नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के मानसून सत्र में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी FCRA संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच जारी गतिरोध को खत्म करने की कोशिश तेज हो गई है। सरकार विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने पर सहमत होने के संकेत दे रही है। इस कदम का उद्देश्य विपक्ष के विरोध को शांत कर विधेयक पर आगे की संसदीय प्रक्रिया शुरू करना है। विपक्ष लगातार कर रहा था विरोध FCRA संशोधन विधेयक को लेकर विपक्षी दलों ने सरकार पर जल्दबाजी में कानून पारित कराने का आरोप लगाया है। विपक्ष की मांग रही है कि विधेयक के प्रावधानों की विस्तृत जांच के लिए इसे संसदीय समिति के पास भेजा जाए। संसद में इस मुद्दे को लेकर लगातार हंगामा होने से कई बार कार्यवाही प्रभावित हुई। विपक्ष ने विधेयक के विभिन्न प्रावधानों पर भी सवाल उठाए हैं। JPC में होगी विस्तृत जांच अगर विधेयक को JPC के पास भेजा जाता है तो समिति इसके प्रावधानों की विस्तृत समीक्षा करेगी। समिति में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सांसद शामिल होंगे। JPC संबंधित पक्षों से सुझाव और जानकारी लेकर अपनी रिपोर्ट संसद को सौंप सकती है। सरकार का यह कदम संसद में जारी गतिरोध को कम करने और विधेयक पर आम सहमति बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। FCRA में बदलाव का क्या है उद्देश्य? FCRA के जरिए भारत में विदेशी स्रोतों से मिलने वाले चंदे और अंशदान को नियंत्रित किया जाता है। संशोधन विधेयक में विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों से जुड़े नियमों और अनुपालन व्यवस्था में बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। सरकार का तर्क है कि प्रस्तावित बदलावों से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी, जबकि विपक्ष को आशंका है कि इससे गैर-सरकारी संगठनों और अन्य संस्थाओं पर अतिरिक्त नियंत्रण बढ़ सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा से जुड़े कथित नकदी मामले की जांच रिपोर्ट को लेकर संसद में राजनीतिक और कानूनी हलचल तेज हो गई है। तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट बुधवार, 12 अगस्त 2026 को लोकसभा में पेश किए जाने की तैयारी है। रिपोर्ट सामने आने के बाद न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आगे की कार्रवाई को लेकर तस्वीर साफ होने की उम्मीद है। लोकसभा में पेश होगी जांच समिति की रिपोर्ट न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच के लिए गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी। अब इस रिपोर्ट को सदन के पटल पर रखा जाएगा। रिपोर्ट में उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगने की घटना के बाद कथित तौर पर मिली नकदी से जुड़े आरोपों की जांच की गई है। इस्तीफे के बाद भी मामला बना हुआ है अहम न्यायमूर्ति वर्मा ने अप्रैल 2026 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि, उनके खिलाफ शुरू हुई संसदीय प्रक्रिया और जांच रिपोर्ट के कारण मामला अभी भी राजनीतिक एवं संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण बना हुआ है। रिपोर्ट में समिति के निष्कर्ष सामने आने के बाद आगे की प्रक्रिया को लेकर चर्चा तेज हो गई है। संसद में बढ़ सकती है राजनीतिक बहस जांच रिपोर्ट के संसद में पेश होने से न्यायपालिका की जवाबदेही, पारदर्शिता और न्यायिक आचरण जैसे मुद्दे एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की नजर रिपोर्ट के निष्कर्षों पर है। रिपोर्ट के आधार पर आगे की संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया तय हो सकती है। क्या है पूरा मामला? 14 मार्च 2025 को न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगने के बाद वहां कथित तौर पर बड़ी मात्रा में जली और अधजली नकदी मिलने की बात सामने आई थी। इसके बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने मामले की आंतरिक जांच के लिए समिति गठित की थी। बाद में मामला संसदीय प्रक्रिया तक पहुंचा और अब जांच समिति की रिपोर्ट लोकसभा में पेश की जा रही है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने की दिशा में केंद्र सरकार को बड़ी सफलता मिली है। केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 को लोकसभा ने 11 अगस्त को मंजूरी दे दी। यह विधेयक संविधान की पहली अनुसूची में राज्य का नाम ‘केरल’ से बदलकर ‘केरलम’ करने का प्रस्ताव रखता है। लोकसभा में बिना चर्चा के पास हुआ बिल लोकसभा में यह विधेयक विपक्ष के हंगामे और नारेबाजी के बीच बिना चर्चा के ध्वनिमत से पारित हुआ। विधेयक को केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से पेश किया गया था। विपक्ष उस समय अन्य मुद्दों को लेकर सदन में विरोध कर रहा था। मलयालम नाम ‘केरलम’ को मिलेगी संवैधानिक पहचान विधेयक का मुख्य उद्देश्य राज्य के आधिकारिक नाम को Kerala से Keralam करना है। ‘केरलम’ राज्य का मलयालम नाम है। विधेयक संविधान की पहली अनुसूची में आवश्यक बदलाव का प्रस्ताव करता है। केरल विधानसभा ने जून 2024 में राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी थी। अभी तुरंत नहीं बदलेगा राज्य का नाम लोकसभा से बिल पास होने के बाद भी इसे कानून बनने के लिए संसद की पूरी संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसलिए फिलहाल सरकारी तौर पर राज्य का नाम ‘केरल’ ही है। विधेयक के कानून बनने के बाद केंद्र सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों और संवैधानिक प्रावधानों में नाम ‘केरलम’ किया जा सकेगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। झारखंड में JPSC और JSSC परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन का मुद्दा मंगलवार को संसद में भी गरमा गया। NDA सांसदों के प्रदर्शन के बीच कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी झारखंड के आंदोलनकारी छात्रों से मिल चुके हैं और उनकी समस्याएं सुनी हैं। प्रियंका गांधी का यह बयान उस समय आया जब BJP सांसदों ने राहुल गांधी से झारखंड