काठमांडू, एजेंसियां। भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने नेपाल के प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री बालेंद्र (बालेन) शाह से मुलाकात की। यह बैठक मंगलवार को काठमांडू स्थित सिंहदरबार में प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई, जिसमें दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और सैन्य संबंधों को मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा हुई। बैठक में नेपाल में भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव भी मौजूद रहे। आपसी हित और सैन्य सहयोग पर बातचीत बैठक के दौरान भारत और नेपाल के बीच आपसी हित से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ दोनों देशों के द्विपक्षीय सैन्य संबंधों को और मजबूत करने पर विचार-विमर्श किया गया। भारतीय सेना प्रमुख का यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब दोनों पड़ोसी देश पारंपरिक रक्षा संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। जनरल धीरज सेठ को मिला मानद जनरल का पद नेपाल यात्रा के दौरान राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने जनरल धीरज सेठ को नेपाली सेना के मानद जनरल की उपाधि प्रदान की। भारत और नेपाल के सेना प्रमुखों को एक-दूसरे की सेना में मानद जनरल का पद देने की यह परंपरा 1950 से चली आ रही है और दोनों सेनाओं के बीच विशेष संबंधों का प्रतीक मानी जाती है। गोरखा भर्ती और रक्षा संबंधों पर नजर जनरल धीरज सेठ की नेपाल यात्रा के दौरान गोरखा सैनिकों की भारतीय सेना में भर्ती का मुद्दा भी चर्चा में रहा है। नेपाल के पूर्व गोरखा सैनिकों ने बालेन शाह सरकार से अग्निपथ योजना के तहत नेपाली युवाओं की भर्ती का रास्ता साफ करने की मांग की है। जनरल सेठ ने नेपाल के सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल से भी द्विपक्षीय बातचीत की। उनकी तीन दिवसीय यात्रा का उद्देश्य भारत-नेपाल के पारंपरिक सैन्य संबंधों को और मजबूत करना तथा रक्षा सहयोग को नई गति देना है।
काठमांडू: भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह सोमवार को काठमांडू में भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव से मुलाकात करने वाले हैं। प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद यह पहली बार होगा जब बालेन शाह किसी देश के राजदूत से अकेले में मुलाकात करेंगे। ऐसे समय में होने वाली यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से लंबित सीमा विवाद के दो प्रमुख मुद्दे अभी भी समाधान की प्रतीक्षा में हैं। भारत और नेपाल के बीच करीब 1,800 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। दोनों देशों ने बातचीत और विभिन्न स्तरों पर कूटनीतिक प्रयासों के जरिए लगभग 98 प्रतिशत सीमा विवाद सुलझा लिया है। हालांकि, सुस्ता और कालापानी-लिम्पियाधुरा-लिपुलेख जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर दोनों पक्षों के बीच अब भी मतभेद कायम हैं। सुस्ता विवाद के बाद बढ़ी चिंता सुस्ता क्षेत्र को लेकर भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। यह विवाद 2 अगस्त को उस समय और गंभीर हो गया, जब नेपाली ग्रामीणों और भारतीय सीमा सुरक्षा कर्मियों के बीच कथित तौर पर झड़प हुई। नेपाली पक्ष की ओर से आरोप लगाया गया कि भारतीय क्षेत्र से आए लोगों ने नवलपरासी पश्चिम स्थित विवादित इलाके में बाढ़ से बचाव के लिए बनाए जा रहे तटबंध को नुकसान पहुंचाया। स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए नेपाल की सशस्त्र पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सुस्ता में सीमा तय करना क्यों मुश्किल? सुस्ता क्षेत्र में करीब 24 किलोमीटर के हिस्से में सीमा स्तंभ नहीं हैं। यहां सीमा निर्धारण के लिए मुख्य रूप से प्राकृतिक संरचनाओं, विशेषकर नदी की धारा और पेड़ों आदि को आधार बनाया गया है। गंडक नदी, जिसे नारायणी नदी के नाम से भी जाना जाता है, के रास्ते में समय के साथ बदलाव आने के कारण सीमा निर्धारण का विवाद और जटिल हो गया है। 