पश्चिम बंगाल के सरकारी कर्मचारियों को बड़ा तोहफा, DA में 20% बढ़ोतरी; 1 अक्टूबर से मिलेगा लाभ कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को बड़ी राहत देते हुए महंगाई भत्ते (DA) में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी का नोटिफिकेशन जारी किया है। नई दर 1 अक्टूबर 2026 से लागू होगी। बढ़ोतरी के बाद कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को मिलने वाला कुल DA 38 प्रतिशत हो जाएगा। अक्टूबर से बढ़ेगा महंगाई भत्ता राज्य सरकार के नए आदेश के मुताबिक कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को अक्टूबर 2026 से संशोधित दर पर महंगाई भत्ते का भुगतान किया जाएगा। DA में इस बढ़ोतरी से बड़ी संख्या में राज्य सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को फायदा मिलेगा। महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी का उद्देश्य बढ़ती महंगाई के बीच कर्मचारियों की आय में राहत देना है। नई दर लागू होने के बाद कर्मचारियों की मासिक आय में भी बढ़ोतरी होगी। कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को मिलेगा लाभ DA बढ़ोतरी का लाभ केवल सेवारत कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा। राज्य सरकार के पात्र पेंशनभोगियों और पारिवारिक पेंशन पाने वालों को भी संशोधित दर के अनुसार लाभ मिलेगा। हालांकि, वास्तविक अतिरिक्त राशि कर्मचारी के मूल वेतन या पेंशन के आधार पर अलग-अलग होगी। यानी हर कर्मचारी को मिलने वाली बढ़ी हुई रकम समान नहीं होगी। राज्य सरकार ने जारी किया नोटिफिकेशन DA बढ़ोतरी को लागू करने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई है। इसमें नई दर और इसके लागू होने की तारीख से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं। सरकार के इस फैसले के बाद लंबे समय से महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी की मांग कर रहे कर्मचारियों को राहत मिलने की उम्मीद है। कर्मचारियों की बढ़ेगी मासिक आय नई DA दर लागू होने के बाद कर्मचारियों के वेतन में महंगाई भत्ते के रूप में मिलने वाली राशि बढ़ जाएगी। पेंशनभोगियों को भी संशोधित दर के अनुसार अधिक पेंशन मिलेगी। 1 अक्टूबर 2026 से 38 प्रतिशत DA लागू होने के बाद राज्य सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की आर्थिक स्थिति में कुछ राहत आने की उम्मीद है। सरकार के इस फैसले को कर्मचारियों के लिए बड़ा वित्तीय लाभ माना जा रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। 8वें वेतन आयोग को लेकर देश के लाखों केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए अहम अपडेट सामने आया है। आयोग ने 15 जून 2026 तक कर्मचारी संगठनों और पेंशनभोगियों से मांगों के ज्ञापन प्राप्त करने का पहला चरण पूरा कर लिया है। अब आयोग के पास अपनी सिफारिशें तैयार करने के लिए लगभग 10 महीने का समय है। आयोग की सिफारिशों का असर करीब 55 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और 69 लाख पेंशनभोगियों पर पड़ेगा। सबसे प्रमुख मांग क्या है ? कर्मचारी संगठनों ने आयोग के सामने सबसे प्रमुख मांग न्यूनतम बेसिक वेतन को मौजूदा ₹18,000 से बढ़ाकर ₹69,000 करने की रखी है। इसके लिए 3.83 के फिटमेंट फैक्टर की मांग की गई है, जबकि कुछ संगठनों ने 3.15 फिटमेंट फैक्टर का सुझाव दिया है। हालांकि, आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए 2.5 या उससे अधिक फिटमेंट फैक्टर पर विचार कर सकती है। दूसरी बड़ी मांग ? कर्मचारियों की दूसरी बड़ी मांग पुरानी पेंशन योजना (OPS) को फिर से लागू करने की है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) की जगह OPS बहाल करने से कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद अधिक सामाजिक