रांची। झारखंड में 14वीं JPSC परीक्षा को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार जारी है। इसी बीच मंगलवार देर रात रांची के जयपाल सिंह स्टेडियम में पुलिस-प्रशासन की टीम के पहुंचने को लेकर सियासत तेज हो गई है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया कि देर रात प्रशासन ने धरने पर बैठे छात्रों को हटाने की कोशिश की और धरनास्थल की बिजली भी काट दी गई। मरांडी ने बुधवार सुबह सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा कर पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि रात करीब 1 से 1:30 बजे के बीच सिटी एसपी, एसएसपी और डीसी समेत कई अधिकारी जयपाल सिंह स्टेडियम पहुंचे थे। छात्रों को हटाने की कोशिश का लगाया आरोप बाबूलाल मरांडी के मुताबिक, प्रशासन की ओर से छात्रों से कहा गया कि JPSC से संबंधित मामला सुलझ चुका है और अब धरना जारी रखने की जरूरत नहीं है। हालांकि, रांची के डीसी मंजूनाथ भजंत्री ने इस दावे से अलग पक्ष रखा। उनके अनुसार, वह छात्रों का हालचाल जानने और उनकी परेशानियों को समझने के लिए धरनास्थल पहुंचे थे। मरांडी ने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से धरना और भूख हड़ताल कर रहे छात्रों को आधी रात में परेशान करना उचित नहीं है। उन्होंने प्रशासन की कार्रवाई को लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाने की कोशिश बताया। बिजली काटने का भी लगाया आरोप नेता प्रतिपक्ष ने दावा किया कि देर रात धरनास्थल की बिजली काट दी गई। इसके बाद छात्रों ने अपने सहयोगियों और अन्य लोगों को फोन कर मौके पर बुलाया। आरोप के अनुसार, भाजपा प्रदेश महामंत्री अमर बावरी, भानु राज सिन्हा समेत कई अन्य लोग भी रात में जयपाल सिंह स्टेडियम पहुंचे। इसके बाद पुलिस और प्रशासन की टीम धीरे-धीरे वहां से वापस लौट गई। 14वीं JPSC परीक्षा रद्द होने के बावजूद क्यों जारी है आंदोलन? मरांडी ने कहा कि सरकार की ओर से 14वीं JPSC परीक्षा रद्द करने का निर्णय छात्रों की सभी मांगों का समाधान नहीं है। उनके मुताबिक, आंदोलन कर रहे छात्रों की सबसे बड़ी मांग परीक्षा में कथित गड़बड़ी की CBI जांच है। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा कराई जा रही CID जांच पर भी सवाल उठाया। मरांडी का कहना है कि छात्रों और झारखंड की जनता का इस जांच पर भरोसा नहीं है। CBI जांच और फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग बाबूलाल मरांडी ने कहा कि पूरे मामले की जांच CBI से कराई जानी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने हाई कोर्ट की निगरानी में फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने की मांग की। उनके अनुसार, इससे परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े सबूत रखने वाले छात्रों को अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा। जांच के बाद दोषियों पर कार्रवाई और निर्दोष लोगों को राहत मिल सकेगी। मरांडी ने सरकार से सवाल किया कि यदि उसे अपनी जांच और कार्रवाई पर पूरा भरोसा है, तो CBI जांच कराने में उसे आपत्ति क्यों है। रात में कार्रवाई को बताया अनुचित नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि लोकतंत्र में छात्रों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने का अधिकार है। उन्होंने प्रशासन से धरना खत्म कराने के बजाय छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि धरनास्थल पर बिजली और दूसरी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध रहनी चाहिए। साथ ही किसी भी परिस्थिति में लाठीचार्ज या बल प्रयोग करके आंदोलन खत्म करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। आंदोलन बढ़ने की दी चेतावनी मरांडी ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि छात्रों के आंदोलन को बलपूर्वक खत्म करने का प्रयास किया गया तो इसकी प्रतिक्रिया पूरे झारखंड में देखने को मिल सकती है। उन्होंने कहा कि JPSC की परीक्षा में शामिल होने वाले छात्र राज्य के अलग-अलग जिलों और गांवों से आते हैं। ऐसे में आंदोलन के व्यापक रूप लेने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने 10 अगस्त को बड़ी संख्या में छात्रों के जुटने का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने इससे पहले इतना बड़ा और अनुशासित छात्र आंदोलन नहीं देखा। सरकार से की संयम बरतने की अपील बाबूलाल मरांडी ने सरकार और जिला प्रशासन से छात्रों को चुनौती देने के बजाय उनकी बात सुनने और सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलन को बलपूर्वक खत्म करने के बजाय सरकार को छात्रों की मुख्य मांगों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। नोट: उपरोक्त खबर उपलब्ध कराए गए समाचार पाठ के आधार पर पूरी तरह पुनर्लिखित है। इसमें प्रशासन और विपक्ष की ओर से सामने आए अलग-अलग दावों को उनके पक्ष के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है।
