पटना, एजेंसियां। बिहार की राजधानी पटना के ज्ञान भवन में 19 अगस्त से पांच दिवसीय मेगा जॉब फेयर शुरू हो गया है। इस रोजगार मेले में 20 हजार से अधिक युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं, बीमा, रिटेल समेत कई क्षेत्रों की कंपनियां युवाओं की भर्ती करेंगी। 50 से ज्यादा कंपनियां ले रहीं हिस्सा रोजगार मेले में 50 से अधिक बड़ी कंपनियों के शामिल होने की जानकारी सामने आई है। इनमें बैंकिंग, रिटेल, ई-कॉमर्स, वित्तीय सेवाओं और अन्य निजी क्षेत्रों की कंपनियां शामिल हैं। अलग-अलग शैक्षणिक योग्यता और कौशल रखने वाले युवाओं के लिए विभिन्न पदों पर अवसर उपलब्ध हैं। 23 अगस्त तक चलेगा रोजगार मेला यह मेगा जॉब फेयर 19 से 23 अगस्त 2026 तक पटना के ज्ञान भवन में आयोजित किया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, मेले के जरिए कंपनियों और नौकरी तलाश रहे युवाओं को एक ही मंच पर लाने की कोशिश की जा रही है। पंजीकरण के बाद ही मिलेगा प्रवेश रोजगार मेले में शामिल होने के लिए उम्मीदवारों का ऑनलाइन पंजीकरण जरूरी बताया गया है। अभ्यर्थियों को अपना रिज्यूमे, शैक्षणिक प्रमाण-पत्र, पहचान पत्र और अन्य जरूरी दस्तावेज साथ लेकर जाने की सलाह दी गई है। पंजीकरण और रोजगार मेले से जुड़ी जानकारी बिहार के रोजगार पोर्टल के माध्यम से उपलब्ध कराई जा रही है। युवाओं के लिए रोजगार का बड़ा अवसर बिहार सरकार और बिहार कौशल विकास मिशन की इस पहल का उद्देश्य युवाओं को निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है। मेले में कंपनियां उम्मीदवारों की योग्यता और अपनी जरूरत के अनुसार चयन करेंगी। 20 हजार से अधिक संभावित रोजगार अवसर इसे बिहार के युवाओं के लिए इस साल के बड़े रोजगार आयोजनों में से एक बनाते हैं।
भारत में उच्च शिक्षा और रोजगार को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। देश के कई प्रमुख अर्थशास्त्रियों और नीति सलाहकारों ने पारंपरिक कॉलेज शिक्षा की उपयोगिता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बदलते दौर में केवल डिग्री हासिल करना सफलता की गारंटी नहीं है, बल्कि व्यावहारिक कौशल और रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण अधिक महत्वपूर्ण बन चुके हैं। दूसरी ओर सरकार 2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (GER) को 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। ऐसे में लाखों छात्रों और अभिभावकों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि भविष्य के लिए सही रास्ता क्या है। डिग्री बनाम स्किल की बहस क्यों तेज हुई? हाल के दिनों में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल, भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन और निवेश विशेषज्ञ सौरभ मुखर्जी ने कॉलेज शिक्षा के पारंपरिक मॉडल पर सवाल उठाए हैं। इनका मानना है कि आज इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण ज्ञान आसानी से उपलब्ध है। ऐसे में यदि कोई युवा कम उम्र से ही किसी कौशल में दक्षता हासिल कर ले और साथ-साथ पढ़ाई जारी रखे, तो उसके लिए रोजगार और आय के बेहतर अवसर बन सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि देश को केवल डिग्रीधारी युवाओं की नहीं, बल्कि कुशल वेल्डर, इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, मशीन ऑपरेटर, टेक्नीशियन और डिजिटल स्किल्स वाले प्रोफेशनल्स की भी बड़ी आवश्यकता है। बेरोजगारी के आंकड़े बढ़ा रहे चिंता भारत हर वर्ष करोड़ों युवाओं को उच्च शिक्षा प्रणाली से जोड़ रहा है, लेकिन रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ रहे हैं। उपलब्ध सरकारी और श्रम बाजार से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी दर अब भी काफी अधिक है। विशेष रूप से 15 से 25 वर्ष आयु वर्ग के स्नातक युवाओं में रोजगार प्राप्त करने की चुनौती गंभीर बनी हुई है। आईटी सेक्टर समेत कई बड़े उद्योगों में हाल के वर्षों में कर्मचारियों की संख्या कम होने और ऑटोमेशन तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव ने भी पारंपरिक नौकरियों पर दबाव बढ़ाया है। सरकार का लक्ष्य और विशेषज्ञों की राय में विरोधाभास एक ओर कई विशेषज्ञ युवाओं को स्किल आधारित शिक्षा अपनाने की सलाह दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत सरकार 2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात को