नई दिल्ली, एजेंसियां। देश में साइबर ठगी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और अब ठगों का नया हथियार SIM Swap Fraud बनता जा रहा है। इस फ्रॉड में अपराधी बिना मोबाइल छुए आपका नंबर अपने कब्जे में ले लेते हैं और फिर बैंक OTP हासिल कर खाते से पैसे निकाल सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के दिनों में इस तरह के मामलों में तेजी देखी गई है।
इस फ्रॉड में ठग आपकी निजी जानकारी जुटाकर टेलीकॉम कंपनी को धोखे से यह विश्वास दिलाते हैं कि वे असली ग्राहक हैं। इसके बाद आपका मोबाइल नंबर एक नए SIM पर ट्रांसफर कर दिया जाता है। जैसे ही आपका SIM बंद होता है, OTP और बैंकिंग संदेश ठगों के पास पहुंचने लगते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आपके फोन में अचानक नेटवर्क आना बंद हो जाए, कॉल और SMS न आएं, तो इसे सामान्य तकनीकी समस्या मानकर नजरअंदाज न करें। यह SIM Swap Fraud का संकेत हो सकता है।
हाल ही में कई बड़े साइबर फ्रॉड मामलों में SIM और OTP का दुरुपयोग सामने आया है। जांच एजेंसियों ने ऐसे नेटवर्क का भी खुलासा किया है जिनमें हजारों SIM कार्ड का इस्तेमाल साइबर अपराधों में किया जा रहा था।
SIM पर PIN लॉक लगाएं।
बैंक अलर्ट SMS के साथ ईमेल पर भी प्राप्त करें।
किसी भी पोर्टिंग या SIM बदलने वाले संदेश को गंभीरता से लें।
OTP और बैंकिंग जानकारी किसी से साझा न करें।
अचानक नेटवर्क बंद होने पर तुरंत टेलीकॉम कंपनी से संपर्क करें।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची। भारतीय पासपोर्ट को लेकर विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के बयान के बाद देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने केंद्र सरकार से सवाल किया है कि यदि पासपोर्ट केवल यात्रा (ट्रैवल) दस्तावेज है और नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया में इसे सबसे पहले स्वीकार किए जाने वाले दस्तावेजों में क्यों शामिल किया गया है। JMM ने सोशल मीडिया पर उठाए सवाल जेएमएम ने सोशल मीडिया के माध्यम से केंद्र सरकार पर विरोधाभासी रुख अपनाने का आरोप लगाया। पार्टी ने कहा कि एक ओर विदेश मंत्रालय पासपोर्ट को केवल ट्रैवल डॉक्यूमेंट बता रहा है, वहीं दूसरी ओर SIR प्रक्रिया में इसे नागरिकता संबंधी प्रमुख दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। पार्टी ने सरकार से इस मुद्दे पर स्पष्टता देने की मांग की है। कांग्रेस और विपक्ष ने भी घेरा इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत और राजद नेता रोहिणी आचार्य ने भी केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो पासपोर्ट जारी करने से पहले होने वाली पुलिस सत्यापन और दस्तावेजों की जांच का औचित्य क्या है। साथ ही उन्होंने पूछा कि आखिर भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कौन-सा दस्तावेज अंतिम रूप से मान्य माना जाएगा। विदेश मंत्रालय ने क्या कहा? पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है, लेकिन यह भारतीय नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं है। मंत्रालय के अनुसार, किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्धारण संबंधित कानूनों और वैधानिक दस्तावेजों के आधार पर किया जाता है। नागरिकता का अंतिम प्रमाण क्या है? कानूनी विशेषज्ञों और पूर्व न्यायिक फैसलों के अनुसार, पासपोर्ट, आधार कार्ड या वोटर आईडी अपने-आप में नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं हैं। भारतीय नागरिकता का निर्धारण मुख्य रूप से नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिककरण, जन्म प्रमाणपत्र, नागरिकता प्रमाणपत्र तथा अन्य वैधानिक दस्तावेजों के आधार पर किया जाता है। इसी मुद्दे को लेकर अब राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है।
भुवनेश्वर: ओडिशा की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। पूर्व आईएएस अधिकारी Sujatha Raut Karthikeyan ने गुरुवार को आधिकारिक तौर पर बीजू जनता दल (BJD) की सदस्यता ग्रहण कर ली। वह पूर्व मुख्यमंत्री Naveen Patnaik की मौजूदगी में पार्टी में शामिल हुईं। सामाजिक कल्याण और विशेष रूप से महिला सशक्तीकरण से जुड़े मिशन शक्ति कार्यक्रम में अहम भूमिका निभाने वाली सुजाता राउत ने 13 मार्च 2025 को भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दिया था। राजनीतिक पृष्ठभूमि और पार्टी में शामिल होना सुजाता राउत कार्तिकेयन, जो 2000 बैच की आईएएस अधिकारी रह चुकी हैं, लंबे समय तक ओडिशा सरकार में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर कार्यरत रहीं। उन्होंने विशेष रूप से महिला सशक्तीकरण से जुड़े कार्यक्रमों को विस्तार देने में अहम योगदान दिया। बीजू जनता दल में उनके शामिल होने की घोषणा पार्टी मुख्यालय शंख भवन में आयोजित बैठक के बाद की गई। नवीन पटनायक का बयान पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने सुजाता राउत का पार्टी में स्वागत करते हुए कहा कि वह एक अनुभवी प्रशासनिक अधिकारी रही हैं और उन्होंने राज्य में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुजाता अपनी नई राजनीतिक भूमिका में सहज होकर जनता, विशेषकर महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम करेंगी। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आगामी चुनावों में बीजू जनता दल का नेतृत्व स्वयं वही करेंगे और नेतृत्व परिवर्तन की सभी अटकलों को खारिज किया। सुजाता राउत का बयान पार्टी में शामिल होने के बाद सुजाता राउत ने कहा कि वह ओडिशा की जनता की सेवा को अपनी प्राथमिकता बनाए रखेंगी। उन्होंने कहा कि उन्हें बीते 24 वर्षों में नवीन पटनायक के नेतृत्व में काम करने का अवसर मिला और अब एक नई भूमिका में जनता की सेवा करने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि वह पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ राज्य के विकास और महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए कार्य करेंगी। पार्टी के भीतर प्रतिक्रियाएं सूत्रों के अनुसार, बीजेडी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने उनके प्रवेश पर आपत्ति भी जताई थी। उनका कहना था कि 2024 के चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को लेकर संगठन के भीतर पहले से ही असंतोष है, और ऐसे में यह कदम राजनीतिक बहस को और बढ़ा सकता है। पार्टी नेतृत्व ने उनके शामिल होने को संगठनात्मक मजबूती और प्रशासनिक अनुभव के तौर पर देखा है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति दोहराते हुए बड़ा बयान दिया है। उन्होंने संकेत दिया कि भ्रष्टाचार और अपराध से अर्जित संपत्तियों को केवल जब्त ही नहीं किया जाएगा, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उनकी नीलामी भी की जा सकती है। मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्तियों पर बनेगा नया कानून विधानसभा में अपने जवाबी भाषण के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में गुंडाराज, माफियातंत्र और वसूली की राजनीति को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने बताया कि सरकार इस सत्र में एक नया विधेयक लाने की तैयारी कर रही है, जिसके माध्यम से भ्रष्टाचार और आपराधिक गतिविधियों से अर्जित संपत्तियों को जब्त करने तथा उनकी नीलामी का कानूनी प्रावधान किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि केवल जेल जाने या लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने से कोई बच नहीं सकेगा। यदि किसी व्यक्ति की संपत्ति अवैध तरीके से अर्जित पाई जाती है तो सरकार उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। आलीशान इमारतों का किया उल्लेख अपने भाषण के दौरान मुख्यमंत्री ने कोलकाता के हरीश मुखर्जी रोड और हरीश चटर्जी रोड स्थित आलीशान इमारतों का उल्लेख करते हुए कहा कि भविष्य में ऐसी बड़ी संपत्तियों का उपयोग उन लोगों के पुनर्वास के लिए किया जा सकता है, जो आज सड़कों, फुटपाथों और फ्लाईओवरों के नीचे जीवन बिताने को मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य केवल अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई करना नहीं, बल्कि उन्हें जनहित में उपयोग में लाना भी है। राजनीतिक गलियारों में बढ़ी चर्चाएं मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में किसी नेता का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान के बाद राजनीतिक हलकों में इसे तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद अभिषेक बनर्जी की ओर इशारा माना जा रहा है। हरीश मुखर्जी रोड और हरीश चटर्जी रोड क्षेत्र में स्थित कुछ चर्चित संपत्तियों को लेकर पहले भी निर्माण संबंधी अनियमितताओं और अन्य विवादों की चर्चा होती रही है। सरकार की ओर से किसी विशेष व्यक्ति या संपत्ति के खिलाफ आधिकारिक कार्रवाई की घोषणा नहीं की गई है। सत्ता पक्ष ने किया समर्थन मुख्यमंत्री के बयान के दौरान सत्ता पक्ष के कई विधायकों और मंत्रियों ने मेज थपथपाकर समर्थन जताया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार का यह रुख आने वाले समय में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को और तेज करने का संकेत है। विपक्ष की प्रतिक्रिया पर नजर मुख्यमंत्री के बयान के बाद अब विपक्ष की प्रतिक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हैं। माना जा रहा है कि प्रस्तावित विधेयक और उससे जुड़े प्रावधानों को लेकर विधानसभा और राज्य की राजनीति में आगे भी तीखी बहस देखने को मिल सकती है।