NAAC Ranking for College Admission: 12वीं या ग्रेजुएशन के बाद कॉलेज चुनना हर छात्र के लिए एक बड़ा फैसला होता है। कई बार छात्र केवल आकर्षक कैंपस, सोशल मीडिया प्रचार या विज्ञापनों को देखकर एडमिशन ले लेते हैं, लेकिन बाद में उन्हें पढ़ाई की गुणवत्ता, प्लेसमेंट और डिग्री की मान्यता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में किसी भी कॉलेज या यूनिवर्सिटी की वास्तविक गुणवत्ता जानने का सबसे भरोसेमंद तरीका उसकी NAAC (National Assessment and Accreditation Council) ग्रेडिंग देखना है। NAAC की रेटिंग संस्थान की शिक्षा, रिसर्च, फैकल्टी, इंफ्रास्ट्रक्चर और छात्र सुविधाओं का समग्र मूल्यांकन करती है। इसलिए एडमिशन लेने से पहले NAAC ग्रेड जरूर जांचना चाहिए। NAAC क्या है? NAAC (National Assessment and Accreditation Council) की स्थापना वर्ष 1994 में University Grants Commission (UGC) द्वारा की गई थी। इसका मुख्यालय बेंगलुरु में है। यह संस्था देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का मूल्यांकन करके उनकी गुणवत्ता के आधार पर ग्रेड प्रदान करती है। NAAC किन आधारों पर कॉलेज का मूल्यांकन करता है? NAAC सात प्रमुख मानकों के आधार पर संस्थानों का मूल्यांकन करता है— शिक्षण और पाठ्यक्रम (Curriculum & Teaching) फैकल्टी की गुणवत्ता रिसर्च और इनोवेशन इंफ्रास्ट्रक्चर और लाइब्रेरी छात्र सहायता और गतिविधियां प्रशासन और नेतृत्व संस्थागत मूल्य एवं सर्वोत्तम प्रथाएं NAAC ग्रेड का क्या मतलब होता है? NAAC Grade CGPA गुणवत्ता स्तर A++ 3.51–4.00 उत्कृष्ट (Outstanding) A+ 3.26–3.50 बहुत अच्छा A 3.01–3.25 अच्छा B++ 2.76–3.00 संतोषजनक B+ / B 2.01–2.75 औसत C 1.51–2.00 न्यूनतम मानक Not Accredited 1.51 से कम मान्यता नहीं एडमिशन से पहले NAAC ग्रेड देखना क्यों जरूरी है? बेहतर डिग्री की मान्यता: अच्छी NAAC ग्रेड वाले संस्थानों की डिग्री को देश और विदेश में अधिक महत्व मिलता है। बेहतर प्लेसमेंट: बड़ी कंपनियां अक्सर अच्छी NAAC ग्रेड वाले कॉलेजों में कैंपस प्लेसमेंट के लिए प्राथमिकता देती हैं। स्कॉलरशिप और एजुकेशन लोन: कई सरकारी योजनाओं और बैंकों में अच्छी ग्रेड वाले संस्थानों के छात्रों को लाभ मिलने की संभावना अधिक होती है। बेहतर फैकल्टी और सुविधाएं: उच्च NAAC ग्रेड वाले कॉलेजों में आधुनिक लैब, लाइब्रेरी, अनुभवी शिक्षक और बेहतर अकादमिक माहौल मिलने की संभावना अधिक रहती है। किसी कॉलेज की NAAC ग्रेड कैसे चेक करें? आप आधिकारिक NAAC वेबसाइट पर जाकर किसी भी कॉलेज या विश्वविद्यालय की मान्यता और ग्रेड आसानी से देख सकते हैं। Official Website: https://www.naac.gov.in NAAC ग्रेड चेक करने के आसान स्टेप्स NAAC की आधिकारिक वेबसाइट www.naac.gov.in खोलें। होमपेज पर "Accredited Institutions" या "Search Accredited Institutions" विकल्प चुनें। कॉलेज या यूनिवर्सिटी का नाम, राज्य या संस्थान का प्रकार दर्ज करें। सर्च रिजल्ट में संबंधित संस्थान चुनें। वहां आपको संस्थान का NAAC Grade, CGPA, Accreditation Status और Validity दिखाई देगी। चाहें तो पूरी Accreditation Report भी डाउनलोड कर सकते हैं। एडमिशन से पहले किन बातों की जांच जरूर करें? NAAC Grade UGC मान्यता NIRF Ranking Placement Record Faculty Profile Infrastructure Course Approval Alumni Reviews ध्यान रखें: केवल विज्ञापन या शानदार कैंपस देखकर एडमिशन लेने के बजाय हमेशा NAAC ग्रेड, UGC मान्यता और प्लेसमेंट रिकॉर्ड की जांच करें। सही जानकारी के आधार पर लिया गया फैसला आपके करियर और भविष्य को बेहतर दिशा दे सकता है।
IIT Dhanbad Assistant Professor Vacancy 2026: प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) धनबाद ने असिस्टेंट प्रोफेसर (ग्रेड-I और ग्रेड-II) के पदों पर भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। इस भर्ती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि UGC NET या CSIR NET पास होना अनिवार्य नहीं है। योग्य अभ्यर्थी 31 अगस्त 2026 तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। यह भर्ती उन उम्मीदवारों के लिए बेहतरीन अवसर है जो उच्च शिक्षा संस्थानों में अध्यापन और शोध के क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं। 30 पदों पर होगी भर्ती आईआईटी धनबाद इस भर्ती अभियान के तहत कुल 30 असिस्टेंट प्रोफेसर पदों को भरेगा। चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति ग्रेड-I और ग्रेड-II के पदों पर संस्थान की आवश्यकता और पात्रता के अनुसार की जाएगी। किन-किन विभागों में निकली हैं वैकेंसी? भर्ती संस्थान के विभिन्न शैक्षणिक विभागों के लिए की जा रही है। इनमें प्रमुख विभाग शामिल हैं— अप्लायड जियोलॉजी अप्लायड जियोफिजिक्स केमिकल इंजीनियरिंग केमिस्ट्री एंड केमिकल बायोलॉजी सिविल इंजीनियरिंग कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग एनवायरमेंट साइंस एंड इंजीनियरिंग फ्यूल, मिनरल्स एंड मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंस मैनेजमेंट स्टडीज एंड इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग माइनिंग इंजीनियरिंग पेट्रोलियम इंजीनियरिंग फिजिक्स अन्य संबंधित विभाग आवेदन की अंतिम तिथि इच्छुक और योग्य उम्मीदवार 31 अगस्त 2026 तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आवेदन निर्धारित समय सीमा के भीतर ही स्वीकार किए जाएंगे। शैक्षणिक योग्यता अभ्यर्थी के पास संबंधित विषय में प्रथम श्रेणी के साथ पीएचडी अथवा समकक्ष शैक्षणिक योग्यता होनी चाहिए। साथ ही उम्मीदवार का अकादमिक रिकॉर्ड भी उत्कृष्ट होना चाहिए। अनुभव की शर्त असिस्टेंट प्रोफेसर ग्रेड-II: पीएचडी के बाद तीन वर्ष से कम का शिक्षण, शोध या औद्योगिक अनुभव रखने वाले उम्मीदवार आवेदन कर सकते हैं। असिस्टेंट प्रोफेसर ग्रेड-I: पीएचडी के बाद कम से कम तीन वर्ष का प्रासंगिक अनुभव आवश्यक है। NET अनिवार्य नहीं इस भर्ती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि UGC NET या CSIR NET की अनिवार्यता नहीं रखी गई है। यदि उम्मीदवार निर्धारित शैक्षणिक योग्यता और अनुभव की शर्तें पूरी करते हैं, तो वे आवेदन के पात्र हैं। आयु सीमा आवेदक की अधिकतम आयु 35 वर्ष निर्धारित की गई है। आरक्षित वर्गों (OBC, SC, ST एवं PwD) को सरकारी नियमों के अनुसार आयु में छूट मिलेगी। वेतन और सुविधाएं चयनित उम्मीदवारों को सातवें वेतन आयोग के अनुसार आकर्षक वेतन मिलेगा। असिस्टेंट प्रोफेसर ग्रेड-II: बेसिक वेतन ₹70,900 से शुरू होगा। भत्तों सहित मासिक वेतन लगभग ₹1,49,262 तक हो सकता है। असिस्टेंट प्रोफेसर ग्रेड-I: भत्तों सहित मासिक वेतन लगभग ₹2,11,196 तक पहुंच सकता है। इसके अलावा चयनित फैकल्टी को मेडिकल सुविधा, हाउस रेंट अलाउंस (HRA), महंगाई भत्ता (DA), ट्रांसपोर्ट अलाउंस, रिसर्च सपोर्ट ग्रांट, फैकल्टी डेवलपमेंट अलाउंस, टेलीफोन बिल प्रतिपूर्ति और बच्चों की शिक्षा से जुड़ी सुविधाएं भी प्रदान की जाएंगी। आवेदन शुल्क इस भर्ती के लिए कोई आवेदन शुल्क नहीं रखा गया है। सभी पात्र उम्मीदवार निशुल्क आवेदन कर सकते हैं। आवेदन कैसे करें? IIT धनबाद के फैकल्टी भर्ती पोर्टल fr.iitism.ac.in पर जाएं। ईमेल आईडी और मोबाइल नंबर से रजिस्ट्रेशन करें। लॉगइन कर आवेदन फॉर्म भरें। आवश्यक शैक्षणिक प्रमाणपत्र, अनुभव प्रमाणपत्र, शोध प्रकाशन, फोटो, हस्ताक्षर और अन्य दस्तावेज अपलोड करें। सभी जानकारी जांचने के बाद आवेदन फॉर्म सबमिट करें। भविष्य के लिए आवेदन का प्रिंटआउट सुरक्षित रखें। भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी आगे की जानकारी और इंटरव्यू संबंधी सूचना उम्मीदवारों को ईमेल के माध्यम से भेजी जाएगी।
