पंजाब में फार्मेसी ऑफिसर परीक्षा पर घमासान, पेपर लीक नहीं बल्कि हाईटेक नकल का मामला चंडीगढ़, एजेंसियां। पंजाब में फार्मेसी ऑफिसर भर्ती परीक्षा को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। 19 जुलाई 2026 को आयोजित भर्ती परीक्षा के दौरान पुलिस ने हाईटेक नकल के एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश किया था। इसके बाद विपक्ष ने सरकार पर परीक्षा व्यवस्था और भर्ती प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। हालांकि, सरकार और पुलिस के मुताबिक प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले लीक नहीं हुआ था। परीक्षा के दौरान पकड़ा गया नकल का रैकेट पुलिस ने परीक्षा केंद्रों पर अभ्यर्थियों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के जरिए नकल कराने की कोशिश का खुलासा किया। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ अभ्यर्थियों के पास छोटे कैमरे और वायरलेस उपकरण पाए गए थे। पुलिस कार्रवाई में कई अभ्यर्थियों और कथित गिरोह से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया गया। मामले में इस्तेमाल किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी बरामद किए गए हैं। विपक्ष ने सरकार को घेरा घटना सामने आने के बाद पंजाब में राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए मामले में जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई की मांग की। विपक्ष ने भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी पंजाब सरकार पर निशाना साधते हुए परीक्षा में गड़बड़ी के मुद्दे को उठाया है। CM भगवंत मान बोले- पेपर लीक नहीं हुआ मुख्यमंत्री भगवंत मान ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पंजाब में पिछले कई वर्षों में कोई भर्ती परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक नहीं हुआ है। शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस ने भी इसे पेपर लीक के बजाय परीक्षा के दौरान पकड़ा गया नकल का मामला बताया है। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र लीक होने की पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल विवाद परीक्षा में पकड़े गए हाईटेक नकल रैकेट और भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर है।
चंडीगढ़: पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले हुए नगर निकाय चुनावों में आम आदमी पार्टी (AAP) ने मजबूत प्रदर्शन करते हुए अपनी राजनीतिक पकड़ और मजबूत कर ली है। पार्टी ने होशियारपुर नगर निगम और जलालाबाद नगर परिषद में शानदार जीत दर्ज कर विपक्षी दलों को बड़ा झटका दिया है। होशियारपुर नगर निगम में AAP का दबदबा होशियारपुर नगर निगम की 50 सीटों में से आम आदमी पार्टी ने 35 सीटों पर जीत हासिल कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। चुनाव परिणाम के अनुसार— AAP: 35 सीटें कांग्रेस: 9 सीटें भाजपा: 3 सीटें निर्दलीय: 3 सीटें होशियारपुर में इस चुनाव के दौरान करीब 60.5 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व आम आदमी पार्टी के विधायक ब्रह्म शंकर जिम्पा करते हैं। जलालाबाद में भी AAP की बड़ी सफलता आम आदमी पार्टी ने जलालाबाद नगर परिषद की 17 में से 12 सीटों पर जीत दर्ज की। पार्टी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि बताते हुए कहा कि जलालाबाद लंबे समय तक शिरोमणि अकाली दल (SAD) के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल का मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा है। बदलते राजनीतिक समीकरण जलालाबाद सीट पर 2017 के विधानसभा चुनाव में सुखबीर सिंह बादल ने वर्तमान मुख्यमंत्री भगवंत मान को हराया था। हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार जगदीप कंबोज ने सुखबीर बादल को 30,930 वोटों के बड़े अंतर से पराजित कर राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे। नगर परिषद चुनाव में मिली ताजा जीत को भी इसी राजनीतिक बदलाव की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है। निकाय चुनावों में लगातार मजबूत प्रदर्शन इससे पहले मई 2026 में हुए पंजाब के नगर निकाय चुनावों में भी आम आदमी पार्टी ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया था। उस दौरान पार्टी ने राज्य के— 8 नगर निगम, 75 नगर परिषद, और 19 नगर पंचायतों के चुनावों में भी महत्वपूर्ण सफलता हासिल की थी। 