जमशेदपुर: साइबर अपराधियों ने जमशेदपुर में तीन अलग-अलग लोगों को निशाना बनाकर कुल 9.34 लाख रुपये की ठगी कर ली. कहीं क्रेडिट कार्ड के नाम पर धोखाधड़ी की गयी, तो कहीं चोरी हुए मोबाइल और कार्ड का इस्तेमाल कर लाखों रुपये के गहने खरीद लिये गये. वहीं एक अन्य मामले में यूपीआइ के जरिये खाते से पैसे उड़ा लिये गये. तीनों मामलों में पीड़ितों ने साइबर थाने में शिकायत दर्ज करायी है. पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर मामलों की जांच शुरू कर दी है. बताया जा रहा है कि ठगी और चोरी की ये घटनाएं 25 जुलाई से 3 अगस्त के बीच हुईं. अलग-अलग तरीके से की गयी इन वारदातों के बाद साइबर थाना पुलिस बैंक ट्रांजेक्शन, सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर अपराधियों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है. मामला 1: क्रेडिट कार्ड के नाम पर 4.57 लाख रुपये की ठगी पहला मामला कदमा के उलियान स्थित सिंडिकेट कॉलोनी का है. यहां रहने वाली पूनम सिंह के क्रेडिट कार्ड से साइबर अपराधियों ने कथित तौर पर 4.57 लाख रुपये निकाल लिये. पीड़िता को जब क्रेडिट कार्ड से रकम कटने का मैसेज मिला, तब उन्हें ठगी का पता चला. इसके बाद उन्होंने साइबर थाने में शिकायत दर्ज करायी. पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि क्रेडिट कार्ड की जानकारी अपराधियों तक कैसे पहुंची और रकम किस माध्यम से निकाली गयी. मामला 2: मोबाइल और क्रेडिट कार्ड चोरी, 4.10 लाख के गहने खरीदे दूसरी घटना जेआरडी टाटा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स से जुड़ी है. नरवापहाड़ निवासी और यूसिलकर्मी दीपांकर चक्रवर्ती किसी काम से जेआरडी कॉम्प्लेक्स गये थे. इसी दौरान अज्ञात बदमाशों ने उनका बैग चोरी कर लिया. बैग में दो मोबाइल फोन और क्रेडिट कार्ड रखे हुए थे. चोरी के बाद अपराधियों ने क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल कर करीब 4.10 लाख रुपये के सोने-चांदी के गहने खरीद लिये. जब पीड़ित को क्रेडिट कार्ड से बड़ी रकम खर्च होने की जानकारी मिली, तो उन्होंने मामले की शिकायत साइबर थाने में की. पुलिस अब उस दुकान और संबंधित लोकेशन की जांच कर रही है, जहां से क्रेडिट कार्ड के जरिये गहनों की खरीदारी की गयी. सीसीटीवी फुटेज और बैंक ट्रांजेक्शन के आधार पर आरोपियों की पहचान करने का प्रयास किया जा रहा है. मामला 3: UPI के जरिये खाते से उड़ाये 67 हजार तीसरा मामला परसुडीह स्थित मां दुर्गा अपार्टमेंट का है. यहां रहने वाली रीना मोहन पिल्लई साइबर ठगी का शिकार हो गयीं. अपराधियों ने कथित तौर पर यूपीआइ के माध्यम से उनके बैंक खाते से 67 हजार रुपये निकाल लिये. पीड़िता को जब खाते से रकम निकलने की जानकारी मिली, तब उन्होंने साइबर थाने में शिकायत दर्ज करायी. पुलिस ट्रांजेक्शन की जानकारी जुटाकर यह पता लगाने में लगी है कि रकम किस खाते या यूपीआइ आईडी में ट्रांसफर हुई. तीनों मामलों की जांच में जुटी साइबर पुलिस तीनों शिकायतों के बाद साइबर थाना पुलिस ने जांच तेज कर दी है. पुलिस बैंक खातों से हुए ट्रांजेक्शन, मोबाइल नंबर, कॉल डिटेल और डिजिटल लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड खंगाल रही है. खास तौर पर 4.10 लाख रुपये के गहनों की खरीदारी वाले मामले में दुकान और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच की जा रही है. पुलिस का प्रयास है कि तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सके. साइबर ठगी से बचने के लिए रहें सतर्क साइबर अपराधियों से बचने के लिए किसी भी अनजान व्यक्ति के साथ क्रेडिट कार्ड नंबर, CVV, OTP, PIN या UPI PIN साझा नहीं करना चाहिए. मोबाइल या क्रेडिट कार्ड चोरी होने पर तुरंत बैंक से संपर्क कर कार्ड और संबंधित डिजिटल भुगतान सेवाओं को ब्लॉक कराना जरूरी है. अगर आपके साथ साइबर ठगी हो जाती है, तो बिना देर किये 1930 पर शिकायत दर्ज करें और संबंधित बैंक को भी तुरंत इसकी जानकारी दें. शुरुआती समय में शिकायत करने से ठगी की रकम को फ्रीज कराने की संभावना बढ़ सकती है.