रांची। झारखंड के विश्वविद्यालयों में इन दिनों क्लस्टर सिस्टम सबसे बड़ा विवाद बन गया है। नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत लागू इस व्यवस्था को लेकर सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन इसे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में अहम कदम बता रहे हैं, जबकि छात्र संगठन इसे छात्रों के भविष्य और शिक्षा तक आसान पहुंच के लिए बड़ा खतरा मान रहे हैं। राज्य के कई विश्वविद्यालयों में इस मुद्दे को लेकर प्रदर्शन, धरना और तालाबंदी जारी है। क्या है क्लस्टर सिस्टम? क्लस्टर सिस्टम के तहत एक ही विश्वविद्यालय से संबद्ध कई कॉलेजों को एक समूह (क्लस्टर) में बांटा गया है। अब हर कॉलेज में सभी विषयों की पढ़ाई नहीं होगी। किसी कॉलेज को विज्ञान, किसी को कला और किसी को वाणिज्य का केंद्र बनाया गया है। यदि किसी छात्र का पसंदीदा विषय उसके कॉलेज में उपलब्ध नहीं है तो उसे उसी क्लस्टर के दूसरे कॉलेज में जाकर पढ़ाई करनी होगी। सरकार क्यों कर रही है लागू? उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग का कहना है कि कई कॉलेज वर्षों से शिक्षकों की कमी, प्रयोगशालाओं के सीमित उपयोग और संसाधनों के असमान वितरण जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। क्लस्टर सिस्टम के जरिए विषय विशेषज्ञ शिक्षकों, प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों का बेहतर उपयोग होगा तथा कॉलेजों को विषयवार उत्कृष्ट केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकेगा। सरकार के दावे सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था से शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर होगी, शिक्षकों की कमी दूर होगी, संसाधनों का प्रभावी उपयोग होगा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों को लागू करने में मदद मिलेगी। इससे छात्रों को बेहतर शैक्षणिक माहौल मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। छात्र क्यों कर रहे हैं विरोध? छात्र संगठनों का कहना है कि झारखंड की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों में यह व्यवस्था व्यावहारिक नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को अपने विषय की पढ़ाई के लिए दूसरे कॉलेज तक रोजाना लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी, जिससे समय और आर्थिक बोझ दोनों बढ़ेंगे। छात्राओं ने सुरक्षा और परिवहन सुविधाओं की कमी को भी बड़ी चिंता बताया है। सीटों में कटौती से बढ़ी मुश्किल क्लस्टर सिस्टम लागू होने के साथ कई विश्वविद्यालयों में विषयवार सीटों का पुनर्निर्धारण किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में 10 से 40 प्रतिशत तक सीटें घटने का दावा किया जा रहा है, जिससे छात्रों के लिए मनचाहे विषय और कॉलेज में प्रवेश पाना और कठिन हो गया है। डीएसपीएमयू में सबसे ज्यादा विरोध डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (DSPMU) में इस व्यवस्था का सबसे अधिक विरोध देखने को मिल रहा है। यहां कॉमर्स की सीटें 540 से घटाकर 240 और बीबीए की सीटें 700 से घटाकर 180 कर दी गई हैं। वहीं जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के कई विषयों में भी सीटों में उल्लेखनीय कमी की बात सामने आई है, जिसके विरोध में छात्र लगातार आंदोलन कर रहे हैं। दूसरे विश्वविद्यालयों में भी असर रांची विश्वविद्यालय के अलावा बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय, सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, कोल्हान विश्वविद्यालय, विनोबा भावे विश्वविद्यालय और नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय में भी क्लस्टर मॉडल लागू किया जा रहा है। कई कॉलेजों में विषयों का पुनर्गठन होने से छात्रों को दूसरे कॉलेजों में जाकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। विशेषज्ञों ने सुझाया समाधान पूर्व कुलपति प्रो. एस.एन. मुंडा का मानना है कि सरकार और छात्रों के बीच संवाद जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि दूसरे कॉलेज जाने वाले छात्रों के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से पढ़ाई की सुविधा दी जाए, विषय विशेषज्ञों को रोटेशन के आधार पर विभिन्न कॉलेजों में भेजा जाए तथा अधिक मांग वाले विषयों में अतिरिक्त बैच और सीटें बढ़ाई जाएं। विवाद के समाधान पर टिकी नजर शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि क्लस्टर सिस्टम का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाना है, लेकिन इसके सफल क्रियान्वयन के लिए परिवहन, छात्रावास, छात्रवृत्ति और पर्याप्त सीटों जैसी मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। फिलहाल सरकार और छात्र संगठनों के बीच सहमति नहीं बनने से विरोध जारी है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए बड़ा विषय बना रह सकता है।
PMRC Scheme 2026: भारतीय मूल के वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ी पहल की है। प्रधानमंत्री रिसर्च चेयर (PMRC) स्कीम 2026 के तहत देश और विदेश में कार्यरत योग्य भारतीय शोधकर्ताओं को भारत के शीर्ष शिक्षण संस्थानों और राष्ट्रीय अनुसंधान प्रयोगशालाओं में शोध करने का अवसर मिलेगा। इसके साथ ही चयनित उम्मीदवारों को 5 करोड़ रुपये तक का रिसर्च ग्रांट, आकर्षक फेलोशिप और अन्य वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाएगी। शिक्षा मंत्रालय ने अधिक से अधिक योग्य उम्मीदवारों को आवेदन का अवसर देने के लिए आवेदन की अंतिम तिथि बढ़ाकर 15 अगस्त 2026 कर दी है। क्या है PMRC Scheme 2026? प्रधानमंत्री रिसर्च चेयर (PMRC) स्कीम का उद्देश्य दुनिया भर में कार्यरत भारतीय मूल के प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को भारत में उच्च स्तरीय अनुसंधान के लिए आकर्षित करना है। इस योजना के माध्यम से सरकार देश के अनुसंधान, नवाचार और तकनीकी विकास को नई गति देना चाहती है। चयनित उम्मीदवारों को IIT, IISc, NIT, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और विभिन्न राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में शोध करने का अवसर मिलेगा। आवेदन की अंतिम तिथि आवेदन शुरू: 1 जून 2026 आवेदन की अंतिम तिथि: 15 अगस्त 2026 आयु सीमा (Age Limit) PMRC Scheme 2026 के लिए कोई निर्धारित अधिकतम आयु सीमा तय नहीं की गई है। उम्मीदवारों का चयन मुख्य रूप से उनकी पीएचडी के बाद का शोध अनुभव, वैज्ञानिक उपलब्धियां, शोध प्रकाशन, पेटेंट, अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार और रिसर्च योगदान के आधार पर किया जाएगा। कौन कर सकता है आवेदन? यह योजना भारतीय मूल के वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए है, जो देश या विदेश में रिसर्च से जुड़े हैं। अनुभव के आधार पर तीन श्रेणियां बनाई गई हैं— 1. यंग रिसर्च फेलो (YRF) पीएचडी के बाद 5 वर्ष तक का अनुभव 2. सीनियर फेलो (SF) पीएचडी के बाद 5 से 10 वर्ष का अनुभव 3. रिसर्च चेयर (RC) पीएचडी के बाद 10 वर्ष या उससे अधिक का अनुभव उम्मीदवारों के पास उच्च गुणवत्ता वाले शोध प्रकाशन, पेटेंट, अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार, सिटेशन और उत्कृष्ट रिसर्च उपलब्धियों का रिकॉर्ड होना चाहिए। कितनी मिलेगी आर्थिक सहायता? यंग रिसर्च फेलो (YRF) वार्षिक फेलोशिप: 15–20 लाख रुपये रिसर्च ग्रांट: 1–1.5 करोड़ रुपये आवास एवं चिकित्सा सहायता: 5 लाख रुपये प्रति वर्ष सीनियर फेलो (SF) वार्षिक फेलोशिप: 20–40 लाख रुपये रिसर्च ग्रांट: 1.5–2.5 करोड़ रुपये आवास एवं चिकित्सा सहायता: 9 लाख रुपये प्रति वर्ष स्थानांतरण सहायता: 40 लाख रुपये संस्थागत ओवरहेड: 30 लाख रुपये प्रति वर्ष रिसर्च चेयर (RC) वार्षिक फेलोशिप: 40–60 लाख रुपये रिसर्च ग्रांट: 3–5 करोड़ रुपये आवास एवं चिकित्सा सहायता: 15 लाख रुपये प्रति वर्ष स्थानांतरण सहायता: 50 लाख रुपये संस्थागत ओवरहेड: 1 करोड़ रुपये प्रति वर्ष किन संस्थानों में मिलेगा अवसर? चयनित उम्मीदवारों को देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में शोध करने का अवसर मिलेगा, जिनमें शामिल हैं— NIRF ओवरऑल या इंजीनियरिंग रैंकिंग के टॉप 100 संस्थान NIRF रिसर्च कैटेगरी के टॉप 50 संस्थान CSIR की राष्ट्रीय प्रयोगशालाएं DBT, DST और ICMR के अंतर्गत आने वाले अनुसंधान संस्थान चयनित उम्मीदवारों की जिम्मेदारियां PMRC Scheme के तहत चयनित वैज्ञानिकों को— उच्च स्तरीय और मौलिक शोध करना शिक्षण कार्य में सहयोग देना नए शैक्षणिक पाठ्यक्रम विकसित करना पीएचडी एवं पोस्टग्रेजुएट छात्रों का मार्गदर्शन करना अंतरराष्ट्रीय रिसर्च सहयोग बढ़ाना उद्योगों के साथ साझेदारी विकसित करना शोध को पेटेंट और तकनीकी नवाचार में बदलने की दिशा में कार्य करना समय-समय पर प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करना आवेदन के लिए जरूरी दस्तावेज अपडेटेड CV शोध प्रकाशनों की सूची पेटेंट और पुरस्कारों का विवरण नागरिकता/वीजा/निवास संबंधी दस्तावेज शोध उपलब्धियों के प्रमाण पसंदीदा होस्ट संस्थान का नाम और चयन का कारण PMRC Scheme 2026 के प्रमुख फायदे 5 करोड़ रुपये तक का रिसर्च ग्रांट आकर्षक वार्षिक फेलोशिप भारत के शीर्ष संस्थानों में रिसर्च का अवसर अंतरराष्ट्रीय स्तर की रिसर्च सुविधाएं उद्योग और अकादमिक संस्थानों के साथ सहयोग युवा शोधकर्ताओं को करियर में नई दिशा भारत के रिसर्च और इनोवेशन इकोसिस्टम को मजबूत करने में योगदान ध्यान रखें: आवेदन करने से पहले आधिकारिक दिशा-निर्देश, पात्रता और आवश्यक दस्तावेजों की पूरी जानकारी अवश्य जांच लें। यह योजना भारतीय मूल के प्रतिभाशाली शोधकर्ताओं को भारत में विश्वस्तरीय अनुसंधान के अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