जाकर छात्रों से मिलने को लेकर सवाल उठाया। BJP सांसदों ने राहुल गांधी से मांगा जवाब संसद परिसर में NDA सांसद झारखंड में छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई के मुद्दे को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान सांसदों की ओर से ‘राहुल गांधी जवाब दो’ जैसे नारे लगाए गए। BJP सांसदों ने सवाल उठाया कि राहुल गांधी छात्रों के मुद्दे पर आवाज उठा रहे हैं, लेकिन वे खुद झारखंड जाकर आंदोलनकारी छात्रों से क्यों नहीं मिले। इसी दौरान प्रियंका गांधी वहां पहुंचीं और उन्होंने BJP सांसदों के सवालों का जवाब दिया। प्रियंका गांधी ने कहा- राहुल छात्रों से मिल चुके हैं प्रियंका गांधी ने स्पष्ट किया कि राहुल गांधी ने झारखंड के छात्रों से मुलाकात की है और उनकी समस्याओं को सुना है। उन्होंने BJP सांसदों से कहा कि छात्रों की बात सुनना और उनके मुद्दे को संसद में उठाना जरूरी है। कांग्रेस की ओर से लगातार कहा जा रहा है कि JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं को लेकर छात्रों की शिकायतों और पुलिस कार्रवाई पर सरकार को जवाब देना चाहिए। राहुल गांधी ने भी झारखंड में छात्रों पर बल प्रयोग को गलत बताते हुए सरकार से बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की थी। झारखंड छात्र आंदोलन बना संसद में राजनीतिक टकराव का मुद्दा रांची में JPSC-JSSC परीक्षा विवाद को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार जारी है। आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई के बाद यह मुद्दा अब राज्य की राजनीति से निकलकर संसद तक पहुंच गया है। एक ओर NDA सांसद विपक्ष पर इस मुद्दे पर चर्चा से बचने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार से जवाब मांग रहे हैं। मंगलवार को NDA सांसदों ने संसद परिसर में मार्च कर राहुल गांधी के खिलाफ नारे लगाए, जिससे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव और बढ़ गया। प्रियंका ने छात्रों के मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगा प्रियंका गांधी के बयान से साफ है कि कांग्रेस झारखंड के छात्र आंदोलन को संसद में प्रमुखता से उठाने की कोशिश कर रही है। पार्टी का कहना है कि भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, छात्रों की शिकायतों और प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों पर सरकार को जवाब देना चाहिए। वहीं, NDA का कहना है कि सरकार संसद में इस मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। इस राजनीतिक खींचतान के बीच झारखंड के छात्रों का आंदोलन अब संसद में भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बड़े विवाद का विषय बन गया है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध मंगलवार को और बढ़ गया। NDA सांसदों ने संसद के मकर द्वार की ओर मार्च कर विपक्ष के खिलाफ प्रदर्शन किया। NDA सांसदों ने आरोप लगाया कि विपक्ष झारखंड में छात्रों के आंदोलन और पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर संसद में चर्चा से बच रहा है, जबकि सरकार की ओर से गृह मंत्री अमित शाह के चर्चा में जवाब देने की तैयारी जताई गई है। ‘मंगल मिलन’ बैठक के बाद निकला मार्च NDA सांसदों का यह मार्च गठबंधन की साप्ताहिक ‘मंगल मिलन’ बैठक के बाद हुआ। बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और NDA के अन्य वरिष्ठ नेता शामिल हुए थे। बैठक के बाद NDA सांसद हाथों में पोस्टर और तख्तियां लेकर संसद की ओर बढ़े। प्रदर्शन के दौरान विपक्ष पर छात्र आंदोलन के मुद्दे पर चर्चा से बचने का आरोप लगाया गया। विपक्ष पर चर्चा से भागने का आरोप NDA नेताओं का कहना है कि सरकार संसद में छात्रों के प्रदर्शन और उस दौरान हुई पुलिस कार्रवाई पर चर्चा के लिए तैयार है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी कहा है कि गृह मंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर सदन में विस्तृत जवाब देने के लिए तैयार हैं। NDA सांसदों ने इसी आधार पर विपक्ष से सदन की कार्यवाही चलने देने की मांग की। उनका आरोप है कि विपक्ष लगातार हंगामा करके चर्चा और संसदीय कामकाज को बाधित कर रहा है। विपक्ष की मांग अलग, संसद में जारी गतिरोध दूसरी ओर विपक्ष छात्र आंदोलन में पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार से स्पष्ट जवाब मांग रहा है। विपक्षी सांसदों की मांग है कि गृह मंत्री अमित शाह इस मामले पर संसद में बयान दें और पुलिस कार्रवाई से जुड़े सवालों का जवाब दें। लोकसभा में विपक्षी सांसदों के विरोध के कारण कार्यवाही प्रभावित हुई। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी विपक्षी दलों से प्रदर्शन समाप्त कर सदन को सुचारु रूप से चलने देने की अपील की। इसके बावजूद गतिरोध जारी रहा। संसद के बाहर भी आमने-सामने सत्ता पक्ष और विपक्ष छात्र आंदोलन का मुद्दा अब संसद के अंदर की राजनीति से निकलकर संसद परिसर के विरोध-प्रदर्शन तक पहुंच गया है। एक ओर NDA सांसद विपक्ष पर चर्चा से बचने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं विपक्ष पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार से जवाबदेही की मांग कर रहा है। ऐसे में मानसून सत्र के दौरान आने वाले दिनों में भी छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और संसद में चर्चा को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव जारी रहने के आसार हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद ने Bankers’ Books Evidence Bill, 2026 को मंजूरी दे दी है। यह विधेयक बैंकिंग रिकॉर्ड से जुड़े करीब 135 साल पुराने कानूनी ढांचे को आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। नए कानून के तहत इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और क्लाउड में रखे गए बैंकिंग रिकॉर्ड को अदालतों में साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने के लिए स्पष्ट कानूनी आधार मिलेगा। 