1816 की सुगौली संधि के तहत नदी की मध्य धारा को सीमा का आधार माना गया था। लेकिन नदी की धारा बदलने के बाद दोनों देशों के दावों और जमीन की वास्तविक स्थिति के बीच अंतर पैदा हुआ। कालापानी-लिम्पियाधुरा-लिपुलेख भी बड़ा विवाद सुस्ता के अलावा कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख क्षेत्र भी भारत-नेपाल संबंधों में संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। नेपाल की संसद ने वर्ष 2020 में संविधान संशोधन के जरिए नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था। इस नक्शे में कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को नेपाल के क्षेत्र के रूप में दिखाया गया था। भारत ने नेपाल के इस दावे को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक तनाव बढ़ा था। हालांकि, समय-समय पर दोनों पक्षों के बीच बातचीत भी जारी रही है। 98 प्रतिशत सीमा विवाद सुलझा, लेकिन दो इलाके बने चुनौती भारत और नेपाल ने सीमा के लगभग 98 प्रतिशत हिस्से से जुड़े विवादों को बातचीत के माध्यम से सुलझा लिया है। इसके बावजूद सुस्ता और कालापानी जैसे इलाकों पर सहमति नहीं बन सकी है। वर्ष 2014 में दोनों देशों ने सीमा विवाद के समाधान के लिए सीमा कार्य समूह और विदेश सचिव स्तर की बातचीत को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी। इसके बाद सीमा कार्य समूह की कई बैठकें हुईं। जुलाई 2025 में भी इस विषय पर बैठक हुई थी, लेकिन विदेश सचिव स्तर पर व्यापक समाधान की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी। बालेन शाह और भारतीय राजदूत की मुलाकात क्यों अहम? बालेन शाह और भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव के बीच होने वाली मुलाकात ऐसे समय में हो रही है, जब सुस्ता को लेकर दोनों देशों में हालिया तनाव सामने आया है। ऐसे में बैठक में सीमा विवाद, सुस्ता में हालिया घटनाक्रम और दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाए रखने के उपायों पर चर्चा की संभावना महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, बैठक में किन मुद्दों पर कितनी विस्तृत बातचीत होगी और किसी ठोस समाधान की दिशा में कितना आगे बढ़ा जाएगा, यह बैठक के बाद ही स्पष्ट होगा। सीमा विवाद का असर भारत-नेपाल संबंधों पर भारत और नेपाल के बीच संबंध केवल राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक संबंध बेहद गहरे हैं। दोनों देशों की खुली सीमा के कारण बड़ी संख्या में लोग रोजगार, व्यापार और पारिवारिक संबंधों के लिए एक-दूसरे के देश में आते-जाते हैं। ऐसे में सीमा विवाद का बार-बार सामने आना केवल कूटनीतिक चुनौती नहीं है, बल्कि इसका असर आम लोगों और दोनों देशों के आपसी संबंधों पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक विवाद बने रहने से दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ सकता है। साथ ही, इससे क्षेत्रीय राजनीति में तीसरे देशों को प्रभाव बढ़ाने का अवसर भी मिल सकता है। अब सभी की नजर प्रधानमंत्री बालेन शाह और भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव की मुलाकात पर है। देखना होगा कि यह बैठक भारत-नेपाल संबंधों में नई बातचीत की शुरुआत करती है या सुस्ता और लिपुलेख जैसे जटिल सीमा विवाद अभी और समय लेते हैं।