भारत में उच्च शिक्षा और रोजगार को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। देश के कई प्रमुख अर्थशास्त्रियों और नीति सलाहकारों ने पारंपरिक कॉलेज शिक्षा की उपयोगिता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बदलते दौर में केवल डिग्री हासिल करना सफलता की गारंटी नहीं है, बल्कि व्यावहारिक कौशल और रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण अधिक महत्वपूर्ण बन चुके हैं। दूसरी ओर सरकार 2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (GER) को 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। ऐसे में लाखों छात्रों और अभिभावकों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि भविष्य के लिए सही रास्ता क्या है। डिग्री बनाम स्किल की बहस क्यों तेज हुई? हाल के दिनों में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल, भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन और निवेश विशेषज्ञ सौरभ मुखर्जी ने कॉलेज शिक्षा के पारंपरिक मॉडल पर सवाल उठाए हैं। इनका मानना है कि आज इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण ज्ञान आसानी से उपलब्ध है। ऐसे में यदि कोई युवा कम उम्र से ही किसी कौशल में दक्षता हासिल कर ले और साथ-साथ पढ़ाई जारी रखे, तो उसके लिए रोजगार और आय के बेहतर अवसर बन सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि देश को केवल डिग्रीधारी युवाओं की नहीं, बल्कि कुशल वेल्डर, इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, मशीन ऑपरेटर, टेक्नीशियन और डिजिटल स्किल्स वाले प्रोफेशनल्स की भी बड़ी आवश्यकता है। बेरोजगारी के आंकड़े बढ़ा रहे चिंता भारत हर वर्ष करोड़ों युवाओं को उच्च शिक्षा प्रणाली से जोड़ रहा है, लेकिन रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ रहे हैं। उपलब्ध सरकारी और श्रम बाजार से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी दर अब भी काफी अधिक है। विशेष रूप से 15 से 25 वर्ष आयु वर्ग के स्नातक युवाओं में रोजगार प्राप्त करने की चुनौती गंभीर बनी हुई है। आईटी सेक्टर समेत कई बड़े उद्योगों में हाल के वर्षों में कर्मचारियों की संख्या कम होने और ऑटोमेशन तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव ने भी पारंपरिक नौकरियों पर दबाव बढ़ाया है। सरकार का लक्ष्य और विशेषज्ञों की राय में विरोधाभास एक ओर कई विशेषज्ञ युवाओं को स्किल आधारित शिक्षा अपनाने की सलाह दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत सरकार 2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात को लगभग 50 प्रतिशत तक ले जाना चाहती है। यानी नीति का उद्देश्य अधिक से अधिक छात्रों को कॉलेज और विश्वविद्यालयों तक पहुंचाना है, जबकि कई विशेषज्ञ रोजगार के लिहाज से कौशल विकास को अधिक प्रभावी मान रहे हैं। यही विरोधाभास इस पूरी बहस को और गंभीर बना रहा है। केवल डिग्री अब नौकरी की गारंटी नहीं रोजगार बाजार में अब कंपनियां केवल शैक्षणिक प्रमाणपत्र नहीं देख रहीं, बल्कि उम्मीदवार के वास्तविक कौशल, प्रोजेक्ट अनुभव और पोर्टफोलियो को भी महत्व दे रही हैं। विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स, साइबर सिक्योरिटी, क्लाउड कंप्यूटिंग, डिजिटल मार्केटिंग और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में छोटे अवधि के प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम और व्यावहारिक अनुभव तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। कई कंपनियां अब उम्मीदवार की समस्या समाधान क्षमता, तकनीकी दक्षता और वास्तविक कार्य अनुभव को प्राथमिकता दे रही हैं। क्या कॉलेज की पढ़ाई अब जरूरी नहीं? विशेषज्ञों का मानना है कि इसका उत्तर सभी के लिए एक जैसा नहीं हो सकता। डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, चार्टर्ड अकाउंटेंट और कई अन्य पेशों में आज भी औपचारिक डिग्री अनिवार्य है। वहीं कुछ क्षेत्रों में कॉलेज की डिग्री शुरुआती भर्ती प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हालांकि, केवल डिग्री लेकर रोजगार मिलने की पुरानी धारणा अब तेजी से बदल रही है। आज के प्रतिस्पर्धी दौर में डिग्री के साथ-साथ व्यवहारिक कौशल, इंटर्नशिप, इंडस्ट्री सर्टिफिकेशन और मजबूत पोर्टफोलियो सफलता के प्रमुख आधार बन चुके हैं। युवाओं के लिए क्या है सही रास्ता? करियर विशेषज्ञों का मानना है कि छात्रों को अपनी रुचि, करियर लक्ष्य और चुने गए क्षेत्र की जरूरतों के अनुसार निर्णय लेना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में प्रोफेशनल डिग्री अनिवार्य है, तो उच्च शिक्षा जरूरी होगी। वहीं डिजिटल, तकनीकी और स्किल आधारित क्षेत्रों में डिग्री के साथ व्यावहारिक अनुभव और प्रमाणित कौशल भविष्य में अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकते हैं। आज का रोजगार बाजार केवल यह नहीं पूछता कि आपने क्या पढ़ा है, बल्कि यह भी देखता है कि आप वास्तव में क्या कर सकते हैं। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में शिक्षा और कौशल दोनों का संतुलित संयोजन सबसे मजबूत करियर विकल्प माना जा रहा है।
हैदराबाद: तेलंगाना में फीस रीइंबर्समेंट (शुल्क प्रतिपूर्ति) और लंबित छात्रवृत्ति जारी करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कार्यकर्ताओं और छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज किया और कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया। TGCHE कार्यालय के बाहर हुआ प्रदर्शन एएनआई के अनुसार, एबीवीपी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में छात्र तेलंगाना राज्य उच्च शिक्षा परिषद (TGCHE) के कार्यालय के बाहर एकत्र हुए। प्रदर्शनकारी वर्ष 2022-23 से 2025-26 के बीच लंबित फीस रीइंबर्समेंट और छात्रवृत्ति की राशि जारी करने की मांग कर रहे थे। छात्रों का कहना है कि आर्थिक सहायता समय पर नहीं मिलने से हजारों विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और कई छात्र पढ़ाई बीच में छोड़ने की स्थिति में पहुंच गए हैं। पुलिस पर लाठीचार्ज का आरोप एबीवीपी नेताओं का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बल प्रयोग करते हुए कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज किया। संगठन का दावा है कि कई छात्रों और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेकर अलग-अलग पुलिस थानों में भेजा गया। पुलिस की ओर से इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। सरकार पर लगाए गंभीर आरोप प्रदर्शनकारी छात्रों और एबीवीपी ने कांग्रेस सरकार पर फीस रीइंबर्समेंट योजना को कमजोर करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सरकार छात्रों के भविष्य की अनदेखी कर रही है और लंबित भुगतान जारी करने में लगातार देरी हो रही है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो पूरे तेलंगाना में व्यापक छात्र आंदोलन शुरू किया जाएगा। 12 हजार करोड़ रुपये बकाया होने का दावा छात्र संगठनों का दावा है कि राज्य सरकार पर निजी कॉलेजों का करीब 12,000 करोड़ रुपये का फीस रीइंबर्समेंट बकाया है। उनका कहना है कि पिछले तीन-चार वर्षों से कई कॉलेजों और छात्रों को नियमित रूप से छात्रवृत्ति और शुल्क प्रतिपूर्ति की राशि नहीं मिल रही है। इसके चलते शैक्षणिक संस्थानों और विद्यार्थियों दोनों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। पहले भी उठ चुका है यह मुद्दा फीस रीइंबर्समेंट और छात्रवृत्ति में देरी का मुद्दा तेलंगाना में नया नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में भी छात्र संगठनों ने कई बार इस मुद्दे पर प्रदर्शन और धरने दिए हैं। सरकारें बदलने के बावजूद यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी है। ताजा प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई के बाद एक बार फिर राज्य में छात्र राजनीति तेज हो गई है। विपक्षी दल भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर निशाना साध रहे हैं, जबकि छात्रों की मांग है कि लंबित राशि जल्द जारी कर उनकी पढ़ाई प्रभावित होने से बचाई जाए।
