तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच जारी परमाणु वार्ता के बीच ईरान ने अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण को लेकर नया रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि उसके परमाणु ठिकानों तक पहुंच केवल अंतिम समझौते के बाद ही दी जाएगी। तेहरान ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक अमेरिका प्रतिबंधों और दंडात्मक उपायों को हटाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक किसी भी प्रकार के निरीक्षण की अनुमति नहीं दी जाएगी। IAEA प्रमुख की मांग को किया खारिज ईरान के उप विदेश मंत्री Kazem Gharibabadi ने बुधवार को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी International Atomic Energy Agency के महानिदेशक Rafael Grossi की उस टिप्पणी को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने ईरान के परमाणु स्थलों के निरीक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया था। गरीबाबादी ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में परमाणु प्रतिष्ठानों या वहां मौजूद परमाणु सामग्री तक किसी भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी की पहुंच देने की कोई योजना नहीं है। स्विट्जरलैंड में नहीं हुई मुलाकात सोशल मीडिया पर जारी अपने बयान में ईरानी उप विदेश मंत्री ने दावा किया कि ग्रोसी के अनुरोध के बावजूद स्विट्जरलैंड में उनकी कोई बैठक नहीं हुई। उन्होंने कहा कि जिन परमाणु ठिकानों पर हाल के महीनों में हमले हुए हैं, वहां निरीक्षण की अनुमति देने का सवाल अभी विचाराधीन भी नहीं है। इन मुद्दों पर फैसला केवल अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक और अंतिम समझौते के तहत ही लिया जाएगा। प्रतिबंध हटाने को बनाया शर्त गरीबाबादी ने कहा कि निरीक्षण व्यवस्था पर सहमति तभी बन सकती है, जब दूसरी ओर से सभी आर्थिक प्रतिबंधों और अन्य दंडात्मक उपायों को समाप्त करने के लिए व्यावहारिक और भरोसेमंद कदम उठाए जाएं। उन्होंने संकेत दिया कि ईरान किसी भी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं करेगा, जिसमें केवल निगरानी और निरीक्षण की शर्तें हों, लेकिन प्रतिबंधों में राहत का स्पष्ट प्रावधान न हो। परमाणु डील पर बढ़ सकता है गतिरोध विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की इस नई शर्त से परमाणु वार्ता और जटिल हो सकती है। अमेरिका लंबे समय से इस बात पर जोर देता रहा है कि किसी भी समझौते में स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था अनिवार्य होगी, ताकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी सुनिश्चित की जा सके। दूसरी ओर, तेहरान का कहना है कि निरीक्षण और सत्यापन की प्रक्रिया को प्रतिबंधों में राहत से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 'मीडिया दबाव से नहीं बदलेगा ईरान का रुख' ईरानी उप विदेश मंत्री ने अपने बयान में पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि मीडिया के जरिए दबाव बनाने या राजनीतिक माहौल तैयार करने की कोशिशों से ईरान अपनी नीति नहीं बदलेगा। उन्होंने कहा, "मीडिया के शोर-शराबे और दबाव की राजनीति के जरिए इन मुद्दों को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। किसी भी निर्णय का आधार केवल अंतिम समझौता और पारस्परिक प्रतिबद्धताओं का पालन होगा।" अंतिम समझौते पर टिकी निगाहें अमेरिका और ईरान के बीच जारी वार्ता का उद्देश्य परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े विवादों का स्थायी समाधान तलाशना है। निरीक्षण व्यवस्था को लेकर सामने आए नए मतभेदों ने यह संकेत दिया है कि दोनों पक्षों के बीच अभी भी कई अहम मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु निरीक्षण और प्रतिबंधों में राहत का मुद्दा आने वाले दौर की वार्ताओं में सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर चल रही बातचीत के बीच परमाणु निरीक्षण का मुद्दा एक बार फिर विवाद के केंद्र में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी