तेहरान: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की तैयारियां तेज हो गई हैं। राजधानी तेहरान में जगह-जगह बैनर लगाकर लोगों से अंतिम यात्रा में शामिल होने की अपील की जा रही है। ईरानी सरकार का अनुमान है कि शनिवार से शुरू होने वाले अंतिम संस्कार कार्यक्रम में लाखों लोग शामिल होंगे। सरकारी अधिकारियों का मानना है कि यह जनसैलाब वर्ष 1989 में अयातुल्ला रूहुल्ला खुमैनी के अंतिम संस्कार की याद ताजा कर सकता है। ग्रैंड मोसल्ला में रखे गए ताबूत तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला परिसर में अयातुल्ला अली खामेनेई का ताबूत ईरानी राष्ट्रीय ध्वज में लपेटकर रखा गया है। उनके साथ उन परिजनों के ताबूत भी रखे गए हैं, जिनकी हालिया संघर्ष के दौरान इजरायली हवाई हमलों में मौत हुई थी। इनमें उनके दामाद, सबसे बड़ी बेटी, 14 महीने की नातिन और नए सर्वोच्च नेता घोषित किए गए अयातुल्ला मुजतबा खामेनेई की पत्नी भी शामिल हैं। श्रद्धांजलि देने पहुंचे धार्मिक और विदेशी प्रतिनिधि देश-विदेश से पहुंचे धार्मिक नेताओं, सरकारी प्रतिनिधियों और विदेशी मेहमानों ने ताबूत के पास जाकर श्रद्धांजलि अर्पित की। सैन्य बैंड ने शोक धुन बजाई, जबकि कई श्रद्धालुओं ने परंपरा के अनुसार अपने स्कार्फ और अन्य वस्तुओं को ताबूत से स्पर्श कराकर श्रद्धा व्यक्त की। 'या हुसैन' वाला लाल झंडा बना आकर्षण खामेनेई के ताबूत पर लाल रंग का झंडा भी रखा गया है, जिस पर सफेद अक्षरों में "या हुसैन" लिखा हुआ है। शिया परंपरा में यह झंडा अन्याय के खिलाफ संघर्ष और बलिदान का प्रतीक माना जाता है। सरकार के लिए शक्ति प्रदर्शन का अवसर विश्लेषकों के अनुसार, यह अंतिम संस्कार केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं बल्कि हालिया संघर्ष के बाद सरकार के लिए जनसमर्थन दिखाने का बड़ा अवसर भी है। ईरान इस समय अमेरिका के साथ युद्धविराम और शांति वार्ता के दौर से गुजर रहा है। वहीं, इजरायल के साथ तनाव भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ऐसे में यह आयोजन राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सैन्य नेतृत्व भी रहा मौजूद कार्यक्रम में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के प्रमुख जनरल अहमद वाहिदी समेत कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, सरकारी प्रतिनिधि, धार्मिक नेता और विभिन्न देशों के मेहमान शामिल हुए। मुजतबा खामेनेई की मौजूदगी पर सस्पेंस ईरान के नए सर्वोच्च नेता घोषित किए गए अयातुल्ला मुजतबा खामेनेई अब तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, हालिया संघर्ष के दौरान उनके घायल होने की चर्चा है। हालांकि अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि वे अपने पिता के अंतिम संस्कार में सार्वजनिक रूप से शामिल होंगे या नहीं। ईरान की कड़ी चेतावनी मुजतबा खामेनेई को लेकर इजरायल की ओर से सामने आई कथित धमकियों के बाद ईरान की संयुक्त सैन्य कमान ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि यदि अमेरिका, इजरायल या उनके सहयोगियों ने ईरान के खिलाफ कोई सैन्य कार्रवाई की, तो उसका "कड़ा और निर्णायक जवाब" दिया जाएगा। 9 जुलाई को होगा अंतिम संस्कार ईरानी सरकार के अनुसार, अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की औपचारिक शुरुआत शनिवार से होगी। उनकी पार्थिव देह को श्रद्धांजलि के लिए ईरान और पड़ोसी इराक के विभिन्न शहरों में ले जाया जाएगा। इसके बाद 9 जुलाई 2026 को पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें उनकी 14 महीने की नातिन समेत अन्य दिवंगत परिजनों के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।
तेहरान: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार को लेकर तैयारियां जारी हैं। इस बीच उनके बेटे मोजतबा खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने को लेकर बड़ा बयान सामने आया है। ईरान के सुप्रीम लीडर के भारत स्थित प्रतिनिधि आयतुल्ला हकीम इलाही ने कहा है कि सुरक्षा कारणों से मोजतबा खामेनेई के सार्वजनिक रूप से अंतिम संस्कार में शामिल होने की संभावना बेहद कम है। सुरक्षा एजेंसियों ने सार्वजनिक उपस्थिति पर जताई चिंता इंडिया टुडे से बातचीत में आयतुल्ला हकीम इलाही ने बताया कि मौजूदा हालात में मोजतबा खामेनेई की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है। इसी वजह से उन्हें सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहने की सलाह दी गई है। उन्होंने कहा कि मोजतबा लोगों के बीच जाकर उनसे मिलना चाहते हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां इसकी अनुमति नहीं दे रही हैं। अधिकारियों का मानना है कि इस समय उनकी सार्वजनिक मौजूदगी सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकती है। तेहरान रवाना होने से पहले दिया बयान नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से तेहरान रवाना होने से पहले इलाही ने कहा कि पिछले सप्ताह उनकी ईरान यात्रा के दौरान उन लोगों से मुलाकात हुई थी, जो मोजतबा खामेनेई के संपर्क में थे। उन्हीं से मिली जानकारी के आधार पर उन्होंने यह बात साझा की। ईरान में कई दिनों तक चलेगा राजकीय शोक आयतुल्ला हकीम इलाही के अनुसार, अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद ईरान में कई दिनों तक राजकीय शोक और अंतिम संस्कार से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन आयोजनों का उद्देश्य इस्लामिक गणराज्य के प्रति जनता की एकजुटता और समर्थन को प्रदर्शित करना है। देशभर में शोक का माहौल उन्होंने कहा कि खामेनेई के निधन से पूरे ईरान में गहरा शोक है। बड़ी संख्या में लोग उन्हें देश का मजबूत नेतृत्वकर्ता और प्रेरणा का स्रोत मानते थे। उनके समर्थकों का मानना है कि उनकी कमी की भरपाई करना आसान नहीं होगा। इलाही ने कहा कि ईरान के विभिन्न प्रांतों के अलावा कई अन्य देशों से भी लोग तेहरान पहुंच रहे हैं, ताकि दिवंगत नेता को अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित कर सकें। अंतिम संस्कार में अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के पहुंचने की उम्मीद सूत्रों के अनुसार, अंतिम संस्कार में कई देशों के प्रतिनिधियों और धार्मिक नेताओं के शामिल होने की संभावना है। वहीं, सुरक्षा एजेंसियां पूरे कार्यक्रम के दौरान व्यापक सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने में जुटी हुई हैं। फिलहाल मोजतबा खामेनेई की सार्वजनिक मौजूदगी को लेकर अंतिम निर्णय सुरक्षा एजेंसियों की सलाह के आधार पर लिया जाएगा।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान नीति के मोर्चे पर बड़ी राजनीतिक जीत मिली है। अमेरिकी सीनेट ने उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रपति की ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने की शक्तियों पर कांग्रेस का नियंत्रण बढ़ाना था। मतदान के दौरान दो रिपब्लिकन सीनेटरों के अंतिम समय में रुख बदलने से ट्रंप प्रशासन को राहत मिल गई। प्रस्ताव के रुकने के बाद ट्रंप ने इसे ईरान के लिए "कड़ा संदेश" बताया और अपने सहयोगी सांसदों का धन्यवाद किया। ट्रंप ने जताई खुशी, बोले- ईरान के लिए चेतावनी सीनेट में मतदान के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, "वाह! सीनेट ने ईरान पर अपना वोट बदल दिया। रैंड पॉल और बिल कैसिडी ने अपना रुख बदला। नेता जॉन थ्यून, लिंडसे ग्राहम, बर्नी मोरेनो और सभी का धन्यवाद। यह वोट ईरान के लिए एक चेतावनी है।" ट्रंप का कहना है कि राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव अमेरिका की कूटनीतिक और रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता था। राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों पर लगाम लगाने की कोशिश नाकाम सीनेट में पेश किए गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान से पहले कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी आवश्यक हो। सीनेट ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और इस तरह राष्ट्रपति की मौजूदा युद्ध शक्तियों को सीमित करने की कोशिश फिलहाल विफल हो गई। दो रिपब्लिकन सांसदों ने बदला फैसला इस मतदान का सबसे बड़ा मोड़ दो रिपब्लिकन सांसदों के रुख बदलने से आया। सीनेटर रैंड पॉल ने इस बार 'प्रेजेंट' वोट किया, यानी उन्होंने पक्ष या विपक्ष में मतदान नहीं किया। सीनेटर बिल कैसिडी ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के खिलाफ मतदान किया। अंतिम मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका और परिणाम 47-50-1 रहा। रैंड पॉल बोले- शांति वार्ता के लिए दिया राष्ट्रपति को मौका मतदान से पहले रैंड पॉल ने सोशल मीडिया पर कहा कि उनकी युद्ध शक्तियों को लेकर राय नहीं बदली है। उन्होंने लिखा कि उनका 'प्रेजेंट' वोट राष्ट्रपति को स्थायी शांति के लिए बातचीत करने की अधिक गुंजाइश देने के उद्देश्य से है। बिल कैसिडी ने पहले उठाए सवाल, फिर बदला रुख सीनेटर बिल कैसिडी ने पहले ट्रंप प्रशासन से ईरान संघर्ष को लेकर कई सवाल पूछे थे। उनका कहना था कि सांसदों और जनता को युद्ध की वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए। बाद में उन्होंने बताया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने उन्हें विस्तृत जानकारी दी, जिससे उनकी कई चिंताएं दूर हो गईं। इसके बाद उन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। कुछ रिपब्लिकन ने किया समर्थन, डेमोक्रेट में भी दिखी अलग राय रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स और लिसा मुर्कोव्स्की ने राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को सीमित करने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं डेमोक्रेटिक सीनेटर जॉन फेटरमैन ने प्रस्ताव का विरोध किया। इससे साफ हुआ कि ईरान नीति को लेकर मतभेद केवल पार्टी लाइनों तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्रपति की शक्तियों पर बहस जारी अमेरिका में राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों का तर्क है कि यदि कोई फैसला अमेरिका को बड़े सैन्य संघर्ष की ओर ले जा सकता है, तो उसमें कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी अनिवार्य होनी चाहिए। वहीं ट्रंप समर्थकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के समय राष्ट्रपति के पास त्वरित निर्णय लेने की पर्याप्त संवैधानिक शक्तियां बनी रहनी चाहिए। ईरान को लेकर जारी तनाव के बीच सीनेट का यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक जीत माना जा रहा है, जबकि राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में बहस आगे भी जारी रहने के संकेत हैं।
