झारखंड छात्र आंदोलन के बीच सरकार का बड़ा कदम, राधाकृष्ण किशोर ने बातचीत की अपील रांची। झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों का आंदोलन जारी है। इसी बीच राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों से सरकार के साथ बातचीत करने की अपील की है। सरकार ने छात्रों की मांगों पर चर्चा के लिए कैबिनेट मंत्रियों की एक समिति गठित करने का फैसला किया है। छात्रों की मांगों पर बातचीत का प्रस्ताव छात्रों का आंदोलन मुख्य रूप से भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों और अनियमितताओं की जांच तथा भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग को लेकर चल रहा है। प्रदर्शनकारी छात्र सरकार से इस मामले में ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि सरकार छात्रों के कल्याण और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने आंदोलन कर रहे छात्रों से सरकार के साथ संवाद करने की अपील की है। सरकार ने बनाई मंत्रियों की समिति छात्रों के साथ बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए झारखंड सरकार ने कैबिनेट मंत्रियों की एक समिति गठित की है। समिति का उद्देश्य प्रदर्शनकारी छात्रों की मांगों को सुनना और उनके समाधान के लिए सरकार के स्तर पर आवश्यक कदमों पर चर्चा करना है। सरकार की इस पहल को आंदोलन को बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। छात्र भी बातचीत के लिए तैयार ताजा घटनाक्रम में छात्रों की ओर से भी सरकार के साथ बातचीत को लेकर सहमति के संकेत मिले हैं। हालांकि, प्रदर्शनकारी छात्रों ने बातचीत को लेकर अपनी कुछ शर्तें रखी हैं। वे चाहते हैं कि चर्चा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मौजूदगी में और मीडिया के सामने हो, ताकि बातचीत में पारदर्शिता बनी रहे। भर्ती परीक्षाओं की जांच पर टिकी नजर छात्रों के आंदोलन के बीच भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच भी जारी है। रिपोर्ट के मुताबिक, मामले में CID की जांच आगे बढ़ रही है और कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं। अब सरकार और छात्रों के बीच होने वाली बातचीत में भर्ती परीक्षाओं की प्रक्रिया, कथित गड़बड़ियों की जांच और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई जैसे मुद्दे प्रमुख रह सकते हैं। सरकार की बातचीत की पहल के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि छात्रों और सरकार के बीच संवाद कब शुरू होता है और आंदोलन को समाप्त करने के लिए कोई ठोस समाधान निकल पाता है या नहीं।
रांची। झारखंड सरकार के मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर राज्य की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे 2029 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे और सक्रिय चुनावी राजनीति से सम्मानजनक विदाई लेना चाहते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि सार्वजनिक जीवन और सामाजिक कार्यों से उनका जुड़ाव आगे भी बना रहेगा। 'हर राजनेता को एक समय पर रुकना चाहिए' राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि राजनीति में भी एक समय ऐसा आता है, जब नई पीढ़ी को आगे बढ़ने का अवसर देना चाहिए। उनका मानना है कि लंबे समय तक चुनावी राजनीति में बने रहने के बजाय सही समय पर जिम्मेदारी छोड़ना लोकतंत्र के लिए बेहतर है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में जाने की कोई इच्छा नहीं है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बनने की अटकलें तेज उनके इस ऐलान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई है कि उन्हें झारखंड कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया जा सकता है। हालांकि राधाकृष्ण किशोर या कांग्रेस नेतृत्व की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। झारखंड की राजनीति में बढ़ी हलचल राधाकृष्ण किशोर झारखंड की राजनीति के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। उनके चुनावी राजनीति से हटने के फैसले को राज्य की सियासत में एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। अब सभी की नजर कांग्रेस नेतृत्व के अगले कदम और उनकी संभावित नई भूमिका पर टिकी हुई है।