2027 चुनाव से पहले बढ़ा AAP का मनोबल होशियारपुर और जलालाबाद में मिली जीत को आम आदमी पार्टी के लिए 2027 विधानसभा चुनाव से पहले एक सकारात्मक राजनीतिक संकेत माना जा रहा है। वहीं, कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के लिए यह परिणाम संगठनात्मक रणनीति और जनाधार को मजबूत करने की चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
अमृतसर: पंजाब सरकार के 'जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम-2026' को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इसी मुद्दे पर सोमवार को मुख्यमंत्री भगवंत मान समेत पंजाब विधानसभा के सभी 78 सिख विधायकों को अमृतसर स्थित अकाल तख्त के समक्ष उपस्थित होना पड़ा। सुनवाई के बाद अकाल तख्त ने सरकार को कानून में आवश्यक संशोधन करने के लिए एक महीने का समय दिया है। बैठक के बाद पंजाब विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां ने इसे सकारात्मक और सार्थक बताया, लेकिन तख्त की मर्यादा का हवाला देते हुए चर्चा का विवरण सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया। वहीं, वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने पुष्टि की कि सरकार को कानून में संशोधन के लिए एक महीने का समय दिया गया है। क्या है पूरा मामला? पंजाब सरकार ने 13 अप्रैल 2026 को 'जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम-2026' विधानसभा के विशेष सत्र में पेश किया था। आनंदपुर साहिब में आयोजित इस विशेष सत्र में विधेयक सर्वसम्मति से पारित हुआ और बाद में इसे राज्यपाल की मंजूरी भी मिल गई। सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी (अपमान) की घटनाओं पर रोक लगाना और दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना है। कानून में क्या हैं प्रमुख प्रावधान? संशोधित कानून के तहत— बेअदबी की साजिश रचकर सांप्रदायिक तनाव फैलाने पर आजीवन कारावास और 5 से 20 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान। बेअदबी के अपराध पर 20 वर्ष तक की कैद और 2 से 10 लाख रुपये तक जुर्माना। अन्य संबंधित मामलों में 5 वर्ष तक की सजा का प्रावधान। अकाल तख्त ने क्यों जताई आपत्ति? अकाल तख्त ने कानून में सजा के प्रावधानों पर आपत्ति नहीं जताई है। उसकी मुख्य आपत्ति कानून बनाने की प्रक्रिया को लेकर है। अकाल तख्त का कहना है कि गुरु ग्रंथ साहिब से जुड़े किसी भी कानून को लागू करने से पहले अकाल तख्त, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और व्यापक सिख समुदाय से विचार-विमर्श किया जाना चाहिए था। इसके अलावा कानून में प्रयुक्त कुछ धार्मिक शब्दावली और प्रावधानों को सिख परंपराओं के अनुरूप नहीं बताया गया है। सुनवाई में क्या निर्णय हुआ? अकाल तख्त के कार्यकारी जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज्ज ने सभी सिख विधायकों को कानून से जुड़ी आपत्तियों की सूची सौंपी और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह एक महीने के भीतर इन बिंदुओं पर संशोधन कर विधानसभा में संशोधित विधेयक लाए। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक मामलों से जुड़े विषयों में सरकार को संबंधित धार्मिक संस्थाओं से व्यापक परामर्श करना चाहिए। सरकार ने संशोधन पर जताई सहमति पंजाब सरकार ने अकाल तख्त की आपत्तियों का सम्मान करते हुए कानून में आवश्यक संशोधन करने पर सहमति जताई है। सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य केवल गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामलों में कड़ी सजा सुनिश्चित करना है, न कि धार्मिक परंपराओं या संस्थाओं के अधिकारों में हस्तक्षेप करना।