नई दिल्ली, एजेंसियां। ऑनलाइन साइबर फ्रॉड और ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों पर सख्ती दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को म्यूल अकाउंट्स और साइबर अपराध से जुड़े बैंक खातों से निपटने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने RBI को यह SOP चार सप्ताह के भीतर तैयार कर प्रसारित करने को कहा है। म्यूल अकाउंट्स पर बनेगी एक समान प्रक्रिया म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक खातों को कहा जाता है जिनका इस्तेमाल साइबर अपराध से हासिल रकम को प्राप्त करने, आगे भेजने या उसकी पहचान छिपाने के लिए किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश ऐसे खातों की पहचान और उनसे जुड़े मामलों में बैंकों तथा जांच एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। डिजिटल अरेस्ट मामलों पर भी सुप्रीम कोर्ट सख्त सुप्रीम कोर्ट ने साइबर फ्रॉड और डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों से निपटने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट का जोर साइबर अपराध की शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई, पीड़ितों की मदद और ठगी की रकम की जल्द रिकवरी पर है। बैंकों और जांच एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल पर जोर कोर्ट के निर्देशों का उद्देश्य साइबर ठगी की रकम को एक खाते से दूसरे खाते में भेजकर छिपाने की प्रक्रिया पर रोक लगाना है। इसके लिए बैंकिंग सिस्टम, पुलिस और साइबर अपराध से जुड़ी एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने और कार्रवाई की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से साइबर फ्रॉड के मामलों में संदिग्ध खातों की पहचान, रकम को रोकने और पीड़ितों तक धन वापस पहुंचाने की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने की उम्मीद है।
Cyber Fraud: देश में तेजी से बढ़ते डिजिटल लेनदेन के साथ साइबर ठगी के मामलों में भी लगातार इजाफा हो रहा है। ऐसे में केंद्र सरकार ने साइबर अपराध पर लगाम लगाने के लिए तकनीक, बैंकों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय को मजबूत किया है। गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) की मदद से 30 जून 2026 तक साइबर धोखाधड़ी के 11,158 करोड़ रुपये से अधिक की राशि आम लोगों के खातों से ठगी जाने से बचा ली गई है। I4C और सिटीजन पोर्टल से मिली बड़ी सफलता गृह मंत्रालय के तहत संचालित सिटीजन फाइनेंशियल फ्रॉड रिपोर्टिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम (CFCFRMS) साइबर ठगी रोकने में अहम भूमिका निभा रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 30 जून 2026 तक इस पोर्टल पर 32.80 लाख से अधिक शिकायतें दर्ज की गईं। समय रहते शिकायत मिलने पर पुलिस, बैंक और अन्य वित्तीय संस्थानों के बीच त्वरित समन्वय स्थापित किया गया, जिससे बड़ी संख्या में लोगों की रकम सुरक्षित बचाई जा सकी। लाखों संदिग्ध सिम और IMEI नंबर ब्लॉक साइबर अपराधियों के नेटवर्क पर कार्रवाई करते हुए सरकार ने 15.75 लाख से अधिक संदिग्ध सिम कार्ड और 5.77 लाख IMEI नंबर ब्लॉक किए हैं। इसके अलावा, सितंबर 2024 में शुरू किए गए संदिग्ध खाता रजिस्टर के माध्यम से 30.48 लाख से अधिक संदिग्ध बैंक खातों की पहचान की गई, जिसके चलते 25,698 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन को रोका जा सका। 