अंतिम समझौते में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को ईरान के परमाणु ठिकानों की जांच की अनुमति देना अनिवार्य होगा। वहीं, ईरान इस तरह की व्यापक निरीक्षण व्यवस्था को स्वीकार करने से इनकार करता नजर आ रहा है। ट्रंप ने ईरान के दावों को बताया गलत पेंसिल्वेनिया में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरानी अधिकारियों के उन दावों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि तेहरान ने किसी व्यापक अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था को मंजूरी नहीं दी है। ट्रंप ने कहा कि ईरानी अधिकारी इस मुद्दे पर गलत जानकारी दे रहे हैं और उन्हें बातचीत में तय हो रही शर्तों की पूरी जानकारी है। उन्होंने कहा, “निरीक्षण व्यवस्था सौ फीसदी तय है। अगर ऐसा नहीं होता तो मैं अभी बातचीत और बैठकों को रद्द कर देता।” IAEA को मिलेगी परमाणु ठिकानों तक पहुंच अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि भविष्य में IAEA के निरीक्षकों को ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों तक पहुंच मिलेगी और वे मौके पर जाकर जांच कर सकेंगे। ट्रंप के अनुसार, किसी भी समझौते की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र और अंतरराष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था जरूरी है। उन्होंने कहा कि उचित समय आने पर निरीक्षक जमीन पर मौजूद होंगे और समझौते के अनुपालन की पुष्टि करेंगे। निरीक्षण व्यवस्था पर दोनों देशों में मतभेद परमाणु निगरानी को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। अमेरिका का मानना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर किसी भी समझौते में स्वतंत्र जांच और सत्यापन की व्यवस्था जरूरी है। वहीं, ईरान कई बार यह कह चुका है कि उसकी परमाणु गतिविधियां शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हैं और अत्यधिक अंतरराष्ट्रीय निगरानी उसकी संप्रभुता के खिलाफ हो सकती है। ईरान ने ट्रंप और जेडी वेंस के दावों को नकारा ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने अमेरिकी दावों को खारिज करते हुए कहा कि परमाणु स्थलों की जांच को लेकर कोई अंतिम समयसीमा तय नहीं हुई है। उन्होंने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस बयान का भी खंडन किया, जिसमें कहा गया था कि ईरान स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए तैयार हो गया है। बघाई ने कहा कि इस विषय पर अभी कई मुद्दों पर चर्चा बाकी है। परमाणु समझौतों में हमेशा अहम रहा है सत्यापन विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान से जुड़े सभी प्रमुख परमाणु समझौतों में निगरानी और सत्यापन सबसे महत्वपूर्ण तत्व रहे हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी देश चाहते हैं कि यह सुनिश्चित किया जाए कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण और नागरिक उद्देश्यों तक सीमित रहे। दूसरी ओर, ईरान का तर्क रहा है कि सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर उसकी चिंताओं को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। 60 दिनों की समयसीमा में आगे बढ़ रही बातचीत अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए समझौते के तहत कई मुद्दों पर चरणबद्ध बातचीत जारी है। दोनों पक्षों ने 60 दिनों के भीतर व्यापक सहमति बनाने की दिशा में काम करने पर सहमति जताई है। स्विट्जरलैंड में हाल में हुई वार्ता में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी अधिकारियों के बीच परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, क्षेत्रीय सुरक्षा, पुनर्निर्माण और होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य हो रही गतिविधियां वार्ता के बाद अमेरिकी प्रशासन ने दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल परिवहन में तेजी आई है और समुद्री गतिविधियां सामान्य होने लगी हैं। अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठनों के अनुसार, क्षेत्र में फंसे