नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने देशभर के शिक्षकों से अपील की है कि वे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में संभावित दिव्यांगता और विशेष जरूरतों की पहचान के लिए 'प्रशस्त' (PRASHAST) ऐप का इस्तेमाल करें। उन्होंने कहा कि समय रहते बच्चों की जरूरतों को पहचानने से उन्हें बेहतर शिक्षा, सहायता और समान अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं। शिक्षकों की भूमिका को बताया महत्वपूर्ण धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि शिक्षक बच्चों के व्यवहार, सीखने की क्षमता और शारीरिक गतिविधियों को सबसे करीब से देखते हैं। इसलिए वे प्रारंभिक स्तर पर किसी भी तरह की सीखने संबंधी कठिनाई या दिव्यांगता के संकेतों को पहचानने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने शिक्षकों से अपील की कि वे प्रशस्त ऐप के माध्यम से बच्चों की स्क्रीनिंग करें और जरूरत पड़ने पर उन्हें उचित विशेषज्ञ सहायता से जोड़ें। क्या है प्रशस्त ऐप 'प्रशस्त' ऐप शिक्षा मंत्रालय की ओर से शुरू किया गया एक डिजिटल टूल है, जिसका उद्देश्य स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में दिव्यांगता की प्रारंभिक पहचान करना है। इसके माध्यम से शिक्षक बच्चों में विभिन्न प्रकार की विशेष जरूरतों के संकेतों को दर्ज कर सकते हैं और आगे की सहायता के लिए जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं। यह ऐप समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। दिव्यांग बच्चों को बेहतर शिक्षा देने पर जोर शिक्षा मंत्री ने कहा कि हर बच्चे को उसकी क्षमता के अनुसार सीखने का अवसर मिलना चाहिए। दिव्यांग बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ समान शिक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराने के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक पहचान होने से बच्चों को सही समय पर विशेष प्रशिक्षण, सहायक उपकरण और आवश्यक शैक्षणिक सहयोग मिल सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्ष्यों से जुड़ा कदम प्रशस्त ऐप का उपयोग राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत समावेशी और समान शिक्षा के लक्ष्य को आगे बढ़ाने की दिशा में देखा जा रहा है। सरकार का उद्देश्य है कि कोई भी बच्चा केवल किसी शारीरिक या सीखने संबंधी कठिनाई के कारण शिक्षा से पीछे न रह जाए। स्कूलों में डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल पर जोर धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि शिक्षा क्षेत्र में डिजिटल तकनीक का उपयोग लगातार बढ़ाया जा रहा है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, ऐप और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित समाधान शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी और बच्चों के अनुकूल बनाने में मदद कर रहे हैं। उन्होंने शिक्षकों से तकनीक का उपयोग कर बच्चों की जरूरतों को समझने और उन्हें बेहतर शैक्षणिक माहौल देने की अपील की।
मेडिकल प्रवेश परीक्षा में धोखाधड़ी रोकने के लिए सरकार का सख्त कदम राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) 2026 से जुड़े कथित पेपर लीक और नकल रैकेट पर कार्रवाई करते हुए केंद्र सरकार ने मैसेजिंग प्लेटफॉर्म Telegram की सेवाओं पर अस्थायी रोक लगा दी है। सरकार के अनुसार यह प्रतिबंध 22 जून 2026 तक प्रभावी रहेगा। शिक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को बताया कि Telegram का इस्तेमाल संगठित गिरोहों द्वारा मेडिकल प्रवेश परीक्षा के उम्मीदवारों को धोखा देने और परीक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी फैलाने के लिए किया जा रहा था। इसी वजह से यह फैसला लिया गया है। आईटी कानून के तहत जारी हुआ आदेश सरकार ने Telegram पर यह प्रतिबंध सूचना प्रौद्योगिकी (IT) कानून के एक विशेष प्रावधान के तहत लगाया है। यह प्रावधान देश की संप्रभुता, अखंडता और सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पहुंच सीमित करने की अनुमति देता है। सरकारी बयान के मुताबिक यह कदम सीमित अवधि और विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखकर उठाया गया है। NEET 2026 पेपर लीक के बाद बढ़ी सख्ती पिछले महीने NEET 2026 परीक्षा को रद्द कर दिया गया था, जब जांच एजेंसियों को प्रश्नपत्र लीक होने के संकेत मिले थे। इस घटना के बाद देशभर में छात्रों के विरोध प्रदर्शन देखने को मिले। अब सरकार ने 21 जून 2026 को पुनर्परीक्षा आयोजित करने का फैसला किया है। अधिकारियों का कहना है कि परीक्षा की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। NTA ने बताया क्यों उठाना पड़ा यह कदम शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाली National Testing