रांची: JPSC और JSSC परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी और परीक्षा प्रक्रिया में सुधार की मांग को लेकर झारखंड में लंबे समय से चल रहा छात्र आंदोलन मंगलवार को एक अहम पड़ाव पर पहुंच गया. रांची सदर अस्पताल में इलाजरत अनशनकारी देवेंद्र नाथ महतो समेत अन्य आंदोलनकारियों ने अपना अनशन समाप्त कर दिया. ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने आंदोलनकारियों को जूस पिलाकर अनशन तुड़वाया.
इस दौरान स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी और JLKM विधायक जयराम महतो भी अस्पताल में मौजूद रहे. लंबे समय तक अनशन पर रहने के कारण कई आंदोलनकारियों की तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें रांची सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया था. डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा था.
JPSC और JSSC की विभिन्न परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पारदर्शिता और भर्ती प्रक्रिया में सुधार की मांग को लेकर छात्र लगातार आंदोलन कर रहे थे. आंदोलनकारियों की ओर से विवादित परीक्षाओं की निष्पक्ष जांच, परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और अभ्यर्थियों के हित में आवश्यक कदम उठाने की मांग की जा रही थी.
इन मांगों को लेकर देवेंद्र नाथ महतो समेत कई छात्र नेता और आंदोलनकारी लंबे समय से अनशन पर बैठे थे. लगातार अनशन के कारण उनकी स्वास्थ्य स्थिति खराब होने लगी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया.
मंगलवार को ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह रांची सदर अस्पताल पहुंचीं. उन्होंने अनशनकारी आंदोलनकारियों से मुलाकात कर उनकी स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी ली. इसके बाद बातचीत के बाद उन्होंने देवेंद्र नाथ महतो समेत अन्य आंदोलनकारियों को जूस पिलाकर अनशन समाप्त कराया.
मंत्री के साथ स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी भी मौजूद रहे. अस्पताल में मौजूद चिकित्सकों से भी आंदोलनकारियों की स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी ली गई.
JLKM विधायक जयराम महतो भी रांची सदर अस्पताल पहुंचे और अनशनकारियों से मुलाकात की. इस दौरान आंदोलनकारियों ने JPSC-JSSC परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों और अपनी मांगों को उनके सामने रखा.
अनशन समाप्त होने के बाद अब आंदोलनकारियों और सरकार के बीच आगे की बातचीत पर नजर रहेगी. अनशन खत्म हो गया है, लेकिन परीक्षा सुधार और कथित अनियमितताओं से जुड़े मुद्दों पर आगे क्या कार्रवाई होती है, यह महत्वपूर्ण होगा.
छात्र आंदोलन के दौरान JPSC और JSSC की परीक्षा व्यवस्था में सुधार, पारदर्शिता और विवादित परीक्षाओं को लेकर कई मांगें सामने आई थीं. अब अनशन समाप्त होने के बाद आंदोलनकारियों की मांगों पर सरकार की ओर से क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं, इस पर सभी की नजर रहेगी.
फिलहाल सदर अस्पताल में मंत्री के हाथों जूस पीने के साथ देवेंद्र नाथ महतो और अन्य आंदोलनकारियों का अनशन समाप्त हो गया है, जिससे लंबे समय से जारी आंदोलन में एक नया मोड़ आया है.
