सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने NEET पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर 26 दिनों से जारी अपनी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुक्रवार (24 जुलाई) को समाप्त कर दी। हालांकि उन्होंने साफ कहा कि उनका अनशन भले खत्म हो गया हो, लेकिन जवाबदेही की लड़ाई अभी जारी रहेगी। वांगचुक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो जारी कर बताया कि सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों से मिले आश्वासन के बाद उन्होंने यह फैसला लिया। उन्होंने कहा कि सरकार ने संसद में परीक्षा व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही के मुद्दे पर चर्चा कराने का भरोसा दिया है। सरकार ने क्या आश्वासन दिया? सोनम वांगचुक के मुताबिक सरकार ने आश्वासन दिया है कि— परीक्षा व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही पर संसद में चर्चा होगी। कथित NEET पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाएगा। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों और युवाओं के खिलाफ कोई नया मामला दर्ज नहीं किया जाएगा। "अनशन खत्म हुआ, संघर्ष नहीं" वीडियो संदेश में वांगचुक ने कहा, "मैंने अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी है, लेकिन अब असली काम जवाबदेही तय करने का है। सरकार से मिले आश्वासन के बाद मैंने यह फैसला लिया है। उम्मीद है कि भविष्य में NEET जैसी परीक्षाओं में गड़बड़ियां रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।" देर रात हुई थी मंत्रियों से मुलाकात गुरुवार (23 जुलाई) देर रात केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ने गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में सोनम वांगचुक से मुलाकात की। बैठक के दौरान सरकार की ओर से आवश्यक कदम उठाने का भरोसा दिया गया, जिसके बाद वांगचुक ने अपना अनशन समाप्त करने का निर्णय लिया। वांगचुक ने X पर लिखा कि उन्होंने जेपी नड्डा, जितेंद्र सिंह और लेह-लद्दाख एपेक्स बॉडी के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में 26 दिन बाद अपना अनशन समाप्त किया। पीएम मोदी ने की सेहत का ध्यान रखने की अपील सोनम वांगचुक के अनशन समाप्त करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की। प्रधानमंत्री ने कहा कि वांगचुक डॉक्टरों की सलाह का पालन करें और अपने स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखें।
सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को दिल्ली हाई कोर्ट की अनुमति के बाद सफदरजंग अस्पताल से गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया। उन्हें एंबुलेंस के जरिए मेदांता ले जाया गया, जहां अब विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनकी निगरानी में इलाज करेगी। यह फैसला वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो की याचिका पर सुनवाई के बाद लिया गया। उन्होंने निजी अस्पताल में इलाज कराने की अनुमति मांगी थी। हाई कोर्ट ने क्या कहा? दिल्ली हाई कोर्ट की पीठ ने निर्देश दिया कि सोनम वांगचुक का इलाज मेदांता अस्पताल के डॉक्टरों की सलाह और निर्धारित मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार किया जाए। अदालत ने अस्पताल प्रबंधन को विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम गठित करने और उनकी नियमित निगरानी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर मिला ट्रांसफर हाई कोर्ट ने एम्स, सफदरजंग अस्पताल और वांगचुक की मेडिकल टीम की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद ट्रांसफर की अनुमति दी। अदालत ने यह भी आदेश दिया कि सफदरजंग अस्पताल वांगचुक के सभी मेडिकल रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट मेदांता अस्पताल को उपलब्ध कराए, ताकि इलाज में कोई बाधा न आए। केंद्र सरकार ने नहीं किया विरोध सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार को वांगचुक को मेदांता अस्पताल भेजे जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि वांगचुक को लगातार मेडिकल निगरानी की जरूरत है और अस्पताल