नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के मानसून सत्र में विधेयकों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि महत्वपूर्ण विधेयकों को पर्याप्त चर्चा और विचार-विमर्श के बिना जल्दबाजी में पारित कराया जा रहा है। उन्होंने इस प्रक्रिया की तुलना ‘मैगी नूडल्स’ से की।
डेरेक ओ’ब्रायन ने संसद में विधायी प्रक्रिया को लेकर सरकार पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि कई विधेयकों पर सांसदों को पर्याप्त समय नहीं मिल रहा है और उन्हें जल्दबाजी में सदन से पारित कराया जा रहा है।
TMC सांसद ने कहा कि संसद में कानून बनाना गंभीर प्रक्रिया है और प्रत्येक विधेयक पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। उनके मुताबिक, सरकार को विपक्ष की आपत्तियों और सुझावों पर भी विचार करना चाहिए।
डेरेक ओ’ब्रायन ने विधेयकों को जल्दबाजी में पारित किए जाने के आरोप को समझाने के लिए ‘मैगी नूडल्स’ का उदाहरण दिया। उनका कहना था कि जिस तरह मैगी कुछ ही मिनटों में तैयार हो जाती है, उसी तरह सरकार संसद में विधेयकों को तेजी से पारित करा रही है। उन्होंने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि कानून बनाने के लिए संसद में पर्याप्त बहस, जांच और विचार-विमर्श जरूरी है।
TMC समेत विपक्षी दलों का कहना है कि महत्वपूर्ण विधेयकों को केवल संख्या बल के आधार पर पारित नहीं किया जाना चाहिए। विपक्ष की मांग है कि विधेयकों को संबंधित संसदीय समितियों के पास भेजा जाए, ताकि उनके प्रावधानों की विस्तृत जांच हो सके।
विपक्षी सांसदों का कहना है कि कानूनों का आम जनता पर व्यापक प्रभाव पड़ता है, इसलिए उन्हें जल्दबाजी में पारित करने के बजाय सभी पक्षों की राय सुनी जानी चाहिए।
संसद के मानसून सत्र में विधेयकों के अलावा कई अन्य मुद्दों को लेकर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। विपक्ष लगातार सरकार पर संसद में पर्याप्त चर्चा नहीं कराने का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि विपक्ष को सदन की कार्यवाही बाधित करने के बजाय बहस में भाग लेना चाहिए।
TMC के डेरेक ओ’ब्रायन की ‘मैगी नूडल्स’ वाली टिप्पणी ने विधेयकों को जल्दबाजी में पारित किए जाने के आरोपों को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
प्रयागराज, एजेंसियां। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के प्रयागराज में प्रस्तावित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को लेकर शुक्रवार को दिनभर सियासी हलचल बनी रही। कार्यक्रम के लिए तय स्थल की अनुमति पहले वापस ले ली गई थी, जिसके बाद कांग्रेस ने इसे लेकर सरकार पर सवाल उठाए। हालांकि बाद में कायस्थ पाठशाला ट्रस्ट (केपी ट्रस्ट) ने कार्यक्रम को सशर्त मंजूरी दे दी। अब राहुल गांधी का कार्यक्रम 8 अगस्त को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आयोजित होने का रास्ता साफ हो गया है। कार्यक्रम की अनुमति वापस लेने से बढ़ा विवाद राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम 8 अगस्त को प्रयागराज में प्रस्तावित था। कार्यक्रम के लिए केपी ट्रस्ट के परिसर का इस्तेमाल किया जाना था। लेकिन कार्यक्रम से ठीक पहले स्थल की अनुमति वापस लिए जाने के बाद कांग्रेस ने इसे लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि छात्रों और युवाओं की आवाज उठाने वाले कार्यक्रम को रोकने की कोशिश की जा रही है। इस घटनाक्रम के बाद प्रयागराज की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई। राहुल गांधी बोले- छात्रों की आवाज नहीं दबेगी अनुमति रद्द होने की खबर के बाद राहुल गांधी ने कहा कि युवाओं और छात्रों की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। कांग्रेस ने भी स्पष्ट किया कि पार्टी छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर अपना अभियान जारी रखेगी। ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के तहत कांग्रेस पेपर लीक, परीक्षा में कथित अनियमितताओं और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को उठाने की तैयारी कर रही है। प्रयागराज का कार्यक्रम इसी अभियान का हिस्सा है। दोबारा मिली सशर्त अनुमति विवाद बढ़ने के बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ लिया। कायस्थ पाठशाला ट्रस्ट ने राहुल गांधी के कार्यक्रम को सशर्त अनुमति दे दी। इसके बाद कांग्रेस ने कहा कि राहुल गांधी 8 अगस्त को तय समय पर प्रयागराज पहुंचेंगे और छात्रों के साथ संवाद करेंगे। इस तरह फिलहाल कार्यक्रम रद्द नहीं है। पहले अनुमति वापस लिए जाने के कारण जो संकट पैदा हुआ था, वह दोबारा अनुमति मिलने के बाद समाप्त होता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस ने सरकार पर साधा निशाना कार्यक्रम को लेकर अनुमति रद्द होने और फिर बहाल किए जाने के घटनाक्रम ने कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को भी तेज कर दिया है। कांग्रेस का कहना है कि छात्रों और युवाओं के सवालों को उठाने से रोकने की कोशिश लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ है। वहीं, अब सशर्त अनुमति मिलने के बाद कांग्रेस 8 अगस्त को प्रयागराज में कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी कर रही है। राहुल गांधी के कार्यक्रम में छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। प्रयागराज में राहुल गांधी के प्रस्तावित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस नेता पर निशाना