पार्टी का ढांचा काफी हद तक 'कमांड स्ट्रक्चर' पर आधारित है। पार्टी के भीतर असहमति की आवाजों (जैसे योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण) को समय-समय पर बाहर का रास्ता दिखाया गया। इस प्रक्रिया ने पार्टी को अनुशासित तो बनाया, लेकिन 'सेकंड लाइन' लीडरशिप को पनपने का मौका कम मिला। आज जब मुख्य नेतृत्व कमजोर है, तो कोई ऐसा सर्वमान्य नेता नहीं दिखता जो पूरी पार्टी को एकजुट रख सके। आतिशी या सौरभ भारद्वाज जैसे नेता प्रभावी तो हैं, लेकिन उनकी स्वीकार्यता केजरीवाल के स्तर की नहीं है। जांच एजेंसियों का घेरा और साख का सवालः शराब नीति घोटाला और अन्य भ्रष्टाचार के आरोपों ने पार्टी की 'कट्टर ईमानदार' छवि पर गहरा आघात किया है। मध्यवर्ग, जो 'आप' का मुख्य आधार था, अब संदेह की नजर से देख रहा है। कोर्ट से राहत मिलने के बावजूद जनता के बीच यह संदेश तो जा ही चुका है कि 'आप' भी अन्य पारंपरिक दलों जैसी ही है। साख का यह संकट पार्टी के विस्तार (राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा) की योजनाओं को पूरी तरह से प्रभावित किया है।  क्या 'आप' वापसी कर सकती है?  भले ही संकट गहरा है, लेकिन 'आप' को पूरी तरह खारिज करना जल्दबाजी होगी। इसके कुछ कारण हैं: मजबूत लाभार्थी वर्ग: बिजली, पानी और शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों ने एक ऐसा वोट बैंक तैयार किया है जो आसानी से दूसरी तरफ नहीं मुड़ता। विकल्प का अभाव: दिल्ली में कांग्रेस अभी भी उस मजबूती से उभर नहीं पाई हैं जो केजरीवाल के विकल्प के रूप में दिखें। वहीं, बीजेपी ने दिल्ली में सरकार तो बना ली है, लेकिन आप से उसका मुकाबला आसान नहीं है।    सहानुभूति की लहर यदि पार्टी यह नैरेटिव सेट करने में सफल रही कि उसे जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है, तो 'सहानुभूति कार्ड' उसे चुनावों में संजीवनी दे सकता है। आम आदमी पार्टी के लिए आने वाले दो साल निर्णायक होंगे। यदि पार्टी इस 'टूट' और कानूनी संकट से उभरकर एक नया नेतृत्व ढांचा तैयार कर लेती है, तो वह भारतीय राजनीति में एक स्थायी स्तंभ बनी रह सकती है। लेकिन, यदि अंदरूनी खींचतान बढ़ी और पंजाब व दिल्ली की इकाइयों में तालमेल की कमी रही, तो पार्टी का बिखरना तय है। विचारधारा कायम रखना बड़ी चुनौती किसी भी राजनीतिक दल का अंत उसकी हार से नहीं, बल्कि उसकी विचारधारा के मरने से होता है। 'आप' को यह साबित करना होगा कि वह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार है। यदि वह ऐसा नहीं कर पाती, तो 'टूट' के बाद उसका अस्तित्व बचाना लगभग असंभव होगा।

Unknown मई 1, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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