Washington: ईरान के मिनाब स्कूल पर हुए घातक मिसाइल हमले को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने कहा कि अब तक ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो सके कि स्कूल पर हमला अमेरिकी मिसाइल से किया गया था। उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान कई पक्षों की ओर से लगातार मिसाइलें दागी जा रही थीं, इसलिए हमले के लिए जिम्मेदार पक्ष की पहचान करना आसान नहीं है। 'हमारी मिसाइल थी, इसका कोई प्रमाण नहीं' हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने कहा कि कुछ लोगों ने दावा किया कि मिनाब स्कूल पर अमेरिकी मिसाइल से हमला हुआ, लेकिन उनके पास इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है। उन्होंने कहा, "युद्ध के दौरान हर दिशा से मिसाइलें दागी जा रही थीं। ऐसे में यह तय करना बेहद मुश्किल है कि किस मिसाइल ने हमला किया। मुझे ऐसा कोई सबूत नहीं दिखा जिससे यह कहा जा सके कि वह हमारी मिसाइल थी।" 28 फरवरी को हुआ था भीषण हमला ईरान-अमेरिका संघर्ष के पहले दिन यानी 28 फरवरी को मिनाब स्थित एक स्कूल पर मिसाइल हमला हुआ था। इस हमले में 150 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जिनमें बड़ी संख्या में स्कूली छात्राएं शामिल थीं। घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली और हमले की निष्पक्ष जांच की मांग उठी। अमेरिका पर लगे थे गंभीर आरोप हमले के तुरंत बाद कई मीडिया रिपोर्टों और विश्लेषकों ने आशंका जताई थी कि इसके पीछे अमेरिकी सैन्य कार्रवाई हो सकती है। अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने अब तक इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है और मामले की जांच जारी होने की बात कही है। ट्रंप ने जांच पर भी जताया संदेह डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इतने बड़े सैन्य संघर्ष के दौरान यह तय करना बेहद कठिन है कि किसी विशेष हमले के लिए कौन जिम्मेदार था। उन्होंने यह भी कहा कि संभव है कि इस मामले की पूरी सच्चाई कभी सामने ही न आ सके। उनके मुताबिक, युद्ध क्षेत्र में लगातार हो रहे हमलों और अलग-अलग पक्षों की सैन्य गतिविधियों के कारण जांच एजेंसियों के सामने भी बड़ी चुनौती है। दुनिया की नजर जांच रिपोर्ट पर मिनाब स्कूल पर हुआ हमला ईरान-अमेरिका संघर्ष की सबसे दर्दनाक घटनाओं में गिना जा रहा है। बड़ी संख्या में बच्चों और नागरिकों की मौत के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है। अब दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि जांच एजेंसियां इस हमले के लिए जिम्मेदार पक्ष की पहचान कर पाती हैं या नहीं।
तेहरान/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर होने के एक दिन बाद ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने पहली बार अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस समझौते को लेकर “बेहद बेताब” थे और इसे अंतिम रूप देने के लिए उन्होंने हर संभव दबाव और प्रभाव का इस्तेमाल किया। खामेनेई ने कहा कि उन्होंने शुरुआत में सिद्धांत के तौर पर इस समझौते का विरोध किया था, लेकिन बाद में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा देशहित और क्षेत्रीय हितों की सुरक्षा का भरोसा दिए जाने के बाद ही इस समझौते को मंजूरी दी। ‘देश के हितों और रेजिस्टेंस फ्रंट की रक्षा का मिला भरोसा’ अपने लिखित बयान में मोजतबा खामेनेई ने कहा कि ईरानी अधिकारियों ने उन्हें आश्वस्त किया था कि समझौते में देश के रणनीतिक हितों, राष्ट्रीय सुरक्षा और तथाकथित ‘रेजिस्टेंस फ्रंट’ के अधिकारों की पूरी तरह रक्षा की जाएगी। उन्होंने कहा, “ईरानी अधिकारियों ने नेक इरादे और देश की चिंता को ध्यान में रखते हुए इस समझौते के लिए कड़ी मेहनत की। मुझे भरोसा दिलाया गया कि ईरान के हितों से कोई समझौता नहीं होगा।” 18 जून को हुआ था समझौते पर हस्ताक्षर 18 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कई महीनों से जारी तनाव को समाप्त करने और बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के उद्देश्य से समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर किए थे। इससे पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी वार्ताकार मोहम्मद बाकेर कालीबाफ ने समझौते के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने वर्चुअल माध्यम से इसे अंतिम मंजूरी प्रदान की। ‘ईरान अपने राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं करेगा’ खामेनेई ने कहा कि राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने उन्हें स्पष्ट रूप से आश्वस्त किया था कि यदि भविष्य में अमेरिका की ओर से कोई ऐसी मांग रखी जाती है जो ईरान के राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध या अत्यधिक हो, तो तेहरान उसे स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने कहा, “ईरान अपने राष्ट्रीय हितों, संप्रभुता और रणनीतिक प्राथमिकताओं से कोई समझौता नहीं करेगा।” बातचीत का मतलब अमेरिकी नीतियों से सहमति नहीं समझौते का समर्थन करते हुए भी खामेनेई ने स्पष्ट किया कि भविष्य में अमेरिका के साथ होने वाली प्रत्यक्ष बातचीत को अमेरिकी नीतियों या दृष्टिकोण की स्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बातचीत का उद्देश्य केवल अपने हितों की रक्षा करना और विवादों का समाधान तलाशना है, न कि किसी दबाव के सामने झुकना। समझौते पर ईरान के भीतर भी हुई व्यापक चर्चा खामेनेई के बयान से यह संकेत मिला है कि अमेरिका-ईरान समझौते को लेकर ईरान के शीर्ष नेतृत्व के भीतर व्यापक विचार-विमर्श हुआ था। सर्वोच्च नेता ने स्वयं स्वीकार किया कि उन्होंने प्रारंभ में इस समझौते का विरोध किया था, लेकिन राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के आश्वासन के बाद ही इसे मंजूरी दी। विश्लेषकों का मानना है कि खामेनेई का बयान एक ओर घरेलू राजनीतिक वर्ग को संदेश देने की कोशिश है, वहीं दूसरी ओर यह संकेत भी है कि ईरान भविष्य में अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखेगा, लेकिन अपने रणनीतिक हितों पर किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा।
US Iran War Cost: अमेरिका और ईरान के बीच 108 दिनों तक चले सैन्य संघर्ष के बाद दोनों देशों ने अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव फिलहाल थमता नजर आ रहा है। हालांकि इस युद्ध की कीमत दोनों देशों को भारी चुकानी पड़ी है, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर अमेरिका को भी बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 28 फरवरी से शुरू होकर 16 जून तक चले इस संघर्ष के दौरान अमेरिका ने केवल सैन्य अभियानों पर ही लगभग 113 अरब डॉलर खर्च किए। वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभावों को जोड़ने पर कुल नुकसान 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। शुरुआती छह दिनों में ही खर्च हुए 11.3 अरब डॉलर अमेरिकी रक्षा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक युद्ध के शुरुआती छह दिनों में ही करीब 11.3 अरब डॉलर खर्च हो चुके थे। इसके बाद प्रतिदिन औसतन लगभग 1 अरब डॉलर (करीब ₹94,475 करोड़) का खर्च दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल सैन्य अभियानों का अनुमानित खर्च है। वास्तविक आर्थिक बोझ इससे कहीं अधिक हो सकता है। मिसाइल और सैन्य तैनाती पर भारी खर्च युद्ध के शुरुआती चरण में अमेरिका ने मिसाइलों, गोला-बारूद और रक्षा उपकरणों पर लगभग 25 अरब डॉलर खर्च किए। पैट्रियट मिसाइल की एक यूनिट की कीमत लगभग 40 लाख डॉलर बताई जाती है। खाड़ी क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती और लॉजिस्टिक सपोर्ट पर भी अरबों डॉलर खर्च हुए। ट्रंप प्रशासन ने शुरुआत में इस युद्ध के लिए लगभग 200 अरब डॉलर के बजट की मांग की थी। अमेरिका पर कुल आर्थिक बोझ 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान अर्थशास्त्रियों और कई अमेरिकी नेताओं का मानना है कि युद्ध का असर केवल रक्षा बजट तक सीमित नहीं रहा। युद्ध के कारण: तेल की कीमतों में उछाल आया। ऊर्जा लागत