1891 के पुराने कानून की जगह लेगा नया विधेयक Bankers’ Books Evidence Bill, 2026 का उद्देश्य Bankers’ Books Evidence Act, 1891 को बदलना है। पुराना कानून उस समय बनाया गया था, जब बैंकिंग रिकॉर्ड मुख्य रूप से कागजी दस्तावेजों के रूप में रखे जाते थे। आज बैंकिंग व्यवस्था में लेन-देन के रिकॉर्ड बड़े पैमाने पर डिजिटल माध्यमों, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों और क्लाउड सर्वर में रखे जाते हैं। ऐसे में सरकार ने मौजूदा कानून को डिजिटल बैंकिंग व्यवस्था के अनुरूप बनाने की जरूरत बताई है। डिजिटल रिकॉर्ड भी अदालत में बनेंगे साक्ष्य नए कानून का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव बैंकिंग रिकॉर्ड की परिभाषा और उसके डिजिटल स्वरूप से जुड़ा है। इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रूप में उपलब्ध बैंक रिकॉर्ड को कानूनी कार्यवाही में साक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल करने की व्यवस्था को स्पष्ट किया गया है। इससे बैंक स्टेटमेंट, इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल बैंकिंग दस्तावेजों को अदालत में पेश करने की प्रक्रिया अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है। इससे न्यायिक मामलों में बैंक रिकॉर्ड की जांच और प्रस्तुति को आसान बनाने में मदद मिल सकती है। लोकसभा के बाद राज्यसभा से भी मंजूरी विधेयक को 6 अगस्त 2026 को लोकसभा ने पारित किया था। इसके बाद 10 अगस्त को राज्यसभा ने भी इसे मंजूरी दे दी, जिसके साथ विधेयक ने संसद की मंजूरी की प्रक्रिया पूरी कर ली। राज्यसभा में विधेयक के पारित होने के दौरान विपक्ष ने बहस के समय को लेकर आपत्ति जताई और विरोध में सदन से वॉकआउट भी किया। डिजिटल बैंकिंग के दौर में क्यों महत्वपूर्ण है फैसला भारत में UPI, इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग और डिजिटल भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल के बीच बैंकिंग रिकॉर्ड का बड़ा हिस्सा इलेक्ट्रॉनिक रूप में तैयार और सुरक्षित किया जाता है। ऐसे में नया कानून अदालतों में डिजिटल बैंकिंग दस्तावेजों की स्वीकार्यता को स्पष्ट करने और बैंकिंग तथा न्यायिक प्रक्रियाओं को डिजिटल व्यवस्था के अनुरूप बनाने की दिशा में अहम बदलाव माना जा रहा है। हालांकि, कानून के व्यावहारिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेंगे कि डिजिटल रिकॉर्ड की प्रमाणिकता और उन्हें अदालत में पेश करने की प्रक्रिया किस तरह लागू की जाती है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के मानसून सत्र के बीच मंगलवार को भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की साप्ताहिक ‘मंगल मिलन’ बैठक आयोजित हुई। बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और NDA के कई सांसद शामिल हुए। बैठक के दौरान सांसदों ने तिरंगा लहराया और ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगाए। संसद में जारी गतिरोध के बीच हुई बैठक NDA की यह बैठक ऐसे समय हुई है जब संसद के मानसून सत्र में कई मुद्दों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव जारी है। ऐसे में ‘मंगल मिलन’ बैठक को NDA सांसदों के बीच समन्वय और आगामी संसदीय रणनीति पर चर्चा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बैठक में सांसदों के बीच संसद की कार्यवाही को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने और सरकार के विधायी एजेंडे को लेकर चर्चा होने की संभावना रही। PM मोदी और वरिष्ठ नेता हुए शामिल बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा गृह मंत्री अमित शाह समेत NDA के वरिष्ठ नेता और विभिन्न सहयोगी दलों के सांसद मौजूद रहे। NDA संसदीय दल की ऐसी बैठकें गठबंधन के सांसदों के बीच संवाद और रणनीतिक समन्वय के लिए आयोजित की जाती हैं। तिरंगा लहराकर ‘वंदे मातरम्’ के नारे ‘मंगल मिलन’ बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और NDA सांसदों ने हाथों में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लेकर उसे लहराया। इस दौरान ‘वंदे मातरम्’ के नारे भी लगाए गए। बैठक की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद यह कार्यक्रम राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया। मानसून सत्र के लिए रणनीति पर नजर NDA की बैठक ऐसे वक्त हुई है जब संसद में सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है और विपक्ष विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेर रहा है। ऐसे में गठबंधन की एकजुटता और सदन में रणनीति आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण रहने वाली है। ‘मंगल मिलन’ बैठक के जरिए NDA नेतृत्व ने अपने सांसदों के बीच समन्वय मजबूत करने के साथ-साथ संसद के बाकी सत्र के लिए राजनीतिक और संसदीय रणनीति पर भी फोकस किया।
नई दिल्ली, एजेंसियां। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को NDA के 45 सांसदों के साथ नाश्ते पर हुई बैठक में उन्हें संसद के बाहर भी संयम और अनुशासन बनाए रखने की सलाह दी। प्रधानमंत्री ने सांसदों से कहा कि वे ‘लुटियंस दिल्ली के जाल’ में न फंसें और अपनी राजनीतिक पहचान को जनता तथा अपने क्षेत्र से जुड़े कामों के साथ मजबूत करें। NDA सांसदों को एकजुट रहने की सलाह बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने NDA को केवल राजनीतिक गठबंधन नहीं, बल्कि एक साझा परिवार के रूप में पेश किया। उन्होंने सहयोगी दलों के सांसदों के बीच बेहतर तालमेल और एकजुटता पर जोर दिया। यह बैठक ऐसे समय हुई है जब संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के विरोध और हंगामे के कारण कई मौकों पर कार्यवाही प्रभावित हुई है। प्रधानमंत्री ने सांसदों को संसद के भीतर अनुशासन और प्रभावी तरीके से अपनी भूमिका निभाने का संदेश दिया। ‘लुटियंस दिल्ली’ से दूर रहने का संदेश PM मोदी ने सांसदों को सलाह दी कि वे दिल्ली के राजनीतिक और नौकरशाही हलकों के प्रभाव में आने के बजाय अपने निर्वाचन क्षेत्रों और जनता से जुड़े रहें। उन्होंने सांसदों को अपनी राजनीतिक गतिविधियों और व्यवहार में सावधानी बरतने का संदेश दिया। संसद में व्यवधान पर भी जताई चिंता प्रधानमंत्री ने संसद में लगातार हो रहे व्यवधान के बीच राजनीतिक स्थिरता और प्रभावी शासन