हजारों नाविकों और जहाज कर्मियों को सुरक्षित निकालने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। अंतिम समझौते में निरीक्षण बन सकता है सबसे बड़ा मुद्दा विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक शांति समझौते की राह में परमाणु निरीक्षण सबसे संवेदनशील और निर्णायक मुद्दा बन सकता है। ट्रंप के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन किसी भी अंतिम समझौते में निरीक्षण और सत्यापन तंत्र से समझौता करने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तेहरान अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था को लेकर कितना लचीला रुख अपनाता है और क्या दोनों देश किसी साझा समाधान तक पहुंच पाते हैं।
वॉशिंगटन/बर्गेनस्टॉक: अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में हुई दो दिवसीय वार्ता के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दावा किया है कि ईरान अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को दोबारा अपने परमाणु प्रतिष्ठानों तक पहुंच देने पर सहमत हो गया है। यदि यह सहमति औपचारिक रूप लेती है, तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम की अंतरराष्ट्रीय निगरानी फिर से शुरू हो सकेगी। इसी बीच, ट्रंप प्रशासन ने ईरानी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर लगे कुछ प्रतिबंधों में 60 दिनों की अस्थायी छूट देने का फैसला किया है। इस कदम को दोनों देशों के बीच जारी वार्ता को आगे बढ़ाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। अगस्त तक ईरानी तेल निर्यात को मिली राहत अमेरिकी वित्त मंत्रालय की ओर से जारी छूट के तहत अगस्त तक ईरानी कच्चे तेल और उससे जुड़े उत्पादों की बिक्री, परिवहन और कुछ वित्तीय गतिविधियों को सीमित अनुमति दी गई है। यह हाल के वर्षों में ईरान को दी गई सबसे बड़ी आर्थिक रियायतों में से एक मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से ईरान की अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिल सकती है, जो लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में रही है। वेंस का दावा- अमेरिकी किसानों को भी होगा फायदा जेडी वेंस ने कहा कि यदि भविष्य में ईरान की जमी हुई संपत्तियों को जारी किया जाता है, तो उसका एक हिस्सा अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद में इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने कहा, "यदि ईरानी संपत्तियां मुक्त होती हैं, तो इससे अमेरिकी किसानों को लाभ मिलेगा और ईरानी लोगों की खाद्य जरूरतें पूरी करने में भी मदद मिलेगी।" वेंस ने यह भी संकेत दिया कि आगामी 60 दिनों के दौरान तकनीकी स्तर की वार्ताएं जारी रहेंगी, जिनका उद्देश्य एक स्थायी समझौते तक पहुंचना है। IAEA निरीक्षण को लेकर उठे सवाल वेंस के दावों पर कई विशेषज्ञों ने सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना है कि IAEA निरीक्षण की व्यवस्था पहले से ही 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) का हिस्सा थी, जिसे 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समाप्त कर दिया था। कई विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा पहल पुराने ढांचे को ही नए स्वरूप में पुनर्जीवित करने की कोशिश है। वार्ता के दौरान दिखा तनाव स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में हुई वार्ता के दौरान कई बार तनाव की स्थिति भी बनी। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कुछ बयानों और लेबनान से जुड़े मुद्दों पर ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अस्थायी रूप से बैठक छोड़ने की चेतावनी दी थी। उपराष्ट्रपति वेंस के हस्तक्षेप के बाद दोनों पक्ष दोबारा बातचीत की मेज पर लौटे और वार्ता आगे बढ़ सकी। पाकिस्तान और कतर ने निभाई अहम भूमिका पूरी बातचीत के दौरान पाकिस्तान और कतर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। दोनों देशों ने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद बनाए रखने और संभावित समझौते की दिशा में माहौल तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इजरायल समर्थक खेमे में बढ़ी चिंता ईरानी तेल प्रतिबंधों में ढील और परमाणु निगरानी को लेकर चल रही वार्ता ने अमेरिका के इजरायल समर्थक राजनीतिक वर्ग में चिंता बढ़ा दी है। कई नेताओं का मानना है कि प्रतिबंधों में राहत से ईरान को आर्थिक मजबूती मिल सकती है, जिसका क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, अगले 60 दिन अमेरिका और ईरान के रिश्तों के लिए निर्णायक माने जा रहे हैं। यदि दोनों पक्ष बातचीत को आगे बढ़ाने में सफल रहते हैं, तो पश्चिम एशिया में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक नई शुरुआत हो सकती है।
India ने United Arab Emirates के बराकह परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर हुए ड्रोन हमले को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। विदेश मंत्रालय ने इस हमले को “बेहद खतरनाक” बताते हुए खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच सभी पक्षों से संयम बरतने और कूटनीति का रास्ता अपनाने की अपील की है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने सोमवार को जारी बयान में कहा कि यूएई की परमाणु सुविधा को निशाना बनाकर किया गया हमला पूरी तरह अस्वीकार्य है और इससे क्षेत्रीय तनाव खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है। मंत्रालय ने कहा कि किसी भी परमाणु प्रतिष्ठान पर हमला वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है। परमाणु संयंत्र के पास लगी आग यह प्रतिक्रिया अबू धाबी स्थित Barakah Nuclear Power Plant पर हुए ड्रोन हमले के बाद आई है। यूएई अधिकारियों के मुताबिक एक ड्रोन संयंत्र के आंतरिक सुरक्षा क्षेत्र के बाहर लगे बिजली जनरेटर से टकरा गया, जिससे वहां आग लग गई। हालांकि अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि घटना में कोई हताहत नहीं हुआ और न ही किसी प्रकार का रेडियोधर्मी रिसाव हुआ है। संयंत्र की सभी सुरक्षा प्रणालियां सामान्य रूप से काम कर रही हैं और बिजली उत्पादन भी प्रभावित नहीं हुआ। यूएई ने बताया आतंकवादी हमला यूएई सरकार ने इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे “बिना उकसावे का आतंकवादी हमला” करार दिया है। यूएई के विदेश मंत्रालय ने कहा कि देश अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा पर किसी भी खतरे को बर्दाश्त नहीं करेगा। यूएई रक्षा मंत्रालय के अनुसार, सऊदी अरब सीमा की ओर से तीन ड्रोन उनके हवाई क्षेत्र में दाखिल हुए थे। इनमें से दो ड्रोन को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही मार गिराया गया, जबकि एक ड्रोन जनरेटर से टकरा गया। हालांकि यूएई ने आधिकारिक रूप से किसी देश का नाम नहीं लिया है, लेकिन क्षेत्र में ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमलों को लेकर पहले भी Iran और उसके समर्थित गुटों पर आरोप लगते रहे हैं। IAEA ने दी चेतावनी International Atomic Energy Agency ने कहा कि आग लगने के बाद संयंत्र के एक रिएक्टर को आपातकालीन डीजल जनरेटर से बिजली आपूर्ति दी जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था ने परमाणु स्थलों के आसपास अधिकतम सैन्य संयम बरतने की अपील की है और कहा है कि वह हालात पर लगातार नजर बनाए हुए है। अरब जगत का इकलौता चालू परमाणु संयंत्र दक्षिण कोरिया की मदद से करीब 20 अरब डॉलर की लागत से तैयार बराकह परमाणु ऊर्जा संयंत्र वर्ष 2020 से संचालित हो रहा है। यह पूरे अरब जगत का एकमात्र चालू परमाणु बिजलीघर है और अकेले यूएई की लगभग 25 प्रतिशत बिजली जरूरतों को पूरा करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस हमले ने खाड़ी क्षेत्र में पहले से जारी तनाव को और बढ़ा दिया है तथा इससे अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक प्रयासों पर भी असर पड़ सकता है।