भारत और नेपाल के बीच करीब 1,800 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। दोनों देशों ने बातचीत और विभिन्न स्तरों पर कूटनीतिक प्रयासों के जरिए लगभग 98 प्रतिशत सीमा विवाद सुलझा लिया है। हालांकि, सुस्ता और कालापानी-लिम्पियाधुरा-लिपुलेख जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर दोनों पक्षों के बीच अब भी मतभेद कायम हैं।
सुस्ता क्षेत्र को लेकर भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। यह विवाद 2 अगस्त को उस समय और गंभीर हो गया, जब नेपाली ग्रामीणों और भारतीय सीमा सुरक्षा कर्मियों के बीच कथित तौर पर झड़प हुई।
नेपाली पक्ष की ओर से आरोप लगाया गया कि भारतीय क्षेत्र से आए लोगों ने नवलपरासी पश्चिम स्थित विवादित इलाके में बाढ़ से बचाव के लिए बनाए जा रहे तटबंध को नुकसान पहुंचाया। स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए नेपाल की सशस्त्र पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।
इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
सुस्ता क्षेत्र में करीब 24 किलोमीटर के हिस्से में सीमा स्तंभ नहीं हैं। यहां सीमा निर्धारण के लिए मुख्य रूप से प्राकृतिक संरचनाओं, विशेषकर नदी की धारा और पेड़ों आदि को आधार बनाया गया है।
गंडक नदी, जिसे नारायणी नदी के नाम से भी जाना जाता है, के रास्ते में समय के साथ बदलाव आने के कारण सीमा निर्धारण का विवाद और जटिल हो गया है। 1816 की सुगौली संधि के तहत नदी की मध्य धारा को सीमा का आधार माना गया था। लेकिन नदी की धारा बदलने के बाद दोनों देशों के दावों और जमीन की वास्तविक स्थिति के बीच अंतर पैदा हुआ।
सुस्ता के अलावा कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख क्षेत्र भी भारत-नेपाल संबंधों में संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।
नेपाल की संसद ने वर्ष 2020 में संविधान संशोधन के जरिए नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था। इस नक्शे में कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को नेपाल के क्षेत्र के रूप में दिखाया गया था। भारत ने नेपाल के इस दावे को स्वीकार नहीं किया।
इसके बाद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक तनाव बढ़ा था। हालांकि, समय-समय पर दोनों पक्षों के बीच बातचीत भी जारी रही है।
भारत और नेपाल ने सीमा के लगभग 98 प्रतिशत हिस्से से जुड़े विवादों को बातचीत के माध्यम से सुलझा लिया है। इसके बावजूद सुस्ता और कालापानी जैसे इलाकों पर सहमति नहीं बन सकी है।
वर्ष 2014 में दोनों देशों ने सीमा विवाद के समाधान के लिए सीमा कार्य समूह और विदेश सचिव स्तर की बातचीत को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी। इसके बाद सीमा कार्य समूह की कई बैठकें हुईं। जुलाई 2025 में भी इस विषय पर बैठक हुई थी, लेकिन विदेश सचिव स्तर पर व्यापक समाधान की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी।
बालेन शाह और भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव के बीच होने वाली मुलाकात ऐसे समय में हो रही है, जब सुस्ता को लेकर दोनों देशों में हालिया तनाव सामने आया है।
ऐसे में बैठक में सीमा विवाद, सुस्ता में हालिया घटनाक्रम और दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाए रखने के उपायों पर चर्चा की संभावना महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, बैठक में किन मुद्दों पर कितनी विस्तृत बातचीत होगी और किसी ठोस समाधान की दिशा में कितना आगे बढ़ा जाएगा, यह बैठक के बाद ही स्पष्ट होगा।
भारत और नेपाल के बीच संबंध केवल राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक संबंध बेहद गहरे हैं। दोनों देशों की खुली सीमा के कारण बड़ी संख्या में लोग रोजगार, व्यापार और पारिवारिक संबंधों के लिए एक-दूसरे के देश में आते-जाते हैं।
ऐसे में सीमा विवाद का बार-बार सामने आना केवल कूटनीतिक चुनौती नहीं है, बल्कि इसका असर आम लोगों और दोनों देशों के आपसी संबंधों पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक विवाद बने रहने से दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ सकता है। साथ ही, इससे क्षेत्रीय राजनीति में तीसरे देशों को प्रभाव बढ़ाने का अवसर भी मिल सकता है।
अब सभी की नजर प्रधानमंत्री बालेन शाह और भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव की मुलाकात पर है। देखना होगा कि यह बैठक भारत-नेपाल संबंधों में नई बातचीत की शुरुआत करती है या सुस्ता और लिपुलेख जैसे जटिल सीमा विवाद अभी और समय लेते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