रांची। झारखंड के सरकारी कॉलेजों में साइंस की पढ़ाई व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी की गई है। नए शैक्षणिक सत्र 2026-30 से अब हर सरकारी कॉलेज में विज्ञान (बीएससी) की पढ़ाई नहीं होगी। राज्य सरकार ने चुनिंदा कॉलेजों को ही विज्ञान शिक्षा के केंद्र के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है। इसका उद्देश्य संसाधनों का बेहतर उपयोग, प्रयोगशालाओं को मजबूत बनाना और छात्रों को गुणवत्तापूर्ण विज्ञान शिक्षा उपलब्ध कराना है। हालांकि इस नई व्यवस्था से छात्रों के सामने पसंदीदा कॉलेज चुनने के विकल्प भी सीमित हो जाएगी। रांची में सिर्फ तीन कॉलेजों में होगी बीएससी की पढ़ाई राजधानी रांची में अब रांची विश्वविद्यालय के केवल डोरंडा कॉलेज, रांची वीमेंस कॉलेज और मारवाड़ी कॉलेज में ही विज्ञान संकाय की पढ़ाई होगी। पहले शहर के छह सरकारी कॉलेजों में बीएससी की पढ़ाई होती थी। नई व्यवस्था के तहत इन तीन कॉलेजों में कुल 1620 सीटों पर दाखिला लिया जाएगा। वहीं जमशेदपुर में भी विज्ञान की पढ़ाई चार की जगह अब केवल ग्रेजुएट कॉलेज, को-ऑपरेटिव कॉलेज और एलबीएसएम कॉलेज में होगी। हालांकि धनबाद के दोनों सरकारी कॉलेजों में विज्ञान की पढ़ाई पहले की तरह जारी रहेगी। कॉलेजों की नई भूमिका भी तय विज्ञान के साथ-साथ इन तीन प्रमुख कॉलेजों में कला, वाणिज्य और विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रम भी संचालित होंगे। डोरंडा कॉलेज में विज्ञान के अलावा हिंदी, अंग्रेजी, भूगोल, जियोलॉजी, इतिहास, राजनीति विज्ञान, वाणिज्य, अर्थशास्त्र, पर्यावरण विज्ञान और क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई होगी। रांची वीमेंस कॉलेज में भी विज्ञान के साथ कला एवं वाणिज्य के प्रमुख विषय उपलब्ध रहेंगे। वहीं मारवाड़ी कॉलेज में कॉमर्स, अर्थशास्त्र, हिंदी, अंग्रेजी, इतिहास, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र और वोकेशनल कोर्स संचालित किए जाएंगे। इसके अलावा जेएन कॉलेज, धुर्वा, आरएलएसवाई कॉलेज और एसएस मेमोरियल कॉलेज जैसे अन्य सरकारी कॉलेजों को मुख्य रूप से कला, वाणिज्य और सामाजिक विज्ञान विषयों पर केंद्रित किया गया है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का दावा, लेकिन बढ़ेंगी चुनौतियां सरकार का मानना है कि विज्ञान शिक्षा को सीमित कॉलेजों में केंद्रित करने से आधुनिक प्रयोगशालाओं, उपकरणों और विशेषज्ञ शिक्षकों का बेहतर उपयोग हो सकेगा। इससे शोध और प्रयोगात्मक शिक्षा को भी बढ़ावा मिलेगा तथा छात्रों को बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं मिलेंगी। हालांकि इस बदलाव का दूसरा पक्ष भी है। अब कई छात्रों को अपने घर के नजदीकी कॉलेज के बजाय दूसरे कॉलेज में दाखिला लेना पड़ेगा, जिससे आवागमन और रहने का अतिरिक्त खर्च बढ़ सकता है। साथ ही तीन कॉलेजों में छात्रों की संख्या बढ़ने से सीटों पर प्रतिस्पर्धा और शैक्षणिक दबाव भी बढ़ने की संभावना है।
DU PG Admission 2026: दिल्ली यूनिवर्सिटी में पोस्टग्रेजुएट (PG) कोर्स में प्रवेश का इंतजार कर रहे छात्रों के लिए अहम अपडेट है। विश्वविद्यालय ने CSAS-PG (Common Seat Allocation System) के तहत पीजी एडमिशन की दूसरी सीट अलॉटमेंट लिस्ट जारी कर दी है। CUET PG 2026 के स्कोर के आधार पर दाखिले दिए जा रहे हैं। जिन उम्मीदवारों को दूसरे राउंड में सीट आवंटित हुई है, उन्हें तय समय सीमा के भीतर सीट स्वीकार करनी होगी और फीस जमा करनी होगी। निर्धारित समय के भीतर प्रक्रिया पूरी नहीं करने पर सीट रद्द हो सकती है। कब तक करनी होगी सीट एक्सेप्ट? दिल्ली यूनिवर्सिटी के अनुसार, दूसरे राउंड में सीट पाने वाले उम्मीदवारों को 24 जून 2026 तक अपनी सीट स्वीकार करनी होगी। वहीं, सीट कन्फर्म करने के लिए फीस जमा करने की अंतिम तिथि 27 जून 2026 निर्धारित की गई है। विश्वविद्यालय ने छात्रों को सलाह दी है कि वे अंतिम समय का इंतजार करने के बजाय जल्द से जल्द प्रक्रिया पूरी कर लें। DU PG Admission 2026: ऐसे करें सीट एक्सेप्ट यदि आपको दूसरी अलॉटमेंट लिस्ट में सीट मिली है, तो नीचे दिए गए स्टेप्स फॉलो करें: स्टेप 1: दिल्ली यूनिवर्सिटी के CSAS-PG पोर्टल पर जाएं। स्टेप 2: अपने CUET PG आवेदन नंबर और पासवर्ड की मदद से लॉग इन करें। स्टेप 3: होमपेज पर दिखाई दे रहे Second Seat Allocation List 2026 लिंक पर क्लिक करें। स्टेप 4: स्क्रीन पर आपका सीट अलॉटमेंट स्टेटस दिखाई देगा। स्टेप 5: यदि सीट आवंटित हुई है, तो Seat Acceptance विकल्प पर क्लिक करें। स्टेप 6: अलॉटमेंट लेटर डाउनलोड करें और भविष्य के लिए उसका प्रिंटआउट सुरक्षित रख लें। दूसरे राउंड में कितने छात्रों को मिली सीट? दिल्ली यूनिवर्सिटी के मुताबिक, पीजी एडमिशन के दूसरे चरण में कुल 2,964 नए सीट अलॉटमेंट किए गए हैं। पहले राउंड में सीट पाने वाले 3,399 छात्रों ने अपनी सीट फ्रीज की थी। 2,448 उम्मीदवारों ने अपग्रेड का विकल्प चुना। 2,303 छात्रों ने न तो फ्रीज और न ही अपग्रेड का विकल्प चुना। इससे पहले पहले राउंड में कुल 11,548 सीटें आवंटित की गई थीं। इनमें से 10,393 छात्रों ने सीट स्वीकार की थी, जबकि 8,150 उम्मीदवारों ने फीस जमा कर अपनी एडमिशन प्रक्रिया पूरी कर ली थी। छात्रों के लिए जरूरी सलाह यदि आपको दूसरी सूची में सीट मिली है, तो समय सीमा समाप्त होने से पहले सीट स्वीकार करें और फीस जमा करना न भूलें। किसी भी देरी की स्थिति में आपका एडमिशन प्रभावित हो सकता है।
भारत में इंजीनियरिंग की पढ़ाई को लंबे समय से बेहतर करियर और स्थिर भविष्य का रास्ता माना जाता रहा है। हर साल लाखों छात्र IIT-JEE जैसी कठिन परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला पाने का सपना देखते हैं। लेकिन हाल ही में प्रसिद्ध उद्यमी और प्राइवेट इक्विटी निवेशक श्रीनि राजू के एक बयान ने डिग्री बनाम स्किल्स की बहस को फिर से तेज कर दिया है। उन्होंने कहा कि कई मामलों में चार साल की इंजीनियरिंग डिग्री छात्रों को नौकरी के लिए उतना तैयार नहीं करती, जितना व्यावहारिक कौशल और लगातार सीखने की क्षमता करती है। कौन हैं श्रीनि राजू? चिंतलपति श्रीनिवास राजू भारतीय आईटी उद्योग, इंफ्रास्ट्रक्चर और प्राइवेट इक्विटी निवेश के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम हैं। उनका जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ था। उन्होंने NIT कुरुक्षेत्र से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और बाद में अमेरिका की Utah State University से सिविल और एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री हासिल की। इंजीनियरिंग डिग्री पर क्या बोले श्रीनि राजू? 'रॉ टॉक्स विद वीके' पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान श्रीनि राजू ने कहा कि आज के समय में कई छात्र वर्षों तक डिग्री हासिल करने में समय लगाते हैं, लेकिन उनके पास वास्तविक नौकरी के लिए जरूरी प्रैक्टिकल स्किल्स की कमी होती है। उनका मानना है कि सिर्फ B.Tech की डिग्री किसी व्यक्ति के जॉब-रेडी होने का पैमाना नहीं हो सकती। 12वीं पास और B.Tech ग्रेजुएट्स पर कंपनी का प्रयोग श्रीनि राजू ने अपनी कंपनी के एक पुराने प्रयोग का जिक्र करते हुए बताया कि एक समूह में 30 इंटरमीडिएट (12वीं पास) छात्रों को और दूसरे समूह में 30 B.Tech ग्रेजुएट्स को रखा गया। दोनों समूहों को एक जैसी ट्रेनिंग एक साल तक दी गई। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद दोनों की उत्पादकता का मूल्यांकन किया गया। उनके अनुसार, परिणामों में कोई बड़ा अंतर नहीं दिखा। इसी अनुभव ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या चार साल की डिग्री हमेशा व्यावहारिक दुनिया में अतिरिक्त लाभ देती है। शिक्षा व्यवस्था में क्या कमी है? श्रीनि राजू का मानना है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली का बड़ा हिस्सा अभी भी किताबी ज्ञान पर आधारित है। कई संस्थानों में छात्रों को वह सिखाया जाता है जो पाठ्यक्रम में लिखा है, जबकि उद्योग की बदलती जरूरतें और वास्तविक कार्य अनुभव उससे अलग हो सकते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह शिक्षा को बेकार नहीं मानते, बल्कि शिक्षा और इंडस्ट्री की जरूरतों के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता पर जोर देते हैं। आज के जॉब मार्केट में क्या सबसे ज्यादा जरूरी है? श्रीनि राजू के अनुसार, बदलते रोजगार बाजार में सिर्फ डिग्री या सर्टिफिकेट काफी नहीं हैं। छात्रों को इन क्षमताओं पर विशेष ध्यान देना चाहिए: प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल्स लगातार सीखने की क्षमता स्वयं से नई चीजें सीखने की आदत प्रैक्टिकल नॉलेज और इंडस्ट्री एक्सपोजर बदलती तकनीकों के साथ खुद को अपडेट रखना IIT-JEE में असफल होने वालों को क्या सलाह दी? उन्होंने छात्रों से कहा कि अगर वे IIT-JEE जैसी परीक्षाओं में सफल नहीं हो पाते हैं, तो इसे जीवन का अंत न समझें। मेहनत और सही कौशल के जरिए कोई भी व्यक्ति अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है। डिग्री बनाम स्किल्स: क्या है सच्चाई? विशेषज्ञों का मानना है कि डिग्री और स्किल्स दोनों का अपना महत्व है। डिग्री बुनियादी ज्ञान और अवसरों के दरवाजे खोलती है, जबकि व्यावहारिक कौशल किसी व्यक्ति को वास्तविक कार्यक्षेत्र में सफल बनाते हैं। ऐसे में दोनों के बीच संतुलन बनाना ही सबसे बेहतर रास्ता माना जाता है।
मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने किया ‘फ्री एंड यूनिवर्सल एजुकेशन’ का ऐलान ओडिशा सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए राज्य के छात्रों को बड़ी राहत दी है। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने घोषणा की है कि अब राज्य में किंडरगार्टन (KG) से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) तक की शिक्षा पूरी तरह मुफ्त होगी। इस फैसले के साथ ओडिशा देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो गया है, जहां उच्च शिक्षा तक निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था लागू की जा रही है। बीजेपी सरकार के दो वर्ष पूरे होने के अवसर पर किए गए इस ऐलान को राज्य की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। सरकार का दावा है कि इस योजना से 10 लाख से अधिक छात्रों को सीधा लाभ मिलेगा। सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नहीं देनी होगी फीस नई व्यवस्था के तहत सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने वाले छात्रों को अब किसी प्रकार की शैक्षणिक फीस नहीं देनी होगी। राज्य में पहले से ही कक्षा 10 तक शिक्षा निशुल्क थी, लेकिन अब इस दायरे को बढ़ाकर स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर तक कर दिया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह निर्णय बेहद लाभकारी साबित होगा। कई छात्र वित्तीय कठिनाइयों के कारण उच्च शिक्षा बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं, लेकिन अब उन्हें बेहतर अवसर मिल सकेंगे। राज्य सरकार पर आएगा करीब 30 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार सरकारी अधिकारियों के अनुसार, सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में फीस पहले से अपेक्षाकृत कम थी, लेकिन पूरी तरह शुल्क समाप्त करने से राज्य सरकार पर हर साल लगभग 30 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा। हालांकि सरकार का मानना है कि शिक्षा पर किया गया यह निवेश राज्य के भविष्य को मजबूत करेगा और युवाओं को अधिक अवसर प्रदान करेगा। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए होगी शिक्षकों की बड़ी भर्ती मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए बड़े पैमाने पर शिक्षकों की नियुक्ति का भी ऐलान किया। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में 45,000 से अधिक नए शिक्षकों की भर्ती की जाएगी। उन्होंने बताया कि पिछले दो वर्षों के दौरान राज्य सरकार पहले ही 26,000 से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति कर चुकी है। नई भर्तियों से स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों की कमी को दूर करने में मदद मिलेगी। उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए बनेंगे चार नए विश्वविद्यालय राज्य में उच्च शिक्षा के अवसर बढ़ाने के लिए सरकार ने चार नए विश्वविद्यालय स्थापित करने की भी घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इन विश्वविद्यालयों के लिए बजट में आवश्यक प्रावधान किए जा चुके हैं और जल्द ही परियोजनाओं पर काम शुरू होगा। सरकार का लक्ष्य है कि राज्य के छात्रों को गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के लिए दूसरे राज्यों का रुख न करना पड़े। विकास परियोजनाओं पर भी सरकार का जोर अपने कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने पर मुख्यमंत्री ने राज्य में चल रही विभिन्न विकास परियोजनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि तटीय राजमार्ग, उत्तर और दक्षिण ओडिशा को जोड़ने वाले दो एक्सप्रेसवे तथा भुवनेश्वर-कटक-पुरी-पारादीप आर्थिक क्षेत्र जैसी परियोजनाएं रोजगार और आर्थिक विकास को गति देंगी। विपक्ष के आरोपों पर भी दिया जवाब कानून-व्यवस्था को लेकर विपक्ष की आलोचनाओं का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में अपराध के मामलों में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ अपराधों में सजा की दर बढ़ने का भी दावा किया। साथ ही उन्होंने पिछली सरकार पर भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए कहा कि वर्तमान सरकार ने पिछले दो वर्षों में कई वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ सतर्कता जांच और कार्रवाई की है। ओडिशा सरकार का यह फैसला शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है तो यह राज्य में उच्च शिक्षा की पहुंच बढ़ाने और सामाजिक-आर्थिक असमानता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
रांची। रांची विश्वविद्यालय (आरयू) अपने शैक्षणिक ढांचे में व्यापक बदलाव की तैयारी कर रहा है। कुलपति प्रो. सरोज शर्मा की अध्यक्षता में 17 जून को होने वाली एकेडमिक काउंसिल की बैठक में 27 महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर विचार किया जाएगा। इनमें प्रोफेशनल विभागों को स्कूल मॉडल में बदलने, नए रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रम शुरू करने, करियर काउंसिलिंग सेंटर की स्थापना, मल्टीपल एंट्री-एग्जिट सिस्टम लागू करने और विभिन्न पाठ्यक्रमों में संशोधन जैसे अहम निर्णय शामिल हैं। पहली बार शुरू होगी डेटा साइंस की पढ़ाई बता दे रांची विश्वविद्यालय पहली बार एमएससी डेटा साइंस और एमए/एमएससी स्टैटिस्टिक्स के नए पाठ्यक्रम शुरू करने की तैयारी कर रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और डेटा एनालिटिक्स जैसे तेजी से उभरते क्षेत्रों में बढ़ती मांग को देखते हुए इन कोर्सों को तैयार किया गया है। विश्वविद्यालय का उद्देश्य छात्रों को आधुनिक तकनीकी कौशल से लैस कर रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है। स्कूल मॉडल के तहत बदलेगी विभागों की पहचान इतना ही नहीं नई व्यवस्था के तहत विश्वविद्यालय के चार प्रोफेशनल और वोकेशनल विभागों को 'यूनिवर्सिटी स्कूल' के रूप में विकसित किया जाएगा। इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (आईएमएस) का नाम बदलकर यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज किया जाएगा। वहीं एमसीए और एमएससी आईटी विभागों का विलय कर यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ कंप्यूटर साइंस एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी बनाया जाएगा। इसके अलावा मास कम्युनिकेशन विभाग को यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन तथा लीगल स्टडीज विभाग को यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ एंड गवर्नेंस के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव है। नई शिक्षा नीति के अनुरूप होंगे बदलाव बैठक में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) की नई गाइडलाइन के अनुरूप पाठ्यक्रमों और प्रमाणपत्रों के स्वरूप में बदलाव पर भी निर्णय लिया जाएगा। साथ ही करियर काउंसिलिंग सेंटर, दो नए विशेष केंद्रों की स्थापना और गुमला के कार्तिक उरांव कॉलेज सहित अन्य संस्थानों में शैक्षणिक संसाधनों के विस्तार के प्रस्ताव भी एजेंडे में शामिल हैं।