साधा है। भाजपा ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी संसद में महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय बाहर कार्यक्रम आयोजित कर ‘छोटी राजनीति’ कर रहे हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब प्रयागराज में कार्यक्रम के आयोजन को लेकर अनुमति वापस लिए जाने पर कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। कार्यक्रम को लेकर बढ़ा राजनीतिक विवाद राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम प्रयागराज में आयोजित होना है। कार्यक्रम का उद्देश्य छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को उठाना बताया जा रहा है। हालांकि, कार्यक्रम के लिए प्रस्तावित स्थल की अनुमति वापस लिए जाने के बाद कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर सवाल उठाए। राहुल गांधी ने भी कार्यक्रम को रोकने की कोशिशों को लेकर सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि छात्रों की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी छात्रों के समर्थन में पार्टी के रुख को स्पष्ट किया है। BJP ने राहुल गांधी पर साधा निशाना भाजपा ने राहुल गांधी के कार्यक्रम को लेकर कहा कि उन्हें संसद में अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। पार्टी का आरोप है कि विपक्ष के नेता संसद की कार्यवाही में हिस्सा लेने के बजाय राजनीतिक कार्यक्रमों के जरिए मुद्दों को उठाने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा नेताओं ने यह भी कहा कि यदि विपक्ष संसद में चर्चा चाहता है तो उसे सदन की कार्यवाही बाधित करने के बजाय उसे चलने देना चाहिए। पार्टी ने राहुल गांधी और कांग्रेस पर राजनीतिक मुद्दों को लेकर जनता को भ्रमित करने का आरोप भी लगाया। छात्रों के मुद्दों पर आमने-सामने सरकार और कांग्रेस प्रयागराज का कार्यक्रम कांग्रेस के छात्र-केंद्रित अभियान का हिस्सा है। कांग्रेस छात्रों से जुड़े सवालों और उनकी समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की तैयारी में है। राहुल गांधी ने युवाओं से सीधे संवाद बढ़ाने की दिशा में सोशल मीडिया पर भी छात्रों से सवाल और सुझाव मांगे हैं। वहीं, भाजपा का कहना है कि संसद लोकतांत्रिक बहस का सबसे महत्वपूर्ण मंच है और विपक्ष को वहां अपनी बात रखने पर प्राथमिकता देनी चाहिए। इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है। संसद बनाम सड़क की राजनीति पर बहस राहुल गांधी के प्रयागराज कार्यक्रम को लेकर शुरू हुआ विवाद अब संसद में विपक्ष की भूमिका और सड़क पर राजनीतिक कार्यक्रमों तक पहुंच गया है। एक ओर कांग्रेस छात्रों के मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ा रही है, वहीं भाजपा राहुल गांधी के कार्यक्रम को राजनीतिक प्रदर्शन के रूप में पेश कर रही है। कार्यक्रम की अनुमति को लेकर पैदा हुआ विवाद और भाजपा की ताजा प्रतिक्रिया मानसून सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ते टकराव को दर्शाती है।
NDA से दूरी बना रहे तीन पूर्व TMC सांसद, बोले- मतदाताओं को देना है जवाब नई दिल्ली, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अलग होकर NCPI समूह में शामिल हुए तीन सांसदों ने BJP के नेतृत्व वाले NDA से दूरी बनाए रखी है। खलीलुर रहमान, अबू ताहेर खान और यूसुफ पठान ने NDA संसदीय दल की बैठक में हिस्सा नहीं लिया। तीनों सांसदों का कहना है कि वे अपने मतदाताओं को जवाब देने के लिए बाध्य हैं और फिलहाल NDA का हिस्सा बनने को लेकर सावधानी बरत रहे हैं। तीनों सांसदों ने NDA बैठक से बनाई दूरी खलीलुर रहमान, अबू ताहेर खान और यूसुफ पठान ने NDA की बैठक से दूरी बनाने का फैसला लगातार दूसरी बार लिया है। इससे NCPI के भीतर मौजूद मतभेद और राजनीतिक स्थिति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, तीनों सांसदों ने अपने क्षेत्रों में मतदाताओं की प्रतिक्रिया को देखते हुए NDA की बैठकों में शामिल नहीं होने का फैसला किया। खास तौर पर BJP के साथ उनकी नजदीकी को लेकर मतदाताओं के एक वर्ग में सवाल उठाए गए हैं। BJP के साथ जाने पर मतदाताओं की नाराजगी का डर तीनों सांसदों के निर्वाचन क्षेत्र पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों में हैं। रिपोर्ट के अनुसार, उनके NDA के साथ संभावित राजनीतिक जुड़ाव को लेकर कुछ मतदाताओं ने सवाल उठाए हैं। ऐसे में सांसद खुलकर BJP-led NDA के साथ खड़े होने से फिलहाल बच रहे हैं। अबू ताहेर खान ने साफ संकेत दिया है कि तीनों सांसद NDA का हिस्सा नहीं हैं। इससे NCPI और NDA के बीच संबंधों को लेकर स्थिति और अधिक स्पष्ट होने के बजाय राजनीतिक रूप से उलझी हुई नजर आ रही है। TMC से अलगाव के बाद भी राजनीतिक स्थिति असमंजस में TMC के कई सांसदों के अलग होकर NCPI समूह बनाने के बाद इस समूह के NDA के साथ तालमेल को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। कुछ NCPI सांसद NDA की बैठकों में शामिल हुए हैं, लेकिन तीनों सांसदों की लगातार अनुपस्थिति ने समूह के भीतर एकराय पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घटनाक्रम के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा NCPI समूह को अलग संसदीय दल के रूप में मान्यता दिए जाने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण बना हुआ है। फिलहाल तीनों सांसदों का रुख बताता है कि वे TMC से अलग होने के बावजूद BJP और NDA के साथ अपने राजनीतिक संबंधों को लेकर बेहद सतर्क हैं।