बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना आज (5 अगस्त 2026) एक साल बाद पहली बार मीडिया को संबोधित करने जा रही हैं। उनकी पार्टी बांग्लादेश आवामी लीग ने घोषणा की है कि वह शाम को एक वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगी। माना जा रहा है कि इस दौरान वह अपनी संभावित बांग्लादेश वापसी, भविष्य की राजनीतिक रणनीति और मौजूदा हालात पर बड़ा बयान दे सकती हैं। पार्टी के मुताबिक यह प्रेस कॉन्फ्रेंस बांग्लादेशी समयानुसार शाम 6:30 बजे और भारतीय समयानुसार शाम 6:00 बजे शुरू होगी। इसमें बांग्लादेश के साथ-साथ दुनिया भर के मीडिया संगठनों के पत्रकारों को शामिल होने का निमंत्रण दिया गया है। देश वापसी पर हो सकता है बड़ा ऐलान आवामी लीग ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि शेख हसीना प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बांग्लादेश लौटने को लेकर महत्वपूर्ण घोषणा कर सकती हैं। हालांकि, पार्टी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह वापसी की कोई निश्चित तारीख बताएंगी या केवल अपनी राजनीतिक योजना साझा करेंगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संबोधन बांग्लादेश की मौजूदा राजनीति पर बड़ा असर डाल सकता है, क्योंकि शेख हसीना पिछले एक वर्ष से सार्वजनिक रूप से मीडिया के सामने नहीं आई हैं। क्यों अहम है यह प्रेस कॉन्फ्रेंस? यह प्रेस कॉन्फ्रेंस इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन और व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद छोड़कर देश से बाहर जाना पड़ा था। उसके बाद यह पहला अवसर होगा जब वह सीधे मीडिया और जनता को संबोधित करेंगी। उम्मीद की जा रही है कि अपने संबोधन में वह: बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर अपनी राय रखेंगी। आवामी लीग की आगे की रणनीति बताएंगी। देश वापसी को लेकर अपना रुख स्पष्ट करेंगी। समर्थकों के लिए राजनीतिक संदेश भी दे सकती हैं। भारत क्यों आई थीं शेख हसीना? शेख हसीना 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश छोड़कर भारत आई थीं। उस समय सरकारी नौकरियों में आरक्षण (कोटा) व्यवस्था के विरोध में शुरू हुआ छात्र आंदोलन धीरे-धीरे सरकार विरोधी व्यापक प्रदर्शन में बदल गया था। देशभर में हिंसा और राजनीतिक संकट बढ़ने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और सैन्य हेलीकॉप्टर से ढाका छोड़कर भारत पहुंचीं। इसके बाद से वह भारत में रह रही हैं। बांग्लादेश की राजनीति पर रहेगी नजर शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस ऐसे समय हो रही है जब बांग्लादेश की राजनीति में लगातार बदलाव देखने को मिल रहे हैं। उनकी संभावित वापसी को लेकर लंबे समय से अटकलें लगाई जा रही हैं। ऐसे में आज का उनका संबोधन न केवल आवामी लीग, बल्कि पूरे बांग्लादेश के राजनीतिक परिदृश्य के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या शेख हसीना वास्तव में अपनी देश वापसी की घोषणा करती हैं या फिर भविष्य की राजनीतिक रणनीति का केवल खाका पेश करती हैं।
नई दिल्ली/ढाका: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने घोषणा की है कि वह इस वर्ष दिसंबर के आसपास अपने देश लौटने की योजना बना रही हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि वापसी पर उनकी गिरफ्तारी हो सकती है या उनकी जान को खतरा हो सकता है, लेकिन इसके बावजूद वह स्वदेश लौटेंगी और अदालत के सामने आत्मसमर्पण करेंगी। 'गिरफ्तार करें या मार दें, मुझे अपने देश लौटना है' समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दिए एक इंटरव्यू में शेख हसीना ने कहा कि अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद उन्हें बांग्लादेश छोड़कर भारत आना पड़ा था। उन्होंने कहा, "वे मुझे गिरफ्तार कर सकते हैं, वे मुझे मार भी सकते हैं। फिर भी मुझे अपने देश लौटना ही होगा।" हसीना ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी प्रस्तावित वापसी को लेकर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से कोई बातचीत नहीं हुई है। कोर्ट में करेंगी आत्मसमर्पण पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि बांग्लादेश लौटने के बाद वह अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करेंगी और कानूनी प्रक्रिया का सामना करेंगी। अवामी लीग नेताओं पर कार्रवाई का आरोप शेख हसीना ने आरोप लगाया कि उनकी पार्टी अवामी लीग के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगातार कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि उनकी मृत्यु भी होती है तो वह अपने देश की धरती पर ही हो, जहां उनके माता-पिता दफन हैं। मानवता के खिलाफ अपराध मामले में मौत की सजा शेख हसीना का यह बयान ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने उन्हें मानवता के खिलाफ अपराध के मामले में दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई है। यह मामला 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और प्रदर्शनकारियों की मौत से जुड़ा है। न्यायाधिकरण