काठमांडू: नेपाल में एक बार फिर जेन-जी (Gen Z) युवाओं के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। राजधानी काठमांडू समेत कई इलाकों में युवा बेरोजगारी, पुलिस कार्रवाई, कथित प्रशासनिक ज्यादती और सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों ने काठमांडू के मेयर बालेन शाह के इस्तीफे की मांग भी तेज कर दी है। यह आंदोलन एक राइड-शेयर चालक की मौत के बाद और उग्र हो गया है। युवाओं का कहना है कि सरकार रोजगार, सुशासन और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर विफल रही है। राइड-शेयर चालक की मौत के बाद भड़का आंदोलन जानकारी के अनुसार, 25 वर्षीय राइड-शेयर चालक गणेश नेपाली ने नगर निगम पुलिस के साथ कथित विवाद के बाद खुद पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा ली थी। गंभीर रूप से झुलसे गणेश की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस कार्रवाई और लगातार प्रशासनिक दबाव के कारण उन्होंने यह कदम उठाया। घटना के बाद युवाओं में भारी नाराजगी फैल गई और निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू हो गए। झुग्गी हटाने की कार्रवाई पर भी नाराजगी विरोध प्रदर्शन का एक बड़ा कारण काठमांडू में चलाया जा रहा अतिक्रमण हटाओ अभियान भी है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रशासन ने बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के नदी किनारे बनी झुग्गी बस्तियों को हटाया, जिससे हजारों परिवार बेघर हो गए। युवाओं का कहना है कि गरीबों के पुनर्वास के बिना की गई कार्रवाई मानवीय दृष्टि से गलत है और सरकार को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। पुलिस पर बल प्रयोग के आरोप प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर लाठीचार्ज, बल प्रयोग और हिरासत में दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं। विभिन्न छात्र और युवा संगठनों ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तथा पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की मांग की है। राजधानी के कई हिस्सों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और पुलिस लगातार प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने में जुटी हुई है। बालेन शाह पर बढ़ा दबाव काठमांडू के मेयर बालेन शाह को पिछले वर्षों में युवाओं का व्यापक समर्थन मिला था, लेकिन अब वही युवा उनके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रशासन जनता की समस्याओं का समाधान करने में असफल रहा है और युवाओं की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। युवाओं ने मेयर बालेन शाह से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने की मांग की है। रोजगार और पारदर्शिता की मांग राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल के युवा रोजगार, पारदर्शी शासन और भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई की उम्मीद कर रहे थे। हालांकि, इन मुद्दों पर अपेक्षित प्रगति नहीं होने से असंतोष लगातार बढ़ता गया। सरकार ने आत्मदाह की घटना की जांच के आदेश दिए हैं, लेकिन प्रदर्शनकारी इसे पर्याप्त नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि केवल जांच नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
काठमांडू: नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह (बालेन) अपनी सरकार का विस्तार करने जा रहे हैं। मंत्रिपरिषद में दो नए चेहरों को शामिल किए जाने की तैयारी है। पूर्व गृह मंत्री सुदन गुरुंग एक बार फिर गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालेंगे, जबकि सामाजिक नवाचार और तकनीकी विकास के क्षेत्र में चर्चित नाम महावीर पुन को नवगठित विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार मंत्रालय का पहला मंत्री बनाया जाएगा। प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों के अनुसार, दोनों नेताओं का शपथ ग्रहण समारोह मंगलवार को राष्ट्रपति भवन शीतल निवास में आयोजित किया जाएगा। सुदन गुरुंग की सरकार में वापसी सरकार द्वारा गठित जांच समिति की रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के बाद सुदन गुरुंग की मंत्रिमंडल में वापसी का रास्ता साफ हो गया है। हाल ही में हुई कैबिनेट बैठक में समिति की रिपोर्ट को मंजूरी दी गई, जिसमें गुरुंग