रांची। झारखंड सरकार ने राज्य के विभिन्न विभागों में लंबे समय से खाली पड़े पदों को भरने की दिशा में बड़ी पहल शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देश पर सभी विभागों में रिक्तियों का आकलन कर भर्ती प्रक्रिया तेज करने की तैयारी की जा रही है। सरकार का लक्ष्य है कि युवाओं को अधिक से अधिक सरकारी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं। सबसे अधिक रिक्तियां शिक्षा, स्वास्थ्य और गृह विभाग में सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में कुल 3,51,968 नियमित पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से केवल 1,87,610 पदों पर ही कर्मचारी और अधिकारी कार्यरत हैं। यानी बड़ी संख्या में पद अब भी खाली पड़े हैं। सबसे अधिक रिक्तियां शिक्षा, स्वास्थ्य और गृह विभाग में हैं, जिससे सरकारी सेवाओं पर सीधा असर पड़ रहा है। जेपीएससी और जेएसएससी को मिली तेजी लाने की जिम्मेदारी सरकार ने झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) को पहले से विज्ञापित पदों की परीक्षाएं जल्द कराने और चयन प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से पूरी करने का निर्देश दिया है। विभागों से प्राप्त रिक्तियों के आधार पर नई अधियाचनाएं भी भेजी जाएंगी। इन पदों पर होगी नियुक्ति भर्ती अभियान के तहत सरकारी स्कूलों में सहायक शिक्षक, स्वास्थ्य विभाग में चिकित्सक, नर्स और मेडिकल स्टाफ, तथा सड़क, पुल और पुलिया निर्माण कार्यों के लिए अभियंता और तकनीकी कर्मचारी नियुक्त किए जाएंगे। यदि प्रक्रिया तय समय पर आगे बढ़ी तो स्वतंत्रता दिवस के आसपास करीब 25 हजार नई नियुक्तियां की घोषणा की जा सकती है। वित्त मंत्री ने क्या कहा वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि राज्य गठन के बाद पहली बार किसी सरकार ने मानव संसाधन की कमी दूर करने पर इतने बड़े स्तर पर ध्यान दिया है। उनके अनुसार वर्तमान कार्यकाल में 40 हजार से अधिक नियुक्तियां की जा चुकी हैं और सरकार आने वाले वर्षों में स्वीकृत पदों को अधिकतम संख्या में भरने के लिए तेजी से काम करेगी। सरकार का मानना है कि बड़े पैमाने पर होने वाली यह भर्ती न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करेगी, बल्कि राज्य के हजारों युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी खोलेगी।
रांची। झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर दिल्ली दौरे पर होने के बावजूद राज्य सरकार द्वारा आयोजित नेशनल स्टेकहोल्डर कंसल्टेशन कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। उनकी अनुपस्थिति ने राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दिया। हालांकि वित्त मंत्री ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि उन्हें इस कार्यक्रम की कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी गई थी और न ही इससे संबंधित कोई पत्र प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि वह पिछले दो दिनों से रांची से बाहर हैं, इसलिए कार्यक्रम की जानकारी भी उन्हें नहीं मिल सकी। वहीं, सरकार की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में कांग्रेस कोटे से मंत्री दीपिका पांडेय सिंह और डॉ. इरफान अंसारी शामिल हुए। दूसरी ओर, कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की भी कार्यक्रम में नहीं पहुंच सकीं। ऐसे में वरिष्ठ मंत्री की गैरमौजूदगी को लेकर सियासी चर्चाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस नेतृत्व से की मुलाकात सरकारी कार्यक्रम से दूर रहने के बावजूद वित्त मंत्री ने दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय का दौरा किया। यहां उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और वरिष्ठ नेता जयराम रमेश से मुलाकात की। मुलाकात के दौरान संगठन और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय, विकास योजनाओं की प्रगति तथा चुनावी घोषणा-पत्र में किए गए वादों को लागू करने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में सरकार और संगठन मिलकर विकास कार्यों को गति दे रहे हैं तथा जनहित से जुड़े वादों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है। विभागीय पत्राचार पर भी उठाया सवाल वित्त मंत्री ने हाल ही में सरकारी वाहन लौटाने को लेकर विभाग के संयुक्त सचिव पंकज सिंह द्वारा भेजे गए पत्र पर भी सवाल उठाए थे। उन्होंने इस संबंध में विभागीय सचिव से स्थिति स्पष्ट करने के लिए पत्र लिखा था, लेकिन अब तक उन्हें कोई आधिकारिक जवाब प्राप्त नहीं हुआ है। ऐसे में विभागीय स्तर पर समन्वय और संवाद को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
