रांची: झारखंड कांग्रेस मुख्यालय में सोमवार को आयोजित प्रेस वार्ता में कांग्रेस नेताओं ने JPSC-JSSC छात्र आंदोलन, SIR और माइनिंग संशोधन बिल को लेकर केंद्र सरकार और बीजेपी पर जमकर निशाना साधा. प्रदेश प्रभारी के. राजू, प्रदेश सह प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष, मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, विधायक दल के नेता प्रदीप यादव, मंत्री दीपिका पांडेय सिंह और स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने अलग-अलग मुद्दों पर पार्टी का पक्ष रखा. छात्र आंदोलन पर कांग्रेस ने कहा- बातचीत से निकले समाधान प्रदेश प्रभारी के. राजू ने कहा कि झारखंड में छात्रों का आंदोलन लंबे समय से चल रहा है. कांग्रेस छात्रों की मांगों के साथ खड़ी है और चाहती है कि सरकार और छात्रों के बीच बातचीत के जरिए जल्द समाधान निकले. उन्होंने राहुल गांधी द्वारा देशभर में छात्रों के मुद्दे उठाने और जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन का जिक्र भी किया. उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से बातचीत के बाद छात्रों की मांगों पर चर्चा के लिए चार सदस्यीय मंत्रियों की कमेटी बनाई गई है. 80 फीसदी मांगों पर सहमति का दावा विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने दावा किया कि छात्रों की करीब 80 फीसदी मांगों पर सहमति बन चुकी है. उन्होंने कहा कि सरकार परीक्षा में कथित गड़बड़ियों को लेकर गंभीर है, लेकिन बीजेपी इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है. वहीं मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि JPSC की 14वीं परीक्षा और बैकलॉग परीक्षाओं को रद्द करने को लेकर सहमति बनी है. TDPL से जुड़ी परीक्षाओं को लेकर भी सरकार और छात्रों के बीच सहमति बनने की बात कही गई. हालांकि JSSC CGL परीक्षा रद्द करने और CBI जांच की मांग पर सहमति नहीं बन सकी है. मंत्री ने कहा कि CGL का रिजल्ट अदालत के निर्देश के बाद जारी हुआ था और कई चयनित अभ्यर्थी करीब एक साल से नौकरी कर रहे हैं. SIR को लेकर निर्वाचन आयोग पर सवाल कांग्रेस ने SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर भी निर्वाचन आयोग और बीजेपी पर निशाना साधा. के. राजू ने आरोप लगाया कि SIR के जरिए लोगों के वोट देने के अधिकार को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी से मुलाकात का समय मांगा था, लेकिन अभी तक समय नहीं मिला. कांग्रेस का दावा है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के फॉर्म लंबित हैं. मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि कई आदिवासी क्षेत्रों में लोग SIR का फॉर्म भरने से इनकार कर रहे हैं. उन्होंने ऐसे इलाकों में विशेष कैंप लगाकर मतदाताओं के नाम जोड़ने की मांग की. माइनिंग बिल पर केंद्र को घेरा प्रेस वार्ता में माइनिंग संशोधन बिल भी बड़ा मुद्दा रहा. के. राजू ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने बिल लाने से पहले राज्यों से पर्याप्त चर्चा नहीं की. कांग्रेस का कहना है कि इससे राज्यों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि पार्टी इस मुद्दे को लेकर राष्ट्रपति से मुलाकात करेगी और बिल को कानून का रूप नहीं देने का आग्रह करेगी. प्रदीप यादव बोले- संघीय ढांचे पर हमला प्रदीप यादव ने माइनिंग संशोधन बिल को संघीय ढांचे पर प्रहार बताया. उन्होंने कहा कि राज्यों की राय लिए बिना खनन से जुड़े अधिकारों में बदलाव करना उचित नहीं है. उन्होंने बताया कि 18 अगस्त को कांग्रेस इस मुद्दे पर आगे की रणनीति तय करेगी और जिला स्तर पर आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी. 15 हजार करोड़ के नुकसान का दावा स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने आरोप लगाया कि माइनिंग संशोधन कानून से झारखंड को करीब 15 हजार करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है. उन्होंने कहा कि यदि राज्य के खनिज आधारित राजस्व पर असर पड़ता है, तो इसका प्रभाव सरकार की कई योजनाओं पर पड़ सकता है. तीनों मुद्दों पर आंदोलन जारी रखने का ऐलान कांग्रेस ने साफ किया कि छात्र आंदोलन, SIR और माइनिंग संशोधन बिल को लेकर पार्टी आगे भी सक्रिय रहेगी. 18 अगस्त को माइनिंग कानून के खिलाफ आंदोलन की रणनीति तय करने के बाद जिला स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाने की बात कही गई है. कुल मिलाकर, कांग्रेस ने एक ही प्रेस वार्ता में छात्र आंदोलन से लेकर मतदाता सूची और खनिज अधिकारों तक कई मुद्दों पर केंद्र और बीजेपी को घेरा और आने वाले दिनों में आंदोलन तेज करने के संकेत दिए हैं.