बढ़ी। वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई। अमेरिकी उपभोक्ताओं और कंपनियों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ा। कुछ अनुमानों के मुताबिक अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर कुल प्रभाव 630 अरब डॉलर से लेकर 1 ट्रिलियन डॉलर तक हो सकता है। ईरान के पुनर्निर्माण पर भी भारी खर्च युद्ध में ईरान के कई महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, तेल रिफाइनरियां और पावर ग्रिड प्रभावित हुए। इनके पुनर्निर्माण के लिए करीब 300 अरब डॉलर की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अंतरिम समझौते के तहत अमेरिका ने इस पुनर्निर्माण प्रक्रिया में सहयोग करने पर सहमति जताई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि इस फंडिंग में खाड़ी देशों की भी भूमिका रहेगी। आम लोगों पर भी पड़ा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का असर सीधे आम उपभोक्ताओं पर पड़ा। अनुमान है कि केवल ऊर्जा कीमतों में वृद्धि के कारण अमेरिकी नागरिकों को 40 अरब डॉलर से अधिक का अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ा। हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि वास्तविक नुकसान इससे कहीं अधिक हो सकता है। प्रमुख आंकड़े एक नजर में युद्ध की अवधि: 108 दिन सैन्य खर्च: लगभग 113 अरब डॉलर शुरुआती 6 दिनों का खर्च: 11.3 अरब डॉलर प्रतिदिन औसत खर्च: लगभग 1 अरब डॉलर ईरान के पुनर्निर्माण की अनुमानित लागत: 300 अरब डॉलर कुल संभावित आर्थिक प्रभाव: 1 ट्रिलियन डॉलर तक
Iran 300 Billion Dollar Fund: अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14 सूत्रीय समझौते में 300 अरब डॉलर (300 Billion Dollar) के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास फंड का प्रावधान सबसे अधिक चर्चा में है। यह फंड युद्ध से प्रभावित ईरान के पुनर्निर्माण, ऊर्जा, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक परियोजनाओं को दोबारा खड़ा करने के लिए प्रस्तावित किया गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी रकम आएगी कहां से और इसे देगा कौन? समझौते में क्या है प्रावधान? समझौते के छठे बिंदु के अनुसार अमेरिका अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की योजना तैयार करेगा। इस योजना का विस्तृत ढांचा अगले 60 दिनों में अंतिम समझौते के दौरान तय किया जाएगा। क्या अमेरिका अपनी जेब से देगा पैसा? अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक इसका जवाब 'नहीं' है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन खबरों को खारिज किया है जिनमें कहा गया था कि अमेरिका सीधे ईरान को सैकड़ों अरब डॉलर देगा। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि अमेरिकी करदाताओं के पैसे से ईरान को कोई वित्तीय सहायता नहीं दी जाएगी। फिर पैसा देगा कौन? अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के मुताबिक, इस फंड का वित्तपोषण मुख्य रूप से खाड़ी देशों, क्षेत्रीय साझेदारों और वैश्विक निजी निवेशकों के जरिए किया जा सकता है। यानी वे खाड़ी देश, जिन्हें हालिया संघर्ष के दौरान ईरान के हमलों का सामना करना पड़ा, भविष्य में ईरान के पुनर्निर्माण में निवेश कर सकते हैं। आधे से ज्यादा फंड पहले ही जुटने का दावा रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार प्रस्तावित 300 अरब डॉलर के फंड का आधे से अधिक हिस्सा पहले ही कमिट किया जा चुका है। यह फंड किसी सरकारी राहत पैकेज की तरह नहीं, बल्कि एक प्राइवेट इन्वेस्टमेंट प्लेटफॉर्म के रूप में काम करेगा, जिसमें ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर, परिवहन और विनिर्माण क्षेत्रों में निवेश किया जाएगा। ईरान पहले मांग रहा था 400 अरब डॉलर रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान ने शुरुआत में अमेरिका से 400 अरब डॉलर के मुआवजे की मांग की थी। अमेरिका की असहमति के बाद पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास फंड का विचार सामने आया। इसके तहत ऋण गारंटी, क्रेडिट लाइन और सीधे निवेश के जरिए ईरान की क्षतिग्रस्त परियोजनाओं को दोबारा खड़ा करने की योजना बनाई गई है। किन परियोजनाओं पर खर्च होगा पैसा? यह फंड ईरान के स्टील प्लांट, रिफाइनरी, एयरपोर्ट, परिवहन नेटवर्क, ऊर्जा परियोजनाओं और युद्ध में क्षतिग्रस्त अन्य बुनियादी ढांचों के पुनर्निर्माण में इस्तेमाल किया जा सकता है। सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी 300 अरब डॉलर का यह फंड फिलहाल केवल प्रस्तावित स्तर पर है। इसके अस्तित्व में आने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच अंतिम और बाध्यकारी समझौते का होना जरूरी है। साथ ही यह भी देखना होगा कि क्या ईरान समझौते की सभी शर्तों का पालन कर पाएगा और क्या खाड़ी देश एवं वैश्विक निवेशक वास्तव में इतनी बड़ी राशि निवेश करने के लिए तैयार होंगे। यदि यह योजना सफल होती है, तो यह न केवल ईरान की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकती है, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की भू-राजनीति और ऊर्जा बाजार पर भी गहरा प्रभाव डाल सकती है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान ने कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाने पर सहमति दे दी है। इसके साथ ही उन्होंने उन रिपोर्टों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि अमेरिका शांति समझौते के तहत ईरान को 300 मिलियन अमेरिकी डॉलर देने जा रहा है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए लिखा, "ईरान कभी भी परमाणु हथियार न बनाने पर सहमत हो गया है।" उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका द्वारा ईरान को 300 मिलियन डॉलर दिए जाने की खबर पूरी तरह फर्जी है और इसे डेमोक्रेट्स द्वारा फैलाया जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से फिर शुरू हुई जहाजों की आवाजाही अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू हो गई है और कई तेल टैंकर सुरक्षित रूप से इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजर रहे हैं। ट्रंप ने कहा कि यह घटनाक्रम अमेरिका और ईरान के बीच 107 दिनों तक चले संघर्ष को समाप्त करने के उद्देश्य से हुए डिजिटल शांति समझौते के बाद सामने आया है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है और इसके खुलने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार को राहत मिलने की उम्मीद है। शुक्रवार को हो सकती है अंतिम डील ट्रंप ने बताया कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में होने वाली बैठक में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे। इस दौरान अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर औपचारिक रूप से आमने-सामने हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। 'होर्मुज हमेशा के लिए शुल्क मुक्त रहेगा' 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' को दिए एक साक्षात्कार में ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ हुए समझौते से यह सुनिश्चित होगा कि होर्मुज जलडमरूमध्य हमेशा के लिए शुल्क मुक्त रहेगा और अंतरराष्ट्रीय जहाजों की निर्बाध आवाजाही जारी रहेगी। रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गलीबाफ के साथ एक कार्यढांचा समझौते (Framework Agreement) पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर भी किए हैं। वैश्विक बाजार की नजर अंतिम समझौते पर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर हो जाते हैं, तो इससे पश्चिम एशिया में तनाव कम हो सकता है, वैश्विक तेल आपूर्ति स्थिर हो सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऊर्जा कीमतों पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों पर अभी भी आगे की वार्ताओं की जरूरत बनी हुई है।
नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच 107 दिनों से जारी संघर्ष को समाप्त करने तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने पर बनी सहमति का भारत ने स्वागत किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उम्मीद जताई कि इस पहल से पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता बहाल करने में मदद मिलेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है और कई देशों में लोगों की जान भी गई है। उन्होंने कहा कि भारत अमेरिका और ईरान के बीच बनी सहमति का स्वागत करता है और उम्मीद करता है कि इसके प्रभावी क्रियान्वयन से क्षेत्र में शांति, स्थिरता, व्यापार और आवाजाही की स्वतंत्रता सुनिश्चित होगी। उन्होंने यह भी कहा कि शेष विवादित मुद्दों पर बातचीत के माध्यम से एक टिकाऊ और व्यापक समझौते की दिशा में आगे बढ़ना आवश्यक है। 19 जून को हो सकते हैं औपचारिक हस्ताक्षर मध्यस्थ देशों और अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। बताया जा रहा है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अन्य संवेदनशील मुद्दों पर आगे अलग दौर की बातचीत होगी। ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने की घोषणा की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समझौते पर सहमति की पुष्टि करते हुए कहा कि उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने को मंजूरी दे दी है। उन्होंने कहा कि मुक्त आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए जलडमरूमध्य को तत्काल प्रभाव से खोला जाएगा। अमेरिका पहले भी संकेत दे चुका था कि होर्मुज जलडमरूमध्य के पुनः खुलने के साथ ईरान पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों में ढील दी जा सकती है, ताकि वह तेल निर्यात बढ़ाकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सके। ईरान ने कहा- औपचारिक हस्ताक्षर के बाद ही होगा अमल ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने समझौते पर सहमति की पुष्टि करते हुए कहा कि तेहरान औपचारिक हस्ताक्षर से पहले समझौते को लागू नहीं करेगा। उनके अनुसार, कतर की मध्यस्थता में 14 घंटे से अधिक चली बातचीत के बाद दोनों पक्ष इस सहमति तक पहुंचे। ईरानी सरकारी मीडिया ने इस घटनाक्रम को अमेरिका के साथ युद्ध समाप्ति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।
तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते (Peace Deal) की खबरों के बीच ईरान में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। राजधानी तेहरान, मशहद और अन्य शहरों में लोगों ने सड़कों पर उतरकर विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रस्तावित समझौते के जरिए ईरान के राष्ट्रीय और रणनीतिक हितों से समझौता किया जा रहा है। यह विरोध ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने संकेत दिए हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच जल्द ही शांति समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। ईरान ने अभी तक किसी तय समयसीमा की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। मशहद में सबसे ज्यादा विरोध उत्तर-पूर्वी ईरान के शहर मशहद में विदेश मंत्रालय के एक कार्यालय के बाहर बड़ी संख्या में लोग जमा हुए। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में प्रदर्शनकारी लाल और काले झंडे लहराते और सरकार विरोधी नारे लगाते दिखाई दिए। प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए, "अराघची मुर्दाबाद", "समझौता करने वालों को शर्म आनी चाहिए" और "देश के साथ समझौता करने वाले इस्तीफा दो"। यह प्रदर्शन उस इंटरव्यू के बाद हुआ, जिसमें विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने संभावित समझौते को लेकर बातचीत की पुष्टि की थी। तेहरान समेत कई शहरों में प्रदर्शन रिपोर्ट्स के अनुसार, राजधानी तेहरान और अन्य शहरों में भी लोग सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने सीधे तौर पर विदेश मंत्री को अमेरिका के साथ बातचीत के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उनके इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शन के दौरान "समझौतावादी मुर्दाबाद" और "समझौता करने वाले इस्तीफा दो" जैसे नारे भी सुनाई दिए। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बढ़ी चिंता विरोध कर रहे लोगों का मानना है कि प्रस्तावित डील से ईरान की रणनीतिक स्थिति कमजोर हो सकती है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) पर ईरान की पकड़ ढीली पड़ने की आशंका को लेकर लोगों में नाराजगी है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि अमेरिका के साथ समझौता हासिल करने के लिए ईरानी वार्ताकार जरूरत से ज्यादा रियायतें देने को तैयार हैं, जिससे देश के दीर्घकालिक हित प्रभावित हो सकते हैं। अराघची ने क्या कहा था? शुक्रवार को सरकारी टेलीविजन को दिए एक इंटरव्यू में विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा था कि संभावित समझौता अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने का रास्ता खोल सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि भविष्य में होर्मुज जलडमरूमध्य का संचालन पहले जैसा नहीं रहेगा। अराघची ने यह भी कहा कि होर्मुज स्ट्रेट ईरान की रणनीतिक निरोधक क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा है और उसके हितों की अनदेखी नहीं की जाएगी। ट्रंप और शहबाज शरीफ ने दिए समझौते के संकेत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि ईरान के साथ एक प्रारूप समझौते पर जल्द हस्ताक्षर हो सकते हैं। वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी कहा कि दोनों पक्ष एक शांति ढांचे पर सहमत हो चुके हैं और समझौते की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। ईरान ने इन दावों पर सावधानी बरतते हुए कहा है कि अभी किसी तत्काल हस्ताक्षर की पुष्टि नहीं की जा सकती। ईरान ने कहा- अभी नहीं होगा समझौता ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सरकारी मीडिया से बातचीत में कहा कि समझौते पर तत्काल हस्ताक्षर नहीं होने जा रहे हैं। उन्होंने कहा, "यह कल नहीं होगा।" उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले दिनों में यदि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है तो समझौते की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। समझौते में क्या हो सकता है शामिल? रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित शांति समझौते का मुख्य उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलना और ईरान पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को हटाना है। इसके अलावा अगले 60 दिनों के भीतर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अलग चरण में बातचीत की योजना बनाई जा सकती है। मसौदे में ईरान की जमी हुई अरबों डॉलर की संपत्तियों को जारी करने और ईरानी तेल निर्यात पर लगे कुछ प्रतिबंधों में राहत देने जैसे प्रस्ताव भी शामिल बताए जा रहे हैं। इन बिंदुओं पर अभी तक कोई आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया गया है।
नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते के संकेतों के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में राहत की उम्मीद बढ़ गई है। इस बीच भारत के लिए भी एक सकारात्मक खबर सामने आई है। पिछले तीन महीनों से अधिक समय से फारस की खाड़ी क्षेत्र में रुका भारतीय एलएनजी (Liquefied Natural Gas) टैंकर 'दिशा' (Disha) अब होर्मुज जलडमरूमध्य की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। यदि समझौते के बाद होर्मुज जलमार्ग आधिकारिक रूप से खुलता है, तो यह भारतीय टैंकर इस रणनीतिक मार्ग से गुजरने वाला पहला जहाज बन सकता है। क्यों अहम है होर्मुज जलडमरूमध्य? होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है। खाड़ी देशों से निकलने वाले तेल और प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से एशिया और यूरोप तक पहुंचता है। फरवरी के अंत में क्षेत्र में बढ़े तनाव और अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद इस मार्ग पर गतिविधियां लगभग ठप हो गई थीं, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई और ऊर्जा कीमतों में उछाल देखने को मिला। कहां पहुंच चुका है भारतीय टैंकर? शिप-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, भारत की एक सरकारी आयातक कंपनी द्वारा दीर्घकालिक लीज पर लिया गया एलएनजी टैंकर 'दिशा' इस समय संयुक्त अरब अमीरात के उत्तर में ओमान के करीब पहुंच चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस जहाज ने लगभग 1 मार्च के आसपास कतर के रास लफ्फान एलएनजी टर्मिनल से गैस की खेप लोड की थी। इसके बाद क्षेत्रीय तनाव के कारण इसकी आवाजाही प्रभावित हुई। समझौते से वैश्विक बाजार को राहत यदि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पूरी तरह लागू होता है और दोनों ओर की नाकेबंदी समाप्त होती है, तो इसका सीधा फायदा— भारत सहित ऊर्जा आयात करने वाले देशों, यूरोप और एशिया के गैस बाजार, और वैश्विक तेल व्यापार को मिलेगा। मार्च से एलएनजी सप्लाई में आई कमी के कारण गैस की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई थी। अब सप्लाई सामान्य होने से कीमतों में नरमी आने की संभावना जताई जा रही है। कच्चे तेल की कीमतों पर भी असर होर्मुज के खुलने की उम्मीद के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में शुरुआती कारोबार के दौरान चार प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों का मानना है कि ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होने से बाजार में स्थिरता लौट सकती है। अभी भी बनी हुई हैं चुनौतियां विशेषज्ञों के अनुसार, समझौते के बाद भी स्थिति पूरी तरह सामान्य होने में समय लग सकता है। कई जहाज अपनी वास्तविक लोकेशन छिपाने के लिए ट्रांसपोंडर बंद कर रहे हैं, जिससे समुद्री गतिविधियों की सही तस्वीर सामने आना मुश्किल हो रहा है। इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का रणनीतिक प्रभाव भविष्य में भी इस मार्ग को संवेदनशील बनाए रख सकता है।