पटना, एजेंसियां। बिहार के मुजफ्फरपुर से सामने आए चर्चित बीडीओ सुसाइड केस ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जाले प्रखंड के बीडीओ मनोज कुमार की पत्नी अमृता कुमारी की जहरीला पदार्थ खाने से मौत के मामले में पुलिस कथित प्रेम संबंध, मानसिक प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों की जांच कर रही है। मामले में बेगूसराय में तैनात महिला दारोगा अनु कुमारी का नाम भी सामने आया है। पुलिस दोनों के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ा रही है। 2020 में शुरू हुआ कथित संबंध, शादी के बाद बढ़ा विवाद पुलिस जांच के अनुसार, मनोज कुमार और अनु कुमारी की मुलाकात वर्ष 2020 में मुजफ्फरपुर की एक कोचिंग संस्था में हुई थी, जिसके बाद दोनों के बीच कथित रूप से नजदीकियां बढ़ीं। इसी दौरान मनोज कुमार ने दिसंबर 2022 में अमृता कुमारी से विवाह किया। परिजनों का आरोप है कि शादी के बाद अमृता को पति के कथित संबंधों की जानकारी मिली, जिसके बाद परिवार में लगातार तनाव बना रहा। वीडियो कॉल और डिजिटल सबूत जांच के केंद्र में मृतका के परिजनों का आरोप है कि घटना वाले दिन बीडीओ और महिला दारोगा ने अमृता से वीडियो कॉल पर बात की और उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। आरोप है कि लगातार तनाव और अपमान के कारण अमृता ने जहरीला पदार्थ खा लिया। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि अभी पुलिस जांच के बाद ही हो सकेगी। परिजनों ने पुलिस को एक पेन ड्राइव भी सौंपी है, जिसमें कथित चैट, तस्वीरें और वीडियो कॉल से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड होने का दावा किया गया है। पुलिस इन इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की फॉरेंसिक जांच करा रही है। फिलहाल पुलिस पूरे मामले के सभी पहलुओं की जांच कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल सबूतों, कॉल रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जांच एजेंसियां हर पहलू की बारीकी से पड़ताल कर रही हैं।
रामगढ़। रामगढ़ जिले के पतरातू प्रखंड में सोमवार को आयोजित बैठक में झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने विस्थापित परिवारों की समस्याएं सुनीं और उन्हें न्याय दिलाने का भरोसा दिया। बैठक में ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम-2013 लागू होने के बावजूद उन्हें न तो उचित मुआवजा मिला और न ही पुनर्वास की सुविधाएं। उन्होंने राज्य सरकार से लंबित मामलों का शीघ्र समाधान करने की मांग की। वित्त मंत्री ने कहा वित्त मंत्री ने कहा कि उनका दौरा राजनीतिक नहीं, बल्कि विस्थापितों की पीड़ा को समझने के लिए है। उन्होंने कहा कि झारखंड को राज्य गठन के समय से ही विस्थापन की गंभीर समस्या विरासत में मिली है और यह राज्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि विस्थापितों की सभी मांगों को कैबिनेट के समक्ष रखा जाएगा और सरकार उनके अधिकार सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगी। राधाकृष्ण किशोर ने कहा राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि पतरातू में एनटीपीसी को दी गई जमीन का वास्तविक उपयोग, अतिरिक्त भूमि की स्थिति और अन्य संस्थानों को सब-लीज पर दी गई जमीन की भी समीक्षा कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि यदि सरकारी अनुमति के बिना भूमि का हस्तांतरण हुआ है तो इसकी जांच कर उचित कार्रवाई की जाएगी। वित्त मंत्री ने जिला प्रशासन को भी निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से कार्य करने की नसीहत देते हुए कहा कि विस्थापितों की समस्याओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक की आवाज का सम्मान होना चाहिए। के. राजू, पूर्व विधायक अंबा प्रसाद, योगेंद्र साव बैठक में कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी के. राजू, पूर्व विधायक अंबा प्रसाद, योगेंद्र साव सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। के. राजू ने कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून-2013 प्रभावित परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास का कानूनी अधिकार देता है और इसे पूरी तरह लागू कराया जाएगा। कार्यक्रम के अंत में ग्रामीणों ने विस्थापन से जुड़े लंबित मामलों के स्थायी समाधान और कानून के सभी प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग दोहराई।