को उनके खिलाफ लगे आरोपों से राहत मिली है। गौरतलब है कि अप्रैल में सुदन गुरुंग ने गृह मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उन पर मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जांच का सामना कर रहे कारोबारी दीपक भट्ट से जुड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी रखने के आरोप लगे थे। दस्तावेजों में उनके नाम पर कुछ माइक्रो इंश्योरेंस कंपनियों के शेयर होने की बात सामने आई थी, जिसके बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था। आरोपों पर पहले ही दे चुके थे सफाई सुदन गुरुंग ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि उन्होंने अपनी संपत्तियों से जुड़ी कोई जानकारी नहीं छिपाई। उनका कहना था कि संबंधित कंपनियों के शेयर उन्होंने मंत्री बनने से पहले खरीदे थे और वे उनकी घोषित संपत्तियों का हिस्सा थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि किसी कंपनी में शेयरधारक होने का अर्थ यह नहीं है कि कंपनी से जुड़े हर व्यक्ति या कारोबारी गतिविधि से उनका प्रत्यक्ष संबंध है। पहली बार बनेगा विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार मंत्रालय कैबिनेट विस्तार का दूसरा बड़ा आकर्षण महावीर पुन की एंट्री मानी जा रही है। नेपाल सरकार ने हाल ही में प्रशासनिक पुनर्गठन के तहत मंत्रालयों की संख्या 25 से घटाकर 18 कर दी थी। इसी प्रक्रिया में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के लिए अलग मंत्रालय का गठन किया गया है। महावीर पुन लंबे समय से नेपाल में वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी विकास और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए अलग मंत्रालय की मांग करते रहे हैं। अब उन्हें इस नए मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपे जाने की तैयारी है। जेन-जी आंदोलन के बाद उभरे थे गुरुंग सुदन गुरुंग सितंबर में हुए जेन-जी आंदोलन के बाद राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुखता से उभरे थे। उन्होंने मार्च में गोरखा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया और बाद में गृह मंत्री बनाए गए। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने प्रशासनिक सुधारों और कई वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सुर्खियां बटोरी थीं। हालांकि बाद में उन पर हितों के टकराव को लेकर सवाल उठे, जिसके बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा था। प्रशासनिक सुधारों पर बालेन सरकार का फोकस विश्लेषकों का मानना है कि कैबिनेट विस्तार और मंत्रालयों के पुनर्गठन के जरिए प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह अपनी सरकार को अधिक प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने की कोशिश कर रहे हैं। विज्ञान एवं नवाचार मंत्रालय का गठन नेपाल की तकनीकी और अनुसंधान क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सुदन गुरुंग की वापसी और महावीर पुन की एंट्री के साथ बालेन सरकार अब प्रशासनिक सुधार, तकनीकी विकास और सुशासन के एजेंडे को आगे बढ़ाने की तैयारी में दिखाई दे रही है।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के एक बयान ने भारत-नेपाल सीमा विवाद को लेकर नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। संसद में अपने संबोधन के दौरान शाह ने कहा कि केवल भारत ने ही नहीं, बल्कि नेपाल ने भी कुछ स्थानों पर भारतीय भूमि का उपयोग या कब्जा किया है। उनके इस बयान के बाद विपक्ष ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा, जिसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय को आधिकारिक सफाई जारी करनी पड़ी। पहली संसदीय स्पीच में उठाया सीमा विवाद का मुद्दा प्रधानमंत्री बनने के बाद संसद में अपने पहले संबोधन में बालेन शाह ने कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे विवादित क्षेत्रों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सीमा विवाद का समाधान दोनों देशों को विशेषज्ञों और इतिहासकारों की मदद से बातचीत के जरिए निकालना चाहिए। विपक्ष ने मांगे सबूत प्रधानमंत्री के बयान के बाद विपक्षी दलों ने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि नेपाल द्वारा भारतीय भूमि पर कब्जे का दावा किया जा रहा है, तो सरकार इसके प्रमाण पेश करे। कई नेताओं ने बयान वापस लेने की भी मांग की। सीमा विशेषज्ञों ने दावे पर जताई असहमति नेपाल-भारत सीमा मामलों के जानकारों ने कहा कि नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्र पर आधिकारिक अतिक्रमण का कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। हालांकि सीमावर्ती इलाकों में दोनों देशों के नागरिकों द्वारा जमीन के उपयोग के कुछ मामले सामने आते रहे हैं। विदेश मंत्रालय ने दी सफाई विवाद बढ़ने के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री का आशय किसी सरकारी कब्जे से नहीं था। मंत्रालय के अनुसार, उन्होंने सीमावर्ती इलाकों में दोनों देशों के नागरिकों द्वारा भूमि उपयोग की स्थिति का जिक्र किया था। लिपुलेख-कालापानी विवाद फिर चर्चा में यह बयान ऐसे समय आया है जब नेपाल हाल ही में लिपुलेख मार्ग से होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भी आपत्ति जता चुका है। कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से सीमा विवाद जारी है।
Balen Shah एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार वजह कोई राजनीतिक बयान नहीं बल्कि उनका बदला हुआ लुक है। काठमांडू के मेयर से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक अक्सर ब्लैक टी-शर्ट, ब्लैक कोट और काले चश्मे में नजर आने वाले बालेन शाह अब अचानक सफेद कपड़ों में दिखाई दिए हैं, जिसके बाद नेपाल में राजनीतिक और सोशल मीडिया हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीर 10 मई को बालेन शाह ने Facebook और TikTok पर अपनी नई तस्वीर और वीडियो पोस्ट की। इसमें वह: सफेद शर्ट धारीदार ट्राउजर सफेद स्नीकर्स पहने नजर आए। खास बात यह रही कि उन्होंने पोस्ट के साथ कोई कैप्शन नहीं लिखा, लेकिन कुछ ही मिनटों में तस्वीर वायरल हो गई। नेपाल में फेसबुक, इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर उनके नए स्टाइल को लेकर जमकर चर्चा शुरू हो गई। जूतों की कीमत भी बनी चर्चा का विषय सोशल मीडिया पर लोगों ने उनके सफेद स्नीकर्स को लेकर भी चर्चा शुरू कर दी। कुछ यूजर्स ने दावा किया कि प्रधानमंत्री के जूतों की कीमत सिर्फ 1200 नेपाली रुपये है। कई टिकटॉक यूजर्स ने वीडियो बनाकर कहा कि बालेन शाह की लोकप्रियता इतनी ज्यादा है कि साधारण जूते भी ट्रेंड बन गए हैं। एक यूजर ने कहा: “प्रधानमंत्री बनने के लिए महंगे जूते जरूरी नहीं हैं।” अब तक मीडिया से दूरी Balen Shah प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक बेहद कम सार्वजनिक रूप से नजर आए हैं। उन्होंने: देश को संबोधित नहीं किया कोई बड़ा इंटरव्यू नहीं दिया प्रेस कॉन्फ्रेंस से दूरी बनाए रखी हालांकि इसके बावजूद वह लगातार चर्चा में बने हुए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, शाह “कम बोलो, ज्यादा काम करो” की रणनीति पर चल रहे हैं। ब्लैक लुक से बनी थी अलग पहचान राजनीति में आने से पहले बालेन शाह एक रैपर और परफॉर्मर भी रह चुके हैं। ऐसे में फैशन और विजुअल पहचान को लेकर उनकी अलग शैली पहले से चर्चा में रही है। काठमांडू के मेयर रहते हुए भी उन्होंने पारंपरिक राजनीतिक ड्रेस कोड से दूरी बनाए रखी थी। औपचारिक कार्यक्रमों में भी वह अक्सर: ब्लैक आउटफिट सनग्लासेस मॉडर्न स्टाइल में नजर आते थे। यहां तक कि प्रधानमंत्री पद की शपथ के दौरान पहनी गई पारंपरिक नेपाली पोशाक “दौरा-सुरुवाल” का रंग भी काला था। सफेद कपड़ों के पीछे क्या है संदेश? