Nandan Nilekani

Infosys co-founder Nandan Nilekani appointed to lead India's exam reform task force
कौन हैं नंदन नीलेकणी, जिन्हें PM मोदी ने सौंपी एग्जाम रिफॉर्म्स की जिम्मेदारी?

Exam Reform Task Force: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने के लिए हाई-पावर्ड टास्क फोर्स का गठन किया है। इस समिति की कमान इंफोसिस के सह-संस्थापक और देश के प्रमुख टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ नंदन नीलेकणी को सौंपी गई है। NEET-UG और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के मामलों के बाद सरकार ने परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की दिशा में यह बड़ा कदम उठाया है। पीएम मोदी ने क्या कहा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (26 जुलाई 2026) को सोशल मीडिया पर जारी अपने संदेश में कहा कि सरकार भारतीय परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह 'लीक-प्रूफ' बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि दुनिया के जाने-माने टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में हाई-पावर्ड टास्क फोर्स बनाई गई है, जो परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने के लिए तकनीक आधारित समाधान सुझाएगी। पीएम मोदी ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में युवाओं का विश्वास बहाल करना सरकार की प्राथमिकता है और इसके लिए आधुनिक तकनीक का अधिकतम उपयोग किया जाएगा। कौन हैं नंदन नीलेकणी? नंदन मोहनराव नीलेकणी का जन्म 2 जून 1955 को कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में हुआ था। उन्होंने IIT बॉम्बे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। वर्ष 1978 में उन्होंने पटनी कंप्यूटर सिस्टम्स से अपने करियर की शुरुआत की। साल 1981 में उन्होंने एन.आर. नारायण मूर्ति और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर इंफोसिस की स्थापना की। कंपनी के शुरुआती विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और वर्ष 2002 में वह इंफोसिस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) बने। उनके नेतृत्व में इंफोसिस ने वैश्विक आईटी उद्योग में अपनी मजबूत पहचान बनाई। आधार परियोजना के प्रमुख वास्तुकार नंदन नीलेकणी का सबसे बड़ा योगदान भारत की आधार (Aadhaar) परियोजना को माना जाता है। वर्ष 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने उन्हें भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) का अध्यक्ष नियुक्त किया था। उनके नेतृत्व में आधार दुनिया का सबसे बड़ा बायोमेट्रिक पहचान कार्यक्रम बना, जिसने सरकारी सेवाओं, सब्सिडी वितरण, बैंकिंग और डिजिटल गवर्नेंस को नई दिशा दी। आज आधार भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। UPI और डिजिटल इंडिया में भी अहम भूमिका नंदन नीलेकणी ने भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। देश में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के विकास और डिजिटल भुगतान प्रणाली को बढ़ावा देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। आज UPI दुनिया की सबसे सफल डिजिटल पेमेंट प्रणालियों में गिना जाता है और भारत की तकनीकी उपलब्धियों का प्रमुख उदाहरण है। परीक्षा सुधार में क्या होगी भूमिका? सरकार की ओर से गठित हाई-पावर्ड टास्क फोर्स का उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में संरचनात्मक और तकनीकी सुधार करना है। समिति निम्नलिखित विषयों पर सुझाव देगी— प्रश्नपत्रों की सुरक्षा को मजबूत बनाना। पेपर लीक रोकने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल। उम्मीदवारों की पहचान और परीक्षा प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाना। परीक्षा संचालन और मूल्यांकन प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाना। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) को तकनीकी रूप से अधिक सक्षम बनाना। क्यों अहम है यह टास्क फोर्स? पिछले कुछ वर्षों में NEET-UG, UGC-NET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं के मामलों ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में सरकार को उम्मीद है कि नंदन नीलेकणी के तकनीकी अनुभव और डिजिटल गवर्नेंस की समझ से ऐसी प्रणाली विकसित की जा सकेगी, जिससे भविष्य में परीक्षाएं अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बन सकें।  

kalpana जुलाई 27, 2026 0
Nandan Nilekani leading a high-powered task force for Indian exam system reforms
Indian Exam System Reform: परीक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी, नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में बनी 6 सदस्यीय टास्क फोर्स

