नई दिल्ली, एजेंसियां। चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व 19 मार्च से शुरू हो रहा है। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा से पहले घटस्थापना यानी कलश स्थापना की जाती है, जिसे समृद्धि और दिव्य ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि सही विधि से घटस्थापना करने पर घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। घटस्थापना से पहले करें तैयारी घटस्थापना करने से पहले आवश्यक सामग्री जैसे कलश, मिट्टी, जौ, नारियल, आम के पत्ते, लाल वस्त्र, अक्षत, कुमकुम, धूप और दीपक एकत्रित कर लें। इसके बाद स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल की साफ-सफाई कर गंगाजल का छिड़काव करें। पूजा के लिए ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) को शुभ माना जाता है। ऐसे करें कलश स्थापना पूजा स्थल पर एक साफ कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद एक पात्र में मिट्टी डालकर उसमें जौ बोएं और जल छिड़कें। अब कलश पर कुमकुम से ओम या स्वस्तिक बनाएं और उसमें जल, सिक्का, हल्दी व सुपारी डालें। कलश के मुख पर आम के पत्ते रखें और लाल कपड़े में लिपटा नारियल ऊपर स्थापित करें। पूजन और संकल्प का महत्व कलश को जौ के बीच या मां दुर्गा के पास स्थापित करने के बाद धूप-दीप जलाकर मां शैलपुत्री की पूजा करें और मंत्रों का जाप करें। जो भक्त नौ दिनों का व्रत रखते हैं, वे इसी समय संकल्प लें। धार्मिक मान्यता है कि संकल्प लेने से पूजा का फल पूर्ण रूप से प्राप्त होता है और नवरात्रि के दौरान विशेष आशीर्वाद मिलता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हर दिन माता के अलग-अलग रूप को विशेष भोग अर्पित करने से सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। पहले से तीसरे दिन तक का भोग नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा में दूध, घी या खीर का भोग लगाना शुभ माना जाता है। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को मिश्री, चीनी या गुड़ अर्पित किया जाता है, जिससे ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को दूध से बने पकवान या मेवे का भोग लगाना शुभ होता है। चौथे से छठे दिन तक का भोग चौथे दिन मां कूष्मांडा को मालपुए का भोग अर्पित किया जाता है, जो जीवन में सुख-समृद्धि लाता है। पांचवें दिन मां स्कंदमाता को केला चढ़ाना शुभ माना जाता है, जिससे संतान सुख की प्राप्ति होती है। छठे दिन मां कात्यायनी को शहद या मीठा पान अर्पित किया जाता है। सातवें से नौवें दिन तक का भोग सातवें दिन मां कालरात्रि को गुड़ या गुड़ से बने पदार्थ चढ़ाए जाते हैं। आठवें दिन मां महागौरी को हलवा-पूरी, खीर और नारियल का भोग लगाया जाता है। वहीं नौवें दिन मां सिद्धिदात्री को काला चना, हलवा और नारियल अर्पित कर नवरात्रि पूजा का समापन किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि विधि-विधान से माता के नौ रूपों को भोग अर्पित करने से भक्तों को विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।
रांची। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से हिंदू नव वर्ष की शुरुआत होती है। इसी दिन से चैत्र नवरात्रि का भी आरंभ होता है, जो देवी शक्ति की आराधना का विशेष पर्व माना जाता है। यह दिन केवल कैलेंडर बदलने का नहीं, बल्कि जीवन में नई शुरुआत और आत्मचिंतन का अवसर माना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग नामों से मनाया जाता है महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, दक्षिण भारत में उगादी और उत्तर भारत में हिंदू नव वर्ष के रूप में इसकी विशेष मान्यता है। हिंदू नव वर्ष के साथ नई शुरुआत हिंदू नव वर्ष को भारतीय संस्कृति में अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इसी दिन सृष्टि की रचना का आरंभ हुआ था। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि का निर्माण प्रारंभ किया था। इसलिए इस दिन को सृजन का प्रथम दिन माना जाता है। इसी दिन से विक्रम संवत का आरंभ भी होता है, जो भारत की प्राचीन कालगणना प्रणाली है। यह दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है और लोग इस दिन नए कार्यों की शुरुआत करते हैं।हिंदू नव वर्ष का आगमन प्रकृति में भी परिवर्तन का संकेत लेकर आता है। इस समय वसंत ऋतू अपने चरम पर होती है। पेड़ों पर नई पत्तियां आती हैं, फूल खिलते हैं और वातावरण में हरियाली और ताजगी दिखाई देती है। यह मौसम प्रकृति के पुनर्जन्म का प्रतीक है। पौराणिक महत्व और धार्मिक मान्यता बता दे हिंदू नव वर्ष के साथ ही चैत्र नवरात्री की शुरुआत होती है। इस बार चैत्र नवरात्रि में माता रानी पालकी पर सवार होकर आ रही है और विदाई हाथी पर होगी। धार्मिक परंपराओं में, पालकी पर मां का आना सामान्य रूप से बहुत ज्यादा शुभ संकेत नहीं माना जाता है, लेकिन इसे पूरी तरह अशुभ भी नहीं कहा जा सकता है। यह एक तरह का संकेत होता है कि आने वाले समय में समाज में कुछ उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। मां का हाथी पर जाना समृद्धि, स्थिरता और खुशी का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इससे अच्छी बारिश होगी, कृषि में लाभ होगा और आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा।इस साल, चैत्र नवरात्रि 19 मार्च को शुरू होगी और 27 मार्च को समाप्त होगी। इन नौ दिनों के दौरान, भक्त पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ देवी दुर्गा की नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इनमें दुर्गा के रूप शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री शामिल हैं। पहले दिन घटस्थापना या कलश स्थापना की जाती है, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्त इन दिनों में व्रत रखते हैं और पूरी श्रद्धा से पूजा-अर्चना करते हैं। चैत्र नवरात्रि की खास बात चैत्र नवरात्रि की खास बात है कि कहते हैं कि यह आध्यात्मिक इच्छाओं की पूर्ति करने वाली होती है। इस दौरान मंदिरों में विशेष पूजा, भजन-कीर्तन और धार्मिक आयोजन होते हैं। श्रद्धालु सात्विक जीवनशैली अपनाते हैं और आत्मशुद्धि पर ध्यान देते हैं। धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से की गई पूजा से देवी मां भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। यह पर्व जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मबल और अनुशासन का महत्व भी बताता है। चैत्र नवरात्रि का समापन राम नवमी के दिन होता है। इस दिन भगवान राम के जन्म का उत्सव मनाया जाता है। नवरात्रि के अंतिम दिन कई घरों में कन्या पूजन की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजा किया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार चैत्र नवरात्रि की पौराणिक कथा के अनुसार, जब राक्षस महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया और कोई भी देवता उसे पराजित नहीं कर सका, तब देवताओं ने पार्वती से रक्षा की प्रार्थना की। इसके बाद माता ने अपने अंश से नौ शक्तिशाली रूप प्रकट किए,जिन्हें देवताओं ने अपने शस्त्र देकर शक्तिशाली बनाया। ये क्रम चैत्र के महीने में प्रतिपदा तिथि से शुरू होकर 9 दिनों तक चला और यही कारण है कि इन नौ दिनों को चैत्र नवरात्रि के तौर पर मनाया जाने लगा। हिंदू नव वर्ष और चैत्र नवरात्रि केवल धार्मिक पर्व नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये पर्व समाज में एकता, अनुशासन और सकारात्मकता का संदेश देते हैं।