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। अमेरिका और इजरायल के हमलों के बावजूद ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम लगभग सुरक्षित बना हुआ है। हमलों का सीमित असर The Wall Street Journal की रिपोर्ट के मुताबिक, हफ्तों तक चले हवाई हमलों और मिसाइल स्ट्राइक के बाद भी ईरान के परमाणु ढांचे को पूरी तरह नुकसान नहीं पहुंचाया जा सका। कुछ लैब्स और ‘येलोकेक’ साइट्स जरूर प्रभावित हुई हैं, लेकिन मुख्य इंफ्रास्ट्रक्चर अब भी सक्रिय है। गुप्त सुरंगों में छिपा यूरेनियम रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने अपने वेपन्स-ग्रेड यूरेनियम का बड़ा हिस्सा गहरी भूमिगत सुरंगों में सुरक्षित रखा हुआ है। International Atomic Energy Agency के अनुसार, ईरान के पास करीब 450 किलोग्राम उच्च संवर्धित यूरेनियम मौजूद है, जो परमाणु हथियार बनाने के लिए अहम माना जाता है। सेंट्रीफ्यूज और टेक्नोलॉजी बरकरार विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के पास अब भी उन्नत सेंट्रीफ्यूज और ऐसे गुप्त ठिकाने हैं, जहां यूरेनियम को हथियार-स्तर तक संवर्धित किया जा सकता है। इससे साफ है कि ईरान की परमाणु क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इस्फहान साइट बनी अहम केंद्र रिपोर्ट के मुताबिक, यूरेनियम का एक बड़ा हिस्सा Isfahan स्थित परमाणु साइट के नीचे गहरी सुरंगों में सुरक्षित रखा गया है। यह जगह ईरान के परमाणु कार्यक्रम का महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई है। वैश्विक चिंता बढ़ी इस खुलासे के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन बंद करे, लेकिन ईरान इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं है।
ईरान के बुशहर न्यूक्लियर पावर प्लांट पर बढ़ते खतरे ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। रूस और ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर इस परमाणु संयंत्र पर हमला हुआ, तो इसका असर पूरे खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region) में विनाशकारी हो सकता है। प्लांट के पास गिरा रॉकेट, बढ़ी चिंता इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के मुताबिक, हाल ही में बुशहर प्लांट के पास एक रॉकेट गिरा है। पिछले कुछ हफ्तों में यह चौथी ऐसी घटना है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर रिएक्टर पर सीधा हमला हुआ, तो रेडिएशन सैकड़ों किलोमीटर तक फैल सकता है। पूरे क्षेत्र में फैल सकती है ‘परमाणु आपदा’ IAEA ने चेतावनी दी है कि ऐसी स्थिति में- कई शहरों को खाली कराना पड़ सकता है बड़े पैमाने पर जनहानि हो सकती है हवा और पानी दोनों जहरीले हो सकते हैं इसे विशेषज्ञों ने “रीजनल कैटास्ट्रोफी” यानी क्षेत्रीय आपदा बताया है। पीने के पानी का बड़ा संकट खाड़ी देशों में पीने का पानी बड़े पैमाने पर समुद्र के पानी को साफ कर तैयार किया जाता है। लेकिन अगर समुद्र का पानी रेडियोधर्मी तत्वों से दूषित हो गया, तो- कतर के पास सिर्फ 3 दिन का पानी बचेगा कुवैत और बहरीन अपनी 90% ज़रूरतों के लिए इसी पर आश्रित सऊदी अरब लगभग 70% पानी समुद्र से लेता है ऐसे में पूरे क्षेत्र में भीषण जल संकट पैदा हो सकता है। हवा और समुद्र से फैलेगा जहर रिपोर्ट्स के अनुसार, बुशहर की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि- जहरीली हवाएं UAE, कतर और सऊदी अरब तक पहुंच सकती हैं समुद्री लहरें 10–15 दिनों में कुवैत और बहरीन के तटों तक रेडिएशन फैला सकती हैं सेहत पर गंभीर असर IAEA और WHO के अनुसार- लोगों को स्किन बर्न और गंभीर बीमारियां हो सकती हैं कैंसर का खतरा कई पीढ़ियों तक बना रहेगा सीजियम-137 जैसे रेडियोधर्मी तत्व दशकों तक मिट्टी और भोजन में बने रह सकते हैं वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर अगर ऐसी आपदा हुई, तो- मछली उद्योग खत्म हो सकता है तेल सप्लाई प्रभावित होगी वैश्विक बाजार में भारी आर्थिक संकट आ सकता है फिलहाल स्थिति सामान्य, लेकिन खतरा बरकरार राहत की बात यह है कि अभी रेडिएशन स्तर सामान्य बताया गया है। लेकिन लगातार बढ़ते हमलों के बीच यह खतरा टला नहीं है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।