के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि NDA के विस्तार और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को साथ लेकर चलने की रणनीति से अलग-अलग राज्यों की आकांक्षाओं को सरकार तक पहुंचाने में मदद मिली है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना रुख स्पष्ट किया है। केंद्र ने ऐसी व्यवस्था लागू करने की मांग वाली याचिका का विरोध करते हुए कहा कि SC/ST आरक्षण के लाभार्थियों को आर्थिक आधार पर अलग करने का मुद्दा नीति और कानून बनाने के क्षेत्र में आता है और इस पर फैसला संसद को करना है। केंद्र ने क्रीमी लेयर लागू करने की मांग का किया विरोध केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाब में SC/ST समुदायों के भीतर आर्थिक आधार पर उप-कोटा या क्रीमी लेयर तय करने की मांग का विरोध किया। सरकार का तर्क है कि SC, ST और अन्य पिछड़े वर्गों के आरक्षण का आधार केवल आर्थिक स्थिति नहीं है। केंद्र के मुताबिक, इन समुदायों को ऐतिहासिक और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा है। इसलिए किसी व्यक्ति या परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार होने मात्र से सामाजिक भेदभाव की स्थिति समाप्त नहीं मानी जा सकती। संसद के अधिकार क्षेत्र का मामला बताया सरकार ने अदालत से कहा कि याचिका में मांगी गई राहत मुख्य रूप से नीतिगत विषय है। ऐसे मामलों में अदालत द्वारा सरकार या संसद को कोई विशेष नीति बनाने का निर्देश देना उचित नहीं होगा। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप से बचने का आग्रह किया है। सरकार का यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर को लेकर पिछले कुछ वर्षों में व्यापक बहस चलती रही है। सवाल यह है कि आरक्षण का लाभ अपेक्षाकृत संपन्न वर्गों तक लगातार पहुंचने की स्थिति में क्या उसके भीतर अलग मानदंड बनाए जाने चाहिए। आर्थिक स्थिति को अकेला आधार मानने पर केंद्र की आपत्ति केंद्र ने कहा कि SC/ST समुदायों के संदर्भ में आरक्षण को केवल आय या आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं देखा जा सकता। सरकार के अनुसार, सामाजिक भेदभाव और ऐतिहासिक वंचना ऐसे कारक हैं जिन्हें आर्थिक स्थिति से अलग करके समझना जरूरी है। इस मामले में केंद्र का रुख यह है कि यदि SC/ST आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव किया जाना है तो उसके लिए उपयुक्त संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस का क्या मतलब? सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर चल रही सुनवाई के बीच केंद्र के रुख से यह स्पष्ट हो गया है कि फिलहाल सरकार SC/ST आरक्षण में OBC की तरह क्रीमी लेयर व्यवस्था लागू करने के पक्ष में नहीं है। हालांकि, सिर्फ केंद्र के जवाब से SC/ST आरक्षण में कोई नया नियम लागू नहीं हुआ है। आगे अदालत की सुनवाई और उसके आदेश के आधार पर स्थिति स्पष्ट होगी।
नई दिल्ली, एजेंसियां। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं को लेकर केंद्र सरकार ने संसद में खर्च का आंकड़ा साझा किया है। सरकार के अनुसार, 2021 से जुलाई 2026 तक प्रधानमंत्री की 77 देशों की विदेश यात्राओं पर कुल ₹557.51 करोड़ खर्च हुए हैं। यह जानकारी गुरुवार को संसद में दी गई। 2026 में अब तक ₹74.59 करोड़ खर्च सरकार द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, 2026 में जुलाई तक प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर ₹74.59 करोड़ खर्च किए गए हैं। इस अवधि में प्रधानमंत्री ने 12 देशों की यात्राएं की हैं। इनमें मलेशिया, इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, इटली, फ्रांस, स्लोवाकिया, सेशेल्स, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड की यात्राएं शामिल हैं। 2025 में सबसे ज्यादा खर्च उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025 में प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर करीब ₹180 करोड़ से अधिक खर्च हुआ। इस साल प्रधानमंत्री ने अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, चीन, जापान सहित कई देशों का दौरा किया था। 2021 से 2025 के बीच विदेश यात्राओं पर खर्च में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिली। सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड में प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं की अवधि और चार्टर्ड विमानों पर हुए खर्च का विवरण भी उपलब्ध है। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, विदेश यात्राओं का खर्च गृह मंत्रालय के बजट से वहन किया जाता है। यात्राओं से 316 समझौते हुए सरकार ने संसद में यह भी बताया कि 2021 के बाद प्रधानमंत्री की इन विदेश यात्राओं के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में 316 समझौते और समझौता ज्ञापन (MoU) हुए। इनका संबंध व्यापार, निवेश, ऊर्जा, रक्षा, तकनीक और रणनीतिक सहयोग जैसे क्षेत्रों से रहा है। केंद्र सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का उद्देश्य भारत के अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना और आर्थिक एवं रणनीतिक सहयोग को बढ़ाना है। विदेश यात्राओं पर खर्च को लेकर चर्चा प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर होने वाला खर्च समय-समय पर राजनीतिक बहस का विषय रहा है। सरकार की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं जब विदेश यात्राओं की लागत और उनसे मिलने वाले कूटनीतिक एवं आर्थिक लाभ को लेकर चर्चा चल रही है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, 2021 से जुलाई 2026 तक 77 देशों की यात्राओं पर ₹557.51 करोड़ खर्च हुए हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के मानसून सत्र में विधेयकों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि महत्वपूर्ण विधेयकों को पर्याप्त चर्चा और विचार-विमर्श के बिना जल्दबाजी में पारित कराया जा रहा है। उन्होंने इस प्रक्रिया की तुलना ‘मैगी नूडल्स’ से की। विधेयकों को लेकर TMC ने सरकार को घेरा डेरेक ओ’ब्रायन ने संसद में विधायी प्रक्रिया को लेकर