नई दिल्ली,एजेंसियां। हिंदू धर्म में नवरात्रि का पर्व देवी शक्ति की आराधना का विशेष समय माना जाता है। इन नौ पवित्र दिनों में भक्त पूरे श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करते हैं। इन्हें सामूहिक रूप से नवदुर्गा कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान देवी पृथ्वी पर आकर अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं और उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु व्रत रखते हैं, देवी की पूजा-अर्चना करते हैं और घरों तथा मंदिरों में विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन और नियम के साथ माता की आराधना करता है, उसके जीवन से दुख और बाधाएं धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं। पहला दिन: मां शैलपुत्री की पूजा नवरात्रि के पहले दिन शैलपुत्री की पूजा की जाती है। उन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है और यह देवी पार्वती का पहला रूप हैं। माता शैलपुत्री नंदी बैल पर सवार रहती हैं और उनके हाथों में त्रिशूल और कमल का फूल होता है।धार्मिक मान्यता है कि मां शैलपुत्री की पूजा से भक्तों को मानसिक शांति, स्थिरता और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है। यह स्वरूप जीवन में नई शुरुआत और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। दूसरा दिन: मां ब्रह्मचारिणी नवरात्रि के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। यह देवी पार्वती का वह स्वरूप है जब उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी।माता ब्रह्मचारिणी के हाथ में जपमाला और कमंडल होता है और उनका स्वरूप तपस्या, त्याग और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। भक्त इस दिन आत्मबल, धैर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति के लिए उनकी आराधना करते हैं। तीसरा दिन: मां चंद्रघंटा नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र के आकार की घंटी होती है, इसलिए उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है।मां चंद्रघंटा सिंह या बाघ पर सवार रहती हैं और उनके हाथों में तलवार, त्रिशूल और धनुष जैसे कई अस्त्र होते हैं। यह देवी साहस, वीरता और शांति की प्रतीक मानी जाती हैं। भक्तों का विश्वास है कि उनकी पूजा से भय और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। चौथा दिन: मां कूष्मांडा नवरात्रि के चौथे दिन कूष्मांडा की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उन्होंने अपनी दिव्य मुस्कान से पूरे ब्रह्मांड की रचना की थी।माता कूष्मांडा सिंह पर सवार रहती हैं और उनकी आठ भुजाएं होती हैं। उनके हाथों में अलग-अलग अस्त्र, जपमाला और अमृत से भरा कलश होता है। उन्हें जीवन ऊर्जा और सृष्टि की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। पांचवां दिन: मां स्कंदमाता नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। वह भगवान कार्तिकेय की माता हैं और मातृत्व, प्रेम तथा करुणा का प्रतीक मानी जाती हैं।माता स्कंदमाता सिंह पर सवार रहती हैं और अपनी गोद में बाल रूप में भगवान कार्तिकेय को धारण करती हैं। माना जाता है कि उनकी पूजा से परिवार में सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। छठा दिन: मां कात्यायनी नवरात्रि के छठे दिन कात्यायनी की पूजा की जाती है। यह देवी दुर्गा का वीर और युद्ध करने वाला स्वरूप माना जाता है।मां कात्यायनी को बुराई और अन्याय का नाश करने वाली शक्ति का प्रतीक माना जाता है। भक्त उनकी पूजा साहस, आत्मविश्वास और जीवन में सफलता के लिए करते हैं। सातवां दिन: मां कालरात्रि नवरात्रि के सातवें दिन कालरात्रि की पूजा की जाती है। उनका स्वरूप अत्यंत उग्र और शक्तिशाली माना जाता है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां कालरात्रि ने चंड और मुंड नामक राक्षसों का वध किया था। उनका यह रूप बुराई, भय और नकारात्मक शक्तियों के नाश का प्रतीक है। हालांकि अपने भक्तों के प्रति वह दयालु और कृपालु मानी जाती हैं। आठवां दिन: मां महागौरी नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी की पूजा की जाती है। उनका स्वरूप अत्यंत शांत, पवित्र और सौम्य माना जाता है।