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका अचानक सफेद कपड़ों में नजर आना सिर्फ फैशन बदलाव नहीं हो सकता। कुछ विशेषज्ञ इसे: सॉफ्ट इमेज बनाने की कोशिश राजनीतिक संदेश विवादों के बीच नई शुरुआत का संकेत मानकर देख रहे हैं। विवादों में रही है बालेन सरकार हाल के महीनों में बालेन सरकार कई मुद्दों को लेकर आलोचना झेल रही है। इनमें: काठमांडू में बुलडोजर कार्रवाई नदी किनारे बसे लोगों को हटाना चीफ जस्टिस की नियुक्ति विवाद प्रशासनिक फैसलों को लेकर सवाल शामिल हैं। इसी वजह से कुछ लोग उनके सफेद लुक को “इमेज मेकओवर” की कोशिश भी बता रहे हैं। हालांकि बालेन शाह ने खुद इस बदलाव पर कोई टिप्पणी नहीं की है। नेपाल में बना फैशन ट्रेंड बालेन शाह की लोकप्रियता का असर बाजार में भी दिखाई देने लगा है। नेपाल में कई दुकानदार अब: उनके जैसे काले चश्मे सफेद स्नीकर्स ब्लैक और व्हाइट आउटफिट बेचते नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर उनके स्टाइल को लेकर मीम्स, वीडियो और फैशन पोस्ट लगातार वायरल हो रहे हैं।
सत्ता में आते ही घिरी सरकार Balen Shah की सरकार को पद संभाले अभी कुछ ही हफ्ते हुए हैं, लेकिन देश में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। राजधानी Kathmandu समेत कई शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारी छात्र, राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता और आम नागरिक शामिल हैं, जो सरकार के कई फैसलों का विरोध कर रहे हैं। भारत से आने वाले सामान पर टैक्स बना मुद्दा विरोध की बड़ी वजह सरकार का वह फैसला है, जिसमें भारत से 100 रुपये से अधिक कीमत के सामान पर अनिवार्य कस्टम ड्यूटी लगाने का नियम लागू किया गया है। सीमावर्ती इलाकों के लोगों का कहना है कि वे रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भारत पर निर्भर हैं और यह फैसला उनके जीवन पर सीधा असर डाल रहा है। छात्र संघ पर रोक से युवाओं में नाराजगी सरकार द्वारा छात्र संगठनों को खत्म या नजरअंदाज करने के फैसले ने युवाओं में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। छात्र नेताओं का आरोप है कि सरकार संवाद करने के बजाय दमनकारी रवैया अपना रही है। हजारों छात्र सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जिनमें स्कूल और कॉलेज के छात्र बड़ी संख्या में शामिल हैं। गृह मंत्री के खिलाफ भी प्रदर्शन विरोध प्रदर्शनों का एक बड़ा कारण गृह मंत्री Sudan Gurung के खिलाफ लगे आरोप भी हैं। उन पर आय से अधिक संपत्ति और संदिग्ध वित्तीय लेनदेन में शामिल होने के आरोप लगाए गए हैं। विपक्ष और नागरिक समूह उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। बढ़ता दबाव, सरकार के लिए चुनौती लगातार बढ़ते विरोध के बीच बालेन शाह सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। आर्थिक नीतियों, छात्र असंतोष और राजनीतिक आरोपों के चलते यह विरोध अब एक बड़े राजनीतिक संकट का रूप लेता दिख रहा है। आने वाले दिनों में सरकार की प्रतिक्रिया और कदम अहम होंगे।
नेपाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। संसदीय चुनावों में नई राजनीतिक ताकत बनकर उभरी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रतिनिधि सभा की अधिकांश सीटों पर जीत दर्ज की है। पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार Balen Shah के नेतृत्व में RSP की इस जीत को नेपाल की राजनीति में ऐतिहासिक माना जा रहा है। चुनाव परिणाम सामने आने के बाद भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi ने सोमवार को टेलीफोन पर Balen Shah और RSP अध्यक्ष Rabi Lamichhane से बातचीत कर उन्हें जीत की बधाई दी। 