से छुट्टी देने का फैसला केवल डॉक्टरों की सलाह पर ही होना चाहिए। डिस्चार्ज के समय क्या थी स्वास्थ्य स्थिति? सफदरजंग अस्पताल की ओर से जारी बयान में कहा गया कि डिस्चार्ज के समय वांगचुक के वाइटल पैरामीटर स्थिर थे। हालांकि, उन्हें पैनसाइटोपेनिया की समस्या बनी हुई है और उनका सीरम पोटैशियम स्तर 3.4 mEq/L दर्ज किया गया, जिसके चलते डॉक्टरों ने लगातार निगरानी की सलाह दी है। पत्नी ने लगाया 'हिरासत' जैसा व्यवहार का आरोप वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने हाई कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए आरोप लगाया कि सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराना एक तरह की हिरासत जैसा था। उन्होंने कहा कि पुलिस वांगचुक को अस्पताल लेकर गई और उन्हें बिना आवश्यकता आईसीयू में रखा गया। साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के इस्तेमाल पर रोक होने के कारण वह परिवार और समर्थकों से संपर्क भी नहीं कर पा रहे थे। 'हालत गंभीर नहीं, लेकिन निगरानी जरूरी' गीतांजलि आंग्मो ने कहा कि वांगचुक की कुछ मेडिकल रिपोर्ट सामान्य नहीं हैं, लेकिन उनकी स्थिति फिलहाल जानलेवा नहीं है। उन्होंने कहा कि इलाज के दौरान मरीज की मानसिक स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है और परिवार को यह अधिकार होना चाहिए कि वह तय करे कि मरीज का इलाज किस अस्पताल में कराया जाए। 28 जून से अनशन पर हैं वांगचुक सोनम वांगचुक 28 जून से कथित परीक्षा अनियमितताओं के विरोध में अनिश्चितकालीन अनशन पर हैं। दिल्ली पुलिस ने 19 जुलाई को उन्हें चिकित्सकीय जरूरत और न्यायिक निर्देशों का हवाला देते हुए सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया था। अब हाई कोर्ट के आदेश के बाद उनका इलाज गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में जारी रहेगा।
सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल मंगलवार को 24वें दिन में पहुंच गई। स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती वांगचुक की हालत फिलहाल स्थिर बताई जा रही है, लेकिन डॉक्टरों ने स्पष्ट किया है कि उनकी सेहत पर लगातार नजर रखना जरूरी है। लंबे समय तक भोजन नहीं करने और शरीर में पानी की कमी के कारण मेडिकल टीम उनकी नियमित जांच कर रही है। क्या है सोनम वांगचुक का ताजा हेल्थ अपडेट? डॉक्टरों के मुताबिक सोनम वांगचुक की स्थिति फिलहाल स्थिर है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं है। ब्लड शुगर सामान्य से कम बना हुआ है, जिससे कमजोरी और अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जोखिम बना हुआ है। जांच में पोटैशियम का स्तर 3.2 mEq/L पाया गया है, जो सामान्य सीमा से कम है। खून की जांच में एनीमिया के लक्षण मिले हैं। सफेद रक्त कोशिकाओं (WBC) की संख्या भी कम पाई गई है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि लंबे उपवास के कारण शरीर में डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) की स्थिति बनी हुई है, इसलिए उनकी लगातार निगरानी की जा रही है। इलाज कैसे चल रहा है? डॉक्टरों की सलाह पर सोनम वांगचुक फिलहाल ORS और पोटैशियम सप्लीमेंट ले रहे हैं। मेडिकल टीम ने उन्हें शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट की कमी दूर करने के लिए IV फ्लूइड और ग्लूकोज लेने की सलाह दी है, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। सफदरजंग अस्पताल और AIIMS के विशेषज्ञ डॉक्टरों की संयुक्त टीम उनकी स्वास्थ्य स्थिति की लगातार समीक्षा कर रही है। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि जरूरत के अनुसार सभी चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। 28 जून से जारी है भूख हड़ताल सोनम वांगचुक 28 जून से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। वह केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं। अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी उन्होंने अपना अनशन समाप्त नहीं किया है। 