नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने WhatsApp के प्रस्तावित 'यूजरनेम' फीचर को लेकर सख्त रुख अपनाया है। सरकार ने Meta को नोटिस जारी कर इस फीचर के रोलआउट पर सवाल उठाए हैं और तीन दिनों के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि जब तक उसके सभी सुरक्षा संबंधी सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तब तक भारत में यह फीचर लॉन्च नहीं किया जा सकेगा।
सरकार ने अपने नोटिस में कहा है कि WhatsApp का यूजरनेम फीचर ऑनलाइन धोखाधड़ी, फिशिंग, डिजिटल अरेस्ट और फर्जी पहचान वाले साइबर अपराधों को बढ़ावा दे सकता है।
नोटिस के अनुसार, यदि लोग केवल यूजरनेम के माध्यम से संपर्क कर सकेंगे, तो साइबर अपराधियों के लिए अपनी पहचान छिपाकर लोगों को निशाना बनाना अधिक आसान हो जाएगा।
सरकार ने मेटा से पूछा है कि जब कंपनी को इस फीचर से संभावित साइबर अपराधों का अंदेशा है, तो उसके खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए।
मेटा को इस संबंध में लिखित और विस्तृत जवाब देने के लिए तीन दिन का समय दिया गया है।
सरकार ने नोटिस में कई संभावित जोखिमों का उल्लेख किया है।
WhatsApp जिस फीचर पर काम कर रहा है, उसके तहत उपयोगकर्ता अपने मोबाइल नंबर के बजाय एक यूजरनेम के जरिए दूसरों से जुड़ सकेंगे। इससे फोन नंबर साझा किए बिना बातचीत करने का विकल्प मिलेगा। यह सुविधा पहले से कई अन्य मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है।
भारत सरकार का मानना है कि इस फीचर को लागू करने से पहले पर्याप्त सुरक्षा उपाय और पहचान सत्यापन की व्यवस्था सुनिश्चित करना आवश्यक है।
फिलहाल मेटा की ओर से इस नोटिस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सरकार के जवाब की समीक्षा के बाद ही भारत में WhatsApp के यूजरनेम फीचर के भविष्य पर फैसला लिया जाएगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली,एजेंसियां। आधुनिक चिकित्सा में एंडोस्कोपी एक महत्वपूर्ण और सुरक्षित जांच प्रक्रिया है, जिसका उपयोग शरीर के अंदरूनी अंगों की बारीकी से जांच करने के लिए किया जाता है। इस तकनीक में डॉक्टर एक पतली, लचीली और कैमरे से लैस ट्यूब, जिसे एंडोस्कोप कहा जाता है, को शरीर के प्राकृतिक रास्तों जैसे मुंह या अन्य निर्धारित मार्गों से अंदर पहुंचाते हैं। कैमरे की मदद से अंगों की तस्वीरें स्क्रीन पर दिखाई देती हैं, जिससे डॉक्टर बीमारी का सटीक पता लगा सकते हैं। यह प्रक्रिया आमतौर पर 5 से 10 मिनट में पूरी हो जाती है और अधिकतर मामलों में किसी बड़े ऑपरेशन की आवश्यकता नहीं पड़ती। कैसे की जाती है एंडोस्कोपी? एंडोस्कोपी से पहले मरीज को 6 से 8 घंटे तक खाली पेट रहने की सलाह दी जाती है ताकि जांच स्पष्ट रूप से हो सके। प्रक्रिया के दौरान मरीज को आरामदायक स्थिति में लिटाकर गले को लोकल एनेस्थेटिक स्प्रे से सुन्न किया जाता है। जरूरत पड़ने पर हल्की बेहोशी की दवा भी दी जाती है। इसके बाद डॉक्टर एंडोस्कोप को धीरे-धीरे शरीर के अंदर ले जाकर भोजन नली, पेट या संबंधित अंगों की जांच करते हैं। यदि किसी असामान्यता का संदेह होता है, तो उसी दौरान बायोप्सी के लिए ऊतक का छोटा नमूना भी लिया जा सकता है। किन बीमारियों का चलता है पता? एंडोस्कोपी के जरिए गैस्ट्रिक अल्सर, सूजन, ब्लीडिंग, कोलन पॉलीप्स, कोलन कैंसर, निगलने में परेशानी, फेफड़ों की बीमारियां, किडनी की पथरी, यूरिनरी ट्रैक्ट संक्रमण, एंडोमेट्रियोसिस और गर्भाशय संबंधी समस्याओं सहित कई गंभीर बीमारियों की पहचान की जा सकती है। कई मामलों में इसका उपयोग उपचार और छोटी सर्जरी के लिए भी किया जाता है। एंडोस्कोपी के कई प्रकार शरीर के अलग-अलग अंगों की जांच के लिए अलग-अलग प्रकार की एंडोस्कोपी की जाती है, जिनमें अपर एंडोस्कोपी, कोलोनोस्कोपी, ब्रोंकोस्कोपी, सिस्टोस्कोपी, हिस्टेरोस्कोपी, लैप्रोस्कोपी और आर्थ्रोस्कोपी प्रमुख हैं। आधुनिक तकनीकों जैसे हाई-डेफिनिशन इमेजिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के उपयोग से एंडोस्कोपी पहले से अधिक सटीक और प्रभावी हो गई है, जिससे शुरुआती चरण में ही गंभीर बीमारियों का पता लगाकर समय पर इलाज संभव हो पाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। चर्चित राजा रघुवंशी हनीमून मर्डर केस की मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी को फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल गई है। शीर्ष अदालत ने उनकी जमानत पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने मेघालय सरकार की उस याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में हाईकोर्ट के फैसले को लेकर कुछ सवाल