सरकार पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि कई विधेयकों पर सांसदों को पर्याप्त समय नहीं मिल रहा है और उन्हें जल्दबाजी में सदन से पारित कराया जा रहा है। TMC सांसद ने कहा कि संसद में कानून बनाना गंभीर प्रक्रिया है और प्रत्येक विधेयक पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। उनके मुताबिक, सरकार को विपक्ष की आपत्तियों और सुझावों पर भी विचार करना चाहिए। ‘मैगी नूडल्स’ से क्यों की तुलना डेरेक ओ’ब्रायन ने विधेयकों को जल्दबाजी में पारित किए जाने के आरोप को समझाने के लिए ‘मैगी नूडल्स’ का उदाहरण दिया। उनका कहना था कि जिस तरह मैगी कुछ ही मिनटों में तैयार हो जाती है, उसी तरह सरकार संसद में विधेयकों को तेजी से पारित करा रही है। उन्होंने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि कानून बनाने के लिए संसद में पर्याप्त बहस, जांच और विचार-विमर्श जरूरी है। विपक्ष ने चर्चा का समय बढ़ाने की मांग की TMC समेत विपक्षी दलों का कहना है कि महत्वपूर्ण विधेयकों को केवल संख्या बल के आधार पर पारित नहीं किया जाना चाहिए। विपक्ष की मांग है कि विधेयकों को संबंधित संसदीय समितियों के पास भेजा जाए, ताकि उनके प्रावधानों की विस्तृत जांच हो सके। विपक्षी सांसदों का कहना है कि कानूनों का आम जनता पर व्यापक प्रभाव पड़ता है, इसलिए उन्हें जल्दबाजी में पारित करने के बजाय सभी पक्षों की राय सुनी जानी चाहिए। मानसून सत्र में बढ़ रही सियासी गर्मी संसद के मानसून सत्र में विधेयकों के अलावा कई अन्य मुद्दों को लेकर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। विपक्ष लगातार सरकार पर संसद में पर्याप्त चर्चा नहीं कराने का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि विपक्ष को सदन की कार्यवाही बाधित करने के बजाय बहस में भाग लेना चाहिए। TMC के डेरेक ओ’ब्रायन की ‘मैगी नूडल्स’ वाली टिप्पणी ने विधेयकों को जल्दबाजी में पारित किए जाने के आरोपों को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद में प्रस्तावित परिसीमन से जुड़े विधेयक को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच बातचीत तेज हो गई है। इसी सिलसिले में केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से फिर बातचीत की है। सरकार की कोशिश है कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर विपक्ष के साथ सहमति बनाई जाए। सरकार ने विपक्ष से संवाद बढ़ाया परिसीमन और उससे जुड़े संवैधानिक प्रावधानों को लेकर सरकार लगातार विपक्षी दलों के साथ बातचीत कर रही है। किरण रिजिजू की राहुल गांधी से बातचीत को इसी संवाद प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है। सरकार चाहती है कि विधेयक को लेकर विपक्ष की चिंताओं को सुना जाए और संसद में इसे लेकर व्यापक चर्चा हो। वहीं कांग्रेस इस मुद्दे पर अपने सवालों और आपत्तियों को सरकार के सामने रख रही है। परिसीमन का राज्यों की सीटों पर पड़ेगा असर परिसीमन का संबंध लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा प्रतिनिधित्व के पुनर्निर्धारण से है। ऐसे में प्रस्तावित बदलाव का देश के अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक स्थिति और संसद में प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है। खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों की ओर से यह चिंता जताई जाती रही है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को परिसीमन के बाद राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान नहीं होना चाहिए। महिला आरक्षण से भी जुड़ा मुद्दा परिसीमन की प्रक्रिया का संबंध महिला आरक्षण को लागू करने से भी जोड़ा जा रहा है। महिला आरक्षण कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है, लेकिन इसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए परिसीमन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। इसी वजह से परिसीमन का मुद्दा आने वाले समय में संसद में बड़ी राजनीतिक बहस का विषय बन सकता है। राहुल गांधी से बातचीत के बाद बढ़ी उम्मीदें किरण रिजिजू और राहुल गांधी के बीच बातचीत को सरकार और मुख्य विपक्षी दल के बीच सहमति बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, कांग्रेस की ओर से विधेयक को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए जा रहे हैं। अब नजर इस बात पर है कि सरकार और कांग्रेस के बीच आगे होने वाली बातचीत में क्या सहमति बनती है और संसद में परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव पर दोनों पक्ष किस रुख के साथ आगे बढ़ते हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू के बीच तीखी बहस देखने को मिली। छात्र प्रदर्शन और गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग को लेकर विपक्ष के हंगामे के बीच सदन की कार्यवाही प्रभावित हुई। इसी दौरान रिजिजू ने खड़गे से कहा कि विपक्ष के नेता सदन की कार्यवाही तय नहीं कर सकते। अमित शाह के बयान की मांग पर अड़ा विपक्ष राज्यसभा में विपक्षी सांसद छात्र प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग कर रहे थे। विपक्ष का कहना था कि इस मामले पर सरकार को सदन में जवाब देना चाहिए। हंगामे के बीच खड़गे ने सरकार पर विपक्ष की आवाज दबाने का आरोप लगाया और कहा कि विपक्ष को अपने मुद्दे उठाने का पूरा अधिकार है। विपक्षी सांसदों के विरोध के कारण सदन की कार्यवाही कई बार बाधित हुई। रिजिजू ने खड़गे को दिया जवाब संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने खड़गे के रुख पर आपत्ति जताते हुए कहा कि सदन की कार्यवाही सभापति के अधिकार क्षेत्र में आती है। उन्होंने कहा कि विपक्ष के नेता अपनी मांगों के आधार पर सदन की कार्यवाही तय नहीं कर सकते। रिजिजू ने विपक्ष से सदन की कार्यवाही चलने देने और निर्धारित नियमों के तहत अपनी बात रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन सदन को लगातार बाधित करना उचित नहीं है। सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ा टकराव छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और गृह मंत्री के बयान की मांग को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव लगातार बढ़ रहा है। विपक्ष इस मुद्दे को संसद में उठाकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि सदन की कार्यवाही नियमों के अनुसार चलनी चाहिए। राज्यसभा में हुई इस नोकझोंक ने मानसून सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ती राजनीतिक खींचतान को एक बार फिर सामने ला दिया है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक को लेकर चर्चा की। बैठक के बाद लालदुहोमा ने बताया कि विधेयक पर संसद में 12 अगस्त को चर्चा होने की संभावना है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रस्तावित बदलाव पिछली तारीख से लागू नहीं होंगे。 