का आरोप है कि तत्कालीन सरकार प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और हिंसा रोकने में विफल रही। पूर्व गृह मंत्री को भी मौत की सजा इसी मामले में बांग्लादेश के पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल को भी मौत की सजा सुनाई गई है। वहीं, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून को पांच वर्ष की जेल की सजा दी गई है। न्यायाधिकरण ने सरकार को शेख हसीना और असदुज्जमान खान कमाल की संपत्तियां जब्त करने का भी निर्देश दिया है। राजनीतिक संकट के बीच वापसी की तैयारी शेख हसीना की संभावित वापसी ऐसे समय में सामने आई है जब बांग्लादेश में राजनीतिक हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। यदि वह दिसंबर में लौटती हैं, तो उन्हें अदालत में पेश होकर कानूनी प्रक्रिया का सामना करना होगा। वहीं, उनकी वापसी देश की राजनीति पर भी बड़ा असर डाल सकती है।
नई दिल्ली/ढाका, एजेंसियां। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने दिसंबर 2026 में अपने देश लौटकर अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि गिरफ्तारी या जान का खतरा होने के बावजूद वह स्वेच्छा से बांग्लादेश लौटेंगी। एक अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी को दिए साक्षात्कार में हसीना ने कहा कि यदि उनकी मृत्यु भी होती है, तो वह अपने देश की मिट्टी पर ही हो, जहां उनके माता-पिता दफन हैं। 78 वर्षीय शेख हसीना अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद सत्ता से हटने के पश्चात भारत आ गई थीं। अब उन्होंने कहा है कि वह अवामी लीग के अन्य निर्वासित नेताओं के साथ बांग्लादेश लौटने की योजना बना रही हैं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी वापसी को लेकर ढाका की वर्तमान सरकार से कोई औपचारिक बातचीत नहीं हुई है। समर्थकों की स्थिति पर जताई चिंता शेख हसीना ने कहा कि उनकी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। उनका मानना है कि कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बजाय देश लौटकर कानूनी प्रक्रिया का सामना करना बेहतर होगा। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें गिरफ्तार किया जाता है या उनकी हत्या भी हो जाती है, तब भी वह अपने फैसले से पीछे नहीं हटेंगी। मौत की सजा के बाद आया बड़ा बयान हसीना का यह बयान उस समय आया है जब बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान कथित मानवता के खिलाफ अपराधों के मामले में उन्हें दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड सुनाया है। ट्रिब्यूनल ने आरोप लगाया कि आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों की मौत के लिए वह जिम्मेदार थीं या हिंसा रोकने में विफल रहीं। इसी मामले में पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल को भी मृत्युदंड तथा पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून को पांच वर्ष की सजा सुनाई गई है। साथ ही अदालत ने शेख हसीना और कमाल की संपत्तियां जब्त करने के निर्देश भी दिए हैं। ऐसे संवेदनशील माहौल में शेख हसीना की संभावित वापसी बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम मानी जा रही है।
ढाका/नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने स्पष्ट कहा है कि वह हर हाल में इसी साल अपने देश लौटेंगी, चाहे उन्हें मौत की सजा का सामना ही क्यों न करना पड़े। करीब दो वर्षों से भारत में रह रहीं हसीना ने कहा कि राजनीतिक दबाव और कानूनी कार्रवाई उनके फैसले को नहीं बदल सकती। उन्होंने अपने खिलाफ दिए गए फैसले को राजनीतिक प्रतिशोध करार देते हुए लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष जारी रखने की बात कही। 'मौत की सजा से नहीं डरती' एक इंटरव्यू में शेख हसीना ने कहा कि उन्हें मौत की सजा का कोई भय नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है और इसका उद्देश्य उनकी पार्टी अवामी लीग को कमजोर करना है। उनके अनुसार, पार्टी जनता की ताकत पर खड़ी है और उसे खत्म नहीं किया जा सकता। हसीना ने कहा कि उनका जीवन हमेशा बांग्लादेश की जनता और लोकतंत्र के लिए समर्पित रहा है तथा वह हर परिस्थिति में अपने देश लौटने का प्रयास करेंगी। 'अवामी लीग को खत्म करने की साजिश' पूर्व प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार उनके नेतृत्व और अवामी लीग को राजनीतिक रूप से खत्म करना चाहती है। उन्होंने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब उनकी पार्टी पर दबाव बनाया गया हो, लेकिन हर बार जनता ने उनका साथ दिया है। उनका दावा है कि उनके खिलाफ सुनाया गया फैसला न्यायिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडा का हिस्सा है। परिवार की त्रासदी का किया जिक्र शेख हसीना ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कई कठिन दौर देखे हैं। उन्होंने 1975 में अपने पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की हत्या का जिक्र करते हुए कहा कि उस हमले में उनके परिवार के अधिकांश सदस्य मारे गए थे। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उन पर पहले भी जानलेवा हमले हुए, जिनमें वह बच निकलीं। उनके मुताबिक, इन घटनाओं ने उन्हें और अधिक मजबूत बनाया है। मौजूदा सरकार पर लगाए गंभीर आरोप हसीना ने दावा किया कि बांग्लादेश में लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हुई हैं और कानून का शासन प्रभावित हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेताओं और अवामी लीग के कार्यकर्ताओं को राजनीतिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिति पर नकारात्मक असर पड़ा है तथा अल्पसंख्यक समुदायों पर हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर जताई चिंता पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला पूरे देश की लोकतांत्रिक भावना पर हमला है। उन्होंने कहा कि सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होती है और इस दिशा में गंभीर प्रयास होने चाहिए। 'दिल आज भी बांग्लादेश में ही है' शेख हसीना ने कहा कि निर्वासन में रहने के बावजूद उनका मन हमेशा बांग्लादेश में ही रहता है। उन्होंने कहा कि देश में अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं और आम लोगों की मुश्किलों की खबरें सुनना उनके लिए बेहद पीड़ादायक है। उन्होंने कहा कि वह लगातार अपने सहयोगियों के संपर्क में हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बांग्लादेश में लोकतंत्र एवं मानवाधिकारों के मुद्दे उठाने का प्रयास कर रही हैं। 'जनता के दम पर फिर खड़ी होगी अवामी लीग' अपने संदेश के अंत में हसीना ने भरोसा जताया कि बांग्लादेश की जनता एक बार फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करेगी। उन्होंने कहा कि अवामी लीग जनता के समर्थन से दोबारा मजबूती के साथ उभरेगी और वह अपने अंतिम दिन तक इस संघर्ष का हिस्सा बनी रहेंगी।
भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा प्रबंधन को लेकर नया विवाद सामने आया है। बांग्लादेश ने आरोप लगाया है कि पिछले 24 घंटों में भारत की ओर से लोगों को उसकी सीमा में भेजने के कई प्रयास किए गए, जिन्हें उसकी सुरक्षा एजेंसियों ने विफल कर दिया। करीब 4,000 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा पर हालात को देखते हुए बांग्लादेशी सुरक्षा बलों ने निगरानी बढ़ा दी है और अवैध प्रवेश के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही है। झिनाइदाह क्षेत्र की घटना बनी तनाव की वजह बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, झिनाइदाह जिले के सीमा क्षेत्र में कुछ लोगों को कथित रूप से सीमा पार कराने की कोशिश की गई थी। सुरक्षा बलों ने समय रहते हस्तक्षेप कर इस प्रयास को रोकने का दावा किया है। इस घटना ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद संवेदनशील सीमा मुद्दों को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। शेख हसीना के बाद बदलते रिश्तों पर नया दबाव पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina के सत्ता से हटने के बाद दोनों देशों के संबंध नए दौर में प्रवेश कर चुके हैं। ऐसे समय में सीमा से जुड़ा यह विवाद द्विपक्षीय संबंधों के लिए नई चुनौती बन सकता है। ढाका का कहना है कि किसी भी नागरिक की वापसी स्थापित कानूनी और राजनयिक प्रक्रियाओं के तहत होनी चाहिए, न कि एकतरफा कार्रवाई के माध्यम से। दिल्ली में होने वाली बैठक से समाधान की उम्मीद सीमा विवाद के बीच 8 से 11 जून तक नई दिल्ली में दोनों देशों के सीमा सुरक्षा प्रमुखों की बैठक प्रस्तावित है। इस बैठक में अवैध आव्रजन, सीमा सुरक्षा और नागरिकों की वापसी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह वार्ता दोनों देशों के बीच बढ़ती गलतफहमियों को दूर करने का महत्वपूर्ण अवसर हो सकती है। सीमाई तनाव के बीच बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सीमा विवाद के समानांतर बांग्लादेश की राजनीति में भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखने को मिला है। अवामी लीग की वरिष्ठ नेता Selina Hayat Ivy को जमानत मिलने के बाद रिहा कर दिया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण संकेत देता है। अवामी लीग पर प्रतिबंध को लेकर बढ़ी बहस International Crisis Group ने बांग्लादेश सरकार से अवामी लीग पर संभावित प्रतिबंध लगाने के फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है। संगठन का मानना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाए रखने के लिए सभी प्रमुख राजनीतिक ताकतों की भागीदारी जरूरी है। सीमा सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता दोनों बड़ी चुनौती भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ता तनाव और बांग्लादेश के भीतर जारी राजनीतिक हलचल दोनों देशों के संबंधों पर असर डाल सकती है। अब निगाहें नई दिल्ली में होने वाली वार्ता और ढाका की राजनीतिक दिशा पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में द्विपक्षीय रिश्तों की दिशा तय कर सकती हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।