Assembly Election Results: चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने पार्टी के प्रदर्शन पर खुलकर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि मौजूदा हालात में कांग्रेस को गंभीर और ईमानदार आत्मचिंतन की जरूरत है, ताकि भविष्य की रणनीति को मजबूत बनाया जा सके। “गंभीर आत्ममंथन के बिना आगे बढ़ना मुश्किल” न्यूज़ एजेंसी ANI से बातचीत में शशि थरूर ने कहा, “मुझे लगता है कि पार्टी को बहुत गंभीर आत्मचिंतन करना होगा, इसमें कोई शक नहीं है। हमने पहले भी यह बात कही है, लेकिन अब इसे और ठोस तरीके से लागू करने की जरूरत है।” उन्होंने इशारों में यह भी माना कि कुछ राज्यों में पार्टी की रणनीति और संगठनात्मक स्तर पर कमियां सामने आई हैं, जिन्हें दूर करना बेहद जरूरी है। केरल मॉडल से सीखने की सलाह थरूर ने खास तौर पर केरल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां पार्टी ने बेहतर रणनीति, मजबूत संगठन और सही गठबंधन के साथ अच्छा प्रदर्शन किया। गौरतलब है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने 102 सीटें जीतकर मजबूत स्थिति बनाई है। थरूर का कहना है कि अगर केरल में यह मॉडल सफल हो सकता है, तो इसे अन्य राज्यों में भी लागू किया जा सकता है। अन्य राज्यों में कमजोर प्रदर्शन चिंता का कारण जहां एक ओर केरल में कांग्रेस को सफलता मिली, वहीं अन्य राज्यों में पार्टी अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी। भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक पकड़ को और मजबूत किया है। इसके अलावा तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी TVK सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जिससे राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। रणनीति और नेतृत्व पर उठ रहे सवाल इन चुनावी नतीजों के बाद कांग्रेस के भीतर भी रणनीति, नेतृत्व और जमीनी संगठन को लेकर सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी को न सिर्फ अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करना होगा, बल्कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को मजबूत करने और मतदाताओं से जुड़ने के नए तरीके अपनाने होंगे। आगे की राह क्या? शशि थरूर के इस बयान को पार्टी के अंदर सुधार की दिशा में एक अहम संकेत माना जा रहा है। आने वाले समय में कांग्रेस को यह तय करना होगा कि वह किन मुद्दों, नेतृत्व और रणनीतियों के जरिए जनता का विश्वास दोबारा हासिल कर सकती है। कुल मिलाकर, इन चुनावी नतीजों ने कांग्रेस के सामने चुनौती भी रखी है और एक अवसर भी– खुद को नए सिरे से तैयार करने का।
Maharashtra Vidhan Parishad Election: बंगाल और असम में शानदार प्रदर्शन के बाद भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र में भी अपनी राजनीतिक ताकत दिखा दी है। महाराष्ट्र विधान परिषद (MLC) चुनाव में पार्टी के 6 उम्मीदवार निर्विरोध जीतकर सदन में पहुंचे हैं। सोमवार (4 मई) को हुए चुनाव में कुल 10 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए, जिससे राज्य की राजनीति में सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन की स्थिति और मजबूत हो गई है। किन नेताओं को मिली जीत निर्विरोध चुने गए उम्मीदवारों में उपसभापति नीलम गोरहे, पूर्व नेता प्रतिपक्ष अंबादास दानवे और पूर्व मंत्री बी. काडू जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। भाजपा