रांची: JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों का आंदोलन लगातार जारी है। आंदोलन के 18वें दिन मंगलवार को राजधानी रांची में छात्रों ने विरोध का अलग तरीका अपनाया। बड़ी संख्या में छात्र और अभ्यर्थी हाथों में फूल लेकर साइलेंट मार्च में शामिल हुए और बिना नारेबाजी के अपनी मांगों को सामने रखा। JPSC-JSSC रिफॉर्म्स मंच के नेतृत्व में निकाला गया यह मौन जुलूस जयपाल सिंह स्टेडियम से शुरू होकर अल्बर्ट एक्का चौक तक पहुंचा। प्रदर्शनकारियों ने फूलों के जरिए शांतिपूर्ण विरोध का संदेश दिया और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग दोहराई। नारे नहीं लगाए, खामोशी से रखी अपनी बात मार्च के दौरान छात्रों ने नारेबाजी से पूरी तरह परहेज किया। हाथों में फूल लेकर वे शांतिपूर्वक आगे बढ़ते रहे। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उनका विरोध किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है, बल्कि सरकारी भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों को लेकर है। छात्रों ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अभ्यर्थी वर्षों का समय, मेहनत और पैसा लगाते हैं। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठने से उनका सिस्टम पर भरोसा प्रभावित होता है। 25 जुलाई से जारी है छात्रों का आंदोलन JPSC और JSSC की विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी और अनियमितताओं को लेकर छात्र 25 जुलाई से आंदोलन कर रहे हैं। मंगलवार को आंदोलन का 18वां दिन था। प्रदर्शनकारी लगातार अलग-अलग तरीकों से सरकार और संबंधित आयोगों तक अपनी मांग पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकारी नौकरियों के लिए होने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं में निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है। कई परीक्षाओं की जांच और रद्द करने की मांग आंदोलनकारी छात्रों की प्रमुख मांगों में JPSC और JSSC की कार्यप्रणाली में सुधार शामिल है। छात्र चाहते हैं कि जिन परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं, उनकी निष्पक्ष जांच कराई जाए। इसके अलावा कुछ परीक्षाओं को रद्द करने और जिम्मेदारी तय करने की मांग भी की जा रही है। छात्रों का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया में ऐसे सुधार किए जाएं, जिससे भविष्य में इस तरह के विवाद दोबारा सामने न आएं। CBI जांच या रिटायर्ड जजों की कमेटी की मांग प्रदर्शनकारी भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवादों की स्वतंत्र जांच चाहते हैं। उनकी मांग है कि पूरे मामले की जांच CBI से कराई जाए। इसके विकल्प के तौर पर दूसरे राज्यों के हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की कमेटी बनाकर जांच कराने का प्रस्ताव भी रखा गया है। छात्रों का तर्क है कि जांच ऐसी स्वतंत्र एजेंसी या समिति से होनी चाहिए, जिससे निष्पक्षता को लेकर कोई सवाल न उठे। छह छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर आंदोलन के बीच छह प्रदर्शनकारी छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। इनमें से दो छात्रों की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। छात्र संगठनों ने सरकार से जल्द हस्तक्षेप करने और आंदोलनकारियों के साथ बातचीत के जरिए समाधान निकालने की मांग की है। सरकार के साथ छठे दौर की बातचीत भी नहीं बनी बात रविवार को JPSC-JSSC रिफॉर्म्स मंच के प्रतिनिधियों और झारखंड सरकार के बीच छठे दौर की बातचीत हुई। हालांकि, इस बैठक में भी किसी ठोस समाधान पर सहमति नहीं बन सकी। लगातार बातचीत के बावजूद गतिरोध खत्म नहीं होने से छात्रों का आंदोलन जारी है। इसी क्रम में मंगलवार को साइलेंट मार्च के जरिए छात्रों ने अपना विरोध दर्ज कराया। फूलों के जरिए दिया शांतिपूर्ण आंदोलन का संदेश रांची में निकले इस मार्च की सबसे खास बात इसका शांतिपूर्ण स्वरूप रहा। छात्रों ने हाथों में फूल रखे, लेकिन नारे नहीं लगाए। खामोशी के जरिए उन्होंने सरकार का ध्यान भर्ती प्रक्रिया में सुधार, पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच की मांग की ओर खींचने की कोशिश की। अब आंदोलन के 18वें दिन के बाद छात्रों की अगली रणनीति और सरकार की ओर से होने वाली पहल पर सबकी नजर है। लंबे समय से जारी गतिरोध को खत्म करने के लिए दोनों पक्षों के बीच बातचीत का अगला दौर अहम माना जा रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।