165 में से 125 सीटों पर जीत नेपाल के संसदीय चुनावों में फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली के तहत 165 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान हुआ। सोमवार शाम तक 163 सीटों के नतीजे सामने आ चुके थे, जिनमें RSP ने 125 सीटें जीतकर करीब 76 प्रतिशत सीटों पर कब्जा जमा लिया। करीब साढ़े तीन साल पुरानी इस पार्टी ने देशभर में जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए पारंपरिक राजनीतिक दलों के कई दिग्गज नेताओं को पीछे छोड़ दिया। ओली का गढ़ भी ढहा Balen Shah ने पूर्व प्रधानमंत्री K. P. Sharma Oli को झापा-5 सीट से 68,348 मतों के बड़े अंतर से हराया। यह अंतर नेपाल के संसदीय इतिहास में किसी भी उम्मीदवार की सबसे बड़ी जीतों में से एक माना जा रहा है। झापा-5 को लंबे समय से ओली का मजबूत गढ़ माना जाता रहा था। दो-तिहाई बहुमत की ओर RSP आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत भी RSP करीब 48 प्रतिशत वोट शेयर के साथ आगे चल रही है। अगर यह रुझान कायम रहता है, तो 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में पार्टी को लगभग 184 सीटें मिल सकती हैं, जो दो-तिहाई बहुमत के करीब होगा। 1991 के बाद पहली बार किसी एक पार्टी को इतना बड़ा जनादेश मिलने की संभावना बन रही है। मोदी ने जताई सहयोग की प्रतिबद्धता प्रधानमंत्री Narendra Modi ने सोशल मीडिया पर जानकारी देते हुए कहा कि उन्होंने Balen Shah और Rabi Lamichhane को चुनावी जीत की बधाई दी और भारत-नेपाल संबंधों को और मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के साझा प्रयासों से आने वाले वर्षों में भारत और नेपाल के संबंध नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं। वहीं RSP अध्यक्ष Rabi Lamichhane ने प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद देते हुए कहा कि उनकी पार्टी आपसी सम्मान और साझा समृद्धि पर आधारित संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कनेक्टिविटी, सांस्कृतिक पर्यटन, ऊर्जा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में भारत के साथ सहयोग बढ़ाने की इच्छा भी जताई।
नेपाल में संसदीय चुनावों की मतगणना अब अंतिम चरण में पहुंच गई है और शुरुआती रुझानों में राजनीतिक तस्वीर तेजी से बदलती नजर आ रही है। राजधानी काठमांडू के मेयर Balen Shah से जुड़ी Rastriya Swatantra Party (RSP) इस चुनाव में स्पष्ट बढ़त बनाए हुए है और संसद में दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। ताजा जानकारी के अनुसार Election Commission Nepal द्वारा जारी आंकड़ों में बताया गया है कि हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP) श्रेणी के तहत RSP ने अब तक 124 सीटें जीत ली हैं और एक अन्य निर्वाचन क्षेत्र में भी बढ़त बनाए हुए है। वहीं प्रमुख विपक्षी दल Nepali Congress को अब तक 17 सीटें मिली हैं और वह एक अन्य सीट पर आगे चल रहा है। इसके अलावा Communist Party of Nepal (Unified Marxist–Leninist) (CPN-UML) ने आठ सीटें जीती हैं और एक क्षेत्र में बढ़त बनाए हुए है, जबकि Communist Party of Nepal (Maoist Centre) को सात सीटें मिली हैं। Rastriya Prajatantra Party (RPP) ने एक सीट हासिल की है, जबकि श्रम संस्कृति पार्टी को तीन सीटों पर जीत मिली है। इस बीच प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र उम्मीदवार Mahabir Pun भी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के लिए निर्वाचित हुए हैं। इसी के साथ प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन (PR) श्रेणी के वोटों की गिनती भी जारी है और यहां भी RSP को बड़ी बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। अब तक कुल 10.9 मिलियन वोटों में से लगभग 8.12 मिलियन वोटों की गिनती पूरी हो चुकी है। सुबह 9 बजे (NST) तक RSP को लगभग 39 लाख से अधिक वोट मिल चुके हैं, जो कुल गिने गए वोटों का लगभग 50 प्रतिशत है। इसके बाद नेपाली कांग्रेस को करीब 13 लाख और CPN-UML को लगभग 11 लाख वोट मिले हैं। नेपाल के चुनावी नियमों के अनुसार PR प्रणाली के तहत सीट पाने के