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची: झारखंड सरकार के JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने के फैसले के बाद अब मामला दो अलग-अलग पक्षों में बंटता नजर आ रहा है. एक ओर परीक्षा में कथित गड़बड़ी की शिकायत को लेकर आंदोलन कर रहे छात्रों ने फैसले का स्वागत किया है, वहीं दूसरी ओर इसी परीक्षा के जरिए चयनित होकर सरकारी नौकरी कर रहे अभ्यर्थियों में भारी नाराजगी है. कई चयनित अभ्यर्थी सरकार के फैसले के खिलाफ प्रोजेक्ट भवन के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं और अब अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं. चयनित अभ्यर्थियों का छलका दर्द प्रदर्शन कर रहे चयनित अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही नौकरी ज्वाइन की थी. एक अभ्यर्थी ने कहा कि हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले के बाद उनकी नियुक्ति हुई थी और मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख भी सामने आ चुका था. इसके बावजूद सरकार ने अचानक परीक्षा रद्द करने का फैसला ले लिया. अभ्यर्थी ने भावुक होकर कहा कि एक पल में वे बेरोजगार हो गए. उनका कहना है कि कई उम्मीदवारों ने JSSC-CGL में चयन के बाद अपनी पुरानी नौकरियां तक छोड़ दी थीं. अब परीक्षा रद्द होने के बाद उनके सामने दोबारा रोजगार हासिल करने का संकट खड़ा हो गया है. बोले- सरकार फैसले पर दोबारा करे विचार प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है. उनका कहना है कि यदि परीक्षा में गड़बड़ी हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर दोषी अभ्यर्थियों या जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए, लेकिन पूरी परीक्षा और सभी चयनित अभ्यर्थियों को एक साथ दोषी मानना उचित नहीं है. एक अभ्यर्थी ने कहा कि अगर जांच में कुछ लोगों की भूमिका सामने आती है तो केवल उन्हीं पर कार्रवाई की जानी चाहिए. चयनित अभ्यर्थियों का दावा है कि उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के तहत परीक्षा पास की और नियुक्ति मिलने के बाद सरकारी विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. कोर्ट जाने की तैयारी में चयनित अभ्यर्थी सरकार के फैसले से नाराज चयनित अभ्यर्थियों ने कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया है. उनका कहना है कि वे पहले भी अदालत के माध्यम से अपनी नियुक्ति के चरण तक पहुंचे हैं और अब परीक्षा रद्द किए जाने के फैसले को भी न्यायालय में चुनौती देंगे. अभ्यर्थियों का कहना है कि उनका भविष्य सीधे तौर पर इस फैसले से प्रभावित हुआ है. खासकर उन उम्मीदवारों की परेशानी ज्यादा बढ़ गयी है, जिन्होंने JSSC-CGL में चयन के बाद दूसरी नौकरियां छोड़कर सरकारी सेवा ज्वाइन की थी. जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में आंदोलनकारी छात्रों में खुशी इधर, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा JSSC-CGL और TDPL के जरिए आयोजित परीक्षाओं को रद्द करने की घोषणा के बाद जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में आंदोलन कर रहे छात्रों ने फैसले का स्वागत किया. छात्रों ने इसे अपने आंदोलन की पहली बड़ी जीत बताया. छात्र नेता पीयूष कुमार ने कहा कि परीक्षा रद्द करना उनकी मांगों की दिशा में पहला कदम है. हालांकि, उन्होंने साफ किया कि आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है. छात्रों की CBI जांच और अन्य मांगें अभी बाकी हैं. उन्होंने कहा कि आगे की रणनीति पर छात्र नेता बैठक कर फैसला लेंगे. CBI जांच और अन्य मांगों पर आंदोलन जारी रखने का ऐलान आंदोलनकारी छात्रों का कहना है कि सिर्फ परीक्षा रद्द होने से उनकी सभी मांगें पूरी नहीं हुई हैं. वे JSSC-CGL मामले की निष्पक्ष CBI जांच समेत अन्य विवादित मुद्दों पर भी सरकार से स्पष्ट कार्रवाई चाहते हैं. इस वजह से एक ही फैसले के बाद JSSC-CGL विवाद में दो अलग तस्वीरें सामने आई हैं. एक तरफ आंदोलनकारी छात्र परीक्षा रद्द होने को जीत मान रहे हैं, तो दूसरी तरफ चयनित अभ्यर्थी इसी फैसले को अपने रोजगार और भविष्य के लिए बड़ा झटका बता रहे हैं. अब इस पूरे मामले में सरकार के अगले कदम और अदालत की संभावित कार्रवाई पर सबकी नजर है.