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से जुड़े कथित वायरल वीडियो को लेकर राज्य की राजनीति गरमा गई है। इस मामले में बीजेपी नेता राघव चड्ढा ने गंभीर आरोप लगाते हुए FIR दर्ज करने और मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की है। उन्होंने दावा किया है कि मामले को दबाने के लिए फर्जी फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार करवाई गई। राघव चड्ढा के आरोप से बढ़ा विवाद राघव चड्ढा ने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी (AAP) की ओर से मुख्यमंत्री भगवंत मान को बचाने के लिए कथित तौर पर फर्जी फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार करवाई गई। उन्होंने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम से सिख समुदाय की भावनाएं आहत हुई हैं और लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। FIR और स्वतंत्र जांच की मांग बीजेपी नेता ने मांग की कि इस बात की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए कि कथित फर्जी रिपोर्ट किसने तैयार की, इसमें कौन-कौन अधिकारी शामिल थे और इसमें सरकारी संसाधनों का कितना इस्तेमाल हुआ। उन्होंने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की भी अपील की। गुरुग्राम पुलिस की कार्रवाई से मामला और उलझा गुरुग्राम पुलिस ने इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि उन्होंने 10 लाख रुपये लेकर फर्जी फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार की। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इस पूरे मामले में पंजाब के कुछ अधिकारियों की भूमिका तो नहीं है। भगवंत मान ने आरोपों को बताया साजिश मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने कहा कि वायरल वीडियो पूरी तरह फर्जी है और उन्हें बदनाम करने के लिए राजनीतिक साजिश रची जा रही है। उनका कहना है कि वीडियो में दिख रहा व्यक्ति वह नहीं हैं। विपक्ष पर साधा निशाना सीएम मान ने बीजेपी, कांग्रेस और अकाली दल पर उनकी छवि खराब करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि जनता सच्चाई जानती है और वे अपने विकास कार्यों पर ध्यान केंद्रित करते रहेंगे। अकाल तख्त की कार्रवाई भी चर्चा में इस विवाद के बीच अकाल तख्त ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को तलब किया था। बाद में सिख समुदाय से उनके सामाजिक बहिष्कार की अपील किए जाने की भी खबर सामने आई, जिससे मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है।
पंजाब नगर निकाय चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) ने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्पष्ट बढ़त हासिल की है। चुनाव नतीजों में AAP ने 900 से अधिक वार्डों में जीत दर्ज कर राज्य की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ का संदेश दिया है। वहीं कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) का प्रदर्शन उम्मीदों से काफी कमजोर रहा। इन चुनावों को राज्य में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा था। नतीजों ने संकेत दिया है कि शहरी क्षेत्रों में भी पार्टी का प्रभाव बरकरार है। AAP ने जीते सबसे ज्यादा वार्ड रात 11 बजे तक उपलब्ध नतीजों के अनुसार, कुल 1,977 वार्डों में हुए चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 957 सीटों पर जीत दर्ज की। कांग्रेस 397 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। वहीं निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी अच्छा प्रदर्शन करते हुए 251 वार्ड जीते। शिरोमणि अकाली दल (SAD) को 191 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी केवल 167 सीटों पर जीत दर्ज कर सकी। प्रमुख दलों का प्रदर्शन पार्टी जीती सीटें (वार्ड) आम आदमी पार्टी (AAP) 957 कांग्रेस (INC) 397 निर्दलीय (IND) 251 शिरोमणि अकाली दल (SAD) 191 भारतीय जनता पार्टी (BJP) 167 बहुजन समाज पार्टी (BSP) 7 