अमित शाह से मुलाकात के बाद लालदुहोमा का बयान मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमित शाह से मुलाकात के बाद FCRA संशोधन विधेयक से जुड़े प्रावधानों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से प्रस्तावित बदलावों को लेकर चर्चा हुई और विधेयक को लेकर आगे की प्रक्रिया संसद में होगी। लालदुहोमा ने संकेत दिया कि मिजोरम से जुड़े हितों और राज्य में विदेशी सहायता प्राप्त करने वाले संगठनों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर भी बातचीत हुई। 12 अगस्त को संसद में चर्चा की संभावना रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक पर 12 अगस्त को संसद में चर्चा होने की संभावना है। हालांकि, संसद की कार्यवाही और विधायी कार्यक्रम के अनुसार इसमें बदलाव भी हो सकता है। FCRA का उद्देश्य भारत में विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करना है। इस कानून के तहत गैर-सरकारी संगठनों और अन्य संस्थाओं को विदेश से मिलने वाले अंशदान के संबंध में नियमों का पालन करना होता है। विधेयक को पिछली तारीख से लागू नहीं करने की बात लालदुहोमा ने बैठक के बाद महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए कहा कि प्रस्तावित संशोधन पूर्व प्रभाव से लागू नहीं होगा। इसका मतलब है कि नए प्रावधान लागू होने से पहले की गतिविधियों या लेनदेन पर नए नियमों को पिछली तारीख से लागू करने की व्यवस्था नहीं होगी। यह पहलू मिजोरम के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि राज्य में कई सामाजिक और धार्मिक संस्थाएं विदेशी अंशदान से जुड़े नियमों के दायरे में आती हैं। FCRA संशोधन को लेकर आगे बढ़ी राजनीतिक गतिविधि अमित शाह और लालदुहोमा की मुलाकात ऐसे समय हुई है जब संसद में FCRA संशोधन को लेकर चर्चा की तैयारी चल रही है। केंद्र सरकार की ओर से विधेयक में बदलावों के जरिए विदेशी अंशदान से जुड़े नियमों को और प्रभावी बनाने पर जोर दिया जा रहा है। अब सभी की नजरें संसद की आगामी कार्यवाही पर हैं, जहां प्रस्तावित विधेयक पर चर्चा के दौरान सरकार और विपक्ष के रुख से इसकी आगे की दिशा स्पष्ट होगी।
नई दिल्ली: अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना स्पष्ट रुख पेश किया है। सरकार ने अदालत को बताया कि SC-ST आरक्षण में OBC की तरह क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि इन वर्गों को मिलने वाला आरक्षण केवल आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक और संरचनात्मक पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर दिया गया है। दरअसल, करीब दो महीने पहले सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर SC-ST आरक्षण में भी क्रीमी लेयर व्यवस्था लागू करने और आरक्षित वर्गों के भीतर आय आधारित उप-वर्गीकरण की मांग की गई थी। इस याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना जवाब दाखिल किया। OBC तक ही सीमित है क्रीमी लेयर का प्रावधान केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत अब तक केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए लागू होता है। OBC आरक्षण में आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों को आरक्षण का लाभ नहीं देने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी, लेकिन SC और ST के मामले में आरक्षण का आधार अलग है। सरकार ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का उद्देश्य केवल आर्थिक असमानता दूर करना नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव, ऐतिहासिक वंचना और सामाजिक पिछड़ेपन की भरपाई करना है। इसलिए केवल आय के आधार पर इन वर्गों के भीतर क्रीमी लेयर लागू करना उचित नहीं होगा। नीति में बदलाव से पहले जरूरी होगा व्यापक अध्ययन केंद्र ने अदालत को बताया कि यदि आरक्षित वर्गों के भीतर आय आधारित प्राथमिकता या उप-कोटा जैसी कोई व्यवस्था लागू करनी हो, तो इसके लिए व्यापक सामाजिक-आर्थिक अध्ययन, विश्वसनीय आंकड़ों का विश्लेषण और समग्र समीक्षा आवश्यक होगी। सरकार ने यह भी कहा कि इस तरह का कोई भी बड़ा बदलाव न्यायिक आदेश के बजाय नीति निर्माण और विधायी प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए। संसद के अधिकार क्षेत्र का मामला सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 15 जून 2026 को दिए अपने जवाब का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने का फैसला केवल संसद ही ले सकती है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि वह ऐसी याचिकाओं पर न्यायिक निर्देश जारी करने से परहेज करे, जिनका उद्देश्य देश की आरक्षण व्यवस्था में व्यापक नीतिगत बदलाव करना हो। सरकार का कहना है कि आरक्षण नीति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन संवैधानिक, सामाजिक और विधायी पहलुओं को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।