की ओर से सुनील विनायक कर्जतकर, माधवी नाइक, संजय नत्थूजी भेंडे, विवेक बिपिंदादा कोल्हे और प्रमोद शांताराम जठार जैसे उम्मीदवार निर्विरोध जीते हैं। कैसे हुआ निर्विरोध चुनाव इस चुनाव के लिए कुल 14 नामांकन दाखिल किए गए थे, जिनमें चार निर्दलीय उम्मीदवार भी शामिल थे। लेकिन आवश्यक शर्तें पूरी न करने के कारण इन सभी निर्दलीयों के नामांकन रद्द कर दिए गए। नामांकन वापसी की अंतिम तिथि तक कोई अतिरिक्त उम्मीदवार मैदान में नहीं बचा, जिसके चलते सभी 10 उम्मीदवारों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया। विपक्ष को सीमित सफलता जहां भारतीय जनता पार्टी ने 6 सीटें जीतीं, वहीं शिवसेना (UBT) को केवल एक सीट पर संतोष करना पड़ा। बाकी सीटें सहयोगी दलों और अन्य उम्मीदवारों के खाते में गईं। राजनीतिक संकेत क्या हैं? महाराष्ट्र में यह नतीजे साफ संकेत देते हैं कि महायुति गठबंधन का दबदबा बरकरार है। बंगाल और असम के बाद महाराष्ट्र में भी भाजपा की मजबूती पार्टी के राष्ट्रीय विस्तार और संगठनात्मक पकड़ को दर्शाती है।
West Bengal Election Result: पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार शुभेंदु अधिकारी एक बड़े ‘टारगेट अचीवर’ के रूप में उभरे हैं। नंदीग्राम के बाद अब भवानीपुर में भी उन्होंने ममता बनर्जी को हराकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। भवानीपुर सीट पर शुभेंदु अधिकारी ने 15,000 से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की, जो उनकी पिछली नंदीग्राम जीत (1956 वोट) से कहीं ज्यादा है। जीत के बाद भावुक हुए शुभेंदु अपनी जीत के बाद शुभेंदु अधिकारी ने इसे भाजपा कार्यकर्ताओं को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि यह जीत उन 300 कार्यकर्ताओं की है, जिन्होंने राजनीतिक हिंसा में अपनी जान गंवाई। उन्होंने समर्थकों का धन्यवाद करते हुए कहा कि उन्हें हिंदू, जैन और सिख समुदायों का भरपूर समर्थन मिला, जिससे यह जीत संभव हो सकी। मोदी-शाह को दिया श्रेय शुभेंदु अधिकारी ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह का विशेष आभार जताया। उन्होंने कहा कि इस सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय पार्टी नेतृत्व के निर्देश पर लिया गया था। वहीं, अमित शाह ने भी जीत के बाद प्रतिक्रिया देते हुए भवानीपुर की जनता को बधाई दी और इसे बदलाव का संकेत बताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भाजपा की जीत पर कहा कि “बंगाल बदल गया है, एक नए युग की शुरुआत हुई है।” भाजपा कार्यकर्ताओं में जश्न शुभेंदु अधिकारी की जीत के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। कोलकाता सहित कई इलाकों में जश्न का माहौल रहा और समर्थक सड़कों पर उतरकर खुशी मनाते नजर आए। राजनीतिक संदेश साफ भवानीपुर जैसी सीट पर जीत को भाजपा के लिए बड़ी रणनीतिक सफलता माना जा रहा है। यह न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की मजबूती को दिखाता है, बल्कि बंगाल की राजनीति में बदलते समीकरणों का भी संकेत देता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में मई 2026 का यह हफ्ता एक युगांतकारी मोड़ के रूप में दर्ज किया गया है। पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने न केवल सत्ता के समीकरण बदले हैं, बल्कि देश की राजनीतिक दिशा को भी एक नई परिभाषा दी है। पूर्व से