रांची: JPSC-JSSC परीक्षा में कथित गड़बड़ी की जांच के दौरान सीआईडी के सामने TDPL के मार्केटिंग मैनेजर अभय तिवारी ने परीक्षा में सेटिंग और रिमोट एक्सेस के जरिए पेपर हल कराने को लेकर कई अहम दावे किए हैं. तिवारी के अनुसार, एजेंट अभ्यर्थियों से संपर्क कर उन्हें पास कराने के लिए मोटी रकम लेते थे. इसके बाद पहले से तय परीक्षा केंद्रों पर सॉफ्टवेयर और कंप्यूटर सिस्टम के जरिए बाहर बैठे सॉल्वर प्रश्नपत्र हल करते थे. अभय तिवारी ने सीआईडी को बताया कि वह खुद भी कथित सेटिंग के जरिए परीक्षा पास हुआ था. उसके बयान के बाद जांच एजेंसियों ने परीक्षा केंद्रों और इसमें कथित रूप से शामिल लोगों की भूमिका की जांच तेज कर दी है. ऐसे काम करता था कथित सॉल्वर नेटवर्क अभय तिवारी के मुताबिक, एजेंट पहले उन अभ्यर्थियों की पहचान करते थे जो कथित तौर पर सेटिंग के जरिए परीक्षा पास करना चाहते थे. इसके बाद उन्हें तय परीक्षा केंद्र पर भेजा जाता था. तिवारी ने दावा किया कि परीक्षा से पहले अभ्यर्थियों को फोन कर उनके कपड़ों के रंग और केंद्र पर किस लाइन में खड़ा होना है, जैसी जानकारी दी जाती थी. केंद्र पर पहचान होने के बाद उन्हें एक निर्धारित कंप्यूटर पर बैठाया जाता था. इसके बाद कथित तौर पर उस कंप्यूटर का रिमोट एक्सेस दूसरे कमरे में बैठे सॉल्वर ग्रुप को दे दिया जाता था. सॉल्वर वहां से प्रश्नपत्र हल करते थे, जबकि परीक्षा दे रहा अभ्यर्थी सिर्फ माउस चलाता रहता था. बूटी मोड़ समेत कई केंद्रों का जिक्र सीआईडी को दिए बयान में अभय तिवारी ने रांची के भव्या, सरला-बिरला के पास संस्कार आईटी, बूटी मोड़ स्थित एक केंद्र और बोकारो के दो केंद्रों का जिक्र किया है. उसके अनुसार, इन केंद्रों पर कथित तौर पर सेटिंग वाले अभ्यर्थियों को परीक्षा पास कराने की व्यवस्था की जाती थी. तिवारी ने बूटी मोड़ स्थित परीक्षा केंद्र के संचालक अजय संग्राम का नाम भी लिया है. उसके मुताबिक अजय संग्राम सेटिंग वाले अभ्यर्थियों को परीक्षा से पहले जरूरी जानकारी देता था और केंद्र पर उनकी व्यवस्था कराता था. अभय तिवारी ने एजेंटों के नाम भी बताए पूछताछ के दौरान अभय तिवारी ने कथित तौर पर कई एजेंटों के नाम भी सीआईडी को बताए. इनमें पटना के इमरान और अली, गिरिडीह के राजेश, बोकारो के शंकर और मनोज तथा हजारीबाग के सुनील कुमार के नाम शामिल बताए गए हैं. तिवारी के अनुसार, शंकर अजय संग्राम का करीबी था. उसने यह भी दावा किया कि अजय संग्राम कई परीक्षा केंद्रों को कथित तौर पर मैनेज करता था. हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी. फिलहाल सामने आए बयान को जांच का हिस्सा माना जा रहा है. PGTTCE 2023 परीक्षा को लेकर भी खुलासा अभय तिवारी ने PGTTCE 2023 परीक्षा में भी कथित सेटिंग के जरिए पास कराने का दावा किया है. उसके अनुसार, बूटी मोड़ स्थित केंद्र पर अभ्यर्थियों को पहले से तय व्यवस्था के तहत कंप्यूटर उपलब्ध कराया जाता था और फिर रिमोट एक्सेस के माध्यम से बाहर बैठे सॉल्वर प्रश्न हल करते थे. तिवारी ने सीआईडी को यह भी बताया कि उसने खुद अजय संग्राम के संपर्क के जरिए कथित सेटिंग कर परीक्षा पास की थी. इस बयान के बाद जांच एजेंसी परीक्षा केंद्रों, एजेंटों और सॉल्वर नेटवर्क के बीच संभावित कनेक्शन की पड़ताल कर रही है. JSSC CGL परीक्षा से भी जुड़ रहे तार जांच के दौरान JSSC CGL परीक्षा को लेकर भी कई सवाल सामने आए हैं. जनवरी 2024 में आयोजित सीजीएल परीक्षा में पेपर लीक के आरोपों के बाद परीक्षा रद्द की गई थी. अब परीक्षा आयोजित कराने वाली एजेंसी और विभिन्न परीक्षा केंद्रों की भूमिका भी जांच के दायरे में है. कुछ दस्तावेजों के आधार पर कुछ परीक्षा केंद्रों से असामान्य रूप से बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों के सफल होने का दावा भी सामने आया है. इस मामले में जेएसएससी की ओर से नामकुम थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी. जांच आगे बढ़ने के साथ बढ़ रही मुश्किलें अभय तिवारी के बयान के बाद अब सीआईडी कथित नेटवर्क में शामिल लोगों, परीक्षा केंद्रों, एजेंटों और तकनीकी व्यवस्था की भूमिका की जांच कर रही है. संस्था के सचिव से भी पूछताछ किए जाने की जानकारी सामने आई है. JPSC-JSSC परीक्षा विवाद में पहले से छात्रों की ओर से परीक्षा में कथित गड़बड़ी की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की जा रही है. ऐसे में अभय तिवारी के दावों ने मामले को और गंभीर बना दिया है. अब जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि उसके आरोपों में कितनी सच्चाई है और कथित सॉल्वर नेटवर्क का दायरा कितना बड़ा था.
