पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच Iran के सबसे बड़े गैस भंडार South Pars Gas Field पर हुए हमले ने वैश्विक तनाव को और बढ़ा दिया है। इस घटनाक्रम के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए खुद को इस हमले से अलग बताया और इसके लिए सीधे Israel को जिम्मेदार ठहराया। “हमारा कोई हाथ नहीं”-ट्रंप की सफाई डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्पष्ट किया कि अमेरिका को इस हमले की कोई पूर्व जानकारी नहीं थी। उन्होंने कहा कि यह हमला इजरायल की ओर से किया गया कदम था और इसमें Qatar की भी कोई भूमिका नहीं थी। ट्रंप के मुताबिक, इस हमले में साउथ पार्स गैस फील्ड का एक सीमित हिस्सा प्रभावित हुआ है, लेकिन इसके प्रभाव व्यापक हो सकते हैं क्योंकि यह दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस स्रोतों में से एक है। ईरान की चेतावनी-ऊर्जा ठिकानों पर हमला बर्दाश्त नहीं ईरान ने इस हमले को गंभीर उकसावे की कार्रवाई बताते हुए साफ कहा है कि अगर उसके ऊर्जा क्षेत्र को दोबारा निशाना बनाया गया, तो वह “कड़ा जवाब” देगा। ईरान का यह भी आरोप है कि हमले के बाद क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। कतर पर हमले को लेकर ट्रंप की कड़ी चेतावनी स्थिति उस समय और गंभीर हो गई जब ईरानी मिसाइलों ने जवाबी कार्रवाई में कतर के LNG प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। इस पर ट्रंप ने बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि अगर Qatar की गैस सुविधाओं पर दोबारा हमला हुआ, तो अमेरिका “किसी भी हद तक जाकर जवाब देगा” और पूरे साउथ पार्स गैस फील्ड को नष्ट करने से भी पीछे नहीं हटेगा। “हिंसा नहीं चाहता, लेकिन जवाब देंगे” ट्रंप ने यह भी कहा कि वह इस स्तर की हिंसा और विनाश को अधिकृत नहीं करना चाहते, क्योंकि इसका दीर्घकालिक असर ईरान के भविष्य पर पड़ेगा। हालांकि, उन्होंने यह साफ कर दिया कि अगर हालात और बिगड़े, तो अमेरिका कड़ी सैन्य कार्रवाई करने में हिचकेगा नहीं। वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल इस हमले और बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी साफ दिख रहा है। गैस और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव तेज हो गया है, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर साउथ पार्स जैसे बड़े गैस फील्ड पर खतरा बना रहा, तो यह पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत की विदेश नीति पर देश की राजनीति में भी बहस तेज हो गई है। Iran और Israel के बीच बढ़ते संघर्ष को लेकर जहां विपक्ष सरकार पर हमलावर है, वहीं कांग्रेस के भीतर ही इस मुद्दे पर अलग-अलग राय सामने आ रही है। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता Sonia Gandhi ने हाल ही में भारत सरकार की ‘चुप्पी’ पर सवाल उठाते हुए इसे नैतिक जिम्मेदारी से बचना बताया था। उन्होंने ईरान की संप्रभुता और वहां हुए हमलों पर भारत की ओर से खुलकर प्रतिक्रिया न देने को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की थी। थरूर का अलग रुख, कहा-यह ‘मोरल सरेंडर’ नहीं अब इसी मुद्दे पर कांग्रेस सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री Shashi Tharoor ने अपनी ही पार्टी से अलग रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध पर भारत की चुप्पी को “मोरल सरेंडर” कहना गलत है। थरूर के अनुसार, यह चुप्पी दरअसल एक “रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ्ट” यानी सोच-समझकर अपनाई गई कूटनीतिक रणनीति है, जो भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देती है। अंतरराष्ट्रीय कानून पर उठाए सवाल थरूर ने अपने लेख में यह भी स्वीकार किया कि अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान के खिलाफ किया गया सैन्य अभियान अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने कहा कि यह कदम उन मूल्यों के खिलाफ है, जिनका भारत ऐतिहासिक रूप से समर्थन करता रहा है-जैसे शांति, आक्रामकता का विरोध और संप्रभुता का सम्मान। ‘हर बार खुलकर निंदा जरूरी नहीं’ हालांकि, इन आपत्तियों के बावजूद थरूर ने यह भी स्पष्ट किया कि हर परिस्थिति में सार्वजनिक रूप से निंदा करना ही एकमात्र विकल्प नहीं होता। उनका मानना है कि कूटनीति में कई बार संतुलन बनाए रखना अधिक महत्वपूर्ण होता है। नेहरू की नीति का दिया उदाहरण थरूर ने भारत की विदेश नीति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए Jawaharlal Nehru की गुटनिरपेक्ष नीति का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि यह नीति नैतिकता से समझौता नहीं, बल्कि उस समय के वैश्विक