दक्षिण तक चली 'प्रो-इंकंबेंसी' और 'परिवर्तन' की लहर ने कई मिथकों को तोड़ दिया है। इस महा-संग्राम का सबसे बड़ा केंद्र रहा पश्चिम बंगाल, जहां 15 साल के ममता बनर्जी के शासन का सूर्यास्त हो गया है। वहीं, दक्षिण में तमिलनाडु ने एक नए सुपरस्टार राजनेता के उदय के साथ इतिहास रचा है, तो केरल में वामपंथ का आखिरी किला भी ढह गया है। बंगाल: 'दीदी' की विदाई और भाजपा का ऐतिहासिक उदय पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम सबसे चौंकाने वाले और ऐतिहासिक रहे। साल 2011 में वामपंथ को उखाड़ फेंकने वाली ममता बनर्जी को खुद 'परिवर्तन' के उसी नारे का सामना करना पड़ा। सत्ता परिवर्तन: भ्रष्टाचार के आरोपों, संदेशखाली जैसी घटनाओं और एंटी-इंकंबेंसी ने टीएमसी के 'मां, माटी, मानुष' के किले में सेंध लगा दी। भाजपा ने भारी बहुमत के साथ राज्य में पहली बार सत्ता हासिल की है। रणनीति की जीत भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के 'बूथ चलो' अभियान ने ग्रामीण बंगाल में टीएमसी के वर्चस्व को चुनौती दी। महिलाओं के साइलेंट वोटर टर्नआउट ने इस जीत में निर्णायक भूमिका निभाई। इनका सूपड़ा साफ कांग्रेस और वामपंथियों का गठबंधन एक बार फिर शून्य पर सिमट गया, जिससे मुकाबला पूरी तरह से द्विध्रुवीय हो गया। तमिलनाडु: थलपति विजय का 'धमाका' दक्षिण भारत की राजनीति हमेशा से फिल्मी सितारों और द्रविड़ विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन, 2026 में एक्टर विजय की पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) ने जो कर दिखाया, उसने स्थापित दिग्गजों—डीएमके और एआईएडीएमके—की नींद उड़ा दी। तीसरा विकल्प विजय ने न केवल युवाओं के वोट बटोरे, बल्कि एक विश्वसनीय तीसरे विकल्प के रूप में खुद को स्थापित किया। उनकी पार्टी ने दोहरे अंकों में सीटें जीतकर राज्य की राजनीति को त्रिकोणीय बना दिया है। द्रविड़ राजनीति में बदलाव हालांकि डीएमके ने कड़ी टक्कर दी, लेकिन विजय के उदय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तमिलनाडु का युवा अब पारंपरिक राजनीति से आगे देखना चाहता है। वामपंथ का अंत: केरल में लाल किला ध्वस्त इस चुनाव की सबसे बड़ी सुर्खियों में से एक है भारत से वामपंथ का पूरी तरह सफाया। केरल, जो दशकों से एलडीएफ और यूडीएफ के बीच झूलता रहा था, वहां इस बार जनता ने एक अलग रास्ता चुना। केरल में कांग्रेस की वापसी शुरुआती रुझानों और नतीजों के अनुसार, केरल में कांग्रेस नीत गठबंधन ने शानदार वापसी की है। वामपंथ सूपड़ा साफ त्रिपुरा और बंगाल के बाद अब केरल से भी वामपंथी सरकार की विदाई ने भारतीय राजनीति में 'कम्युनिज्म' के भविष्य पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं। अब देश के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं बची है। असम में भाजपा की हैट्रिक और JMM का प्रवेश असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा ने लगातार तीसरी बार सत्ता का स्वाद चखा है। विकास बनाम विरासत भाजपा के विकास कार्ड और घुसपैठ के खिलाफ सख्त रुख ने मतदाताओं को एकजुट किया। JMM का प्रदर्शन दिलचस्प बात यह रही कि झारखंड की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने भी असम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। मजबात और डिगबोई जैसी सीटों पर JMM के उम्मीदवारों ने दूसरे स्थान पर रहकर सबको हैरान कर दिया, जिससे पता