Exam Reform Task Force: देश में लगातार सामने आए पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली पर उठे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने के लिए 6 सदस्यीय हाई-पावर्ड टास्क फोर्स के गठन का ऐलान किया है। इस समिति की अध्यक्षता इंफोसिस के सह-संस्थापक और आधार परियोजना के प्रमुख वास्तुकार नंदन नीलेकणी करेंगे। सरकार का कहना है कि समिति परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधारों का रोडमैप तैयार करेगी और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) को अधिक मजबूत बनाने के लिए सुझाव देगी। नंदन नीलेकणी को सौंपी गई बड़ी जिम्मेदारी डिजिटल गवर्नेंस और बड़े तकनीकी प्रोजेक्ट्स का लंबा अनुभव रखने वाले नंदन नीलेकणी इस टास्क फोर्स का नेतृत्व करेंगे। आधार जैसी दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल पहचान परियोजना को सफलतापूर्वक लागू करने का अनुभव उनके पास है। सरकार चाहती है कि भविष्य की परीक्षाओं में प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, उम्मीदवारों की पहचान, परीक्षा संचालन, डेटा सुरक्षा और परिणाम प्रक्रिया में आधुनिक तकनीकों का अधिक उपयोग किया जाए, ताकि पेपर लीक जैसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाई जा सके। समिति में शामिल हैं देश के शीर्ष विशेषज्ञ सरकार ने इस टास्क फोर्स में तकनीक, सुरक्षा, शिक्षा और प्रशासन से जुड़े अनुभवी विशेषज्ञों को शामिल किया है। समिति के प्रमुख सदस्यों में शामिल हैं— नंदन नीलेकणी – अध्यक्ष, इंफोसिस के सह-संस्थापक और आधार परियोजना के प्रमुख। डॉ. एस. सोमनाथ – इसरो (ISRO) के पूर्व अध्यक्ष, जिन्हें बड़े तकनीकी और वैज्ञानिक प्रोजेक्ट्स का व्यापक अनुभव है। तपन डेका – पूर्व इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) निदेशक, जो परीक्षा सुरक्षा और पेपर लीक रोकने के उपायों पर सुझाव देंगे। प्रो. वी. कामकोटी – निदेशक, IIT मद्रास, जो साइबर सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कंप्यूटर सिस्टम के विशेषज्ञ हैं। अनीता करवाल – पूर्व CBSE अध्यक्ष और पूर्व स्कूल शिक्षा सचिव, जिन्होंने नई शिक्षा नीति (NEP 2020) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचे (NCF) के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अमृत लाल मीणा – वरिष्ठ IAS अधिकारी और बिहार के पूर्व मुख्य सचिव, जिन्हें बड़े प्रशासनिक ढांचे के संचालन का लंबा अनुभव है। क्या होंगे टास्क फोर्स के प्रमुख कार्य? सरकार के अनुसार यह समिति परीक्षा प्रणाली में संरचनात्मक, प्रशासनिक और तकनीकी सुधारों पर काम करेगी। टास्क फोर्स निम्नलिखित पहलुओं पर अपनी सिफारिशें देगी— प्रश्नपत्रों की सुरक्षा को और मजबूत बनाना। पेपर लीक रोकने के लिए नई तकनीकों का उपयोग। उम्मीदवारों की डिजिटल पहचान सत्यापन प्रणाली विकसित करना। परीक्षा संचालन को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना। साइबर सुरक्षा और डेटा सुरक्षा के मानकों को मजबूत करना। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली में सुधार और संस्थागत क्षमता बढ़ाना। परीक्षा प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक डिजिटल तकनीकों के उपयोग की संभावनाओं पर सुझाव देना। पेपर लीक के बाद सरकार की बड़ी पहल पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य पर पड़े असर को देखते हुए सरकार अब परीक्षा व्यवस्था में दीर्घकालिक और संस्थागत सुधार लागू करने की तैयारी कर रही है। सरकार का मानना है कि केवल सख्त कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से इतना मजबूत बनाना होगा कि प्रश्नपत्रों की गोपनीयता, डिजिटल सुरक्षा और परीक्षा संचालन में किसी भी तरह की गड़बड़ी की संभावना न्यूनतम हो। भविष्य की परीक्षा प्रणाली तय करेगी समिति सरकार ने संकेत दिए हैं कि टास्क फोर्स की सिफारिशों के आधार पर भविष्य की परीक्षा प्रणाली, सुरक्षा मानकों और संचालन से जुड़े नए नियम तैयार किए जाएंगे। उम्मीद की जा रही है कि समिति की रिपोर्ट आने के बाद NTA सहित देश की प्रमुख परीक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली में व्यापक बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इससे प्रतियोगी परीक्षाओं को अधिक विश्वसनीय, पारदर्शी और तकनीक-संचालित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जाएगा।  