29 हजार से ज्यादा आरोपी गिरफ्तार गृह राज्य मंत्री बंदी संजय कुमार ने लोकसभा में जानकारी दी कि साइबर अपराध से निपटने के लिए पुलिस और जांच एजेंसियों की क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। इसके लिए 'साइट्रेन' (CyTrain) नामक ऑनलाइन प्रशिक्षण पोर्टल शुरू किया गया है। अब तक 1.61 लाख से अधिक पुलिसकर्मियों और न्यायिक अधिकारियों को साइबर अपराध की जांच और रोकथाम का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। उन्होंने बताया कि एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय के कारण अब तक 29,837 से अधिक आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। लोगों को भी किया जा रहा जागरूक सरकार साइबर अपराध पर रोक लगाने के लिए केवल कार्रवाई ही नहीं, बल्कि जागरूकता अभियान भी चला रही है। एसएमएस, कॉलर ट्यून, सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से लोगों को ऑनलाइन धोखाधड़ी से बचने के तरीके बताए जा रहे हैं। सरकार का कहना है कि तकनीकी निगरानी, तेज शिकायत निवारण प्रणाली और जनता की सतर्कता के जरिए साइबर ठगी पर प्रभावी नियंत्रण की दिशा में लगातार काम किया जा रहा है।
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने WhatsApp के प्रस्तावित 'यूजरनेम' फीचर को लेकर सख्त रुख अपनाया है। सरकार ने Meta को नोटिस जारी कर इस फीचर के रोलआउट पर सवाल उठाए हैं और तीन दिनों के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि जब तक उसके सभी सुरक्षा संबंधी सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तब तक भारत में यह फीचर लॉन्च नहीं किया जा सकेगा। नोटिस में क्या कहा गया? सरकार ने अपने नोटिस में कहा है कि WhatsApp का यूजरनेम फीचर ऑनलाइन धोखाधड़ी, फिशिंग, डिजिटल अरेस्ट और फर्जी पहचान वाले साइबर अपराधों को बढ़ावा दे सकता है। नोटिस के अनुसार, यदि लोग केवल यूजरनेम के माध्यम से संपर्क कर सकेंगे, तो साइबर अपराधियों के लिए अपनी पहचान छिपाकर लोगों को निशाना बनाना अधिक आसान हो जाएगा। कानूनी कार्रवाई की चेतावनी सरकार ने मेटा से पूछा है कि जब कंपनी को इस फीचर से संभावित साइबर अपराधों का अंदेशा है, तो उसके खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। मेटा को इस संबंध में लिखित और विस्तृत जवाब देने के लिए तीन दिन का समय दिया गया है। सरकार की प्रमुख चिंताएं सरकार ने नोटिस में कई संभावित जोखिमों का उल्लेख किया है। डिजिटल अरेस्ट और ऑनलाइन स्कैम: सरकार का मानना है कि बिना फोन नंबर साझा किए केवल यूजरनेम के जरिए संपर्क की सुविधा मिलने पर साइबर अपराधियों के लिए लोगों तक पहुंचना आसान हो सकता है। फर्जी पहचान का खतरा: धोखेबाज किसी व्यक्ति, कंपनी या सरकारी संस्था से मिलते-जुलते यूजरनेम बनाकर लोगों को भ्रमित कर सकते हैं। सरकारी एजेंसियों की नकल: आशंका जताई गई है कि अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, बैंक या अन्य सरकारी अधिकारी बताकर लोगों से ठगी कर सकते हैं। यूजरनेम फीचर क्या है? WhatsApp जिस फीचर पर काम कर रहा है, उसके तहत उपयोगकर्ता अपने मोबाइल नंबर के बजाय एक यूजरनेम के जरिए दूसरों से जुड़ सकेंगे। इससे फोन नंबर साझा किए बिना बातचीत करने का विकल्प मिलेगा। यह सुविधा पहले से कई अन्य मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है। भारत सरकार का मानना है कि इस फीचर को