चलता है कि चाय बागान क्षेत्रों में पार्टी का प्रभाव बढ़ रहा है। क्या कहते हैं ये नतीजे? इन पांच राज्यों के नतीजों ने प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के 'अजेय' होने के नैरेटिव को और मजबूत किया है। बंगाल जैसी बड़ी जीत 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ है। क्षेत्रीय क्षत्रपों का कमजोर होना ममता बनर्जी की हार ने यह साबित कर दिया है कि क्षेत्रीय पहचान और करिश्मा तब तक ही काम करता है, जब तक सुशासन और पारदर्शिता बनी रहे। टीएमसी का यह पतन अन्य क्षेत्रीय दलों के लिए एक चेतावनी है। 'न्यू इंडिया' का नया वोट बैंक इन चुनावों ने दिखाया है कि अब जाति और धर्म के साथ-साथ 'लाभार्थी वर्ग' (Beneficiary Class) एक नया वोट बैंक बन चुका है। मुफ्त राशन, आवास योजना और महिला सशक्तिकरण की योजनाओं ने भाषा और भूगोल की सीमाओं को पार कर भाजपा को जीत दिलाई है। पुराने ढर्रे की राजनीति अब नहीं चलेगी 2026 के ये चुनाव परिणाम भारतीय राजनीति के "री-एलाइनमेंट" (पुनर्गठन) का संकेत हैं। जहां एक ओर भाजपा अपने वैचारिक और सांगठनिक विस्तार के चरम पर है, वहीं विपक्ष को अब नए चेहरों और नई विचारधारा के साथ खुद को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। एक्टर विजय का तमिलनाडु में उदय और केरल से वामपंथ की विदाई बताती है कि भारत की जनता अब पुराने ढर्रे की राजनीति से ऊब चुकी है और स्पष्ट परिणाम चाहती है।अगला पड़ाव अब दिल्ली है, लेकिन आज की जीत का जश्न कोलकाता से लेकर गुवाहाटी तक गूंज रहा है।
West Bengal Election Result: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार ऐतिहासिक नतीजे सामने आए हैं। भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत के साथ राज्य की सत्ता पर कब्जा जमाने की ओर निर्णायक बढ़त बना ली है। 294 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी 148 सीटों के आंकड़े को पार करते हुए भाजपा 190 से अधिक सीटों पर जीत या बढ़त के साथ सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई है। करीब 15 साल से सत्ता में काबिज तृणमूल कांग्रेस को इस चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा है। पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के नेतृत्व में लड़ी गई इस लड़ाई में कई दिग्गज नेता अपने-अपने क्षेत्रों में पिछड़ गए, जिससे पार्टी के जनाधार में गिरावट साफ नजर आई। कैसे बदला बंगाल का राजनीतिक समीकरण 2011 में जहां भाजपा का खाता तक नहीं खुला था, वहीं 2016 में उसने 3 सीटें जीतीं और 2021 में 77 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बनकर उभरी। इस बार पार्टी ने 40% से ज्यादा वोट शेयर हासिल कर ग्रामीण, आदिवासी और औद्योगिक क्षेत्रों में अपनी मजबूत पकड़ बना ली। इन इलाकों में भाजपा की बड़ी बढ़त चुनाव नतीजों से साफ है कि भाजपा ने उत्तर बंगाल, जंगलमहल और सीमावर्ती इलाकों में शानदार प्रदर्शन किया। इन क्षेत्रों में पार्टी को भारी जनसमर्थन मिला, जबकि टीएमसी शहरी इलाकों और कुछ पारंपरिक सीटों तक सिमटती नजर आई। भाजपा की जीत के बड़े कारण भाजपा की इस ऐतिहासिक जीत के पीछे कई अहम वजहें रहीं। पार्टी का मजबूत संगठन, आक्रामक चुनाव प्रचार और बढ़ा हुआ वोट प्रतिशत इसके प्रमुख कारण बने। इसके अलावा सीमावर्ती और आदिवासी क्षेत्रों में गहरी पैठ बनाना भी भाजपा के लिए निर्णायक साबित हुआ। सत्ता