बीजेपी के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं ये नतीजे? नगर निकाय चुनावों में बीजेपी का पांचवें स्थान पर रहना पार्टी के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है। पार्टी न केवल कांग्रेस और AAP से पीछे रही, बल्कि निर्दलीय उम्मीदवारों और शिरोमणि अकाली दल से भी कम सीटें हासिल कर सकी। विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में संगठन विस्तार और जनाधार बढ़ाने के लिए बीजेपी को नई रणनीति पर काम करना पड़ सकता है। खासकर ऐसे समय में जब पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत स्थिति में है, लेकिन राज्य में अपेक्षित समर्थन हासिल नहीं कर पा रही है। जीत के बाद AAP में जश्न का माहौल नतीजों के बाद पंजाब भर में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जीत का जश्न मनाया। पार्टी कार्यालयों में ढोल-नगाड़ों के साथ खुशी मनाई गई और समर्थकों के बीच मिठाइयां बांटी गईं। पार्टी नेताओं ने इसे राज्य सरकार के कामकाज और विकास नीतियों पर जनता की मुहर बताया। अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी पर साधा निशाना जीत के बाद आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने पंजाब की जनता का आभार जताया। उन्होंने बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा कि जनता ने उन ताकतों को जवाब दिया है जो लगातार लोगों और छोटे कारोबारियों को परेशान करने का काम कर रही थीं। केजरीवाल ने बीजेपी को "ईडी पार्टी" बताते हुए कहा कि मतदाताओं ने नकारात्मक राजनीति को खारिज कर दिया है। भगवंत मान बोले- जनता ने विकास की राजनीति को चुना भगवंत मान ने चुनाव परिणामों का स्वागत करते हुए कहा कि जनता ने विकास, काम और जनहित की राजनीति पर भरोसा जताया है। उन्होंने कहा कि चुनाव नतीजे यह दिखाते हैं कि लोग नफरत और टकराव की राजनीति के बजाय विकास और सुशासन को प्राथमिकता दे रहे हैं। पंजाब की राजनीति के लिए क्या संकेत? नगर निकाय चुनावों के नतीजे यह संकेत देते हैं कि पंजाब में आम आदमी पार्टी अभी भी मजबूत स्थिति में है। कांग्रेस ने दूसरे स्थान पर रहकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है, लेकिन सत्तारूढ़ दल से उसका अंतर काफी बड़ा है। वहीं बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के सामने आने वाले समय में अपने जनाधार को मजबूत करने की चुनौती बनी रहेगी। इन नतीजों को भविष्य के विधानसभा और लोकसभा चुनावों की दिशा तय करने वाले संकेतों के रूप में भी देखा जा रहा है।
फायरिंग की घटना के बाद गरमाई सियासत Diljit Dosanjh के मैनेजर के घर के बाहर हुई फायरिंग के बाद मामला अब राजनीतिक रंग लेता नजर आ रहा है। पंजाब के मुख्यमंत्री Bhagwant Mann ने इस घटना को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ समय से दिलजीत दोसांझ पर राजनीति में शामिल होने का दबाव बनाया जा रहा था। मुख्यमंत्री ने कहा कि कलाकारों को जबरन राजनीति में लाने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। क्या बोले भगवंत मान? Bhagwant Mann ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पिछले कुछ दिनों से ऐसी खबरें सामने आ रही थीं कि भाजपा दिलजीत दोसांझ को राजनीति में लाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि दिलजीत पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनका राजनीति में आने का कोई इरादा नहीं है। ऐसे में उन पर दबाव बनाना सही नहीं है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि कई राजनीतिक दल लोकप्रिय कलाकारों की फैन फॉलोइंग का फायदा उठाना चाहते हैं। विजय का भी लिया उदाहरण भगवंत मान ने दक्षिण भारतीय अभिनेता Vijay का उदाहरण देते हुए कहा कि फिल्मों की लोकप्रियता कई बार नेताओं को कलाकारों को राजनीति में लाने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने दावा किया कि इसी तरह कुछ लोग दिलजीत दोसांझ की लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें राजनीति में शामिल करना