18 जुलाई को बिगड़ी थी तबीयत लगातार तीन सप्ताह तक भूख हड़ताल करने के बाद 18 जुलाई को उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। इसके बाद दिल्ली पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल लेकर गई, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज शुरू किया गया। अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी वांगचुक ने आंदोलन जारी रखने की इच्छा जताई थी। उन्होंने CJP के 'संसद चलो मार्च' में शामिल होने के लिए अस्पताल से डिस्चार्ज करने की भी मांग की थी, लेकिन डॉक्टरों ने स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उन्हें अस्पताल में ही रहने की सलाह दी। एक नजर में पूरा हेल्थ अपडेट अनशन का आज: 24वां दिन अस्पताल: सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली हालत: फिलहाल स्थिर ब्लड शुगर: सामान्य से कम पोटैशियम: 3.2 mEq/L एनीमिया: जांच में पुष्टि WBC: सामान्य से कम क्या ले रहे हैं: ORS और पोटैशियम की दवा क्या लेने से इनकार किया: IV फ्लूइड और ग्लूकोज इलाज: सफदरजंग और AIIMS के विशेषज्ञों की संयुक्त टीम की निगरानी में डॉक्टरों का कहना है कि फिलहाल वांगचुक की स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन लंबे समय तक जारी भूख हड़ताल के कारण किसी भी तरह की चिकित्सीय जटिलता से बचने के लिए 24 घंटे निगरानी और नियमित मेडिकल जांच बेहद जरूरी है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपनी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल समाप्त करने के लिए तीन शर्तें रखी हैं। उन्होंने कहा है कि यदि सरकार शिक्षा व्यवस्था में हुई विफलताओं की जिम्मेदारी स्वीकार करती है या राजनीतिक दल संसद में इस मुद्दे को उठाने का स्पष्ट आश्वासन देते हैं, तभी वह अपना अनशन समाप्त करेंगे। इसी बीच, आज 'चलो संसद' मार्च का भी आह्वान किया गया है, जिसके मद्देनजर दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। ये हैं सोनम वांगचुक की तीन शर्तें वांगचुक ने अपने संदेश में कहा कि वह भूख हड़ताल तभी समाप्त करेंगे जब: केंद्र सरकार शिक्षा व्यवस्था में हालिया विफलताओं और पेपर लीक जैसी घटनाओं की जिम्मेदारी स्वीकार करे। उन्हें और सीजेपी (CJP) के नेतृत्व को संसद तक पहुंचने दिया जाए, जहां विभिन्न दलों के सांसद और नेता सार्वजनिक रूप से यह आश्वासन दें कि वे इन मुद्दों को संसद में उठाएंगे। यदि स्वास्थ्य कारणों या अन्य वजहों से उनका संसद तक पहुंचना संभव न हो, तो विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसद और नेता अस्पताल पहुंचकर उन्हें यह आश्वासन दें। आज प्रस्तावित है 'चलो संसद' मार्च वांगचुक के समर्थकों ने आज जंतर-मंतर से संसद तक मार्च का आह्वान किया है। हालांकि दिल्ली पुलिस का कहना है कि मार्च के लिए आवश्यक अनुमति नहीं ली गई है। इसके चलते जंतर-मंतर और संसद मार्ग के आसपास भारी पुलिस बल तैनात किया गया है तथा कई इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। अस्पताल से जारी किया संदेश सोनम वांगचुक फिलहाल अस्पताल में भर्ती हैं। उन्होंने वहीं से जारी संदेश में कहा कि उनका आंदोलन किसी व्यक्तिगत मांग के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय करने और छात्रों के हितों की रक्षा के लिए है। उनकी पत्नी गितांजलि आंग्मो ने भी कहा है कि यदि संसद में शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर ठोस पहल होती है तो वांगचुक अनशन समाप्त करने पर विचार करेंगे। राजनीतिक हलचल तेज मानसून सत्र के पहले दिन इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। कई विपक्षी नेताओं ने वांगचुक के समर्थन में आवाज उठाई है, जबकि सरकार की ओर से अभी तक उनकी शर्तों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। ऐसे में आज का 'चलो संसद' मार्च और संसद की कार्यवाही दोनों पर देशभर की नजरें टिकी हुई हैं।
दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अस्पताल से जारी एक नए संदेश में कहा है कि वे अपना लंबा भूख हड़ताल समाप्त करने के लिए तैयार हैं, लेकिन इसके लिए केंद्र सरकार को उनकी तीन शर्तों पर सकारात्मक कदम उठाने होंगे। वांगचुक का कहना है कि उनकी मांगें शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और लोकतांत्रिक संवाद से जुड़ी हैं। पहली शर्त: शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही सोनम वांगचुक ने कहा कि यदि केंद्र सरकार शिक्षा व्यवस्था में सामने आई गड़बड़ियों, विशेष रूप से कथित परीक्षा पेपर लीक मामलों की जिम्मेदारी स्वीकार करे और दोषियों की जवाबदेही तय करे, तो वह अपना अनशन समाप्त करने पर विचार करेंगे। दूसरी शर्त: संसद तक जाने की अनुमति उन्होंने कहा कि यदि पहली मांग नहीं मानी जाती है, तो उन्हें और उनके साथियों को संसद तक जाने की अनुमति दी जाए, ताकि वे अपनी मांगें सीधे सांसदों और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के सामने रख सकें। वांगचुक ने कहा कि यदि संसद में विभिन्न दलों के सांसद उन्हें भरोसा दिलाते हैं कि उनके मुद्दों को सदन में उठाया जाएगा, तो वे अपना निर्णय बदलने पर विचार कर सकते हैं। तीसरी शर्त: सांसद अस्पताल आकर दें आश्वासन सोनम वांगचुक ने कहा कि यदि स्वास्थ्य कारणों या किसी अन्य वजह से वे संसद नहीं जा पाते हैं, तो विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसद और नेता अस्पताल आकर उन्हें यह भरोसा दें कि उनकी मांगों को संसद में उठाया जाएगा। ऐसी स्थिति में भी वे अपना अनशन समाप्त करने पर विचार करेंगे। अस्पताल में रखने पर भी जताई आपत्ति अपने संदेश में वांगचुक ने यह भी दावा किया कि उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में रखा गया है। उन्होंने इसे "गैरकानूनी हिरासत" बताया और कहा कि वे अब भी अपनी मांगों पर कायम हैं तथा सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं। मानसून सत्र के बीच बढ़ा मुद्दा गौरतलब है कि संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हो रहा है। ऐसे में वांगचुक का यह बयान राजनीतिक और संसदीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। फिलहाल, उनकी मांगों पर केंद्र सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर शनिवार को उस समय हंगामे की स्थिति बन गई, जब पिछले 20 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को पुलिस इलाज के लिए सफदरजंग अस्पताल लेकर गई। इसके बाद पुलिस ने प्रदर्शन स्थल खाली कराते हुए वहां मौजूद प्रदर्शनकारियों को हटाया और कई लोगों को हिरासत में भी लिया। इस दौरान महिला प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। न्यूज एजेंसी एएनआई द्वारा साझा किए गए वीडियो में पुलिस महिला प्रदर्शनकारियों को जबरन हटाती दिखाई दे रही है। वीडियो में एक महिला कार्यकर्ता पुलिस कार्रवाई का विरोध करते हुए चिल्लाती है, "हम प्रदर्शन क्यों नहीं करें?" वहीं, कुछ प्रदर्शनकारी जमीन पर बैठकर विरोध जताते रहे, जिन्हें पुलिसकर्मियों ने उठाकर वहां से बाहर ले जाया। महिला प्रदर्शनकारियों को उठाकर ले गई पुलिस वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कई महिला प्रदर्शनकारी प्रदर्शन स्थल छोड़ने को तैयार नहीं थीं। इसके बाद पुलिसकर्मियों ने उन्हें पकड़कर और उठाकर वहां से हटाया। कुछ प्रदर्शनकारियों को पुलिस वाहन तक ले जाया गया, जबकि कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया। पुलिस की इस कार्रवाई के दौरान जंतर-मंतर पर भारी संख्या में सुरक्षाबल तैनात रहे। मौके पर मौजूद प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई का विरोध करते हुए नारेबाजी भी की। सफदरजंग अस्पताल में भर्ती हैं सोनम वांगचुक एएनआई के मुताबिक, सूत्रों ने बताया कि सोनम वांगचुक को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया है। डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा है। अस्पताल सूत्रों के अनुसार, वह पूरी तरह होश में हैं और उनकी हालत फिलहाल स्थिर बताई जा रही है। हाई कोर्ट के आदेश के बाद हुई कार्रवाई दिल्ली पुलिस का कहना है कि दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देश और डॉक्टरों की सलाह के बाद सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत को देखते हुए उन्हें अस्पताल भेजा गया। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि कार्रवाई का उद्देश्य उनकी सुरक्षा और इलाज सुनिश्चित करना था। साथ ही पुलिस ने जंतर-मंतर पर मौजूद सभी प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्वक प्रदर्शन समाप्त कर स्थल खाली करने की अपील की। हालांकि, प्रदर्शनकारियों ने इस कार्रवाई का विरोध करते हुए इसे आंदोलन को दबाने की कोशिश बताया। सोनम वांगचुक की सेहत और उनके आंदोलन को लेकर आगे क्या फैसला होता है, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले 21 दिनों से जंतर-मंतर पर आमरण अनशन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को शनिवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनकी लगातार बिगड़ती सेहत को देखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने तत्काल चिकित्सकीय निगरानी में भर्ती करने का निर्देश दिया था। कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली पुलिस जंतर-मंतर पहुंची और उन्हें अस्पताल लेकर गई। न्यूज एजेंसी एएनआई के अनुसार, फिलहाल सोनम वांगचुक की तबीयत स्थिर बताई जा रही है। उन्हें सफदरजंग अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया है, जहां उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। जंतर-मंतर पर तैनात रहा भारी पुलिस बल शनिवार सुबह कोर्ट के आदेश के बाद जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया। पुलिस की मौजूदगी के बीच वांगचुक को अस्पताल ले जाया गया। इस दौरान उनके समर्थकों ने पुलिस की कार्रवाई का विरोध किया और इसे आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश बताया। प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोगों में वांगचुक की सेहत को लेकर भी चिंता साफ दिखाई दी। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन समाप्त करने और जंतर-मंतर खाली करने की अपील की। पुलिस का कहना है कि हाई कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए वांगचुक को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के लिए अस्पताल ले जाया गया है। 21 दिनों से आमरण अनशन पर हैं वांगचुक सोनम वांगचुक पिछले तीन सप्ताह से केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर आमरण अनशन कर रहे हैं। लंबे समय से भोजन न लेने के कारण उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी, जिसके बाद मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कराने का निर्देश दिया। CJP ने लगाया लाठीचार्ज का आरोप इस बीच सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया कि पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे CJP समर्थकों पर लाठीचार्ज किया। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ बल प्रयोग किया गया। हालांकि, इस आरोप पर दिल्ली पुलिस की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। फिलहाल सोनम वांगचुक का इलाज डॉक्टरों की निगरानी में जारी है। वहीं, उनके समर्थक आंदोलन को जारी रखने की बात कह रहे हैं। अब सभी की नजर वांगचुक की सेहत और आंदोलन के अगले कदम पर बनी हुई है।
नई दिल्ली: फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप ने सामाजिक कार्यकर्ता और इंजीनियर सोनम वांगचुक के आमरण अनशन का समर्थन करते हुए सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने पोस्ट में अनुराग कश्यप ने कहा कि लंबे समय से जारी भूख हड़ताल के बावजूद सरकार की चुप्पी चिंता का विषय है। सोनम वांगचुक पिछले कई दिनों से जंतर-मंतर पर अपनी विभिन्न मांगों को लेकर आमरण अनशन पर हैं। उनकी सेहत को लेकर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों और समर्थकों ने भी चिंता जताई है तथा उनसे अनशन समाप्त करने की अपील की है। अनुराग कश्यप ने क्या कहा? अनुराग कश्यप ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर लिखा कि एक समय भूख हड़ताल लोकतांत्रिक विरोध का एक प्रभावी माध्यम माना जाता था और लोग गंभीर मुद्दों पर ही इस रास्ते को अपनाते थे। उन्होंने लिखा कि किसी व्यक्ति का आमरण अनशन पर बैठना इस बात का संकेत है कि वह न्याय और अपने मुद्दे को लेकर पूरी प्रतिबद्धता के साथ संघर्ष कर रहा है। अनुराग ने यह भी कहा कि वे स्वयं इस तरह का कदम उठाने की हिम्मत नहीं रखते, लेकिन सोनम वांगचुक