रांची। रांची यूनिवर्सिटी (आरयू) प्रशासन ने अपने अंतर्गत आने वाले 24 अंगीभूत कॉलेजों की 43,530 सीटों पर स्नातक (UG) एडमिशन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह प्रक्रिया शैक्षणिक सत्र 2026-30 (चार वर्षीय रेगुलर कोर्स) और वोकेशनल कोर्स सत्र 2026-29 के लिए शुरू की गई है। इच्छुक छात्र चांसलर पोर्टल के माध्यम से 12 जून से 29 जून तक ऑनलाइन आवेदन भर सकेंगे। बड़ा बदलाव: बॉटनी और जूलॉजी की बजाय 'लाइफ साइंस'... स्नातक स्तर पर इस सत्र से एक बड़ा बदलाव किया गया है। अब बॉटनी और जूलॉजी को अलग-अलग विषय के रूप में हटाकर 'लाइफ साइंस' के तहत शामिल कर दिया गया है। ऐसे में इस वर्ष एडमिशन लेने वाले विद्यार्थियों को बॉटनी या जूलॉजी के बजाय 'लाइफ साइंस' विषय के लिए आवेदन करना होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के तहत लिए गए इस फैसले का असर सिर्फ अंगीभूत कॉलेजों तक ही सीमित नहीं रहेगा। आरयू से संबद्ध और अल्पसंख्यक कॉलेजों में नामांकन के लिए आवेदन प्रक्रिया पहले से चल रही है, जहां बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने पहले ही बॉटनी और जूलॉजी विषय चुनकर आवेदन कर दिया है। अब नई व्यवस्था लागू होने के बाद, इन पहले से आए आवेदनों को भी नई प्रणाली के अनुरूप लाइफ साइंस में समायोजित किया जाएगा। एडमिशन शेड्यूल (यूजी) आवेदन की शुरुआत: 12 जून आवेदन की अंतिम तिथि: 29 जून फर्स्ट सेलेक्शन लिस्ट: 3 जुलाई डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन: 4 से 14 जुलाई 24 कॉलेजों में सीटों की संख्या 1 मारवाड़ी कॉलेज 3700 2 केओ कॉलेज गुमला 3240 3 रांची वीमेंस कॉलेज 3210 4 एसएसएम कॉलेज 3100 5 बीएस कॉलेज लोहरदगा 2940 6 बिरसा कॉलेज खूंटी 2640 7 आरएलएसवाई कॉलेज 2640 8 पीपीके कॉलेज बुंडू 2580 9 डोरंडा कॉलेज 2440 10 मांडर कॉलेज 2100 11 सिमडेगा कॉलेज सिमडेगा 2040 12 जेएन कॉलेज 1740 13 केसीबी कॉलेज बेड़ो 1740 14 बीएन जलान कॉलेज सिसई 1320 15 डिग्री कॉलेज, खिजरी 900 16 डिग्री कॉलेज सिल्ली 900 17 डिग्री कॉलेज विष्णुपुर 900 18 डिग्री कॉलेज तोरपा 900 19 डिग्री कॉलेज कोलेबिरा 900 20 मॉडल कॉलेज गुमला 720 21 वीमेंस कॉलेज गुमला 720 22 वीमेंस कॉलेज खूंटी 720 23 वीमेंस कॉलेज लोहरदगा 720 24 वीमेंस कॉलेज सिमडेगा 720
नई दिल्ली: सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि 30 जून 2026 से भारत में कागज के नोटों की जगह प्लास्टिक करेंसी शुरू कर दी जाएगी। वीडियो में यह भी कहा गया है कि 10, 20, 50 और 100 रुपये के मौजूदा नोट धीरे-धीरे बंद कर दिए जाएंगे। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) ने इन दावों को पूरी तरह फर्जी बताया है। सोशल मीडिया पर क्या किया जा रहा है दावा? वायरल वीडियो में कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार और RBI जल्द ही पॉलीमर यानी प्लास्टिक के नोट जारी करने वाले हैं और 30 जून 2026 तक पुराने कागजी नोटों को बदल दिया जाएगा। वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कथित आवाज का भी इस्तेमाल किया गया है। क्या है वायरल दावे की सच्चाई? इन दावों के सामने आने के बाद प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) ने फैक्ट चेक जारी कर स्थिति स्पष्ट की। RBI के हवाले से बताया गया कि फिलहाल कागज के नोटों को वापस लेने या उनकी जगह प्लास्टिक करेंसी लाने की कोई योजना नहीं है। PIB ने यह भी कहा कि वायरल वीडियो डिजिटल रूप से एडिट किया गया है और उसमें किए गए दावे भ्रामक हैं। लोगों से क्या अपील की गई? सरकार ने लोगों से अपील की है कि नोटों और बैंकिंग से जुड़ी किसी भी जानकारी के लिए केवल भारतीय रिजर्व बैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर ही भरोसा करें। सोशल मीडिया पर वायरल किसी भी संदेश या वीडियो को बिना जांचे-परखे साझा न करें। अगर किसी को सरकार से जुड़ा कोई संदिग्ध या फर्जी कंटेंट दिखाई देता है, तो उसकी शिकायत @PIBFactCheck के माध्यम से की जा सकती है। किन देशों में चलते हैं प्लास्टिक के नोट? दुनिया के कई देशों में पॉलीमर आधारित नोट पहले से इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया, न्यूजीलैंड और वियतनाम जैसे देश शामिल हैं। प्लास्टिक के नोट कैसे बनते हैं? विशेषज्ञों के अनुसार, ये नोट सामान्य प्लास्टिक से नहीं बल्कि पॉलीमर सामग्री, विशेष रूप से पॉलीप्रोपलीन से बनाए जाते हैं। ये पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक मजबूत और टिकाऊ होते हैं तथा जल्दी खराब नहीं होते।
रांची। झारखंड में चिकित्सा शिक्षा को नई दिशा देने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य के प्रमुख चिकित्सा संस्थान रिम्स रांची में स्नातक (UG), स्नातकोत्तर (PG) और सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों की सीटों में उल्लेखनीय वृद्धि की जाएगी। स्वास्थ्य विभाग ने इस संबंध में रिम्स प्रशासन को विस्तृत प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश दिया है। इस पहल का उद्देश्य राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाना और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना है। केंद्र और राज्य मिलकर उठाएंगे खर्च केंद्र प्रायोजित योजना के तहत मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने के लिए प्रति सीट लगभग 1.5 करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता दी जाएगी। इसमें 60 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करेगी। योजना के तहत रिम्स में UG सीटों को 180 से बढ़ाकर 250, PG सीटों को 176 से बढ़ाकर 275 और सुपर स्पेशियलिटी सीटों को 11 से बढ़ाकर 100 करने का लक्ष्य रखा गया है। MGM और धनबाद मेडिकल कॉलेज को मिल चुकी मंजूरी स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, एमजीएम मेडिकल कॉलेज, जमशेदपुर में UG सीटें 150 से बढ़ाकर 250 और PG सीटें 49 से बढ़ाकर 200 करने के प्रस्ताव को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है। वहीं, धनबाद मेडिकल कॉलेज में UG सीटें 100 से बढ़ाकर 250 और PG सीटें 19 से बढ़ाकर 200 करने के प्रस्ताव को भी भारत सरकार की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। PPP मॉडल पर बनेंगे नए छात्रावास रिम्स-टू परियोजना के तहत छात्रावास निर्माण के लिए नई रणनीति अपनाई जाएगी। राज्य सरकार ने निर्णय लिया है कि हॉस्टल निर्माण पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर किया जाएगा। इसके लिए केंद्र सरकार के वायबिलिटी गैप फंड (VGF) से सहायता लेने की योजना है। इससे सरकारी खर्च कम होगा और छात्रों को आधुनिक सुविधाओं से युक्त बेहतर आवास उपलब्ध कराया जा सकेगा। चिकित्सा शिक्षा को मिलेगा नया आयाम सीटों में बढ़ोतरी और आधुनिक बुनियादी ढांचे के विकास से झारखंड में मेडिकल शिक्षा को बड़ा लाभ मिलेगा। इससे राज्य के छात्रों को अधिक अवसर मिलेंगे और भविष्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी को दूर करने में मदद मिलेगी।