ट्रंप ने ईरान पर लगाया भारतीय जहाजों को निशाना बनाने का आरोप पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से निकल रहे भारतीय जहाजों पर ड्रोन हमला करने की कोशिश की, जिसे विफल कर दिया गया। उन्होंने इस घटना को "पूरी तरह अस्वीकार्य" बताया और ईरान की कड़ी आलोचना की। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कहा कि भारतीय जहाजों को निशाना बनाने की कोशिश क्षेत्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए चिंताजनक है। ओमान तट के पास हमलों के बाद बढ़ा विवाद ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब इस सप्ताह ओमान तट के पास भारतीय क्रू वाले कई जहाजों पर हमले हुए हैं। इनमें सबसे चर्चित मामला एमटी सेटेबेलो जहाज का रहा, जिसमें तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई थी। इन घटनाओं को लेकर भारत पहले ही चिंता जता चुका है और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग कर चुका है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने नागरिक जहाजों पर हो रहे हमलों को बेहद गंभीर और चिंताजनक बताया है। ईरान ने ट्रंप के आरोपों को किया खारिज ट्रंप के आरोपों के बाद ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। भारत में ईरानी दूतावास ने बयान जारी कर कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति के आरोप पूरी तरह निराधार हैं। ईरान का कहना है कि यह आरोप लोगों का ध्यान उन घटनाओं से हटाने की कोशिश है, जिनमें हाल के दिनों में अमेरिकी कार्रवाई के दौरान भारतीय जहाज प्रभावित हुए और भारतीय नागरिकों की जान गई। तेहरान ने कहा कि भारत और ईरान के बीच मजबूत संबंध हैं और भारतीय जहाजों को निशाना बनाने का आरोप तथ्यहीन है। प्रस्तावित शांति समझौते पर भी बढ़ा विवाद इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर भी बयानबाजी तेज हो गई है। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की ओर से सामने आया समझौते का कथित मसौदा वास्तविक सहमति से मेल नहीं खाता। उन्होंने कहा कि ईरान द्वारा प्रस्तुत जानकारी सच्चाई से दूर है और वार्ता में पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है। ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व से जल्द स्पष्ट रुख अपनाने की अपील भी की। अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने दी सफाई अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने भी समझौते को लेकर फैल रही अफवाहों का खंडन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान को कोई नकद भुगतान नहीं किया जा रहा है और न ही सिर्फ समझौते पर हस्ताक्षर करने के बदले आर्थिक सहायता दी जाएगी। उनके अनुसार, किसी भी आर्थिक राहत को ईरान द्वारा तय शर्तों के पालन से जोड़ा गया है। ईरान बोला- समझौता पहले से ज्यादा करीब वहीं ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पहले की तुलना में कहीं ज्यादा करीब पहुंच चुका है। उन्होंने संकेत दिया कि दोनों पक्ष युद्ध समाप्त करने और क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने के लिए तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। भारत के लिए क्यों अहम है यह पूरा घटनाक्रम? होर्मुज जलडमरूमध्य Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आने वाले तेल और गैस आयात पर निर्भर करता है। ऐसे में इस क्षेत्र में बढ़ता तनाव, जहाजों पर हमले और अमेरिका-ईरान के बीच जारी कूटनीतिक खींचतान भारत की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों पर सीधा असर डाल सकती है। इसलिए नई दिल्ली इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है।
युद्धविराम की दिशा में बड़ी प्रगति, समझौते का मसौदा तैयार अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और सैन्य संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों देशों ने शांति समझौते के एक ड्राफ्ट (मसौदा) के शब्दों पर सहमति बना ली है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि समझौते का अंतिम मसौदा तैयार हो चुका है और मध्यस्थ देश इसे अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में शांति स्थापित करने की दिशा में यह अब तक की सबसे महत्वपूर्ण प्रगति है और समझौता पहले से कहीं ज्यादा करीब दिखाई दे रहा है। ट्रंप और ईरान के विदेश मंत्री ने भी दिए सकारात्मक संकेत अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने भी संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच समझौता जल्द हो सकता है। वहीं ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा कि किसी समझौते के इतने करीब दोनों देश पहले कभी नहीं पहुंचे थे। हालांकि ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मसौदा अभी आंतरिक समीक्षा के दौर से गुजर रहा है और अंतिम मंजूरी मिलना बाकी है। क्या जल्द होगा समझौते पर हस्ताक्षर? ईरान की ओर से संकेत मिले हैं कि आने वाले दिनों में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि हस्ताक्षर किसी आमने-सामने बैठक के बजाय ऑनलाइन या दूरस्थ माध्यम से भी किए जा सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, इस प्रारंभिक समझौते का मुख्य उद्देश्य युद्ध को समाप्त करना और क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करना है। परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों को फिलहाल इस समझौते से अलग रखा गया है और उन पर बाद में अलग चरण में बातचीत की जाएगी। किन मुद्दों पर अब भी बनी हुई है असहमति? हालांकि बातचीत में काफी प्रगति हुई है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं। ईरान चाहता है कि उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में राहत मिले और विदेशों में जमा उसकी संपत्तियां मुक्त की जाएं। दूसरी ओर अमेरिका का कहना है कि किसी भी राहत से पहले ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कुछ कदम उठाने होंगे। यही कारण है कि अंतिम समझौते से पहले कुछ शर्तों पर और बातचीत हो सकती है। भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता? इस संभावित समझौते का भारत पर भी सीधा असर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, समझौते में Strait of Hormuz को फिर से पूरी तरह खोलने की दिशा में कदम शामिल हो सकते हैं। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। यदि इस क्षेत्र में तनाव कम होता है और जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है, तो तेल की कीमतों में स्थिरता आने की संभावना बढ़ जाएगी। इजरायल अभी भी बातचीत का हिस्सा नहीं रिपोर्ट्स के अनुसार, Israel इस वार्ता प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। इजरायली नेतृत्व पहले ही संकेत दे चुका है कि वह अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रख सकता है और जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र रूप से फैसले लेने का अधिकार सुरक्षित रखता है। अगले कुछ दिन होंगे बेहद अहम कूटनीतिक सूत्रों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के भीतर सभी स्तरों पर मंजूरी मिल जाती है, तो आने वाले कुछ दिनों में आधिकारिक समझौते की घोषणा हो सकती है। इससे पश्चिम एशिया में जारी तनाव कम होने, वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत मिलने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों की सुरक्षा बहाल होने की उम्मीद बढ़ जाएगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी बातचीत अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है और दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण समझौते पर जल्द हस्ताक्षर हो सकते हैं। ईरान ने स्पष्ट किया है कि अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है और कई मुद्दों पर बातचीत जारी है। ट्रंप बोले- औपचारिक प्रक्रिया बाकी व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि समझौते के अधिकांश बिंदुओं पर सहमति बन चुकी है और अब केवल कुछ औपचारिक दस्तावेजी प्रक्रियाएं पूरी की जानी हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले कुछ दिनों में इन प्रक्रियाओं को अंतिम रूप देकर समझौते पर आधिकारिक हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। ट्रंप के अनुसार, समझौते पर हस्ताक्षर का कार्यक्रम इसी सप्ताहांत यूरोप में आयोजित किया जा सकता है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर सकते हैं अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व ट्रंप ने बताया कि यदि हस्ताक्षर समारोह आयोजित होता है तो वह स्वयं इसमें शामिल नहीं होंगे। उनकी जगह अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे। इस बयान को अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों से चल रही कूटनीतिक बातचीत में महत्वपूर्ण प्रगति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी जताई उम्मीद ट्रंप ने कहा कि संभावित समझौते से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव कम करने का रास्ता खुल सकता है। उनका मानना है कि समझौते के बाद इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर सामान्य गतिविधियां बहाल होने में मदद मिलेगी। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है और क्षेत्रीय तनाव के कारण यह लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है। ईरान ने कहा- अभी अंतिम समझौता नहीं दूसरी ओर, ईरान ने ट्रंप के दावों पर सावधानीपूर्ण प्रतिक्रिया दी है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सरकारी टेलीविजन से बातचीत में कहा कि वार्ता के कई पहलुओं पर प्रगति हुई है, लेकिन अभी अंतिम समझौता नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि बातचीत के दौरान अमेरिका की ओर से नई मांगें सामने रखी जा रही हैं, जिससे कुछ मुद्दों पर सहमति बनने में कठिनाई आ रही है। बघाई ने दोहराया कि ईरान अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और निर्धारित "रेड लाइन" से पीछे नहीं हटेगा। आगे की कूटनीतिक गतिविधियों पर नजर ट्रंप के आशावादी बयान और ईरान की सतर्क प्रतिक्रिया के बीच अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर आगामी कूटनीतिक गतिविधियों पर टिकी हुई है। यदि दोनों पक्ष शेष मतभेदों को दूर करने में सफल रहते हैं, तो यह समझौता पश्चिम एशिया की राजनीति और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।