Agency (NTA) ने कहा कि Telegram का उपयोग कुछ संगठित नकल गिरोहों द्वारा NEET पुनर्परीक्षा के अभ्यर्थियों को गुमराह करने और धोखाधड़ी के लिए किया जा रहा था। एजेंसी के अनुसार, प्लेटफॉर्म से आपत्तिजनक सामग्री हटाने के लिए पहले भी प्रयास किए गए थे, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। इसके बाद अस्थायी प्रतिबंध को "अंतिम विकल्प" के रूप में लागू किया गया। लाखों उपयोगकर्ताओं पर पड़ेगा असर भारत Telegram का सबसे बड़ा बाजार माना जाता है और यहां करोड़ों लोग इस ऐप का उपयोग करते हैं। शिक्षा, व्यवसाय, समाचार, ऑनलाइन समुदाय और व्यक्तिगत संचार के लिए Telegram व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। सरकार ने स्वीकार किया है कि इस कदम से बड़ी संख्या में उपयोगकर्ताओं को असुविधा होगी, लेकिन परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह फैसला जरूरी बताया गया है। टेलीकॉम और टेक कंपनियों की प्रतिक्रिया का इंतजार फिलहाल प्रमुख दूरसंचार कंपनियों और टेक प्लेटफॉर्म्स की ओर से इस फैसले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। देश की प्रमुख टेलीकॉम कंपनियां जैसे Reliance Jio, Bharti Airtel और Vodafone Idea (Vi) इस आदेश को लागू करने की प्रक्रिया में हैं या नहीं, इस पर भी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। वहीं Google Play Store और Apple App Store की ओर से भी फिलहाल कोई बयान जारी नहीं किया गया है। 21 जून की परीक्षा पर टिकी निगाहें अब छात्रों और अभिभावकों की नजर 21 जून को होने वाली NEET पुनर्परीक्षा पर है। सरकार का कहना है कि परीक्षा को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं। Telegram पर लगाया गया यह अस्थायी प्रतिबंध हाल के वर्षों में किसी बड़े मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के खिलाफ उठाए गए सबसे सख्त कदमों में से एक माना जा रहा है।
नई दिल्ली: परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने केंद्र सरकार के खिलाफ अपना विरोध और तेज कर दिया है। संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए 13 जून तक का अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समय सीमा तक कोई कार्रवाई नहीं हुई तो देशभर में चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा। परीक्षाओं में गड़बड़ी का लगाया आरोप बुधवार को मीडिया से बातचीत के दौरान अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया कि नीट (NEET), सीबीएसई (CBSE) और सीयूईटी (CUET) जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में सामने आई कथित गड़बड़ियों ने लाखों छात्रों को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि छात्रों के भविष्य से जुड़े मामलों में जवाबदेही तय होना आवश्यक है और सरकार को इस मुद्दे को गंभीरता से लेना चाहिए। दीपके ने कहा कि युवा वर्ग अब अपनी समस्याओं को लेकर मुखर हो रहा है और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता तथा जवाबदेही की मांग कर रहा है। 13 जून तक का समय, फिर शुरू होगा आंदोलन सीजेपी के अनुसार, केंद्रीय शिक्षा मंत्री को 13 जून तक इस्तीफा देने का समय दिया गया है। मांग पूरी नहीं होने की स्थिति में संगठन देशभर में विरोध-प्रदर्शन शुरू करेगा। दीपके ने बताया कि आंदोलन की शुरुआत पुणे से की जाएगी, जहां 11 जून को शाम चार बजे शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा। इसके बाद लखनऊ, अमृतसर, जयपुर, बेंगलुरु सहित कई प्रमुख शहरों में विरोध कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है। 20 जून को दिल्ली कूच की तैयारी संगठन ने 20 जून को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बड़े प्रदर्शन की भी घोषणा की है। अभिजीत दीपके ने कहा कि यदि सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देती है तो देशभर से छात्र और युवा दिल्ली पहुंचकर प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने दावा किया कि वह स्वयं इस अभियान का नेतृत्व करेंगे और छात्रों से बड़ी संख्या में इसमें शामिल होने की अपील करेंगे। "एक करोड़ से अधिक छात्र प्रभावित" अभिजीत दीपके ने दावा किया कि विभिन्न प्रतियोगी और प्रवेश परीक्षाओं में सामने आई समस्याओं के कारण एक करोड़ से अधिक छात्र प्रभावित हुए हैं। उन्होंने कहा कि कई छात्र मानसिक तनाव और अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं। उनके मुताबिक, छात्रों के हितों की रक्षा के लिए जवाबदेही तय करना जरूरी है और संबंधित अधिकारियों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। जंतर-मंतर प्रदर्शन का भी किया जिक्र सीजेपी संस्थापक ने बताया कि 6 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था, जहां शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई गई थी। उन्होंने कहा कि छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा और प्रभावी समाधान की आवश्यकता है। फिलहाल केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से इस अल्टीमेटम और आंदोलन की घोषणा पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, संगठन ने संकेत दिया है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।