विरोधी लहर और विपक्ष की कमजोर रणनीति ने भी भाजपा को फायदा पहुंचाया। टीएमसी की हार के कारण तृणमूल कांग्रेस की हार के पीछे सत्ता विरोधी माहौल, संगठनात्मक कमजोरी और नेताओं के खिलाफ बढ़ता असंतोष प्रमुख कारण रहे। कई मंत्री अपने ही क्षेत्रों में पिछड़ गए, जिससे पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर साबित हुई। कल्याणकारी योजनाएं भी इस बार मतदाताओं को पूरी तरह प्रभावित नहीं कर सकीं। नया राजनीतिक अध्याय शुरू इस चुनाव परिणाम के साथ पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो गया है। वामपंथ और कांग्रेस के बाद टीएमसी का दौर खत्म होता दिख रहा है और अब भाजपा के नेतृत्व में राज्य में नई राजनीतिक दिशा तय होती नजर आ रही है। आने वाले समय में इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है।
गुवाहाटी, 4 मई: असम विधानसभा चुनाव 2026 की मतगणना के बीच शुरुआती रुझानों ने साफ संकेत दे दिए हैं कि राज्य में एक बार फिर Bharatiya Janata Party (BJP) की सरकार बन सकती है। रुझानों में पार्टी ने तीन-चौथाई का आंकड़ा पार करते हुए करीब 95 सीटों पर बढ़त बना ली है, जो स्पष्ट जनादेश की ओर इशारा करता है। BJP की ऐतिहासिक बढ़त 126 सीटों वाली असम विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 64 है, लेकिन शुरुआती रुझानों में BJP इससे काफी आगे निकलती दिख रही है। BJP: 90+ सीटों पर बढ़त (कुछ रुझानों में 95 तक) Indian National Congress (कांग्रेस): 25-30 सीटों के आसपास अन्य दल: सीमित बढ़त इन आंकड़ों से साफ है कि BJP लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की ओर बढ़ रही है। ‘हिमंता फैक्टर’ फिर काम करता दिख रहा मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma जलुकबाड़ी सीट से बढ़त बनाए हुए हैं। उनके नेतृत्व में पार्टी ने इस चुनाव में आक्रामक प्रचार किया था और अब रुझानों में उसका असर दिख रहा है। अहम सीटों का हाल जोरहाट: BJP के हितेंद्र नाथ गोस्वामी आगे, कांग्रेस के Gaurav Gogoi पीछे सिस्सीबर्गांव, तिंगखोंग, गोलाघाट: BJP उम्मीदवार बढ़त में पक्केबेटबारी: कांग्रेस को बढ़त दलगांव: All India United Democratic Front के मजिबुर रहमान आगे बिन्नाकांडी: AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल बढ़त में घंटे-दर-घंटे मजबूत होती बढ़त पहले घंटे में BJP 67 सीटों पर आगे 10 बजे के आसपास बढ़त 80+ सीटों तक पहुंची ताजा रुझानों में BJP 90 से ज्यादा सीटों पर बढ़त के साथ तीन-चौथाई आंकड़े के पार यह ट्रेंड दिखाता है कि जैसे-जैसे वोटों की गिनती आगे बढ़ रही है, BJP की स्थिति और मजबूत होती जा रही है। कांग्रेस का दावा बरकरार कांग्रेस नेता Pawan Khera ने दावा किया है कि उनकी पार्टी पांचों राज्यों में अच्छा प्रदर्शन करेगी। हालांकि असम के रुझान फिलहाल कांग्रेस के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं। जश्न की तैयारी शुरू दिल्ली स्थित BJP मुख्यालय में शुरुआती रुझानों के बीच जश्न की तैयारी शुरू हो गई है। कार्यकर्ताओं के लिए मिठाइयां और खाने-पीने का इंतजाम किया जा रहा है, जिससे पार्टी खेमे में उत्साह साफ नजर आ रहा है। सुरक्षा और मतगणना राज्य के 35 जिलों के 40 मतगणना केंद्रों पर कड़ी सुरक्षा के बीच गिनती जारी है। पहले पोस्टल बैलेट और फिर EVM वोटों की गिनती की जा रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।