वॉशिंगटन/तेहरान: पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की सख्त चेतावनी के कुछ घंटों बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई की। हमलों के बाद दक्षिणी ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में विस्फोटों की खबरें सामने आई हैं, जबकि तेहरान ने जवाबी कदम उठाते हुए होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की घोषणा कर दी है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सिरिक, मिनाब, बंदर अब्बास, क़ेश्म द्वीप और गोर्गान समेत कई इलाकों में विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं। हालात की गंभीरता को देखते हुए ईरान ने कई संवेदनशील क्षेत्रों में अपने एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय कर दिए हैं और सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। ट्रंप प्रशासन की चेतावनी के बाद हुई कार्रवाई अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने पहले ही संकेत दिया था कि यदि ईरान अपने रवैये में बदलाव नहीं करता, तो उसके महत्वपूर्ण सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया जाएगा। अमेरिकी हमले उसी चेतावनी के बाद किए गए, जिससे दोनों देशों के बीच टकराव और गहरा गया है। ईरान ने बंद किया होर्मुज स्ट्रेट अमेरिकी हमलों के बाद ईरान के संयुक्त सैन्य कमान ने गुरुवार को घोषणा की कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट को तत्काल प्रभाव से बंद किया जा रहा है। सैन्य अधिकारियों ने कहा कि अब इस समुद्री मार्ग से किसी भी तेल टैंकर या व्यावसायिक जहाज को गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ईरान ने चेतावनी दी कि प्रतिबंध के बावजूद इस मार्ग का इस्तेमाल करने की कोशिश करने वाले जहाजों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। घोषणा के कुछ समय बाद ईरानी मीडिया ने दावा किया कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने का प्रयास कर रहे दो जहाजों को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने रोक दिया। अमेरिका ने किया ईरानी दावों का खंडन अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने ईरान के दावों को खारिज करते हुए कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात जारी है और अंतरराष्ट्रीय नौवहन गतिविधियों पर फिलहाल कोई व्यापक असर नहीं पड़ा है। वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है असर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट में तनाव लगातार बढ़ता है, तो इसका सीधा प्रभाव वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा बाजारों पर पड़ सकता है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय बन गया है। फिलहाल दोनों देशों की ओर से आक्रामक बयानबाजी जारी है और क्षेत्रीय हालात पर दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।
तेहरान/नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में एक बार फिर बढ़ते सैन्य तनाव के बीच भारत ने अपने नागरिकों के लिए उच्च स्तरीय सुरक्षा चेतावनी जारी की है। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने ईरान में मौजूद भारतीयों को जल्द से जल्द देश छोड़ने की सलाह दी है, जबकि अन्य नागरिकों से फिलहाल ईरान की यात्रा पूरी तरह टालने की अपील की गई है। दूतावास की यह एडवाइजरी ऐसे समय में जारी हुई है जब इजरायल और ईरान के बीच पिछले 24 घंटों में सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति लगातार बिगड़ती नजर आ रही है। भारतीय दूतावास ने जारी की नई चेतावनी भारतीय दूतावास ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि क्षेत्र में तेजी से बदलते सुरक्षा हालात को देखते हुए भारतीय नागरिकों को अत्यधिक सतर्क रहने की जरूरत है। दूतावास ने कहा, “हाल के घटनाक्रमों को देखते हुए भारतीय नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे ईरान की यात्रा से बचें। जो भारतीय वर्तमान में ईरान में मौजूद हैं, वे उपलब्ध परिवहन साधनों का उपयोग कर जल्द से जल्द देश से बाहर निकलने की व्यवस्था करें।” दूतावास ने यह भी कहा कि भारतीय नागरिक स्थानीय प्रशासन की सलाह का पालन करें और सुरक्षा संबंधी अपडेट पर लगातार नजर बनाए रखें। 24 घंटे में तेजी से बदले हालात पश्चिम एशिया में तनाव तब और बढ़ गया जब इजरायल और ईरान के बीच एक बार फिर प्रत्यक्ष सैन्य टकराव की खबरें सामने आईं। दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ की गई कार्रवाई ने पहले से नाजुक स्थिति को और गंभीर बना दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि हालिया घटनाक्रमों ने क्षेत्र में व्यापक संघर्ष की आशंकाओं को फिर से बढ़ा दिया है। बेरूत हमलों के बाद बढ़ा संकट तनाव की शुरुआत रविवार को हुई, जब इजरायल ने लेबनान की राजधानी बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में हवाई हमले किए। इसके बाद ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई की गई और दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तथा सैन्य गतिविधियां तेज हो गईं। रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल ने एक ईरानी पेट्रोकेमिकल परिसर को निशाना बनाया, जबकि ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने इजरायली सैन्य ठिकानों पर हमले का दावा किया है। लाल सागर में भी बढ़ी चिंता क्षेत्रीय तनाव का असर समुद्री मार्गों पर भी दिखाई देने लगा है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में इजरायल से जुड़े जहाजों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति और बिगड़ती है तो इसका असर वैश्विक व्यापार, तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात पर पड़ सकता है। लाल सागर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक समुद्री मार्गों में शामिल है। ट्रंप की कूटनीतिक कोशिशों को झटका बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ संभावित परमाणु समझौते के जरिए क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। हालिया हमलों ने इन प्रयासों को कठिन बना दिया है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि यदि सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो बातचीत की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। नेतन्याहू से ट्रंप की फोन पर बातचीत अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, ईरानी मिसाइल हमलों के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बातचीत की। बताया जा रहा है कि ट्रंप ने नेतन्याहू से आगे सैन्य कार्रवाई से बचने और कूटनीतिक रास्ता अपनाने का आग्रह किया। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि दोनों पक्ष किसी संभावित समझौते के करीब पहुंच सकते हैं, बशर्ते तनाव को और न बढ़ाया जाए। ‘अब बातचीत की मेज पर लौटने का समय’ एक इंटरव्यू के दौरान ट्रंप ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि समझौते की संभावनाएं अभी भी मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि हाल के घटनाक्रमों के बावजूद बातचीत का रास्ता खुला है और क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी रहने चाहिए। भारतीयों के लिए क्या है सलाह? भारत सरकार और भारतीय दूतावास ने ईरान में मौजूद नागरिकों से अपील की है कि वे स्थिति को हल्के में न लें और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन करें। दूतावास ने भारतीयों से कहा है कि वे अपनी यात्रा योजनाओं की समीक्षा करें, स्थानीय परिस्थितियों पर नजर रखें और आवश्यकता पड़ने पर जल्द से जल्द सुरक्षित स्थानों की ओर रवाना हों। पश्चिम एशिया पर टिकी दुनिया की नजर इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है। ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक सुरक्षा पर इसके संभावित प्रभाव को देखते हुए दुनिया भर की सरकारें हालात पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। आने वाले दिनों में दोनों देशों के कदम यह तय करेंगे कि क्षेत्र शांति की ओर बढ़ता है या एक नए बड़े संघर्ष की ओर।