के समर्थन में खड़े हैं। सरकार की चुप्पी पर जताई नाराजगी अपने पोस्ट में अनुराग कश्यप ने सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि लंबे समय तक किसी प्रकार की प्रतिक्रिया न आना चिंताजनक है। उन्होंने सत्ता पक्ष की चुप्पी की आलोचना करते हुए तीखी भाषा का इस्तेमाल किया और इसे लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उनके एक अन्य सोशल मीडिया पोस्ट में भी सरकार के प्रति कड़ी आलोचना देखने को मिली, जिसमें उन्होंने अपनी असहमति व्यक्त करते हुए कठोर शब्दों का प्रयोग किया। कई कलाकार भी जता चुके हैं चिंता सोनम वांगचुक के अनशन को लेकर फिल्म और कला जगत की कई हस्तियों ने भी चिंता व्यक्त की है। कई कलाकारों ने उनकी सेहत को ध्यान में रखते हुए उनसे आमरण अनशन समाप्त करने की अपील की है। क्या हैं सोनम वांगचुक की प्रमुख मांगें? सोनम वांगचुक जंतर-मंतर पर अपनी विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके प्रमुख मुद्दों में: NEET पेपर लीक मामले में जवाबदेही तय करने की मांग। केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग। लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग। वांगचुक का कहना है कि यदि उनकी प्रमुख मांगों पर सकारात्मक निर्णय लिया जाता है तो वह अपना अनशन समाप्त करने पर विचार करेंगे। स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता लंबे समय से जारी भूख हड़ताल के कारण सोनम वांगचुक की सेहत को लेकर चिंता बढ़ गई है। डॉक्टर लगातार उनकी स्वास्थ्य जांच कर रहे हैं और समर्थक उनसे अनशन समाप्त करने की अपील कर रहे हैं। फिलहाल सरकार की ओर से उनकी मांगों पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। वहीं, यह मामला सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की लगातार जारी भूख हड़ताल के बीच दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके स्वास्थ्य को लेकर अहम निर्देश जारी किए हैं। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने कहा कि हर नागरिक का जीवन कीमती है और किसी के जीवन को जोखिम में नहीं डाला जा सकता। अदालत ने सरकारी डॉक्टरों को वांगचुक के स्वास्थ्य की नियमित जांच करने तथा चिकित्सकीय आवश्यकता पड़ने पर उचित हस्तक्षेप करने का निर्देश दिया। अदालत ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका का निस्तारण भी कर दिया। सरकार ने कोर्ट को दिया स्वास्थ्य निगरानी का भरोसा सुनवाई के दौरान केंद्र और दिल्ली सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में पेश हुए। उन्होंने अदालत को आश्वासन दिया कि सरकारी चिकित्सकों की टीम सोनम वांगचुक की नियमित स्वास्थ्य जांच करेगी और जरूरत पड़ने पर आवश्यक चिकित्सकीय कदम उठाए जाएंगे। इस आश्वासन के बाद अदालत ने संतोष जताते हुए स्वास्थ्य निगरानी जारी रखने के निर्देश दिए। 19वें दिन भी जारी है भूख हड़ताल सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल गुरुवार को 19वें दिन में प्रवेश कर गई। डॉक्टरों के अनुसार, लंबे उपवास के कारण उनका वजन 9 किलोग्राम से अधिक घट चुका है। चिकित्सकों ने बताया कि लगातार उपवास से उनके ब्लड शुगर का स्तर कम हो रहा है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। हालांकि, फिलहाल वह सक्रिय हैं और डॉक्टरों की टीम लगातार उनकी स्थिति पर नजर बनाए हुए है। 20 जुलाई को संसद मार्च की अपील सोनम वांगचुक ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी एक वीडियो संदेश में कहा कि उनकी तबीयत पूरी तरह ठीक नहीं है, लेकिन स्थिति नियंत्रण में है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक वह अपना अनशन जारी रखेंगे। साथ ही उन्होंने लोगों से 20 जुलाई को संसद तक प्रस्तावित शांतिपूर्ण मार्च में शामिल होने की अपील करते हुए कहा कि आंदोलन को मजबूत करना ही उनके समर्थन का सबसे प्रभावी तरीका होगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के समर्थन में खुला पत्र जारी किया है। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों के आंदोलन को उचित बताते हुए सरकार से उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करने की अपील की है। साथ ही, उन्होंने वांगचुक से स्वास्थ्य कारणों को देखते हुए अपना अनिश्चितकालीन अनशन समाप्त करने का आग्रह किया है। 