तेहरान/तेल अवीव। ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर चल रही अटकलों के बीच ईरान की अर्ध-सरकारी मेहर न्यूज एजेंसी ने एक वीडियो जारी किया है। वीडियो में मोजतबा खामेनेई कथित तौर पर स्वस्थ नजर आ रहे हैं। हालांकि, वीडियो की तारीख स्पष्ट नहीं की गई है। इजराइली मीडिया के दावे के बाद जारी हुआ वीडियो यह वीडियो ऐसे समय में सामने आया है, जब इजराइली मीडिया की कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया था कि मोजतबा खामेनेई की हालत बेहद गंभीर है और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इन रिपोर्टों में ईरान के अंदर के सूत्रों का हवाला देते हुए उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई गई थी। मेहर न्यूज एजेंसी ने वीडियो जारी कर इन अटकलों को खारिज करने की कोशिश की है। मोजतबा खामेनेई ने सर्वोच्च नेता का पद संभालने के बाद से सार्वजनिक रूप से बेहद कम उपस्थिति दर्ज कराई है और उनका संवाद मुख्य रूप से लिखित बयानों के जरिए सामने आया है। स्वास्थ्य को लेकर लगातार उठ रहे सवाल मोजतबा खामेनेई की सार्वजनिक अनुपस्थिति के कारण उनकी सेहत और नेतृत्व क्षमता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कुछ विदेशी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि उन्हें पहले हुए सैन्य हमलों में चोट लगी थी। हालांकि, ईरानी अधिकारियों ने इन दावों को खारिज करते हुए उनकी चोटों को मामूली बताया है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि मोजतबा खामेनेई देश के रणनीतिक मामलों की निगरानी और आवश्यक निर्देश देने में सक्षम हैं। ईरानी सरकार ने दावों को बताया था भ्रामक ईरानी पक्ष की ओर से पहले भी मोजतबा खामेनेई के स्वास्थ्य को लेकर सामने आई गंभीर खबरों का खंडन किया गया है। वहीं, उनकी लाइव सार्वजनिक उपस्थिति नहीं होने के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके स्वास्थ्य और स्थान को लेकर अटकलें बनी हुई हैं। फिलहाल जारी वीडियो को ईरानी पक्ष की ओर से उनकी स्थिति सामान्य होने के संकेत के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन वीडियो की तारीख और स्वतंत्र रूप से इसकी सत्यता की पुष्टि की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
काठमांडू: भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह सोमवार को काठमांडू में भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव से मुलाकात करने वाले हैं। प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद यह पहली बार होगा जब बालेन शाह किसी देश के राजदूत से अकेले में मुलाकात करेंगे। ऐसे समय में होने वाली यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से लंबित सीमा विवाद के दो प्रमुख मुद्दे अभी भी समाधान की प्रतीक्षा में हैं। भारत और नेपाल के बीच करीब 1,800 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। दोनों देशों ने बातचीत और विभिन्न स्तरों पर कूटनीतिक प्रयासों के जरिए लगभग 98 प्रतिशत सीमा विवाद सुलझा लिया है। हालांकि, सुस्ता और कालापानी-लिम्पियाधुरा-लिपुलेख जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर दोनों पक्षों के बीच अब भी मतभेद कायम हैं। सुस्ता विवाद के बाद बढ़ी चिंता सुस्ता क्षेत्र को लेकर भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। यह विवाद 2 अगस्त को उस समय और गंभीर हो गया, जब नेपाली ग्रामीणों और भारतीय सीमा सुरक्षा कर्मियों के बीच कथित तौर पर झड़प हुई। नेपाली पक्ष की ओर से आरोप लगाया गया कि भारतीय क्षेत्र से आए लोगों ने नवलपरासी पश्चिम स्थित विवादित इलाके में बाढ़ से बचाव के लिए बनाए जा रहे तटबंध को नुकसान पहुंचाया। स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए नेपाल की सशस्त्र पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सुस्ता में सीमा तय करना क्यों मुश्किल? सुस्ता क्षेत्र में करीब 24 किलोमीटर के हिस्से में सीमा स्तंभ नहीं हैं। यहां सीमा निर्धारण के लिए मुख्य रूप से प्राकृतिक संरचनाओं, विशेषकर नदी की धारा और पेड़ों आदि को आधार बनाया गया है। गंडक नदी, जिसे नारायणी नदी के नाम से भी जाना जाता है, के रास्ते में समय के साथ बदलाव आने के कारण सीमा निर्धारण का विवाद और जटिल हो गया है। 1816 की सुगौली संधि के तहत नदी की मध्य धारा को सीमा का आधार माना गया था। लेकिन नदी की धारा बदलने के बाद दोनों देशों के दावों और जमीन की वास्तविक स्थिति के बीच अंतर पैदा हुआ। कालापानी-लिम्पियाधुरा-लिपुलेख भी बड़ा विवाद सुस्ता के अलावा कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख क्षेत्र भी भारत-नेपाल संबंधों में संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। नेपाल की संसद ने वर्ष 2020 में संविधान संशोधन के जरिए नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था। इस नक्शे में कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को नेपाल के क्षेत्र के रूप में दिखाया गया था। भारत ने नेपाल के इस दावे को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक तनाव बढ़ा था। हालांकि, समय-समय पर दोनों पक्षों के बीच बातचीत भी जारी रही है। 