तेहरान: दुनिया के कई हिस्सों में लगातार आ रहे भूकंपों ने वैज्ञानिकों और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। फिलीपींस में आए शक्तिशाली भूकंप के बाद अब क्यूबा और ईरान में भी धरती कांपने से लोगों में दहशत फैल गई। क्यूबा के उत्तर-पश्चिमी तट के पास आए 6.1 तीव्रता के भूकंप को विशेषज्ञों ने पिछले लगभग 150 वर्षों में क्षेत्र के सबसे शक्तिशाली झटकों में से एक बताया है। वहीं कुछ ही घंटों बाद दक्षिणी ईरान में भी 5.0 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। दोनों देशों में किसी बड़े जान-माल के नुकसान की सूचना नहीं मिली है, लेकिन लगातार अलग-अलग क्षेत्रों में आ रहे भूकंपों ने वैश्विक स्तर पर भूगर्भीय गतिविधियों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्यूबा के पास समुद्र के भीतर आया शक्तिशाली भूकंप अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, क्यूबा के उत्तर-पश्चिमी तट के पास आए भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 6.1 मापी गई। इसका केंद्र समुद्र के भीतर लगभग 26 किलोमीटर की गहराई में स्थित था। भूकंप का केंद्र पश्चिमी क्यूबा के मांतुआ क्षेत्र से करीब 104 किलोमीटर पश्चिम-उत्तर पश्चिम दिशा में बताया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह मेक्सिको की खाड़ी क्षेत्र में हाल के दशकों के सबसे महत्वपूर्ण भूकंपीय घटनाक्रमों में से एक है। वैज्ञानिकों ने बताया असामान्य घटना विशेषज्ञों का कहना है कि यह भूकंप कई मायनों में असामान्य है। सामान्यतः बड़े भूकंप दो टेक्टोनिक प्लेटों की सीमाओं पर आते हैं, लेकिन यह झटका प्लेट के भीतर उत्पन्न हुआ। भूकंप वैज्ञानिकों के मुताबिक, वर्ष 1880 में सैन क्रिस्टोबल क्षेत्र के पास लगभग 6.0 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया था। उसके बाद इतने बड़े स्तर का झटका इस क्षेत्र में महसूस नहीं किया गया था। फ्लोरिडा और मेक्सिको तक महसूस हुए झटके क्यूबा में आए भूकंप का असर केवल द्वीपीय क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। इसके झटके कैरेबियन क्षेत्र, मेक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप और अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य तक महसूस किए गए। क्यूबा की राजधानी हवाना सहित कई शहरों में लोग घबराकर घरों और दफ्तरों से बाहर निकल आए। स्थानीय निवासियों ने बताया कि इमारतों में तेज कंपन महसूस हुआ और कई लोगों ने पहली बार इतनी तीव्रता के झटके अनुभव किए। फिलहाल नहीं जारी हुई सुनामी चेतावनी भूकंप के बाद राहत एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण शुरू कर दिया है। शुरुआती रिपोर्टों में किसी बड़े संरचनात्मक नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है। विशेषज्ञों ने संभावना जताई है कि आने वाले दिनों में कुछ हल्के आफ्टरशॉक्स महसूस हो सकते हैं, लेकिन उनके ज्यादा खतरनाक होने की आशंका नहीं है। राहत की बात यह रही कि इस भूकंप के बाद किसी प्रकार की सुनामी चेतावनी जारी नहीं की गई। ईरान में भी देर रात कांपी धरती क्यूबा में आए भूकंप के कुछ घंटों बाद दक्षिणी ईरान के होर्मोजगान प्रांत में भी भूकंप दर्ज किया गया। स्थानीय मीडिया के अनुसार, सरगाज क्षेत्र के निकट आए इस भूकंप की तीव्रता 5.0 मापी गई। रात के समय आए झटकों के कारण लोग नींद से जाग गए और एहतियातन खुले स्थानों की ओर निकल आए। शुरुआती रिपोर्टों में किसी बड़े नुकसान या जनहानि की सूचना नहीं मिली है। गहराई और तीव्रता को लेकर अलग-अलग आंकड़े अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने ईरान के भूकंप की तीव्रता 4.9 बताई है, जबकि ईरानी अधिकारियों ने इसे 5.0 दर्ज किया है। भूकंप की गहराई को लेकर भी दोनों पक्षों के आंकड़ों में अंतर देखा गया। अमेरिकी एजेंसी ने इसकी गहराई 10 किलोमीटर बताई, जबकि ईरानी अधिकारियों के अनुसार भूकंप लगभग 22 किलोमीटर नीचे आया था। आखिर क्यों बार-बार भूकंप की चपेट में आता है ईरान? विशेषज्ञों के अनुसार ईरान दुनिया के सबसे अधिक भूकंप प्रभावित देशों में से एक है। इसकी प्रमुख वजह देश की जटिल भूगर्भीय संरचना और सक्रिय फॉल्ट लाइनें हैं। ईरान कई प्रमुख टेक्टोनिक प्लेटों के संगम क्षेत्र में स्थित है। इसके दक्षिण-पूर्व में भारतीय प्लेट, उत्तर में यूरेशियन प्लेट और दक्षिण-पश्चिम में अरबियन प्लेट मौजूद हैं। इन प्लेटों के बीच लगातार दबाव और टकराव से भूगर्भीय तनाव पैदा होता रहता है, जो समय-समय पर भूकंप के रूप में सामने आता है। ज़ाग्रोस पर्वतीय क्षेत्र बढ़ाता है खतरा भूवैज्ञानिकों का मानना है कि अरबियन और यूरेशियन प्लेटों की टक्कर से बने ज़ाग्रोस पर्वतीय क्षेत्र में लगातार भूगर्भीय गतिविधियां होती रहती हैं। यही कारण है कि ईरान में छोटे और बड़े भूकंप नियमित रूप से दर्ज किए जाते हैं। मंगलवार को आया भूकंप भी इसी भूगर्भीय प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है। क्या दुनिया में अचानक बढ़ गए हैं भूकंप? विशेषज्ञों का कहना है कि क्यूबा, ईरान और फिलीपींस में आए हालिया भूकंप आपस में सीधे तौर पर जुड़े हुए नहीं हैं। ये अलग-अलग भूगर्भीय क्षेत्रों में स्थित हैं और अलग-अलग टेक्टोनिक गतिविधियों के कारण उत्पन्न हुए हैं। जब कम समय के भीतर दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बड़े भूकंप आते हैं तो लोगों को ऐसा लग सकता है कि भूकंप अचानक बढ़ गए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह पृथ्वी की स्वाभाविक भूगर्भीय प्रक्रिया का हिस्सा है और फिलहाल ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि हालिया घटनाएं किसी एक वैश्विक कारण से जुड़ी हुई हैं। 100 वर्षों में लाखों जिंदगियां प्रभावित ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1900 के बाद से केवल ईरान में ही विभिन्न भूकंपों के कारण 1.26 लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। वहीं दुनिया के अन्य भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में भी समय-समय पर आए बड़े झटकों ने भारी तबाही मचाई है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि भूकंपों को रोका नहीं जा सकता, लेकिन बेहतर निर्माण मानकों, आपदा प्रबंधन और समय पर चेतावनी प्रणालियों के जरिए इनके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
तेहरान: मध्य पूर्व में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। दक्षिणी बेरूत पर इजराइली हवाई हमलों के कुछ घंटों बाद ईरान ने इजराइल की ओर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इजराइली सेना के अनुसार, रविवार रात कई इलाकों में एयर रेड सायरन बजाए गए और नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के निर्देश जारी किए गए। इजराइली सेना (IDF) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी बयान में कहा कि ईरान की ओर से दागी गई मिसाइलों का समय रहते पता लगा लिया गया था, जिसके बाद देश की वायु रक्षा प्रणाली को सक्रिय कर दिया गया। सेना का दावा है कि अधिकांश मिसाइलों को हवा में ही इंटरसेप्ट कर नष्ट कर दिया गया। कई इलाकों में बजाए गए सायरन आईडीएफ के मुताबिक, संभावित हमले की चेतावनी मिलने के बाद उत्तरी इजराइल समेत कई क्षेत्रों में सायरन बजाए गए। सुरक्षा एजेंसियों ने लोगों को बंकरों और सुरक्षित स्थानों में रहने की सलाह दी। फिलहाल किसी बड़े नुकसान या जनहानि की सूचना नहीं मिली है। सीजफायर के बाद पहला सीधा हमला 8 अप्रैल को लागू हुए युद्धविराम के बाद यह इजराइल पर ईरान का पहला प्रत्यक्ष मिसाइल हमला माना जा रहा है। हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच बयानबाजी तेज हो गई थी, लेकिन अब संघर्ष फिर से सैन्य कार्रवाई के स्तर तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। बेरूत हमले के बाद बढ़ा तनाव इससे पहले इजराइल ने दक्षिणी बेरूत के कई इलाकों में हवाई हमले किए थे। ईरान ने इन हमलों की कड़ी निंदा करते हुए चेतावनी दी थी कि यदि क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई जारी रही तो उसका जवाब दिया जाएगा। इसके बाद तेहरान ने अमेरिका के साथ चल रही कुछ कूटनीतिक वार्ताओं को भी रोकने का फैसला किया। रामत डेविड एयर बेस को निशाना बनाने का दावा ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि उसकी एयरोस्पेस फोर्स ने बैलिस्टिक मिसाइलों के जरिए इजराइल के रामत डेविड एयर बेस को निशाना बनाया। इजराइल ने इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की है। ईरान की चेतावनी मिसाइल हमलों के बाद ईरानी अधिकारियों ने कहा कि यदि इजराइल आगे भी सैन्य कार्रवाई जारी रखता है तो जवाब और अधिक कठोर होगा। दूसरी ओर इजराइली सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। क्षेत्रीय स्थिरता पर बढ़ी चिंता विश्लेषकों का मानना है कि बेरूत एयरस्ट्राइक और उसके बाद हुए मिसाइल हमलों ने अप्रैल में लागू युद्धविराम को कमजोर कर दिया है। यदि दोनों पक्षों के बीच सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता और बढ़ सकती है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