विपक्ष के हंगामे के बीच लोकसभा में बैंकर्स बुक्स एविडेंस विधेयक पारित, डिजिटल बैंक रिकॉर्ड को मिलेगी कानूनी मान्यता नई दिल्ली, एजेंसियां। लोकसभा ने बैंकर्स बुक्स एविडेंस बिल, 2026 को विपक्ष के हंगामे के बीच वॉइस वोट से पारित कर दिया। हंगामे के कारण विधेयक पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी। यह विधेयक 1891 के पुराने कानून को बदलने और बैंकिंग रिकॉर्ड से जुड़े कानूनी प्रावधानों को मौजूदा डिजिटल बैंकिंग व्यवस्था के अनुरूप बनाने का प्रयास है। 1891 के कानून की जगह लेगा नया विधेयक बैंकर्स बुक्स एविडेंस बिल, 2026 का उद्देश्य Bankers' Books Evidence Act, 1891 को निरस्त कर उसकी जगह नया कानूनी ढांचा तैयार करना है। पुराना कानून उस दौर में बनाया गया था जब बैंकिंग रिकॉर्ड मुख्य रूप से कागजों में रखे जाते थे। नए विधेयक में मौजूदा बैंकिंग व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए डिजिटल रिकॉर्ड से जुड़े प्रावधानों को शामिल किया गया है। डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड होंगे मान्य विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में बैंक के इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल, वर्चुअल और क्लाउड आधारित रिकॉर्ड को कानूनी साक्ष्य के तौर पर मान्यता देना शामिल है। इससे अदालतों में बैंकिंग रिकॉर्ड पेश करने की प्रक्रिया को डिजिटल युग के अनुरूप बनाने में मदद मिलेगी। प्रमाणित डिजिटल रिकॉर्ड को कानूनी कार्यवाही में इस्तेमाल करने का रास्ता भी स्पष्ट होगा। विपक्ष के हंगामे के बीच हुई वोटिंग विधेयक पर विचार और पारित करने की प्रक्रिया के दौरान लोकसभा में विपक्षी सांसद विभिन्न मुद्दों को लेकर नारेबाजी और विरोध कर रहे थे। हंगामे के बीच विधेयक को बिना विस्तृत बहस के वॉइस वोट से पारित कर दिया गया। सरकार की ओर से इसे बैंकिंग और न्यायिक व्यवस्था को डिजिटल दौर के अनुरूप बनाने वाला कदम बताया गया है। अब विधेयक की आगे की संसदीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसके प्रावधान कानून का हिस्सा बन सकेंगे।
अमित शाह के बयान की मांग को लेकर मणिकम टैगोर का स्थगन प्रस्ताव नोटिस, संसद में विपक्ष का हंगामा नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के मानसून सत्र में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग को लेकर विपक्ष का विरोध तेज हो गया है। कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस देकर सरकार से छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई कथित पुलिस कार्रवाई पर गृह मंत्री अमित शाह से जवाब देने की मांग की है। छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल विपक्षी सांसदों का आरोप है कि छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर कई गंभीर सवाल उठे हैं। विपक्ष चाहता है कि गृह मंत्री सदन में इस पूरे मामले पर सरकार का पक्ष स्पष्ट करें और कार्रवाई से जुड़े तथ्यों की जानकारी दें। इस मुद्दे को लेकर संसद की कार्यवाही के दौरान विपक्षी सांसदों ने सरकार के खिलाफ विरोध भी जताया है। विपक्ष लगातार मांग कर रहा है कि सरकार इस मामले पर सदन में जवाब दे। मणिकम टैगोर ने सरकार से जवाब मांगा कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर की ओर से दिए गए स्थगन प्रस्ताव के जरिए इस मुद्दे पर सामान्य संसदीय कामकाज को रोककर तत्काल चर्चा कराने की मांग की गई है। विपक्ष का कहना है कि छात्रों से जुड़े इस संवेदनशील मामले में सरकार को चुप रहने के बजाय संसद के भीतर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। दूसरी ओर, सरकार की ओर से विपक्ष के आरोपों पर जवाब दिया जा रहा है और सदन की कार्यवाही चलाने पर जोर दिया जा रहा है। संसद में लगातार बढ़ रहा टकराव अमित शाह के बयान की मांग को लेकर विपक्ष पहले भी संसद में विरोध दर्ज करा चुका है। रिपोर्टों के मुताबिक इस मुद्दे के कारण लोकसभा की कार्यवाही में व्यवधान भी आया है। संसद में इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव आने वाले दिनों में भी जारी रहने के आसार हैं। विपक्ष जहां गृह मंत्री के बयान पर अड़ा है, वहीं सरकार की प्राथमिकता सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने की है।
संसद में जन्म और मृत्यु पंजीकरण संशोधन विधेयक पारित, देरी से रजिस्ट्रेशन के नियम होंगे सख्त नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद ने जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी है। राज्यसभा ने बुधवार को विधेयक पारित किया, जबकि लोकसभा इसे पहले ही 31 जुलाई को पारित कर चुकी थी। विधेयक का उद्देश्य देश में जन्म और मृत्यु के पंजीकरण की प्रक्रिया को मजबूत और अधिक प्रभावी बनाना है। दो साल से अधिक देरी पर न्यायिक मजिस्ट्रेट की मंजूरी संशोधन में जन्म या मृत्यु के पंजीकरण में लंबे समय तक हुई देरी को लेकर नियमों को सख्त किया गया है। दो साल से अधिक देरी होने पर पंजीकरण के लिए अब प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश आवश्यक होगा। मौजूदा व्यवस्था में ऐसी देरी के मामलों में जिला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट या अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट आदेश जारी कर सकते थे। हर जन्म और मृत्यु के रिकॉर्ड को मजबूत करने पर जोर केंद्र सरकार का कहना है कि संशोधन का उद्देश्य देश में होने वाले हर जन्म और मृत्यु का सही तरीके से पंजीकरण सुनिश्चित करना है। इससे सरकारी रिकॉर्ड को अधिक सटीक बनाने और विभिन्न सरकारी सेवाओं में जन्म-मृत्यु संबंधी दस्तावेजों के इस्तेमाल को बेहतर तरीके से व्यवस्थित करने में मदद मिलेगी। राज्यसभा में बिना चर्चा के पारित हुआ विधेयक राज्यसभा में विधेयक को लेकर विपक्ष के विरोध के बीच इसे पारित किया गया। रिपोर्ट के अनुसार सदन में इस पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने विधेयक को आगे बढ़ाया। अब विधेयक के कानून बनने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी और उसके बाद अधिसूचना से संबंधित प्रक्रिया पूरी होगी।