लागू करने से पहले पर्याप्त सुरक्षा उपाय और पहचान सत्यापन की व्यवस्था सुनिश्चित करना आवश्यक है। फिलहाल मेटा की ओर से इस नोटिस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सरकार के जवाब की समीक्षा के बाद ही भारत में WhatsApp के यूजरनेम फीचर के भविष्य पर फैसला लिया जाएगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। देश में तेजी से बढ़ रहे साइबर फ्रॉड पर लगाम लगाने के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने ऑपरेशन चक्र-VI के तहत बड़ा अभियान चलाया है। ऑपरेशन चक्र-VI (Operation Chakra-VI) के तहत CBI ने 16 राज्यों में 80 से अधिक स्थानों पर एक साथ छापेमारी की। यह कार्रवाई कथित "डिजिटल अरेस्ट" और संगठित साइबर ठगी से जुड़े नेटवर्क को ध्वस्त करने के उद्देश्य से की गई। 16 राज्यों में एक साथ कार्रवाई CBI की लगभग 60 विशेष टीमों ने दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक, ओडिशा, असम, मणिपुर समेत 16 राज्यों में समन्वित छापेमारी की। जांच एजेंसी का कहना है कि यह नेटवर्क देशभर में 200 से अधिक साइबर ठगी के मामलों से जुड़ा हो सकता है। क्या है 'डिजिटल अरेस्ट' फ्रॉड? डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड में अपराधी खुद को CBI, पुलिस, ED, कस्टम या अदालत का अधिकारी बताकर लोगों को वीडियो कॉल करते हैं। इसके बाद फर्जी वारंट, कोर्ट ऑर्डर या जांच का डर दिखाकर पीड़ितों से लाखों रुपये अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करवा लेते हैं। फर्जी वेबसाइट और बैंक खातों का इस्तेमाल प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि गिरोह कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट जैसी दिखने वाली फर्जी वेबसाइट का इस्तेमाल कर लोगों को भ्रमित करता था। ठगी की रकम को छिपाने के लिए बड़ी संख्या में म्यूल बैंक अकाउंट (Mule Accounts) का उपयोग किया जाता था। दो आरोपी गिरफ्तार CBI ने इस अभियान के दौरान दो प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार किया है। एजेंसी डिजिटल उपकरण, बैंक रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों की जांच कर रही है ताकि पूरे नेटवर्क का पता लगाया जा सके। लोगों से सतर्क रहने की अपील जांच एजेंसियों ने नागरिकों से अपील की है कि यदि कोई व्यक्ति खुद को किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर पैसे ट्रांसफर करने के लिए कहे, तो उसकी बातों में न आएं। किसी भी संदिग्ध साइबर ठगी की शिकायत तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 या राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर करें।
जामताड़ा, एजेंसियां। साइबर अपराध के लिए बदनाम जामताड़ा से ठगी का एक और नया तरीका सामने आया है। पुलिस ने तीन साइबर अपराधियों को गिरफ्तार कर ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो कैशबैक ऑफर और फर्जी बैंक कॉल के जरिए लोगों के बैंक खातों से पैसे उड़ा रहे थे। आरोपियों के खुलासों ने साइबर ठगी के नए और खतरनाक तरीकों की जानकारी दी है। गिरिडीह के साइबर डीएसपी अमित रविदास ने बताया कि गुप्त सूचना के आधार पर करमाटाड़ थाना क्षेत्र में छापेमारी कर समीम अंसारी (24), कैफ अंसारी (19) और मुस्तकीम अंसारी (38) को गिरफ्तार किया गया। कार्रवाई के दौरान उनके पास से छह मोबाइल फोन और चार सिम कार्ड बरामद किए गए हैं। कैशबैक ऑफर के नाम पर