पटना, एजेंसियां । जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के क्षेत्र में उच्च शिक्षा और करियर बनाने के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए अच्छी खबर है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) ने एमएससी इन क्लाइमेट चेंज कार्यक्रम की शुरुआत की है। इसके साथ ही इग्नू इस विषय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम शुरू करने वाली देश की पहली ओपन यूनिवर्सिटी बन गई है। इच्छुक अभ्यर्थी 15 जुलाई 2026 तक इस कोर्स के लिए आवेदन कर सकते हैं। दो वर्षीय कोर्स, 80 क्रेडिट की संरचना विश्वविद्यालय के अनुसार यह दो वर्षीय स्नातकोत्तर कार्यक्रम है, जिसमें कुल 80 क्रेडिट निर्धारित किए गए हैं। प्रवेश के लिए किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से किसी भी विषय में स्नातक (Graduation) होना आवश्यक है। खास बात यह है कि पहले वर्ष की पढ़ाई पूरी करने वाले विद्यार्थी चाहें तो पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन क्लाइमेट चेंज भी प्राप्त कर सकते हैं। जलवायु संकट से निपटने के लिए तैयार होंगे विशेषज्ञ इग्नू ने बताया कि इस पाठ्यक्रम का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों का वैज्ञानिक, व्यावहारिक और टिकाऊ समाधान विकसित करने वाले प्रशिक्षित पेशेवर तैयार करना है। दुनिया भर में बढ़ते तापमान, प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय संकटों को देखते हुए इस कार्यक्रम को विशेष रूप से डिजाइन किया गया है। पाठ्यक्रम में शामिल होंगे महत्वपूर्ण विषय एमएससी क्लाइमेट चेंज कोर्स में विद्यार्थियों को जलवायु विज्ञान, जलवायु जोखिम, अनुकूलन एवं शमन रणनीतियां, पर्यावरण प्रबंधन और सतत विकास जैसे विषयों की पढ़ाई कराई जाएगी। इसके अलावा जल संसाधन प्रबंधन, ऊर्जा प्रणाली, कृषि, जैव विविधता संरक्षण, आपदा जोखिम न्यूनीकरण, कचरा प्रबंधन, चक्रीय अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, पर्यावरण कानून और जलवायु आकलन जैसे महत्वपूर्ण विषय भी पाठ्यक्रम का हिस्सा होंगे। छात्रों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों के लिए अवसर इग्नू ने छात्रों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं और पर्यावरण क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों से इस पाठ्यक्रम में नामांकन लेने की अपील की है। विश्वविद्यालय का मानना है कि यह कार्यक्रम युवाओं को जलवायु परिवर्तन की वास्तविक चुनौतियों को समझने और सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में प्रभावी योगदान देने के लिए तैयार करेगा।
देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों की बहुप्रतीक्षित IIRF (Indian Institutional Ranking Framework) Ranking 2026 जारी कर दी गई है। इस वर्ष की रैंकिंग में इंजीनियरिंग, यूनिवर्सिटी और मैनेजमेंट शिक्षा के क्षेत्र में देश के प्रमुख संस्थानों ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। इंजीनियरिंग श्रेणी में Indian Institute of Technology Bombay ने पहला स्थान हासिल किया है, जबकि यूनिवर्सिटी कैटेगरी में Jawaharlal Nehru University शीर्ष पर रही। वहीं मैनेजमेंट संस्थानों में Indian Institute of Management Ahmedabad ने अपना दबदबा कायम रखा है। IIRF रैंकिंग उच्च शिक्षा संस्थानों का मूल्यांकन कई महत्वपूर्ण मानकों के आधार पर करती है। इनमें शिक्षा की गुणवत्ता, शोध कार्य, उद्योगों के साथ सहयोग, प्लेसमेंट रिकॉर्ड, अंतरराष्ट्रीय पहचान और छात्रों के भविष्य के अवसर शामिल हैं। इस वर्ष की रैंकिंग में IIT और केंद्रीय विश्वविद्यालयों का वर्चस्व स्पष्ट रूप से देखने को मिला। इंजीनियरिंग में IIT बॉम्बे का जलवा इंजीनियरिंग संस्थानों की सूची में Indian Institute of Technology Bombay ने पहला स्थान हासिल किया। इसके बाद Indian Institute of Technology Delhi, Indian Institute of Technology Madras, Indian Institute of Technology Kanpur और Indian Institute of Technology Kharagpur को शीर्ष संस्थानों में जगह मिली। टॉप 10 IIT संस्थान (IIRF 2026) रैंक संस्थान 1 IIT बॉम्बे 2 IIT दिल्ली 3 IIT मद्रास 4 IIT कानपुर 5 IIT खड़गपुर 6 IIT रुड़की 7 IIT हैदराबाद 8 IIT गुवाहाटी 9 IIT (BHU) 10 IIT इंदौर यूनिवर्सिटी कैटेगरी में JNU शीर्ष पर यूनिवर्सिटी श्रेणी में Jawaharlal Nehru University ने पहला स्थान हासिल किया। विश्वविद्यालय ने अपने मजबूत रिसर्च रिकॉर्ड, अकादमिक उत्कृष्टता और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान के दम पर यह उपलब्धि हासिल की है। दिल्ली यूनिवर्सिटी और जामिया भी टॉप संस्थानों में शामिल University of Delhi और Jamia Millia Islamia ने भी इस वर्ष की रैंकिंग में शानदार प्रदर्शन किया है। दोनों संस्थान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रिसर्च और बेहतर प्लेसमेंट रिकॉर्ड के लिए लंबे समय से जाने जाते हैं। मैनेजमेंट शिक्षा में IIM अहमदाबाद अव्वल मैनेजमेंट संस्थानों की श्रेणी में Indian Institute of Management Ahmedabad शीर्ष स्थान पर रहा। संस्थान लगातार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उत्कृष्ट शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध और प्लेसमेंट प्रदर्शन के लिए पहचान बना रहा है। छात्रों के लिए IIRF रैंकिंग कॉलेज और विश्वविद्यालय चुनने का एक महत्वपूर्ण माध्यम मानी जाती है। यह रैंकिंग संस्थानों की शिक्षा गुणवत्ता, रिसर्च क्षमता, प्लेसमेंट अवसरों और उद्योग जगत से जुड़ाव का व्यापक आकलन प्रस्तुत करती है।
रांची। 12 वीं पास विद्यार्थियों के लिए खुशखबरी है। रांची विश्वविद्यालय और डीएसपीएमयू में नए शैक्षणिक सत्र 2026-30 के लिए स्नातक नामांकन प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। छात्रों के लिए चांसलर पोर्टल खोल दिया गया है, जिसके माध्यम से यूजी रेगुलर और वोकेशनल कोर्स में आवेदन किया जा सकेगा। विश्वविद्यालय प्रशासन ने आवेदन की अंतिम तिथि, चयन सूची जारी करने और कक्षाएं शुरू करने की तारीखों की भी घोषणा कर दी है। डीएसपीएमयू ने पहली बार स्नातक सत्र 2026-30 के लिए नामांकन की अंतिम तिथि 31 जुलाई 2026 निर्धारित की है। साथ ही विश्वविद्यालय ने यह भी निर्णय लिया है कि नई कक्षाएं 3 अगस्त 2026 से शुरू कर दी जाएंगी। राज्य सरकार ने भी सभी सरकारी विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया है कि प्रत्येक वर्ष 31 जुलाई तक नामांकन प्रक्रिया हर हाल में पूरी कर ली जाए, ताकि शैक्षणिक सत्र नियमित रह सके। 26 जून को जारी होगी पहली चयन सूची डीएसपीएमयू में आवेदन प्रक्रिया गुरुवार से शुरू कर दी गई है। छात्र 13 जून 2026 तक चांसलर पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, पहली चयन सूची 26 जून 2026 को जारी की जाएगी। इसके बाद चयनित छात्रों का दस्तावेज सत्यापन और नामांकन प्रक्रिया पूरी की जाएगी। दूसरी ओर रांची विश्वविद्यालय के कुछ अंगीभूत कॉलेजों में क्लस्टर सिस्टम को लेकर चल रहे विवाद के कारण नामांकन प्रक्रिया फिलहाल रुकी हुई है। हालांकि विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले कई अल्पसंख्यक और संबद्ध कॉलेजों में आवेदन प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अल्पसंख्यक कॉलेजों में भी आवेदन शुरू जबकि, विश्वविद्यालय अंतर्गत अल्पसंख्यक कॉलेज संत जेवियर्स कॉलेज, गोस्सनर कॉलेज, निर्मला कॉलेज, मौलाना आजाद कॉलेज, योगदा सत्संग कॉलेज और अन्य सहित संबद्ध कॉलेजों में नामांकन प्रक्रिया चांसलर पोर्टल से शुरू कर दी गई है। विश्वविद्यालय की अधिसूचना के अनुसार आवेदन की अंतिम तिथि 13 जून तय की गई है। पहली चयन सूची 18 जून को जारी होगी, जबकि दस्तावेज सत्यापन और नामांकन प्रक्रिया 19 से 30 जून तक चलेगी।
पटना, एजेंसियां। बिहार में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने घोषणा की है कि जिन लोगों द्वारा डिग्री कॉलेज खोलने के लिए जमीन दान दी जाएगी, उनके नाम पर कॉलेज या उसके किसी हिस्से का नाम रखा जाएगा। यह घोषणा उच्च शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक के दौरान की गई। 211 प्रखंडों में शुरू होगी डिग्री की पढ़ाई मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के 211 ऐसे प्रखंड, जहां अभी तक डिग्री कॉलेज नहीं हैं, वहां 1 जुलाई से डिग्री स्तर की पढ़ाई शुरू की जाएगी। सरकार का उद्देश्य ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों के विद्यार्थियों को उनके क्षेत्र में ही उच्च शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराना है, ताकि उन्हें दूसरे शहरों में जाने की परेशानी न उठानी पड़े। विक्रमशिला यूनिवर्सिटी के लिए जल्द मिलेगी जमीन बैठक में यह भी जानकारी दी गई कि प्रस्तावित विक्रमशिला यूनिवर्सिटी के लिए राज्य सरकार जल्द ही केंद्र सरकार को जमीन उपलब्ध कराएगी। इसके अलावा मुख्यमंत्री ने देश की प्रमुख ओपन यूनिवर्सिटीज का अध्ययन कर बिहार में भी नई ओपन यूनिवर्सिटी स्थापित करने की दिशा में काम करने के निर्देश दिए। आंशिक सहयोग करने वालों को भी सम्मान सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति कॉलेज निर्माण में आंशिक सहयोग करता है, तो उसके नाम पर भी कॉलेज के किसी हिस्से का नामकरण किया जा सकता है। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया कि नए कॉलेज ऐसे स्थानों पर बनाए जाएं जहां विद्यार्थियों को पहुंचने में सुविधा हो। टॉप यूनिवर्सिटीज से होगा समझौता उच्च शिक्षा विभाग को देश की शीर्ष 10 यूनिवर्सिटीज के साथ एमओयू करने का निर्देश दिया गया है, ताकि बिहार के कॉलेजों को बेहतर शैक्षणिक सहयोग और गुणवत्ता मिल सके। बैठक में विभागीय सचिव राजीव रौशन ने विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, शिक्षकों के पद सृजन और विभिन्न योजनाओं की विस्तृत जानकारी भी मुख्यमंत्री को दी।