लगभग 50 प्रतिशत तक ले जाना चाहती है। यानी नीति का उद्देश्य अधिक से अधिक छात्रों को कॉलेज और विश्वविद्यालयों तक पहुंचाना है, जबकि कई विशेषज्ञ रोजगार के लिहाज से कौशल विकास को अधिक प्रभावी मान रहे हैं। यही विरोधाभास इस पूरी बहस को और गंभीर बना रहा है। केवल डिग्री अब नौकरी की गारंटी नहीं रोजगार बाजार में अब कंपनियां केवल शैक्षणिक प्रमाणपत्र नहीं देख रहीं, बल्कि उम्मीदवार के वास्तविक कौशल, प्रोजेक्ट अनुभव और पोर्टफोलियो को भी महत्व दे रही हैं। विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स, साइबर सिक्योरिटी, क्लाउड कंप्यूटिंग, डिजिटल मार्केटिंग और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में छोटे अवधि के प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम और व्यावहारिक अनुभव तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। कई कंपनियां अब उम्मीदवार की समस्या समाधान क्षमता, तकनीकी दक्षता और वास्तविक कार्य अनुभव को प्राथमिकता दे रही हैं। क्या कॉलेज की पढ़ाई अब जरूरी नहीं? विशेषज्ञों का मानना है कि इसका उत्तर सभी के लिए एक जैसा नहीं हो सकता। डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, चार्टर्ड अकाउंटेंट और कई अन्य पेशों में आज भी औपचारिक डिग्री अनिवार्य है। वहीं कुछ क्षेत्रों में कॉलेज की डिग्री शुरुआती भर्ती प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हालांकि, केवल डिग्री लेकर रोजगार मिलने की पुरानी धारणा अब तेजी से बदल रही है। आज के प्रतिस्पर्धी दौर में डिग्री के साथ-साथ व्यवहारिक कौशल, इंटर्नशिप, इंडस्ट्री सर्टिफिकेशन और मजबूत पोर्टफोलियो सफलता के प्रमुख आधार बन चुके हैं। युवाओं के लिए क्या है सही रास्ता? करियर विशेषज्ञों का मानना है कि छात्रों को अपनी रुचि, करियर लक्ष्य और चुने गए क्षेत्र की जरूरतों के अनुसार निर्णय लेना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में प्रोफेशनल डिग्री अनिवार्य है, तो उच्च शिक्षा जरूरी होगी। वहीं डिजिटल, तकनीकी और स्किल आधारित क्षेत्रों में डिग्री के साथ व्यावहारिक अनुभव और प्रमाणित कौशल भविष्य में अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकते हैं। आज का रोजगार बाजार केवल यह नहीं पूछता कि आपने क्या पढ़ा है, बल्कि यह भी देखता है कि आप वास्तव में क्या कर सकते हैं। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में शिक्षा और कौशल दोनों का संतुलित संयोजन सबसे मजबूत करियर विकल्प माना जा रहा है।
नई दिल्ली: भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है, लेकिन आज भी बड़ी संख्या में युवाओं के पास औपचारिक कौशल प्रशिक्षण (स्किल ट्रेनिंग) की कमी है। बदलती तकनीक, ऑटोमेशन और आधुनिक उद्योगों की जरूरतों को देखते हुए अब स्किल डेवलपमेंट (कौशल विकास) रोजगार और स्वरोजगार की सबसे बड़ी कुंजी बनता जा रहा है। इसी दिशा में सरकार के साथ-साथ निजी कंपनियां भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। वेदांता समूह का दावा है कि उसने पिछले छह वर्षों में अपनी विभिन्न कौशल विकास पहलों के जरिए 20 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण देकर रोजगार और बेहतर आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने में मदद की है। क्यों जरूरी है स्किल डेवलपमेंट? भारत में युवाओं की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है, लेकिन प्रशिक्षित कार्यबल (Skilled Workforce) का प्रतिशत अभी भी कई विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। ऐसे में उद्योगों की बदलती जरूरतों के अनुसार युवाओं को प्रशिक्षित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। कौशल प्रशिक्षण से न केवल नौकरी पाने की संभावना बढ़ती है, बल्कि युवाओं को स्वरोजगार और उद्यमिता के नए अवसर भी मिलते हैं। सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर कर रहे काम कौशल विकास को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार कई योजनाएं चला रही है, जिनमें निजी क्षेत्र की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है। वेदांता समूह विभिन्न सरकारी और संस्थागत कार्यक्रमों के साथ मिलकर युवाओं को उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षण दे रहा है। कंपनी जिन प्रमुख योजनाओं से जुड़ी है, उनमें शामिल हैं— प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) पीएम