लिए किसी भी पार्टी को कुल वोटों का कम से कम 3 प्रतिशत हासिल करना जरूरी होता है। मौजूदा रुझानों के आधार पर RSP, नेपाली कांग्रेस, CPN-UML, माओवादी सेंटर और RPP ही इस सीमा को पार करती दिखाई दे रही हैं। अगर अंतिम परिणाम तक यही स्थिति बनी रहती है, तो अनुमान है कि PR श्रेणी में RSP को लगभग 60 सीटें मिल सकती हैं, जबकि नेपाली कांग्रेस को लगभग 20 सीटें, CPN-UML को 17 सीटें, माओवादी सेंटर को करीब 8 सीटें और RPP को लगभग 5 सीटें मिल सकती हैं। नेपाल के 275 सदस्यीय हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए किसी भी पार्टी को 184 सीटों की जरूरत होती है। मौजूदा रुझानों के आधार पर यदि RSP को PR श्रेणी की अनुमानित 60 सीटें मिलती हैं और FPTP की मौजूदा सीटें इसमें जोड़ दी जाती हैं, तो पार्टी का कुल आंकड़ा लगभग 185 सीटों तक पहुंच सकता है। ऐसे में माना जा रहा है कि अगर यही रुझान अंतिम नतीजों तक जारी रहता है तो RSP नेपाल की राजनीति में ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए संसद में दो-तिहाई बहुमत हासिल कर सकती है।
नेपाल की राजनीति में इस समय एक नया नाम तेजी से चर्चा में है। रैपर से नेता बने Balen Shah आम चुनाव के शुरुआती रुझानों में बड़ी बढ़त के साथ उभरते दिख रहे हैं। इससे संकेत मिल रहे हैं कि वह नेपाल के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं। जनवरी तक राजधानी Kathmandu के मेयर रहे 35 वर्षीय बालेन शाह का मुकाबला इस चुनाव में कई दिग्गज नेताओं से था। इनमें KP Sharma Oli और Gagan Thapa जैसे बड़े नाम शामिल हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार बालेन शाह की पार्टी Rastriya Swatantra Party (आरएसपी) 165 प्रत्यक्ष निर्वाचित सीटों में से दो-तिहाई से अधिक सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। चुनाव आयोग के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक आरएसपी ने अब तक 24 सीटें जीत ली हैं और 93 सीटों पर आगे चल रही है। वहीं Nepali Congress दूसरे स्थान पर है, जिसने एक सीट जीती है और 11 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। जबकि Communist Party of Nepal (Unified Marxist–Leninist) (यूएमएल) एक सीट जीतकर 10 सीटों पर आगे चल रही है। नेपाल में पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण मतगणना धीमी रहती है। दूरदराज इलाकों से मतपेटियां लाने के लिए हेलिकॉप्टर का सहारा लेना पड़ता है, इसलिए अंतिम परिणाम आने में कई दिन लग सकते हैं। कौन हैं बालेन शाह? 35 वर्षीय बालेन शाह पेशे से एक स्ट्रक्चरल इंजीनियर हैं और कई वर्षों तक नेपाल के हिप-हॉप संगीत जगत “नेफहॉप” से जुड़े रहे हैं। उनका जन्म 1990 में काठमांडू में हुआ था। उनके पिता राम नारायण शाह आयुर्वेदिक डॉक्टर हैं और उनकी मां ध्रुवदेवी शाह हैं। संगीत के साथ-साथ बालेन शाह को एक रैपर, म्यूजिक प्रोड्यूसर, गीतकार और कवि के रूप में भी जाना जाता है। साल 2022 में जब उन्होंने काठमांडू के मेयर का चुनाव जीता, तो यह नेपाल की राजनीति के लिए बड़ा आश्चर्य था। इसके बाद युवा मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। केपी ओली के गढ़ में बढ़त बालेन शाह झापा-5 सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, जिसे पारंपरिक रूप से केपी शर्मा ओली का मजबूत क्षेत्र माना जाता है। शुरुआती मतगणना में शाह यहां करीब 10,000 वोटों से आगे बताए जा रहे हैं। इस चुनाव को नेपाल में पुराने और नए नेतृत्व के बीच मुकाबले के रूप में देखा जा रहा है। देश के करीब 8 लाख युवा मतदाता पहली बार वोट कर रहे हैं, जिससे चुनाव का रुख बदलता दिख रहा है। अगर बालेन शाह जीतते हैं, तो यह नेपाल की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत होगा, क्योंकि पिछले कई दशकों से देश में पारंपरिक दलों का ही दबदबा रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।