सुरक्षा मिलेगी। इसके अलावा मकान किराया भत्ता (HRA), रिस्क अलाउंस, वार्षिक बोनस और अन्य सेवा लाभों में भी सुधार की मांग की गई है। आयोग देशभर में विभिन्न राज्यों के कर्मचारी संगठनों से संवाद कर रहा है। दिल्ली, लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, हैदराबाद और उत्तराखंड के बाद जुलाई में लखनऊ, भुवनेश्वर और कोलकाता में भी बैठकें प्रस्तावित हैं। वर्तमान में कर्मचारियों को 60 प्रतिशत डीए मिल रहा है। इस बीच कर्मचारियों की नजर जुलाई 2026 से मिलने वाले अगले महंगाई भत्ते (DA) पर भी टिकी है। वर्तमान में कर्मचारियों को 60 प्रतिशत डीए मिल रहा है। मई और जून के AICPI-IW आंकड़ों के आधार पर अगले डीए का फैसला सितंबर या अक्टूबर में होने की संभावना है। वहीं, 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने पर इन्हें 1 जनवरी 2026 से प्रभावी माना जाएगा।
पटना, एजेंसियां। बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद पहली कैबिनेट बैठक आयोजित हुई। इस बैठक में कुल 18 अहम प्रस्तावों पर मुहर लगाई गई। सबसे बड़ा फैसला राज्य के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के महंगाई भत्ते (DA) और महंगाई राहत (DR) को बढ़ाने को लेकर लिया गया। वित्त विभाग के अनुसार, सातवें वेतनमान के तहत वेतन और पेंशन प्राप्त करने वाले कर्मचारियों का महंगाई भत्ता 58 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दिया गया है। वहीं पांचवें वेतनमान के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए DA 474 प्रतिशत से बढ़ाकर 483 प्रतिशत कर दिया गया है। इस फैसले से लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को सीधा लाभ मिलेगा। पटना मेट्रो और स्वास्थ्य सुविधाओं को मिली मजबूती कैबिनेट बैठक में Patna Metro परियोजना के लिए भी बड़ा फैसला लिया गया। सरकार ने कॉरिडोर-1 और कॉरिडोर-2 के निर्माण हेतु वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए ₹768.12 करोड़ की प्रशासनिक स्वीकृति दी है। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले के तहत राज्य के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों के लिए 121 नए एम्बुलेंस खरीदने की मंजूरी दी गई। ALS और BLS श्रेणी के इन एम्बुलेंसों की खरीद पर ₹42.50 करोड़ खर्च होंगे। इससे मरीजों को बेहतर और तेज आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधा मिल सकेगी। उद्योग और रोजगार को बढ़ावा देने की तैयारी सरकार ने “मुख्यमंत्री सूक्ष्म एवं लघु उद्योग क्लस्टर विकास योजना” का नाम बदलकर “मुख्यमंत्री सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग क्लस्टर विकास योजना” करने को मंजूरी दी है। इसके तहत उद्योगों के लिए सामान्य सुविधा केंद्र (CFC) स्थापित किए जाएंगे। इसके अलावा पटना जिले के फतुहा में डेयरी उत्पादन इकाई लगाने के लिए ₹97.17 करोड़ के निजी निवेश को स्वीकृति दी गई है। इस परियोजना में फुल क्रीम दूध, दही, छाछ और मक्खन का उत्पादन किया जाएगा। सरकार का दावा है कि इससे करीब 170 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा। कानून-व्यवस्था और निवेश पर भी जोर कैबिनेट ने पूर्वी चंपारण, समस्तीपुर, मधुबनी, वैशाली और सीवान जैसे संवेदनशील जिलों में पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) के पांच नए पदों के सृजन को मंजूरी दी है। सरकार का मानना है कि इससे अपराध नियंत्रण और कानून-व्यवस्था मजबूत होगी। इसके साथ ही बिहार औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन पैकेज (BIIPP) 2025 की अवधि 30 जून 2026 तक बढ़ा दी गई है। सरकार को उम्मीद है कि इससे राज्य में निवेश बढ़ेगा और औद्योगिक विकास को नई गति मिलेगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।