98 प्रतिशत सीमा विवाद सुलझा, लेकिन दो इलाके बने चुनौती भारत और नेपाल ने सीमा के लगभग 98 प्रतिशत हिस्से से जुड़े विवादों को बातचीत के माध्यम से सुलझा लिया है। इसके बावजूद सुस्ता और कालापानी जैसे इलाकों पर सहमति नहीं बन सकी है। वर्ष 2014 में दोनों देशों ने सीमा विवाद के समाधान के लिए सीमा कार्य समूह और विदेश सचिव स्तर की बातचीत को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी। इसके बाद सीमा कार्य समूह की कई बैठकें हुईं। जुलाई 2025 में भी इस विषय पर बैठक हुई थी, लेकिन विदेश सचिव स्तर पर व्यापक समाधान की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी। बालेन शाह और भारतीय राजदूत की मुलाकात क्यों अहम? बालेन शाह और भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव के बीच होने वाली मुलाकात ऐसे समय में हो रही है, जब सुस्ता को लेकर दोनों देशों में हालिया तनाव सामने आया है। ऐसे में बैठक में सीमा विवाद, सुस्ता में हालिया घटनाक्रम और दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाए रखने के उपायों पर चर्चा की संभावना महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, बैठक में किन मुद्दों पर कितनी विस्तृत बातचीत होगी और किसी ठोस समाधान की दिशा में कितना आगे बढ़ा जाएगा, यह बैठक के बाद ही स्पष्ट होगा। सीमा विवाद का असर भारत-नेपाल संबंधों पर भारत और नेपाल के बीच संबंध केवल राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक संबंध बेहद गहरे हैं। दोनों देशों की खुली सीमा के कारण बड़ी संख्या में लोग रोजगार, व्यापार और पारिवारिक संबंधों के लिए एक-दूसरे के देश में आते-जाते हैं। ऐसे में सीमा विवाद का बार-बार सामने आना केवल कूटनीतिक चुनौती नहीं है, बल्कि इसका असर आम लोगों और दोनों देशों के आपसी संबंधों पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक विवाद बने रहने से दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ सकता है। साथ ही, इससे क्षेत्रीय राजनीति में तीसरे देशों को प्रभाव बढ़ाने का अवसर भी मिल सकता है। अब सभी की नजर प्रधानमंत्री बालेन शाह और भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव की मुलाकात पर है। देखना होगा कि यह बैठक भारत-नेपाल संबंधों में नई बातचीत की शुरुआत करती है या सुस्ता और लिपुलेख जैसे जटिल सीमा विवाद अभी और समय लेते हैं।
तेहरान, एजेंसियां। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने अमेरिका के साथ जारी तनाव और बातचीत के बीच कहा है कि उनका देश कूटनीति के रास्ते को पूरी तरह बंद नहीं कर रहा है, लेकिन दबाव या धमकी के जरिए ईरान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उन्होंने बातचीत को ईरान के अधिकारों और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए एक रास्ता बताया है। बातचीत का रास्ता खुला, लेकिन शर्तों के साथ पेजेशकियान का रुख ऐसे समय सामने आया है जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने के प्रयास जारी हैं। ईरानी राष्ट्रपति ने बातचीत को आत्मसमर्पण के बराबर मानने से इनकार किया है। उनका कहना है कि कूटनीति का मतलब अपने अधिकारों से पीछे हटना नहीं है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी जारी है गतिरोध ईरान और ओमान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित नौवहन को लेकर बातचीत आगे बढ़ रही है। हालांकि ईरान ने संकेत दिया है कि केवल एक समझौता पर्याप्त नहीं होगा। तेहरान चाहता है कि अमेरिका प्रतिबंधों, सैन्य गतिविधियों और युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई जैसे मुद्दों पर भी कदम उठाए। दबाव के बावजूद आत्मसमर्पण से इनकार पेजेशकियान का संदेश साफ है कि ईरान बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन दबाव, धमकी या सैन्य कार्रवाई के जरिए किसी समझौते को स्वीकार नहीं करेगा। इससे ईरान-अमेरिका वार्ता के बीच एक तरफ कूटनीतिक रास्ता खुला रहने और दूसरी तरफ तेहरान के कड़े रुख—दोनों का संकेत मिलता है। ऐसे में आने वाले दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बातचीत और अमेरिका की ओर से प्रतिबंध एवं सैन्य दबाव में संभावित बदलाव पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।