चाहते हैं। मैनेजर के घर पर हुई थी गोलीबारी रिपोर्ट्स के अनुसार, हरियाणा के करनाल में दिलजीत दोसांझ के मैनेजर गुरप्रताप सिंह कांग के घर के बाहर अज्ञात हमलावरों ने फायरिंग की थी। घटना के बाद इलाके में दहशत फैल गई, हालांकि किसी के घायल होने की खबर सामने नहीं आई। पुलिस मामले की जांच में जुटी हुई है। लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने ली जिम्मेदारी मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इस घटना की जिम्मेदारी Lawrence Bishnoi Gang ने ली है। फिलहाल पुलिस सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर पूरे मामले की जांच कर रही है और हमलावरों की तलाश जारी है। राजनीति में आने से पहले ही कर चुके हैं इनकार Diljit Dosanjh पहले भी सोशल मीडिया के जरिए साफ कर चुके हैं कि वे राजनीति में शामिल नहीं होने वाले हैं। इसके बावजूद लगातार उनके राजनीति में आने की अटकलें लगती रही हैं, जिन पर अब फायरिंग की घटना के बाद बहस और तेज हो गई है।
Punjab Politics: पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायकों के साथ दिल्ली का रुख किया है, जहां वह राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात करेंगे। इस मुलाकात का मुख्य उद्देश्य हाल ही में AAP के सात राज्यसभा सांसदों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के मुद्दे को उठाना है, जिसे पार्टी ‘ग़ैरक़ानूनी दलबदल’ करार दे रही है। यह मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है और इसके संवैधानिक पहलुओं पर भी सवाल उठने लगे हैं। क्या है पूरा विवाद? 24 अप्रैल 2026 को राघव चड्ढा समेत आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने पार्टी से इस्तीफा देकर भाजपा जॉइन कर ली थी। इस फैसले को राज्यसभा सभापति की मंजूरी भी मिल गई, जिससे यह मामला और संवेदनशील हो गया। हालांकि आम आदमी पार्टी का कहना है कि यह दलबदल कानून का स्पष्ट उल्लंघन है और इन सांसदों की सदस्यता रद्द होनी चाहिए। पार्टी का आरोप है कि लोकतांत्रिक मूल्यों और जनादेश के साथ समझौता किया गया है। राष्ट्रपति से क्या करेंगे मांग? भगवंत मान इस पूरे घटनाक्रम को राष्ट्रपति के सामने विस्तार से रखेंगे और उनसे संवैधानिक हस्तक्षेप की मांग करेंगे। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा, “मुझे विश्वास है कि राष्ट्रपति हमारी बात जरूर सुनेंगी। वह संविधान की संरक्षक हैं और देश की सर्वोच्च संवैधानिक प्राधिकरण हैं। हमें न्याय की उम्मीद है।” बीजेपी का जवाब और सियासी तंज इस मुद्दे पर सुनील जाखड़ ने पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें इस मुलाकात की ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन भगवंत मान को अपने विधायकों पर नजर रखनी चाहिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि कहीं ऐसा न हो कि AAP के विधायक भी भाजपा के कार्यक्रमों में पहुंच जाएं। इस बयान के बाद दोनों पार्टियों के बीच सियासी जुबानी जंग और तेज हो गई है। संवैधानिक और राजनीतिक महत्व यह मामला सिर्फ एक राजनीतिक दल बदल तक सीमित नहीं है, बल्कि दलबदल कानून, संसद की कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक मूल्यों से भी जुड़ा हुआ है। अगर इस पर कोई बड़ा फैसला आता है, तो इसका असर भविष्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केस आने वाले समय में एक मिसाल बन सकता है कि राज्यसभा जैसे सदन में दलबदल के मामलों को कैसे देखा और सुलझाया जाता है। आगे की राजनीति पर नजर अब सभी की निगाहें द्रौपदी मुर्मु से होने वाली इस मुलाकात पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि इस मुद्दे पर क्या संवैधानिक कदम उठाए जाते हैं और क्या इससे AAP को कोई राहत मिलती है। कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम पंजाब से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है, जो आने वाले दिनों में और भी गर्मा सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।