रांची: JPSC और JSSC परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी और परीक्षा प्रक्रिया में सुधार की मांग को लेकर झारखंड में लंबे समय से चल रहा छात्र आंदोलन मंगलवार को एक अहम पड़ाव पर पहुंच गया. रांची सदर अस्पताल में इलाजरत अनशनकारी देवेंद्र नाथ महतो समेत अन्य आंदोलनकारियों ने अपना अनशन समाप्त कर दिया. ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने आंदोलनकारियों को जूस पिलाकर अनशन तुड़वाया. इस दौरान स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी और JLKM विधायक जयराम महतो भी अस्पताल में मौजूद रहे. लंबे समय तक अनशन पर रहने के कारण कई आंदोलनकारियों की तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें रांची सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया था. डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा था. लंबे समय से चल रहा था छात्र आंदोलन JPSC और JSSC की विभिन्न परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पारदर्शिता और भर्ती प्रक्रिया में सुधार की मांग को लेकर छात्र लगातार आंदोलन कर रहे थे. आंदोलनकारियों की ओर से विवादित परीक्षाओं की निष्पक्ष जांच, परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और अभ्यर्थियों के हित में आवश्यक कदम उठाने की मांग की जा रही थी. इन मांगों को लेकर देवेंद्र नाथ महतो समेत कई छात्र नेता और आंदोलनकारी लंबे समय से अनशन पर बैठे थे. लगातार अनशन के कारण उनकी स्वास्थ्य स्थिति खराब होने लगी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने पिलाया जूस मंगलवार को ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह रांची सदर अस्पताल पहुंचीं. उन्होंने अनशनकारी आंदोलनकारियों से मुलाकात कर उनकी स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी ली. इसके बाद बातचीत के बाद उन्होंने देवेंद्र नाथ महतो समेत अन्य आंदोलनकारियों को जूस पिलाकर अनशन समाप्त कराया. मंत्री के साथ स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी भी मौजूद रहे. अस्पताल में मौजूद चिकित्सकों से भी आंदोलनकारियों की स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी ली गई. जयराम महतो ने भी की मुलाकात JLKM विधायक जयराम महतो भी रांची सदर अस्पताल पहुंचे और अनशनकारियों से मुलाकात की. इस दौरान आंदोलनकारियों ने JPSC-JSSC परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों और अपनी मांगों को उनके सामने रखा. अनशन समाप्त होने के बाद अब आंदोलनकारियों और सरकार के बीच आगे की बातचीत पर नजर रहेगी. अनशन खत्म हो गया है, लेकिन परीक्षा सुधार और कथित अनियमितताओं से जुड़े मुद्दों पर आगे क्या कार्रवाई होती है, यह महत्वपूर्ण होगा. अब सरकार के अगले कदम पर नजर छात्र आंदोलन के दौरान JPSC और JSSC की परीक्षा व्यवस्था में सुधार, पारदर्शिता और विवादित परीक्षाओं को लेकर कई मांगें सामने आई थीं. अब अनशन समाप्त होने के बाद आंदोलनकारियों की मांगों पर सरकार की ओर से क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं, इस पर सभी की नजर रहेगी. फिलहाल सदर अस्पताल में मंत्री के हाथों जूस पीने के साथ देवेंद्र नाथ महतो और अन्य आंदोलनकारियों का अनशन समाप्त हो गया है, जिससे लंबे समय से जारी आंदोलन में एक नया मोड़ आया है.