ईरान के साथ जारी सैन्य तनाव को लेकर अमेरिकी राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध संबंधी शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव पारित कर दिया है। खास बात यह रही कि इस प्रस्ताव को पारित कराने में कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी डेमोक्रेट्स का साथ दिया। 215-208 वोटों से पास हुआ प्रस्ताव बुधवार को हुए मतदान में प्रस्ताव 215 के मुकाबले 208 मतों से पारित हुआ। मतदान के दौरान रिपब्लिकन सांसद थॉमस मैसी, ब्रायन फिट्जपैट्रिक, टॉम बैरेट और वॉरेन डेविडसन ने पार्टी लाइन से हटकर प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। इस नतीजे ने संकेत दिया है कि ईरान नीति को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी मतभेद बढ़ रहे हैं। कांग्रेस की मंजूरी बिना युद्ध पर उठे सवाल विवाद की जड़ अमेरिकी सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ है, जिसकी शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी। आलोचकों का आरोप है कि व्हाइट हाउस ने इस सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस से औपचारिक मंजूरी नहीं ली। डेमोक्रेट सांसदों का कहना है कि अमेरिकी संविधान के अनुसार लंबे सैन्य अभियान के लिए कांग्रेस की स्वीकृति आवश्यक है। क्या है वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन? प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित यह प्रस्ताव ‘वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन’ के तहत लाया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रपति कांग्रेस की अनुमति के बिना लंबे समय तक किसी सैन्य संघर्ष में अमेरिका को शामिल न रख सकें। यह प्रस्ताव सीधे कानून नहीं बनता, लेकिन इसके जरिए राष्ट्रपति पर राजनीतिक और संवैधानिक दबाव बढ़ाया जा सकता है। अब सीनेट में होगी अगली परीक्षा हाउस से पारित होने के बाद यह प्रस्ताव अब सीनेट के पास जाएगा। वहां भी मंजूरी मिलने पर ट्रंप प्रशासन पर दबाव और बढ़ सकता है। अंतिम रूप से यह प्रस्ताव राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए नहीं भेजा जाता और सामान्य परिस्थितियों में इसे कानून का दर्जा नहीं मिलता। डेमोक्रेट सांसद बोले- संविधान की रक्षा जरूरी प्रस्ताव पेश करने वाले न्यूयॉर्क के डेमोक्रेट सांसद ग्रेगरी मीक्स ने कहा कि कांग्रेस अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रही है। उन्होंने कहा कि जब कार्यपालिका संविधान के अनुरूप काम नहीं करती, तब विधायिका का दायित्व है कि वह नियंत्रण और संतुलन की भूमिका निभाए। पहले टल गया था मतदान, अब बदल गए हालात इस प्रस्ताव पर मतदान मई में होना था, लेकिन उस समय इसे टाल दिया गया था। डेमोक्रेट नेताओं ने आरोप लगाया था कि रिपब्लिकन नेतृत्व प्रस्ताव की संभावित सफलता से चिंतित था। अब कुछ रिपब्लिकन सांसदों के समर्थन के साथ प्रस्ताव पारित होने से राजनीतिक समीकरण बदलते दिखाई दे रहे हैं। रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी बढ़ रही असहमति ईरान नीति के अलावा हाल के महीनों में ट्रंप प्रशासन के कई प्रस्तावों पर रिपब्लिकन सांसदों के बीच मतभेद सामने आए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि विदेश नीति और सरकारी खर्चों को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग धड़े खुलकर सामने आने लगे हैं। स्पीकर माइक जॉनसन ने किया विरोध प्रतिनिधि सभा के स्पीकर माइक जॉनसन ने प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि राष्ट्रपति की शक्तियों पर इस तरह के प्रतिबंध अमेरिका की कूटनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकते हैं। उनका तर्क था कि ईरान में सैन्य अभियान के उद्देश्य पूरे किए जा चुके हैं और अब शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए राष्ट्रपति को पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। सैन्य अभियान की वैधानिक जांच भी शुरू इसी बीच पेंटागन, विदेश विभाग और यूएसएआईडी के महानिरीक्षकों ने ईरान से जुड़े सैन्य अभियान की संयुक्त समीक्षा शुरू कर दी है। निगरानी एजेंसियों का कहना है कि कानून के तहत 60 दिनों से अधिक समय तक चलने वाले सैन्य अभियानों की समीक्षा अनिवार्य होती है। इससे व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच टकराव और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान को संवेदनशील तकनीकी उपकरण उपलब्ध कराने के आरोप में अमेरिकी-ईरानी कारोबारी जमशीद घोमी को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों का दावा है कि उन्होंने वर्षों तक अमेरिकी निर्यात प्रतिबंधों को दरकिनार करते हुए नेटवर्किंग और साइबर सुरक्षा से जुड़े उपकरण ईरान तक पहुंचाए। संघीय अधिकारियों के अनुसार, 63 वर्षीय घोमी कैलिफोर्निया के न्यूपोर्ट कोस्ट के निवासी हैं और तेहरान स्थित तकनीकी कंपनी फराज परदाज रायानेह (FPR) के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। निर्यात प्रतिबंधों को दरकिनार करने का आरोप अमेरिकी न्याय विभाग के मुताबिक, घोमी पर इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) समेत कई संघीय कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। जांचकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने बिना आवश्यक सरकारी अनुमति के संवेदनशील अमेरिकी तकनीक ईरान भेजने के लिए एक संगठित तंत्र तैयार किया था। यूएई बना कथित ट्रांजिट हब अभियोजन पक्ष के अनुसार, उपकरणों को सीधे ईरान भेजने के बजाय पहले संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) स्थित कंपनियों और बिचौलियों तक पहुंचाया जाता था। वहां से उन्हें आगे ईरान भेजा जाता था। अधिकारियों का मानना है कि इस तरीके का इस्तेमाल वास्तविक खरीदारों और अंतिम उपयोगकर्ताओं की पहचान छिपाने के लिए किया गया। ऑनलाइन खरीदारी से शुरू हुआ ऑपरेशन जांच में सामने आया है कि शुरुआती दौर में कथित तौर पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और डिजिटल भुगतान सेवाओं के माध्यम से बड़ी मात्रा में तकनीकी उपकरण खरीदे गए। बाद में अमेरिकी सप्लायरों से सीधे खरीदारी की गई और कई कंपनियों का उपयोग कर लेनदेन की वास्तविक प्रकृति को छिपाने का प्रयास किया गया। भारी मात्रा में हार्डवेयर भेजने का दावा संघीय जांच एजेंसियों का आरोप है कि कई वर्षों के दौरान बड़ी मात्रा में तकनीकी हार्डवेयर दुबई के रास्ते ईरान पहुंचाया गया। जांचकर्ताओं के अनुसार, शिपिंग रिकॉर्ड और दस्तावेजों में कथित रूप से गलत जानकारी दर्ज कर अंतिम गंतव्य को छिपाया गया। रक्षा और परमाणु संस्थानों तक पहुंचे उपकरण अदालती दस्तावेजों में दावा किया गया है कि भेजे गए कुछ उपकरण ईरान के परमाणु और रक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठनों तक पहुंचे। अभियोजकों के अनुसार, इन संस्थाओं को नेटवर्किंग, संचार और एन्क्रिप्शन तकनीक उपलब्ध कराई गई हो सकती है। इन आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगी। पैसों के लेनदेन की भी जांच अमेरिकी एजेंसियां इस मामले से जुड़े वित्तीय लेनदेन की भी जांच कर रही हैं। आरोप है कि धन के प्रवाह को छिपाने के लिए शेल कंपनियों, जटिल कारोबारी संरचनाओं और कथित फर्जी दस्तावेजों का उपयोग किया गया। साथ ही आय और कारोबारी गतिविधियों से जुड़ी जानकारी को लेकर भी जांच जारी है। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला अमेरिकी न्याय विभाग ने इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय बताया है। विभाग का कहना है कि संवेदनशील तकनीक को प्रतिबंधित देशों तक पहुंचने से रोकना उसकी प्राथमिकता है। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि ऐसे मामलों में आगे भी सख्त कार्रवाई की जाएगी। अदालत में साबित होंगे आरोप जमशीद घोमी के खिलाफ आरोपों की जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी है। यदि अदालत में आरोप सिद्ध हो जाते हैं, तो उन्हें अमेरिकी संघीय कानूनों के तहत लंबी जेल की सजा हो सकती है। कानूनी सिद्धांतों के अनुसार अदालत में दोष साबित होने तक उन्हें निर्दोष माना जाएगा।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के इस्तीफे की खबरों ने राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। कुछ विदेशी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि देश की निर्णय प्रक्रिया में बढ़ते सैन्य प्रभाव और सरकार की सीमित भूमिका से नाराज होकर उन्होंने इस्तीफा देने की पेशकश की है। ईरानी सरकार और राष्ट्रपति कार्यालय ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। रिपोर्ट में क्या किया गया दावा? ब्रिटिश-ईरानी मीडिया संस्थान 'ईरान इंटरनेशनल' की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने दावा किया कि राष्ट्रपति पेजेशकियन ने सर्वोच्च नेतृत्व को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। रिपोर्ट में कहा गया कि महत्वपूर्ण राष्ट्रीय फैसलों में सरकार की भूमिका कम होने से वह असंतुष्ट थे। राष्ट्रपति कार्यालय ने बताया निराधार राष्ट्रपति कार्यालय के अधिकारियों ने इन खबरों को अफवाह करार देते हुए कहा कि पेजेशकियन सामान्य रूप से अपने सभी सरकारी दायित्व निभा रहे हैं। राष्ट्रपति कार्यालय के संचार विभाग ने कहा कि विदेशी मीडिया द्वारा फैलाई जा रही खबरों का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। तस्नीम एजेंसी ने भी किया खंडन आईआरजीसी से संबद्ध तस्नीम न्यूज एजेंसी ने सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा कि राष्ट्रपति ने इस्तीफा नहीं दिया है और सरकार अपना कामकाज सामान्य रूप से चला रही है। सरकार और सुरक्षा संस्थाओं के रिश्तों पर चर्चा पिछले कुछ महीनों से ईरान की निर्वाचित सरकार और सैन्य-सुरक्षा संस्थाओं के बीच मतभेदों की खबरें सामने आती रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में इस्तीफे की अटकलों को बल मिला। हालांकि, सरकार का कहना है कि देश की एकता और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर फैलाई जा रही ऐसी खबरों का कोई आधार नहीं है। सत्ता के केंद्र को लेकर बहस जारी विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की नीतिगत निर्णय प्रक्रिया में कई प्रभावशाली संस्थाओं और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका रहती है। लेकिन फिलहाल राष्ट्रपति के इस्तीफे को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और सरकार लगातार इन दावों को भ्रामक प्रचार बता रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।