ठगी पुलिस पूछताछ में सामने आया कि समीम और कैफ अंसारी ‘Ease My Deal’ नामक ऐप का इस्तेमाल कर लोगों के PhonePe खातों पर ₹1999 कैशबैक का आकर्षक संदेश भेजते थे। संदेश देखकर कई लोग इसे असली ऑफर समझकर लिंक पर क्लिक कर देते थे। जैसे ही पीड़ित लिंक पर क्लिक करता, उसके खाते से रकम ट्रांसफर हो जाती। ठग इस पैसे से ऑनलाइन गिफ्ट कार्ड खरीदते और बाद में उन्हें कमीशन पर बेचकर नकदी हासिल करते थे। पुलिस का कहना है कि यह तरीका तेजी से लोगों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। फर्जी SBI अधिकारी बनकर करता था कॉल गिरफ्तार तीसरा आरोपी मुस्तकीम अंसारी खुद को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) का अधिकारी बताकर लोगों को फोन करता था। वह पीड़ितों को डराता था कि उनका क्रेडिट कार्ड जल्द बंद होने वाला है और उसे चालू रखने के लिए कुछ जरूरी प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसके बाद वह मोबाइल में एक APK फाइल डाउनलोड करवाता था। यह फाइल जासूसी सॉफ्टवेयर की तरह काम करती थी और इंस्टॉल होते ही कार्ड नंबर, ओटीपी तथा अन्य गोपनीय जानकारियां अपराधियों तक पहुंच जाती थीं। इसके बाद खाते से रकम निकाल ली जाती थी। पुराने नेटवर्क की तलाश में पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि मुस्तकीम अंसारी पहले भी साइबर ठगी के मामलों में शामिल रह चुका है। पुलिस अब उसके पुराने नेटवर्क, सहयोगियों और इस गिरोह से जुड़े अन्य लोगों की तलाश कर रही है। अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि किसी भी कैशबैक लिंक, अज्ञात ऐप या APK फाइल पर भरोसा न करें और बैंक संबंधी जानकारी किसी के साथ साझा न करें।
नई दिल्ली, एजेंसियां। देश में साइबर ठगी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और अब ठगों का नया हथियार SIM Swap Fraud बनता जा रहा है। इस फ्रॉड में अपराधी बिना मोबाइल छुए आपका नंबर अपने कब्जे में ले लेते हैं और फिर बैंक OTP हासिल कर खाते से पैसे निकाल सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के दिनों में इस तरह के मामलों में तेजी देखी गई है। SIM Swap Fraud क्या है? इस फ्रॉड में ठग आपकी निजी जानकारी जुटाकर टेलीकॉम कंपनी को धोखे से यह विश्वास दिलाते हैं कि वे असली ग्राहक हैं। इसके बाद आपका मोबाइल नंबर एक नए SIM पर ट्रांसफर कर दिया जाता है। जैसे ही आपका SIM बंद होता है, OTP और बैंकिंग संदेश ठगों के पास पहुंचने लगते हैं। अचानक नेटवर्क गायब हो जाए तो हो जाएं सतर्क विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आपके फोन में अचानक नेटवर्क आना बंद हो जाए, कॉल और SMS न आएं, तो इसे सामान्य तकनीकी समस्या मानकर नजरअंदाज न करें। यह SIM Swap Fraud का संकेत हो सकता है। करोड़ों रुपये की ठगी के मामले सामने आए हाल ही में कई बड़े साइबर फ्रॉड मामलों में SIM और OTP का दुरुपयोग सामने आया है। जांच एजेंसियों ने ऐसे नेटवर्क का भी खुलासा किया है जिनमें हजारों SIM कार्ड का इस्तेमाल साइबर अपराधों में किया जा रहा था। ऐसे करें खुद का बचाव SIM पर PIN लॉक लगाएं। बैंक अलर्ट SMS के साथ ईमेल पर भी प्राप्त करें। किसी भी पोर्टिंग या SIM बदलने वाले संदेश को गंभीरता से लें। OTP और बैंकिंग जानकारी किसी से साझा न करें। अचानक नेटवर्क बंद होने पर तुरंत टेलीकॉम कंपनी से संपर्क करें।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।