संसद में हंगामा जारी: राहुल गांधी से किरण रिजिजू की मुलाकात, फिर भी नहीं थमा गतिरोध नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के मानसून सत्र में जारी गतिरोध को खत्म करने की कोशिशों के बीच बुधवार (5 अगस्त) को केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की। संसद परिसर में हुई इस वन-टू-वन बैठक को सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत की पहल के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि बैठक के बाद भी लोकसभा में विपक्ष का हंगामा जारी रहा और कार्यवाही कुछ ही मिनटों में स्थगित करनी पड़ी। राम मंदिर चढ़ावा और छात्र प्रदर्शन मुद्दे पर विपक्ष का हंगामा लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसदों ने अयोध्या राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी के आरोप और दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे को लेकर नारेबाजी शुरू कर दी। विपक्ष गृह मंत्री अमित शाह से इस मामले पर बयान की मांग कर रहा है। एक मिनट में स्थगित हुई लोकसभा कार्यवाही हंगामा बढ़ने के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दी। इसके चलते प्रश्नकाल और शून्यकाल भी नहीं चल सके। विपक्षी सांसद लगातार अपनी मांगों को लेकर सदन में विरोध करते रहे। राहुल गांधी से मुलाकात में प्रियंका गांधी भी रहीं मौजूद किरण रिजिजू ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से उनके कार्यालय में मुलाकात की। इस बैठक के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी भी मौजूद रहीं। बैठक का उद्देश्य संसद में जारी गतिरोध को खत्म कर सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने की कोशिश माना जा रहा है। ओम बिरला ने विपक्ष से की सदन चलाने की अपील लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने हंगामा कर रहे सांसदों से प्रश्नकाल चलने देने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रश्नकाल जनता से जुड़े मुद्दे उठाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। बिरला ने विपक्ष को भरोसा दिलाया कि प्रश्नकाल के बाद उनके मुद्दों पर चर्चा का अवसर दिया जाएगा। मानसून सत्र में लगातार 13वें दिन कामकाज प्रभावित संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हुआ था। अलग-अलग मुद्दों को लेकर जारी हंगामे के कारण बुधवार को लगातार 13वें दिन प्रश्नकाल और शून्यकाल प्रभावित रहे। सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत के प्रयासों के बावजूद सदन में गतिरोध खत्म नहीं हो पाया है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के मानसून सत्र के दौरान पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव शुक्रवार को विपक्ष के सांकेतिक प्रदर्शन में पुजारी के वेश में नजर आए। प्रदर्शन के दौरान राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े कथित चोरी के मुद्दे को लेकर विरोध जताया गया। इस दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत विपक्षी सांसदों की मौजूदगी में सांकेतिक तौर पर दान पात्र भी रखा गया। घटना के बाद पप्पू यादव को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। संसद परिसर में पुजारी के वेश में नजर आए पप्पू यादव नई दिल्ली स्थित संसद परिसर में विपक्षी सांसदों के प्रदर्शन के दौरान पप्पू यादव ने पुजारी का रूप धारण किया। प्रदर्शन का उद्देश्य राम मंदिर में चढ़ावे और उससे जुड़े कथित अनियमितताओं के मुद्दे को उठाना था। इस दौरान विपक्ष की ओर से केंद्र सरकार पर भी सवाल उठाए गए। राहुल गांधी ने दान पात्र में डाले पैसे प्रदर्शन के दौरान एक दान पात्र रखा गया था, जिसमें राहुल गांधी ने पैसे डाले। विपक्ष की ओर से इस प्रदर्शन को राम मंदिर से जुड़े चढ़ावे के मुद्दे पर सरकार और संबंधित संस्थाओं से जवाब मांगने के प्रतीकात्मक तरीके के तौर पर पेश किया गया। पप्पू यादव के खिलाफ दिल्ली में शिकायत इस प्रदर्शन के बाद पप्पू यादव के खिलाफ दिल्ली के जहांगीरपुरी थाने में शिकायत दर्ज किए जाने की खबर सामने आई है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि संसद में पुजारी का वेश धारण करने से धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। मामले को लेकर राजनीतिक और धार्मिक स्तर पर विवाद शुरू हो गया है। बीजेपी ने प्रदर्शन को बताया राजनीतिक स्टंट बीजेपी की ओर से भी पप्पू यादव के प्रदर्शन पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने पप्पू यादव और राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए इसे हिंदुत्व और साधु-संतों के अपमान से जोड़कर आलोचना की है। इस घटनाक्रम के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी तेज हो गई है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, नकल और अन्य अनुचित साधनों पर शिकंजा कसने के लिए लाया गया लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 अब कानून बन गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने विधेयक को मंजूरी दे दी है। संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के साथ ही इसे कानून का रूप मिल गया है। पेपर लीक और नकल पर सख्ती नए कानून का उद्देश्य सार्वजनिक परीक्षाओं में होने वाली पेपर लीक, नकल और संगठित गड़बड़ियों पर रोक लगाना है। परीक्षा प्रणाली में अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ पहले की तुलना में अधिक कड़ी कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। दोषियों पर बढ़ेगी कानूनी कार्रवाई संशोधित कानून में पेपर लीक और परीक्षा में अनुचित साधनों को बढ़ावा देने वाले मामलों में सख्त सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। सरकार का लक्ष्य परीक्षा माफिया और संगठित नकल गिरोहों पर प्रभावी कार्रवाई कर परीक्षाओं की विश्वसनीयता बढ़ाना है। फास्ट ट्रैक कोर्ट और विशेष जांच व्यवस्था कानून में परीक्षा से जुड़े मामलों की जांच और सुनवाई को तेजी से पूरा करने की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है। संसद में चर्चा के दौरान फास्ट ट्रैक कोर्ट और विशेष टास्क फोर्स जैसे प्रावधानों का उल्लेख किया गया था, ताकि मामलों का निपटारा लंबा न खिंचे। छात्रों के हित में परीक्षा व्यवस्था मजबूत करने का दावा सरकार का कहना है कि परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनाए रखना जरूरी है। नए कानून से प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का रास्ता मजबूत होगा और मेहनत के आधार पर चयन की प्रक्रिया में छात्रों का भरोसा बढ़ाने में मदद मिलेगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।