आज के समय में कॉरपोरेट दुनिया तेजी से बदल रही है और इसके साथ ही प्रोफेशनल एजुकेशन का ट्रेंड भी बदलता जा रहा है। लंबे समय तक Master of Business Administration और Doctor of Philosophy को मैनेजमेंट की सबसे बड़ी डिग्री माना जाता था, लेकिन अब एक नई डिग्री तेजी से लोकप्रिय हो रही है – DBA यानी Doctor of Business Administration। DBA को बिजनेस और मैनेजमेंट सेक्टर की हाई-लेवल डॉक्टरेट डिग्री माना जाता है। खास बात यह है कि इस डिग्री को पूरा करने के बाद उम्मीदवार अपने नाम के आगे “Dr.” भी लगा सकते हैं। क्या है DBA? Doctor of Business Administration यानी DBA एक प्रोफेशनल डॉक्टरेट डिग्री है, जिसे खासतौर पर अनुभवी कॉरपोरेट प्रोफेशनल्स और सीनियर मैनेजर्स के लिए डिजाइन किया गया है। यह डिग्री उन लोगों के लिए होती है जो बिजनेस की वास्तविक समस्याओं पर रिसर्च करना चाहते हैं और अपने प्रैक्टिकल अनुभव को अकादमिक पहचान देना चाहते हैं। इसमें पढ़ाई का फोकस सिर्फ थ्योरी पर नहीं, बल्कि रियल बिजनेस चैलेंज को सॉल्व करने पर होता है। MBA और DBA में क्या अंतर है? MBA क्या है? Master of Business Administration एक पोस्टग्रेजुएट डिग्री है, जिसे ज्यादातर छात्र ग्रेजुएशन के बाद या शुरुआती वर्क एक्सपीरियंस के साथ करते हैं। इस कोर्स में: मैनेजमेंट के बेसिक्स बिजनेस स्ट्रेटेजी मार्केटिंग फाइनेंस लीडरशिप जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। DBA कैसे अलग है? Doctor of Business Administration MBA से कहीं अधिक एडवांस और हाई-लेवल डिग्री मानी जाती है। DBA में एडमिशन के लिए आमतौर पर: MBA डिग्री 3 से 5 साल का कॉरपोरेट अनुभव जरूरी माना जाता है। यह कोर्स उन लोगों के लिए होता है जो: CXO लेवल तक पहुंचना चाहते हैं इंटरनेशनल बिजनेस लीडरशिप में जाना चाहते हैं रिसर्च और कॉरपोरेट स्ट्रेटेजी में विशेषज्ञ बनना चाहते हैं क्या DBA के बाद ‘Doctor’ लगा सकते हैं? हां, DBA एक मान्यता प्राप्त डॉक्टरेट लेवल की डिग्री है। इस कोर्स को पूरा करने के बाद उम्मीदवार अपने नाम के आगे “Dr.” लगा सकते हैं। कॉरपोरेट और इंटरनेशनल बिजनेस कम्युनिटी में DBA होल्डर्स को काफी सम्मान दिया जाता है और इन्हें कई मामलों में PhD होल्डर्स के बराबर माना जाता है। भारत में कहां से कर सकते हैं DBA? भारत में कई बड़े संस्थान DBA या इसके समकक्ष प्रोग्राम ऑफर करते हैं। प्रमुख संस्थान Indian Institute of Management Ahmedabad Indian Institute of Management Bangalore Indian Institute of Management Calcutta यहां Executive FPM प्रोग्राम ऑफर किए जाते हैं, जिन्हें DBA के बराबर माना जाता है। Indian School of Business यहां Executive DBA (EDBA) प्रोग्राम उपलब्ध है। SP Jain Institute of Management and Research BITS Pilani upGrad Symbiosis International University ये प्लेटफॉर्म विदेशी यूनिवर्सिटीज के साथ मिलकर ऑनलाइन DBA प्रोग्राम भी ऑफर करते हैं। DBA करने के क्या फायदे हैं? कॉरपोरेट दुनिया में हाई-लेवल पहचान CXO और टॉप लीडरशिप रोल्स के अवसर रिसर्च और कंसल्टिंग करियर में फायदा इंटरनेशनल नेटवर्किंग “Doctor” टाइटल का सम्मान
झारखंड के लिए गर्व की बात है कि Indian Institute of Management Ranchi ने पहली बार प्रतिष्ठित QS Executive MBA Ranking 2026 में अपनी जगह बना ली है। यह उपलब्धि न केवल संस्थान के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि अब IIM रांची वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान स्थापित कर रहा है। देश में चौथा स्थान, ग्लोबल और एशिया-पैसिफिक में भी मजबूत उपस्थिति इस रैंकिंग में Indian Institute of Management Ranchi ने भारत के अन्य IIMs के बीच चौथा स्थान हासिल किया है। वहीं, वैश्विक स्तर पर इसे 201+ बैंड में जगह मिली है और एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में 33वां स्थान प्राप्त हुआ है। QS Executive MBA Ranking दुनिया की सबसे विश्वसनीय और प्रतिष्ठित बिजनेस स्कूल रैंकिंग्स में से एक मानी जाती है। किन मानकों पर होती है रैंकिंग? QS Executive MBA Ranking में संस्थानों का मूल्यांकन कई अहम मानकों पर किया जाता है, जिनमें प्लेसमेंट पैकेज, अकादमिक प्रतिष्ठा, करियर ग्रोथ, प्रोफेशनल प्रोफाइल और स्टूडेंट डाइवर्सिटी शामिल हैं। सरल शब्दों में, यह रैंकिंग इस बात का आकलन करती है कि किसी संस्थान से पढ़ाई के बाद छात्रों को कितने बेहतर करियर अवसर मिलते हैं और इंडस्ट्री में उनकी वैल्यू कितनी बढ़ती है। करियर ग्रोथ और इंडस्ट्री कनेक्शन बने सफलता की कुंजी IIM रांची ने इस रैंकिंग में सभी पैरामीटर पर प्रभावशाली प्रदर्शन किया है, खासकर करियर आउटकम्स में इसकी मजबूती साफ नजर आती है। यहां से पढ़ने वाले प्रोफेशनल्स को बेहतर सैलरी ग्रोथ, प्रमोशन के अवसर और मजबूत इंडस्ट्री एक्सपोजर मिलता है। संस्थान की सफलता के पीछे उसकी इंडस्ट्री से गहरी साझेदारी और रिसर्च-ओरिएंटेड अप्रोच अहम भूमिका निभाती है। Indian Institute of Management Ranchi अपने छात्रों को सिर्फ सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि वास्तविक बिजनेस परिस्थितियों का अनुभव भी देता है। ग्लोबल कोलैबोरेशन और आधुनिक पाठ्यक्रम के जरिए संस्थान लगातार अपने शैक्षणिक स्तर को ऊंचा उठा रहा है। Executive MBA प्रोग्राम: प्रोफेशनल्स के लिए खास डिजाइन IIM रांची का Executive MBA प्रोग्राम विशेष रूप से कामकाजी पेशेवरों के लिए तैयार किया गया है। यह दो वर्षीय कोर्स है, जिसमें प्रवेश के लिए कम से कम 3 साल का कार्य अनुभव जरूरी होता है। इस कार्यक्रम में फाइनेंस, मार्केटिंग, ऑपरेशंस, स्ट्रेटेजी और ह्यूमन रिसोर्स जैसे महत्वपूर्ण विषयों के साथ कई वैकल्पिक विषय भी शामिल हैं, जिससे छात्र अपनी जरूरत और करियर लक्ष्यों के अनुसार पढ़ाई को कस्टमाइज कर सकते हैं।
विदेश में उच्च शिक्षा हासिल करने का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के लिए बड़ी खुशखबरी है। यूरोप का खूबसूरत देश Romania अब भारतीय छात्रों को अपने यहां पढ़ने और रिसर्च करने का शानदार मौका दे रहा है। अकादमिक वर्ष 2026-27 के लिए रोमानिया सरकार ने विशेष स्कॉलरशिप की घोषणा की है, जिसके तहत छात्रों को पढ़ाई के साथ-साथ रहने और खाने का खर्च भी दिया जाएगा। यह पहल भारत और रोमानिया के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम का हिस्सा है। Ministry of Education India के माध्यम से छात्रों का नामांकन किया जाएगा, जबकि अंतिम चयन रोमानिया की सरकार करेगी। कितनी अवधि की होगी स्कॉलरशिप? रोमानिया सरकार कुल 20 महीने की स्कॉलरशिप ऑफर कर रही है। हर छात्र को 3 महीने से 10 महीने तक की अवधि के लिए मौका मिलेगा समर कोर्स (रोमानियाई भाषा, संस्कृति और सभ्यता) के लिए अलग से 2 स्कॉलरशिप भी उपलब्ध हैं ध्यान देने वाली बात यह है कि यह स्कॉलरशिप फुल डिग्री (बैचलर्स/मास्टर्स/पीएचडी) के लिए नहीं, बल्कि एक्सचेंज प्रोग्राम और रिसर्च ट्रेनिंग के लिए है। स्कॉलरशिप में क्या-क्या फायदे मिलेंगे? इस स्कॉलरशिप के तहत छात्रों को कई बड़े लाभ दिए जाएंगे: यूनिवर्सिटी एडमिशन और ट्यूशन फीस पूरी तरह माफ हॉस्टल में रहने की सुविधा, जिसका खर्च सरकार उठाएगी हर महीने 925 लेई (लगभग 20,000 रुपये) का भत्ता बीमारी की स्थिति में मुफ्त मेडिकल सुविधा किन शर्तों को पूरा करना होगा? छात्र के पास रोमानियाई यूनिवर्सिटी का ऑफर लेटर होना जरूरी है बैचलर्स या मास्टर्स एक्सचेंज प्रोग्राम के लिए रोमानियाई भाषा का सर्टिफिकेट अनिवार्य है यह स्कॉलरशिप केवल भारतीय छात्रों के लिए उपलब्ध है कैसे करें आवेदन? इच्छुक छात्र SAKSHAT Portal पर जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आवेदन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और अंतिम तिथि 15 मई 2026 निर्धारित की गई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।