विश्वकर्मा योजना NABARD से जुड़े कौशल कार्यक्रम Skill India Impact Bond (SIIB) मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना (MMKVY) Odisha Skill Development Authority (OSDA) की योजनाएं इन कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण, रोजगार योग्य कौशल और उद्यमिता से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। छह साल में 20 लाख लोगों को मिला प्रशिक्षण वेदांता समूह के अनुसार, पिछले छह वर्षों में उसकी कौशल विकास पहल से करीब 20 लाख लोग लाभान्वित हुए हैं। कंपनी का कहना है कि उसका उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर आजीविका के अवसर बढ़ाना और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना भी है। कई देशों में संचालित हो रहे कार्यक्रम वेदांता समूह मेटल, ऑयल एंड गैस, मिनरल्स, एनर्जी और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में काम करता है। भारत के अलावा कंपनी दक्षिण अफ्रीका, लाइबेरिया और नामीबिया जैसे देशों में भी अपनी उपस्थिति रखती है। कंपनी का कहना है कि वह भविष्य की जरूरतों के अनुरूप कुशल कार्यबल तैयार करने और सभी के लिए समान अवसर उपलब्ध कराने के अपने लक्ष्य पर लगातार काम कर रही है। भविष्य की अर्थव्यवस्था में बढ़ेगी स्किल की अहमियत विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और नई तकनीकों के विस्तार के साथ कौशल आधारित रोजगार की मांग तेजी से बढ़ेगी। ऐसे में स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम युवाओं के लिए बेहतर करियर, स्थायी रोजगार और स्वरोजगार के नए रास्ते खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
नई दिल्ली: कांग्रेस नेता उदित राज ने प्रधानमंत्री Narendra Modi के लंबे कार्यकाल और केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर तीखी आलोचना की है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विकास और अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़ों को लेकर भ्रामक तस्वीर पेश कर रही है तथा वास्तविक मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। उदित राज ने कहा कि किसी भी सरकार का मूल्यांकन उसके कार्यकाल की अवधि से नहीं, बल्कि रोजगार सृजन, महंगाई नियंत्रण, प्रति व्यक्ति आय और आर्थिक अवसरों में सुधार जैसे मानकों से किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, जनता इन मुद्दों पर जवाब चाहती है। GDP आंकड़ों को लेकर सरकार पर निशाना कांग्रेस नेता ने आर्थिक आंकड़ों और विकास दर को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि सरकार अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है और आर्थिक स्थिति की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं रखती। उदित राज ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि आर्थिक आंकड़ों की विश्वसनीयता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार आलोचनाओं का जवाब देने के बजाय राजनीतिक मुद्दों को अधिक प्रमुखता देती है। रोजगार और महंगाई को बताया बड़ा मुद्दा कांग्रेस नेता ने कहा कि देश के सामने रोजगार, महंगाई, उत्पादन, निर्यात-आयात और बढ़ते कर्ज जैसे मुद्दे सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। उनके अनुसार, इन विषयों पर व्यापक बहस और ठोस नीतिगत कदमों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि किसी भी अर्थव्यवस्था का आकलन जाति, धर्म या राजनीतिक नारों के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक संकेतकों और आम नागरिक के जीवन स्तर में सुधार के आधार पर किया जाना चाहिए। लंबे कार्यकाल पर भी उठाए सवाल उदित राज ने कहा कि लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकार से लोगों की अपेक्षाएं अधिक होती हैं। उनके अनुसार, ऐसे कार्यकाल का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि रोजगार के अवसर कितने बढ़े, महंगाई पर कितना नियंत्रण हुआ और आम लोगों की आय में कितना सुधार आया। फिलहाल कांग्रेस और भाजपा के बीच अर्थव्यवस्था, विकास दर और रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज बनी हुई है। सत्तारूढ़ पक्ष जहां अपनी आर्थिक उपलब्धियों को रेखांकित कर रहा है, वहीं विपक्ष सरकार के दावों पर लगातार सवाल उठा रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।