हालात में राष्ट्रीय हितों की रक्षा का व्यावहारिक तरीका थी। आज के बहुध्रुवीय विश्व में भारत “मल्टी-अलाइनमेंट” की नीति अपना रहा है, जहां वह अलग-अलग वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलन बनाए रखते हुए अपने रणनीतिक हितों को साधता है। ऐतिहासिक उदाहरणों से समझाया रुख थरूर ने आलोचकों को जवाब देते हुए कहा कि भारत ने पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर खुलकर प्रतिक्रिया नहीं दी थी- 1956 में हंगरी संकट 1968 में चेकोस्लोवाकिया 1979 में अफगानिस्तान इन मामलों में भी भारत ने अपने रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित रुख अपनाया था। राजनीतिक बहस तेज इस पूरे घटनाक्रम के बाद यह साफ है कि ईरान-इजरायल युद्ध पर न सिर्फ सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं, बल्कि विपक्ष के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। आने वाले दिनों में यह बहस और तेज हो सकती है, खासकर जब अंतरराष्ट्रीय हालात लगातार बदल रहे हैं।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच Iran ने BRICS देशों से एकजुटता की अपील की है, जिससे India के सामने कूटनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। मौजूदा समय में BRICS की अध्यक्षता भारत के पास है और इस कारण संकट पर साझा रुख तय करना भारत के लिए जटिल हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान और भारत के विदेश मंत्रियों के बीच अब तक चार बार बातचीत हो चुकी है। हालिया बातचीत में ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने भारतीय विदेश मंत्री Subrahmanyam Jaishankar से पश्चिम एशिया में बढ़ते संकट पर BRICS देशों की एकजुटता की मांग की। मोदी और ईरानी राष्ट्रपति की भी बातचीत इससे पहले प्रधानमंत्री Narendra Modi ने ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian से फोन पर बात कर क्षेत्र की गंभीर स्थिति पर चर्चा की। प्रधानमंत्री ने बढ़ते तनाव, नागरिकों की मौत और असैन्य ढांचे को हुए नुकसान पर चिंता जताई। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और ऊर्जा व सामान की निर्बाध आपूर्ति भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता है। रूस से भी हुई चर्चा पश्चिम एशिया संकट को लेकर Subrahmanyam Jaishankar ने रूस के विदेश मंत्री Sergey Lavrov से भी फोन पर बातचीत की। माना जा रहा है कि BRICS देशों के बीच एक संतुलित और सभी के लिए स्वीकार्य संयुक्त बयान तैयार करने को लेकर प्रारंभिक स्तर पर चर्चा चल रही है। BRICS में रुख तय करना मुश्किल विशेषज्ञों का मानना है कि BRICS में साझा रुख तय करना आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके कई सदस्य सीधे तौर पर इस क्षेत्रीय तनाव से जुड़े हैं। इनमें Iran के साथ-साथ United Arab Emirates और Saudi Arabia भी शामिल हैं। ईरान की क्या मांग ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा कि अमेरिका और इज़राइल के कथित हमलों के बाद क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता पर गंभीर असर पड़ा है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संगठनों से ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की निंदा करने की अपील की और वैश्विक स्थिरता बनाए रखने में BRICS देशों की भूमिका को अहम बताया। इस साल के अंत में BRICS शिखर सम्मेलन भारत में प्रस्तावित है, ऐसे में पश्चिम एशिया संकट पर सदस्य देशों के बीच संतुलित रुख तय करना भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक परीक्षा माना जा रहा है।
ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी भीषण सैन्य टकराव अब 12वें दिन में प्रवेश कर चुका है। बीते 11 दिनों में यह संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता का कारण बन गया है। लगातार हवाई हमलों, मिसाइल हमलों और जवाबी सैन्य कार्रवाई के बीच क्षेत्र में तनाव चरम पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल इस युद्ध का कोई स्पष्ट समाधान नजर नहीं आ रहा है, लेकिन इसके लंबे समय तक खिंचने से वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है। रात भर पश्चिम एशिया के कई हिस्सों में एयर डिफेंस सायरन बजते रहे और मिसाइलों के दागे जाने की खबरें सामने आती रहीं। इजरायल और अमेरिका की ओर से ईरान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया, जबकि ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए इजरायल और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सहयोगी देशों पर हमले तेज कर दिए हैं। ईरान का बड़ा सैन्य अभियान, इजरायल के दावे ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया है कि उसने अपने सैन्य अभियान की 35वीं लहर शुरू कर दी है। इस चरण में मध्य-पूर्व में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों और इजरायल के मध्य क्षेत्रों को निशाना बनाया गया। ईरान का कहना है कि यह कार्रवाई उसके खिलाफ हो रहे हमलों का जवाब है। दूसरी ओर, इजरायली सेना का दावा है कि उसने तेहरान में ईरानी सरकार से जुड़े कई अहम ठिकानों पर सटीक हमले किए हैं। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान की जनता को संबोधित करते हुए कहा कि मौजूदा हालात उनके लिए एक ऐतिहासिक अवसर हो सकते हैं। उन्होंने ईरानियों से अपील करते हुए कहा कि वे मौजूदा शासन के खिलाफ आवाज उठाकर अपनी स्वतंत्रता की दिशा में कदम बढ़ाएं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ता तनाव इस युद्ध के बीच सबसे बड़ी चिंता का विषय हॉर्मुज जलडमरूमध्य बन गया है। यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक स्तर पर लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति होती है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो दुनिया भर में ऊर्जा संकट गहराने की आशंका बढ़ सकती है। अमेरिकी सेना ने दावा किया है कि उसने इस क्षेत्र के आसपास ईरान के 16 नौसैनिक जहाजों को नष्ट कर दिया है। इन जहाजों में कुछ ऐसे पोत भी शामिल थे जिनका इस्तेमाल समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाने के लिए किया जा सकता था। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति मार्ग को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से की गई। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि ईरान इस जलमार्ग में बारूदी सुरंगें बिछाने की तैयारी कर रहा था, जिससे वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता था। बढ़ता मानवीय संकट संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत के अनुसार, युद्ध की शुरुआत से अब तक अमेरिका और इजरायल के हमलों में 1300 से अधिक नागरिकों की मौत हो चुकी है। कई शहरों में भारी तबाही और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आ रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, 28 फरवरी को दक्षिणी ईरान में एक प्राथमिक स्कूल पर हुए हमले के बाद मिले मिसाइल के अवशेष अमेरिकी टॉमहॉक क्रूज मिसाइल से जुड़े हो सकते हैं। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है। वहीं अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने स्वीकार किया है कि ईरान की जवाबी कार्रवाई में लगभग 140 अमेरिकी सैनिक घायल हुए हैं। इनमें से 8 सैनिकों की हालत गंभीर बताई जा रही है। लेबनान और खाड़ी देशों तक फैला संघर्ष यह युद्ध अब धीरे-धीरे पूरे पश्चिम एशिया को अपनी चपेट में लेता नजर आ रहा है। लेबनान की राजधानी बेरूत के दहिया इलाके में इजरायल ने हवाई हमले किए हैं। यह इलाका ईरान समर्थित संगठन हिज्बुल्लाह का मजबूत गढ़ माना जाता है। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, इन हमलों में कम से कम 95 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं हिज्बुल्लाह ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए एक ही दिन में इजरायल पर 30 हमले करने का दावा किया है। खाड़ी देशों में भी सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। बहरीन ने बताया कि युद्ध शुरू होने के बाद से उसने 106 मिसाइल और 176 ड्रोन मार गिराए हैं। कतर ने अपने क्षेत्र में 7 मिसाइल हमलों की पुष्टि की है। कुवैत ने अपने हवाई क्षेत्र में 5 ड्रोन के प्रवेश की जानकारी दी है। सऊदी अरब ने 4 ड्रोन और 7 बैलिस्टिक मिसाइलों को नष्ट करने का दावा किया है। वहीं संयुक्त अरब अमीरात का कहना है कि युद्ध शुरू होने के बाद से उसके खिलाफ 1475 ड्रोन और 260 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें दागी जा चुकी हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बढ़ता खतरा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष और लंबा खिंचता है या हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, ऊर्जा संकट और वैश्विक व्यापार में बाधा जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। कुल मिलाकर, ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच जारी यह टकराव अब एक क्षेत्रीय संघर्ष से आगे बढ़कर वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है। दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयास इस संकट को शांत कर पाएंगे या यह युद्ध और व्यापक रूप ले सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।