रांची। झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर एक बार फिर राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में हैं। हाल ही में अपनी सरकारी सुरक्षा और एस्कॉर्ट वाहन लौटाने के बाद अब उनकी रांची के शूटिंग रेंज में निशानेबाजी का अभ्यास करते हुए तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं। इन तस्वीरों के वायरल होने के बाद राज्य की राजनीति में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। सुरक्षा लौटाने के बाद फिर चर्चा में मंत्री कुछ दिन पहले राधाकृष्ण किशोर ने अपनी सुरक्षा में तैनात 16 सुरक्षाकर्मियों और सरकारी एस्कॉर्ट वाहनों को वापस करने का फैसला लिया था। हालांकि, पुलिस मुख्यालय ने सुरक्षा प्रोटोकॉल को देखते हुए सुरक्षाकर्मियों को उनके सरकारी आवास पर तैनात रहने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले के बाद से सरकार के भीतर मतभेदों की अटकलें तेज हो गई थीं। शूटिंग रेंज में अभ्यास, बोले- यह सिर्फ एक खेल वायरल तस्वीरों में वित्त मंत्री रांची के एक शूटिंग सेंटर में निशानेबाजी का अभ्यास करते नजर आ रहे हैं। इस पर उन्होंने कहा कि शूटिंग उनके लिए केवल एक खेल है, जो एकाग्रता, अनुशासन और आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद करता है। हालांकि, उनके इस कदम को सुरक्षा लौटाने की घटना से जोड़कर भी देखा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में बढ़ी हलचल विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक इस घटनाक्रम को राज्य सरकार के भीतर चल रही खींचतान से जोड़कर देख रहे हैं। इस बीच राधाकृष्ण किशोर बिना बॉडीगार्ड सचिवालय भी पहुंचे और संकेत दिया कि वह "चार दिन बाद" इस पूरे मामले पर विस्तार से अपनी बात रखेंगे। वहीं, विपक्षी नेताओं ने भी सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
रांची। झारखंड के लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में बड़ी सौगात मिली है। राजधानी रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) परिसर में अत्याधुनिक क्षेत्रीय नेत्र संस्थान (रीजनल आई इंस्टीट्यूट) का विधिवत उद्घाटन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने किया। इस संस्थान के शुरू होने से अब राज्य के मरीजों को आंखों की गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए दूसरे राज्यों का रुख नहीं करना पड़ेगा। अत्याधुनिक सुविधाओं से होगा इलाज उद्घाटन के बाद स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने कहा कि राज्य सरकार का लक्ष्य झारखंडवासियों को अपने ही राज्य में बेहतर और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है। उन्होंने बताया कि संस्थान में मोतियाबिंद, रेटिना और आंखों से जुड़ी अन्य जटिल बीमारियों का इलाज एवं ऑपरेशन अत्याधुनिक तकनीक के साथ किया जाएगा। इससे मरीजों को बेहतर उपचार के साथ समय और खर्च दोनों की बचत होगी। मंत्री ने कहा कि सरकार लगातार रिम्स को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रही है और क्षेत्रीय नेत्र संस्थान राज्य के स्वास्थ्य ढांचे को नई मजबूती देगा। हजारों मरीजों को मिलेगा लाभ इस अवसर पर कांके विधायक एवं रिम्स शासी परिषद के सदस्य सुरेश बैठा ने कहा कि इस संस्थान के शुरू होने से राज्य के हजारों मरीजों को सीधा लाभ मिलेगा। अब बेहतर नेत्र चिकित्सा के लिए लोगों को राज्य से बाहर जाने की जरूरत नहीं होगी, जिससे आम लोगों को बड़ी राहत मिलेगी। सुरक्षा विवाद पर भी दी प्रतिक्रिया कार्यक्रम के दौरान वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर द्वारा सरकारी सुरक्षा और कारकेड लौटाने के मुद्दे पर पूछे गए सवाल पर डॉ. इरफान अंसारी ने कहा कि जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, विशेषकर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में। उन्होंने कहा कि यदि इस संबंध में कोई चिंता थी तो उसे कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के समक्ष रखा जाना चाहिए था। मंत्री ने विश्वास जताया कि मुख्यमंत्री सभी मंत्रियों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर गंभीरता से निर्णय लेते हैं।
रांची। झारखंड से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार प्रणव झा ने आज नामांकन प्रक्रिया की शुरुआत करते हुए नामांकन पत्र खरीदा। इस अवसर पर झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, विधायक दल के उपनेता राजेश कच्छप, मंत्री राधाकृष्ण किशोर, मंत्री दीपिका पांडे सिंह, मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष सह मीडिया चेयरमैन सतीश पौल मुंजनी, रियाज अंसारी, सुल्तान अहमद तथा उज्ज्वल प्रकाश तिवारी सहित पार्टी के कई वरिष्ठ नेता एवं पदाधिकारी उपस्थित रहे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।