नई दिल्ली, एजेंसियां। लग्जरी कार निर्माता फेरारी की पहली पूरी तरह इलेक्ट्रिक कार Ferrari Luce ने बाजार में उतरने से पहले ही बड़ा रिकॉर्ड बना दिया है। लूचे के एक खास ‘Chassis 0’ संस्करण को अमेरिका के कैलिफोर्निया में आयोजित RM Sotheby’s की चैरिटी नीलामी में 4 करोड़ डॉलर (करीब ₹330 करोड़) में बेचा गया। यह किसी नई कार की नीलामी में अब तक की सबसे बड़ी कीमत है। 40 मिलियन डॉलर में बिकी कार फेरारी लूचे के इस खास मॉडल की शुरुआती अनुमानित कीमत करीब 11 लाख डॉलर थी, लेकिन नीलामी में यह कीमत से लगभग 36 गुना अधिक रकम में बिकी। इससे पहले नई कार की नीलामी का रिकॉर्ड Ferrari Daytona SP3 के नाम था, जो 2025 में 2.6 करोड़ डॉलर में बिकी थी। हालांकि, यह किसी भी कार की सबसे महंगी नीलामी का रिकॉर्ड नहीं है। उस रिकॉर्ड के लिए 1955 की Mercedes-Benz 300 SLR Uhlenhaut Coupé अभी भी करीब 13.5 करोड़ यूरो की बिक्री के साथ आगे है। Ferrari Luce में क्या खास है? Luce फेरारी की पहली पूरी तरह इलेक्ट्रिक कार है। इसके सामान्य मॉडल की कीमत लगभग 5.5 लाख यूरो से शुरू होती है। कार में चार इलेक्ट्रिक मोटर हैं और इसका आउटपुट 1,000 हॉर्सपावर से अधिक बताया गया है। इसका डिजाइन पूर्व Apple डिजाइन प्रमुख जॉनी आइव के स्टूडियो LoveFrom के साथ मिलकर तैयार किया गया है। नीलामी की पूरी रकम जाएगी चैरिटी में नीलामी में बिकी यह कार सामान्य उत्पादन मॉडल नहीं, बल्कि एक विशेष वन-ऑफ संस्करण है। इससे मिलने वाली पूरी 40 मिलियन डॉलर की रकम Ferrari Foundation के जरिए शिक्षा से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर खर्च की जाएगी। कार के खरीदार अमेरिकी अरबपति और लंबे समय से फेरारी कलेक्टर हर्बर्ट ए. वर्टहाइम हैं। फेरारी के इलेक्ट्रिक सफर के लिए बड़ा संकेत लूचे की शुरुआत को लेकर फेरारी के पारंपरिक प्रशंसकों के बीच डिजाइन और इलेक्ट्रिक पावरट्रेन को लेकर बहस जरूर हुई थी। लेकिन रिकॉर्ड कीमत में इसकी नीलामी से संकेत मिलता है कि अल्ट्रा-लक्जरी इलेक्ट्रिक कारों के लिए कलेक्टरों और अमीर ग्राहकों की मांग मजबूत हो सकती है। फेरारी अब इलेक्ट्रिक, हाइब्रिड और पारंपरिक इंजन वाली कारों को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाए हुए है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।