'देश को आपकी आवाज़ की ज़रूरत है' अपने पत्र में शशि थरूर ने सोनम वांगचुक से कहा कि देश को उनकी आवाज़ और नेतृत्व की आवश्यकता है। उन्होंने लिखा कि आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए उनका स्वस्थ रहना अधिक जरूरी है, इसलिए उन्हें भूख हड़ताल समाप्त कर संवाद और लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखना चाहिए। छात्रों के संघर्ष को बताया जायज़ थरूर ने कहा कि पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ियों से सबसे अधिक नुकसान मेहनत करने वाले सामान्य परिवारों के छात्रों को होता है। उन्होंने लिखा कि यह केवल परीक्षा का नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य और उनके विश्वास का भी सवाल है। सरकार से बातचीत की अपील कांग्रेस सांसद ने केंद्र सरकार से प्रदर्शन कर रहे छात्रों और आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों के साथ सार्थक बातचीत करने की अपील की। उन्होंने कहा कि युवाओं की चिंताओं का समाधान संवाद के माध्यम से निकाला जाना चाहिए। मानसून सत्र में उठ सकता है मुद्दा शशि थरूर ने संकेत दिया कि प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और छात्रों की मांगों का मुद्दा संसद के आगामी मानसून सत्र में भी उठाया जा सकता है। उनका कहना है कि युवाओं का भरोसा बनाए रखना लोकतंत्र और शिक्षा व्यवस्था दोनों के लिए जरूरी है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। शिक्षा सुधारक और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल गुरुवार को 19वें दिन भी जारी रही। बिगड़ती सेहत के बीच जारी एक वीडियो संदेश में उन्होंने साफ कहा कि वह अभी अपना अनशन समाप्त नहीं करेंगे। उन्होंने लोगों से अपील की कि उनसे अनशन तोड़ने की मांग करने के बजाय 20 जुलाई को संसद तक प्रस्तावित शांतिपूर्ण मार्च में शामिल होकर आंदोलन का समर्थन करें। 'अभी अनशन नहीं तोड़ूंगा' वीडियो संदेश में सोनम वांगचुक ने कहा, "मैं अच्छी स्थिति में नहीं हूं, लेकिन इतनी भी खराब हालत में नहीं हूं। मुझसे अनशन खत्म करने के लिए मत कहिए, बल्कि 20 जुलाई को संसद मार्च में शामिल होकर इस आंदोलन को मजबूत कीजिए।" उनका कहना है कि आंदोलन का उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता डॉक्टरों के अनुसार, लगातार भूख हड़ताल के कारण वांगचुक का वजन करीब 8.9 किलोग्राम तक घट चुका है। वह बेहद कमजोर हैं और चिकित्सकीय निगरानी में हैं। हालांकि उनकी जीवन रक्षक जांचों पर लगातार नजर रखी जा रही है। दिल्ली हाई कोर्ट में पहुंचा मामला वांगचुक की बिगड़ती सेहत को लेकर दायर जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनवाई के लिए सहमति जताई है। याचिका में उनकी चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित करने और सरकार से आवश्यक कदम उठाने की मांग की गई है। 20 जुलाई को संसद मार्च का आह्वान वांगचुक ने देशभर के छात्रों, युवाओं और नागरिकों से 20 जुलाई को संसद तक शांतिपूर्ण मार्च में शामिल होने की अपील की है। उनका कहना है कि यह आंदोलन केवल उनकी भूख हड़ताल नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार और पारदर्शिता की लड़ाई है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चल रहा विरोध प्रदर्शन मंगलवार को अपने 11वें दिन में पहुंच गया। यह आंदोलन शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, पर्यावरण संरक्षण और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर चलाया जा रहा है। इसी प्रदर्शन के तहत पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का आज तीसरा दिन है। लगातार उपवास के चलते उनका ब्लड शुगर लेवल घटकर 66 तक पहुंच गया है, जो सामान्य स्तर से काफी नीचे है। इससे उनके समर्थकों और डॉक्टरों की चिंता बढ़ गई है। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके के अनुसार, वांगचुक पिछले तीन दिनों से सिर्फ पानी और नमक के सहारे भूख हड़ताल पर हैं, और डॉक्टर नियमित रूप से उनकी नाड़ी, ब्लड प्रेशर तथा अन्य स्वास्थ्य संकेतकों की निगरानी कर रहे हैं। उन्होंने आगाह किया कि यदि स्थिति और बिगड़ती है तो मामला गंभीर हो सकता है। छात्र, शिक्षक, युवा और सामाजिक कार्यकर्ता आंदोलन के 11वें दिन भी बड़ी संख्या में छात्र, शिक्षक, युवा और सामाजिक कार्यकर्ता धरना स्थल पर पहुंचे और शांतिपूर्ण तरीके से नारेबाजी करते हुए सरकार से ठोस कदम उठाने की अपील की। आयोजकों का कहना है कि यह आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि देश के छात्रों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा है। प्रदर्शनकारी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता प्रदर्शनकारी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई और सरकारी भर्तियों में जवाबदेही की मांग के साथ-साथ पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों को भी उठा रहे हैं। उनका कहना है कि अच्छी शिक्षा और सुरक्षित पर्यावरण दोनों देश के विकास के लिए जरूरी हैं। धरना स्थल पर रोज विभिन्न राज्यों से लोग पहुंचकर समर्थन दे रहे हैं, कुछ सांकेतिक उपवास रख रहे हैं तो कुछ कई दिनों से डटे हुए हैं। आयोजकों ने स्पष्ट किया है कि जब तक सरकार मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं करती, आंदोलन जारी रहेगा।
तमिलनाडु में किसानों ने अपनी मांगों को लेकर मुख्यमंत्री C. Joseph Vijay की सरकार के खिलाफ आंदोलन का ऐलान कर दिया है। किसान संगठनों का आरोप है कि सरकार चुनावी घोषणा पत्र में किए गए फसल ऋण माफी के वादे से पीछे हट रही है। किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं, तो 30 जून को पूरे राज्य में भूख हड़ताल की जाएगी। 30 जून को राज्यव्यापी भूख हड़ताल का ऐलान किसान नेता P. R. Pandian ने कहा कि राज्य सरकार को किसानों की मांगों पर तत्काल निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार ने फसल ऋण माफी से जुड़ी मांगों को स्वीकार नहीं किया, तो किसान 30 जून को पूरे तमिलनाडु में भूख हड़ताल कर विरोध प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने कहा, "सरकार ने किसानों से जो वादे किए थे, उन्हें पूरा करना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो किसान राज्यव्यापी आंदोलन करने को मजबूर होंगे।" चुनावी घोषणा पत्र में किया था फसल ऋण माफी का वादा C. Joseph Vijay के नेतृत्व वाली Tamilaga Vettri Kazhagam (टीवीके) ने विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों से कई बड़े वादे किए थे। इनमें सबसे प्रमुख वादा फसल ऋण माफी (Crop Loan Waiver) का था। किसान संगठनों का कहना है कि चुनाव प्रचार के दौरान विजय ने आश्वासन दिया था कि सरकार बनने के बाद सबसे पहले किसानों के कृषि ऋण माफ किए जाएंगे। क्या था टीवीके का चुनावी वादा? टीवीके के चुनावी घोषणा पत्र के अनुसार— 5 एकड़ से कम भूमि वाले किसानों का पूरा कृषि ऋण माफ किया जाएगा। 5 एकड़ से अधिक भूमि वाले किसानों का 50 प्रतिशत कृषि ऋण माफ किया जाएगा। लेकिन हाल ही में सरकार द्वारा जारी संशोधित नीति में केवल 75,000 रुपये तक का ऋण लेने वाले छोटे और सीमांत किसानों का पूरा कर्ज माफ करने की घोषणा की गई है। किसानों ने सरकार पर वादाखिलाफी का लगाया आरोप किसान संगठनों का कहना है कि सरकार ने अपने मूल वादे में बदलाव कर किसानों के साथ अन्याय किया है। उनका आरोप है कि सरकार अब बिना किसी सीमा के सभी किसानों के कृषि ऋण माफ करने की अपनी प्रतिबद्धता से पीछे हट रही है। किसान नेता पी.आर. पांडियन ने कहा कि किसान संगठन सभी कृषि ऋणों की पूर्ण माफी की मांग पर अड़े हुए हैं और जब तक सरकार स्पष्ट घोषणा नहीं करती, आंदोलन जारी रहेगा। सरकार के सामने बढ़ सकती है चुनौती तमिलनाडु में कृषि ऋण माफी का मुद्दा अब राजनीतिक रूप लेता दिख रहा है। यदि 30 जून को राज्यव्यापी भूख हड़ताल होती है, तो मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की सरकार के सामने अपनी पहली बड़ी किसान चुनौती खड़ी हो सकती है। आने वाले दिनों में सरकार और किसान संगठनों के बीच बातचीत इस विवाद की दिशा तय करेगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।