जरूर हैं, लेकिन चूंकि सोनम पहले ही जेल से रिहा हो चुकी हैं, इसलिए इस स्तर पर उनकी जमानत पर रोक लगाना उचित नहीं होगा। सरकार ने बताया हाईकोर्ट का फैसला चौंकाने वाला सुनवाई के दौरान मेघालय सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाईकोर्ट के फैसले को "बेहद चौंकाने वाला" बताया। उन्होंने अदालत को बताया कि यह एक सुनियोजित हत्या का मामला है, जिसमें हनीमून पर गए राजा रघुवंशी की हत्या कर शव को गहरी खाई में फेंक दिया गया था। सरकार के मुताबिक, इस मामले में 94 गवाह हैं और मुकदमे की सुनवाई जारी है। टाइपिंग की गलती बनी जमानत का आधार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी दस्तावेज में भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) की जगह गलती से धारा 403(1) लिखे जाने को आधार बनाकर जमानत दी। मेघालय सरकार का तर्क है कि यह केवल टाइपिंग की त्रुटि थी और आरोपी को गिरफ्तारी के समय हत्या के आरोपों की पूरी जानकारी दी गई थी। इसलिए इतनी गंभीर वारदात में सिर्फ तकनीकी गलती के आधार पर जमानत देना उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरश ने पूछा कि यदि पहले की जमानत याचिकाओं में गिरफ्तारी के आधार का मुद्दा नहीं उठाया गया था, तो बाद में यही आधार कैसे बन गया। वहीं, सोनम के वकील ने कहा कि उन्हें गिरफ्तारी के आधार सही तरीके से नहीं बताए गए थे और वह सख्त शर्तों के तहत शिलांग में रह रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फिलहाल जमानत बरकरार रहेगी, लेकिन मामले की विस्तृत सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के आदेश की वैधता पर विचार किया जाएगा।
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर प्रस्तावित और मौजूदा 'यूजरनेम फीचर' को लेकर सख्त रुख अपनाया है। WhatsApp को नोटिस जारी करने के बाद अब सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने Telegram और Signal को भी नोटिस भेजकर उनके यूजरनेम सिस्टम और उससे जुड़े सुरक्षा उपायों पर जवाब मांगा है। सरकार ने इन प्लेटफॉर्म्स से पूछा है कि यूजरनेम फीचर के जरिए होने वाली धोखाधड़ी, फर्जी पहचान (Impersonation) और साइबर अपराधों को रोकने के लिए उन्होंने क्या सुरक्षा इंतजाम किए हैं। Telegram और Signal से मांगा जवाब सरकार ने नोटिस में पूछा है कि दोनों प्लेटफॉर्म अपने यूजरनेम फीचर को जारी रखने के पक्ष में क्या तर्क देते हैं और यह फीचर उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किस तरह काम करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, Telegram को भेजे गए नोटिस में सरकार ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि उसे यूजरनेम फीचर बनाए रखने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए। गौरतलब है कि Telegram और Signal पर यूजरनेम फीचर पहले से उपलब्ध है, जिससे बिना मोबाइल नंबर साझा किए भी यूजर्स एक-दूसरे से संपर्क कर सकते हैं। WhatsApp को भी भेजा गया था नोटिस इससे पहले केंद्र सरकार ने Meta को नोटिस जारी कर WhatsApp के प्रस्तावित यूजरनेम फीचर पर आपत्ति जताई थी। सरकार ने कहा था कि जब तक इस विषय पर विस्तृत चर्चा पूरी नहीं हो जाती, तब तक इस फीचर को भारत में लॉन्च नहीं किया जाए। सरकार की चिंता है कि मोबाइल नंबर की जगह यूजरनेम आधारित पहचान से ऑनलाइन ठगी, फर्जी प्रोफाइल और पहचान छिपाकर अपराध करने के मामलों में बढ़ोतरी हो सकती है। आईटी नियमों के तहत मांगा जवाब सरकार ने Meta से यह भी पूछा है कि प्रस्तावित फीचर को लेकर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। नोटिस में कहा गया है कि यदि यह फीचर पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना लागू किया जाता है, तो इससे साइबर अपराध और ऑनलाइन फ्रॉड का खतरा बढ़ सकता है। WhatsApp ने किया फीचर का बचाव WhatsApp ने सरकार की चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि प्रस्तावित यूजरनेम फीचर में उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है। कंपनी का दावा है कि इसमें फर्जी पहचान, प्रतिरूपण (Impersonation) और ऑनलाइन धोखाधड़ी को रोकने के लिए कई सुरक्षा उपाय पहले से शामिल किए गए हैं। भारत है सबसे बड़ा बाजार भारत WhatsApp के लिए दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में शामिल है। देश में WhatsApp के करीब 50 करोड़ उपयोगकर्ता हैं। वहीं, Telegram और Signal के भी लाखों सक्रिय यूजर्स हैं। ऐसे में सरकार का यह कदम डिजिटल सुरक्षा, ऑनलाइन पहचान और साइबर धोखाधड़ी को रोकने के प्रयासों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।