रांची। झारखंड में JPSC और JSSC की विवादित परीक्षाओं को रद्द करने के सरकार के फैसले के बाद आंदोलनकारी छात्रों ने अनशन खत्म कर दिया। मंगलवार देर रात राज्य सरकार की मंत्री दीपिका पांडेय सिंह और इरफान अंसारी विधायक जयराम महतो के साथ रांची सदर अस्पताल पहुंचे। यहां ICU-HDU वार्ड में भर्ती छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो, हबीबा और राहुल क्रांतिकारी को जूस पिलाकर उनका अनशन समाप्त कराया गया। 15 दिन से भूख हड़ताल पर थीं हबीबा बोकारो के कसमार की रहने वाली हबीबा पिछले 15 दिनों से भूख हड़ताल पर थीं। लगातार अनशन के कारण उन्हें रांची सदर अस्पताल के ICU-HDU वार्ड में भर्ती कराया गया था। सरकार की ओर से छात्रों की प्रमुख मांगें मानने की जानकारी मिलने के बाद हबीबा भावुक हो गईं। सोशल मीडिया पर सरकार के फैसले की खबर देखने के बाद उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े। उन्होंने अपने भाई और सहयोगियों के साथ बनाए गए वीडियो में कहा कि ये खुशी के आंसू हैं। 'मां ने कहा था लड़ाई जीतकर ही घर आना' हबीबा ने अपनी मां की कही बात को याद करते हुए कहा कि उनकी मां ने उनसे कहा था कि लड़ाई जीतकर ही घर लौटना। उन्होंने कहा कि आमतौर पर मां अपने बच्चों से ऐसी बात नहीं कहतीं, लेकिन उनकी मां ने उन्हें यही हौसला दिया था। सरकार द्वारा JPSC के साथ-साथ JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने की घोषणा के बाद हबीबा ने कहा कि अब उन्हें महसूस हो रहा है कि वह अपनी लड़ाई जीतकर ही घर लौटेंगी। मंत्रियों ने कराया अनशन समाप्त सरकार की ओर से छात्रों की मांगों पर बड़ा फैसला लिए जाने के बाद मंत्री दीपिका पांडेय सिंह और इरफान अंसारी अस्पताल पहुंचे। विधायक जयराम महतो भी उनके साथ मौजूद रहे। तीनों नेताओं ने अनशनकारी छात्रों से मुलाकात की और उन्हें जूस पिलाकर अनशन समाप्त कराया। इस दौरान अस्पताल में आंदोलन से जुड़े अन्य छात्र और समर्थक भी मौजूद रहे। सरकार ने रद्द की कई भर्ती परीक्षाएं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की विशेष बैठक में JSSC-CGL के साथ 14वीं JPSC PT और अन्य विवादित परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला लिया गया। सरकार ने TDPL द्वारा आयोजित कई परीक्षाओं को भी रद्द करने की घोषणा की है। इसके अलावा सरकार ने 2014 से अब तक आयोजित भर्ती परीक्षाओं की जांच कराने और JPSC-JSSC की परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए रिफॉर्म कमेटी के गठन की बात कही है। सरकार के इस फैसले के बाद लंबे समय से चल रहे छात्र आंदोलन में बड़ा मोड़ आया है। अनशन समाप्त होने के बाद अब छात्रों की नजर सरकार द्वारा किए गए फैसलों के क्रियान्वयन और आगे की जांच प्रक्रिया पर है।