kalpana जुलाई 27, 2026 0
Infosys Chairman Nandan Nilekani discusses AI opportunities and dismisses concerns about job losses in the IT sector.
Infosys & AI: ‘इंफोसिस का कुछ नहीं बिगाड़ सकता AI’, नौकरियों पर खतरे के डर को नंदन नीलेकणि ने किया खारिज

Infosys Chairman on AI: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव और इसके कारण नौकरियों पर मंडरा रहे खतरे को लेकर दुनिया भर में बहस जारी है। इसी बीच इंफोसिस के चेयरमैन नंदन नीलेकणि ने AI से जुड़ी आशंकाओं पर स्पष्ट और मजबूत राय रखी है। उनका कहना है कि AI पारंपरिक आईटी कंपनियों की जगह नहीं लेगा, बल्कि उनकी क्षमता और उत्पादकता को कई गुना बढ़ाने का काम करेगा। AI से नहीं खत्म होंगी आईटी कंपनियां इंफोसिस की 45वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) में बोलते हुए नंदन नीलेकणि ने कहा कि जेनरेटिव AI के आने से पारंपरिक आईटी सर्विसेज मॉडल खत्म होने की बात सही नहीं है। उन्होंने कहा कि: "AI हमारी जैसी कंपनियों को रिप्लेस नहीं करेगा, बल्कि उन संगठनों की ताकत बढ़ाएगा जो तेजी से बदलाव के साथ खुद को ढालते हैं और स्पष्ट लक्ष्य के साथ आगे बढ़ते हैं।" नीलेकणि के अनुसार, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट केवल कोड लिखने तक सीमित नहीं है। इसमें डोमेन नॉलेज, सुरक्षा, टेस्टिंग, सिस्टम डिजाइन और आर्किटेक्चर जैसी कई महत्वपूर्ण विशेषज्ञताएं शामिल होती हैं, जिन्हें केवल AI के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। ऑटोमेशन के बीच क्यों बढ़ा है डर? दुनियाभर में यह चिंता लगातार बढ़ रही है कि AI और ऑटोमेशन के कारण कोडिंग, आउटसोर्सिंग और पारंपरिक आईटी सेवाओं की मांग घट सकती है। खासकर भारत के 300 अरब डॉलर से अधिक के तकनीकी उद्योग के लिए यह चिंता महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, नंदन नीलेकणि का मानना है कि AI खतरा नहीं बल्कि अवसर है। पुराने सिस्टम को आधुनिक बनाने में मदद कर रहा AI इंफोसिस चेयरमैन ने बताया कि AI की मदद से कंपनियां अपने दशकों पुराने टेक्नोलॉजी सिस्टम को आधुनिक बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रही हैं। उनके मुताबिक, आने वाले समय में सबसे बड़ा अवसर AI मॉडल और एजेंट्स को कंपनियों के महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ने में होगा। रिपोर्ट्स के अनुसार, इंफोसिस अपने शीर्ष 200 ग्राहकों में से लगभग 90 प्रतिशत के साथ AI आधारित प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। 2030 तक 400 बिलियन डॉलर का हो सकता है बाजार इंफोसिस ने हाल ही में अपना AI-First Value Framework लॉन्च किया है। कंपनी का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक AI-फर्स्ट सर्विसेज का वैश्विक बाजार 300 से 400 बिलियन डॉलर के बीच पहुंच सकता है। नंदन नीलेकणि के बयान से यह संकेत मिलता है कि इंफोसिस AI को चुनौती नहीं, बल्कि भविष्य के विकास का सबसे बड़ा अवसर मान रही है।  

surbhi जून 24, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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भारत की हवाई ताकत को मिलेगा बड़ा बूस्ट? फ्रांस ने 114 राफेल फाइटर जेट का प्रस्ताव सौंपा, 94 विमान भारत में बनाने की योजना

surbhi अगस्त 7, 2026 0