धार्मिक मान्यता है कि मां महागौरी अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं और उन्हें जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता प्रदान करती हैं। उनकी पूजा से पापों से मुक्ति और आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त होती है। नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री नवरात्रि के अंतिम दिन सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। उन्हें सभी प्रकार की सिद्धियां और दिव्य शक्तियां देने वाली देवी माना जाता है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवता, ऋषि और मनुष्य सभी उनकी आराधना करते हैं। मां सिद्धिदात्री की पूजा से ज्ञान, सफलता और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। नवरात्रि पूजा का आध्यात्मिक महत्व नवरात्रि का पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक भी है। इन नौ दिनों में देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करके भक्त शक्ति, ज्ञान, साहस और समृद्धि की कामना करते हैं।
नई दिल्ली: हिंदू धर्म में शक्ति उपासना के लिए Chaitra Navratri का पर्व बेहद पवित्र और फलदायी माना जाता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर नवमी तक चलने वाले इन नौ दिनों में भक्त मां शक्ति की साधना, जप-तप और व्रत के जरिए उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। साल 2026 में Chaitra Navratri 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक मनाई जाएगी। यदि आप इस बार पहली बार नवरात्रि का व्रत रखने की योजना बना रहे हैं, तो पूजा-विधि और नियमों के बारे में पहले से जान लेना बेहद ज़रूरी माना जाता है। चैत्र नवरात्रि व्रत के मुख्य नियम 1. पूजा सामग्री पहले से तैयार रखें नवरात्रि व्रत शुरू करने से एक दिन पहले सभी ज़रूरी पूजा सामग्री एकत्र कर ले, ताकि प्रतिपदा के दिन पूजा में किसी प्रकार की बाधा न आए। 2. सुबह जल्दी उठकर ले व्रत का संकल्प प्रतिपदा के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और मन को पवित्र करते हुए Durga माता का ध्यान करें। इसके बाद पूरे नौ दिनों तक व्रत रखने का संकल्प ले। 3. कलश स्थापना से शुरू करें पूजा नवरात्रि के पहले दिन यानी प्रतिपदा पर विधि-विधान से कलश स्थापना की जाती है। इसे किसी योग्य पुजारी के मार्गदर्शन में करना शुभ माना जाता है। 4. देवी पूजा के लिए अलग आसन रखें माता की साधना हमेशा लाल रंग के ऊनी आसन पर बैठकर करनी चाहिए। पूजा के लिए एक ही आसन का प्रयोग करना शुभ माना जाता है। 5. नौ दिनों तक रखें संयम नवरात्रि व्रत के दौरान साधक को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और तामसिक भोजन जैसे मांस-मदिरा, लहसुन-प्याज आदि से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। 6. अखंड ज्योति का रखें विशेष ध्यान अगर घर में कलश स्थापना के साथ अखंड ज्योति जलाई जाती है, तो घर को बंद करके बाहर नहीं जाना चाहिए। ज्योति को लगातार जलते रहना चाहिए। 7. फलाहार का करें सेवन नवरात्रि व्रत में सामान्य अन्न का सेवन नहीं किया जाता। इसकी जगह फलाहार लिया जाता है। कुट्टू या सिंहाड़े के आटे का उपयोग किया जा सकता है सामान्य नमक की जगह सेंधा नमक का इस्तेमाल करें 8. कपड़ों के रंग का रखें ध्यान नवरात्रि में काले रंग के कपड़े पहनने से बचना चाहिए। शक्ति साधना के लिए लाल और पीले रंग के वस्त्र अधिक शुभ माने जाते हैं। 9. अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन नवरात्रि के अंतिम दो दिनों यानी अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन किया जाता है। इस दौरान 2 से 9 वर्ष तक की कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है और उन्हें भोजन कराया जाता है। 10. व्रत का पारण नवमी के दिन पूजा के बाद व्रत का पारण किया जाता है। इसके बाद पूजा में उपयोग की गई सामग्री को किसी पवित्र स्थान पर मिट्टी में दबा देना शुभ माना जाता है। Note: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य परंपराओं पर आधारित है। IDTV Indradhanush इसकी पुष्टि नहीं करता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।