सीबीएसई और नीट परीक्षा से जुड़े विवाद को लेकर राजनीति गरमा गई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। दोनों नेताओं ने एक-दूसरे पर तीखे आरोप लगाए हैं और परीक्षा प्रणाली में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठाये हैं। राहुल गांधी ने शिक्षा मंत्रालय पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ किया गया है, जबकि केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पलटवार करते हुए राहुल गांधी को चुनावी हार से हताश बताया। धर्मेंद्र प्रधान ने कहा- राहुल गांधी की मानसिक स्थिति ठीक नहीं लगती केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मीडिया से बातचीत के दौरान राहुल गांधी के आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि CBSE ने पहले ही इस मामले पर अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है और सभी प्रक्रियाएं भारत सरकार की खरीद नीति के अनुसार पूरी की गई हैं। उन्होंने कहा कि अगर किसी भी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है, तो दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। राहुल गांधी पर हमला करते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, “लगातार चुनावी हार के कारण राहुल गांधी हताश नजर आते हैं। उन्होंने SIR का विरोध किया, EVM का विरोध किया और डिजिटल इंडिया का भी विरोध किया। ऐसा लगता है कि वे भारत की वैज्ञानिक प्रगति के साथ खड़े नहीं हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि राहुल गांधी की बयानबाजी राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित लगती है। ‘यह राजनीति करने का समय नहीं’, शिक्षा मंत्री की अपील धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि परीक्षा से जुड़े विवाद के कारण छात्रों और अभिभावकों में पहले से ही तनाव है और इस समय राजनीति करने से स्थिति और खराब हो सकती है। उन्होंने कहा, “सरकार की ओर से यदि किसी प्रकार की असुविधा हुई है, तो मैं स्वयं उसकी जिम्मेदारी लेता हूं। लेकिन अभी सबसे जरूरी बात यह है कि छात्रों का मानसिक तनाव और न बढ़े।” केंद्रीय मंत्री ने सभी राजनीतिक दलों और नेताओं से अपील की कि वे ऐसे बयान देने से बचें, जिससे छात्रों की चिंता और बढ़े। राहुल गांधी ने उठाये CBSE कॉन्ट्रैक्ट और कंपनी चयन पर सवाल राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शिक्षा मंत्री पर पलटवार करते हुए कहा कि व्यक्तिगत हमला करने से सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। उन्होंने लिखा, “धर्मेंद्र प्रधान जी, आप मुझ पर जितना चाहें हमला कर सकते हैं, लेकिन इससे आप अपने अपराधों से बरी नहीं होंगे और न ही यह मुझे 18.5 लाख बच्चों के लिए जवाब मांगने से रोक पाएगा।” राहुल गांधी ने CBSE के OSM कॉन्ट्रैक्ट को लेकर भी सवाल उठाये। उन्होंने पूछा कि यह कॉन्ट्रैक्ट COEMPT नाम की कंपनी को क्यों दिया गया, जबकि उसी कंपनी का पुराना नाम Globarena पहले से विवादों में रहा है। उन्होंने सवाल किया कि इस कंपनी का चयन किसके आदेश पर किया गया, बैकग्राउंड जांच क्यों नहीं हुई और कंपनी के प्रबंधन तथा केंद्र सरकार के बीच क्या संबंध हैं। राहुल गांधी बोले- दोनों ही स्थिति में सरकार जिम्मेदार राहुल गांधी ने कहा कि यदि सरकार ने बैकग्राउंड जांच की थी और फिर भी कंपनी को काम दिया गया, तो यह गंभीर लापरवाही है। वहीं अगर जांच नहीं की गई, तो यह और भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों ही परिस्थितियों में सरकार जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि अगर सरकार को वास्तव में छात्रों की चिंता होती, तो इतने बड़े विवाद के बाद शिक्षा मंत्री को बहुत पहले ही पद से हटा दिया गया होता। परीक्षा विवाद पर बढ़ी राजनीतिक गर्मी CBSE और NEET से जुड़े विवाद पहले ही राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने हुए हैं। ऐसे में राहुल गांधी और धर्मेंद्र प्रधान के बीच बढ़ती बयानबाजी ने इस मुद्दे को और राजनीतिक बना दिया है। एक तरफ विपक्ष परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और छात्रों के भविष्य को लेकर सवाल उठा रहा है, वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि वह किसी भी अनियमितता को गंभीरता से ले रही है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।