political defection

NCPI, once left with only ₹75 in its bank account, is now in the spotlight after 20 rebel TMC MPs announced their merger with the party.
75 रुपए वाली गुमनाम पार्टी रातोंरात बन सकती है NDA की दूसरी सबसे बड़ी ताकत! जानिए NCPI का पूरा सच

  नई दिल्ली/कोलकाता: भारतीय राजनीति में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर आम लोगों तक को हैरान कर दिया है। जिस पार्टी के बैंक खाते में एक साल पहले केवल 75 रुपए बचे थे, वही पार्टी अब संसद में सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए (NDA) की दूसरी सबसे बड़ी ताकत बनने की दहलीज पर खड़ी दिखाई दे रही है। यह पार्टी है नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI)। पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों द्वारा इस पार्टी में विलय की घोषणा के बाद अचानक यह छोटा-सा दल राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। 75 रुपए से संसद की ताकत बनने तक का सफर निर्वाचन आयोग को सौंपी गई एनसीपीआई की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2022-23 में पार्टी को चंदे के रूप में कुल 1,13,075 रुपए मिले थे। पार्टी ने लगभग पूरी राशि संगठनात्मक गतिविधियों और चुनावी खर्चों में खर्च कर दी। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चार उम्मीदवारों को मैदान में उतारने पर पार्टी ने करीब 49,400 रुपए खर्च किए थे। चुनाव और अन्य खर्चों के बाद पार्टी के बैंक खाते में मात्र 75 रुपए बचे थे। पति-पत्नी के चंदे से चलती थी पार्टी रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी को दान देने वालों में प्रमुख रूप से पार्टी अध्यक्ष शिउली कुंडू और उनके पति उत्तीय कुंडू शामिल थे। शिउली कुंडू ने 15,000 रुपए का योगदान दिया था। उत्तीय कुंडू ने 18,000 रुपए का चंदा दिया था। यानी जिस पार्टी का अस्तित्व कुछ समर्थकों और परिवार के योगदान पर टिका था, वही आज राष्ट्रीय राजनीति की सुर्खियों में है। त्रिपुरा में नहीं मिला था जनसमर्थन एनसीपीआई ने वर्ष 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव की चार सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। अधिकांश सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों को NOTA (नोटा) के आसपास ही वोट मिले। पार्टी न तो कोई सीट जीत सकी और न ही कोई बड़ा जनाधार बना पाई। विडंबना: 'दलबदलुओं को नकारें' का नारा, लेकिन दलबदल से मिली पहचान जनवरी 2023 में पंजीकरण के समय एनसीपीआई ने अपना प्रमुख नारा दिया था— "अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलबदलुओं को नकारें।" लेकिन राजनीतिक विडंबना देखिए कि आज इसी पार्टी की पहचान और राष्ट्रीय महत्व तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों के दलबदल के कारण बनी है। 20 सांसदों के आने से कैसे बदल जाएगा समीकरण? यदि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला बागी सांसदों के विलय को मान्यता दे देते हैं, तो एनसीपीआई रातोंरात लोकसभा की सबसे बड़ी पार्टियों में शामिल हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार: पार्टी सीधे देश की प्रमुख संसदीय ताकतों में शामिल हो जाएगी। एनडीए के भीतर इसका आकार कई पुराने सहयोगी दलों से बड़ा हो सकता है। इससे संसद में सीटों का गणित और गठबंधन की राजनीति दोनों प्रभावित हो सकते हैं। यह सब लोकसभा अध्यक्ष और कानूनी प्रक्रियाओं के फैसलों पर निर्भर करेगा। जमीन पर कोई जनप्रतिनिधि नहीं, फिर भी राष्ट्रीय चर्चा में सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि एनसीपीआई के पास अब तक किसी बड़े स्तर का जनाधार नहीं रहा है। पार्टी का कोई विधायक नहीं। कोई सांसद नहीं था। किसी बड़े नगर निकाय में भी उल्लेखनीय प्रतिनिधित्व नहीं रहा। इसके बावजूद, बागी सांसदों के विलय के बाद यह पार्टी राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है। कौन हैं शिउली और उत्तीय कुंडू? एनसीपीआई की पूर्व अध्यक्ष शिउली कुंडू की शैक्षणिक योग्यता काफी चर्चित रही है। वे: कलकत्ता हाईकोर्ट की वकील हैं। गणित में एमएससी हैं। एमबीए और एलएलएम की डिग्री रखती हैं। लैंड सर्वेइंग का प्रमाणपत्र भी उनके पास है। वहीं उनके पति उत्तीय कुंडू स्वयं को: बांग्ला अखबार के संपादक, गणित शिक्षक, मोटिवेशनल स्पीकर, आईएसओ ऑडिटर, योग स्वयंसेवक बताते हैं। आगे क्या? एनसीपीआई की कहानी भारतीय लोकतंत्र के सबसे अनोखे राजनीतिक घटनाक्रमों में शामिल हो सकती है। एक ऐसी पार्टी, जिसके खाते में कभी केवल 75 रुपए बचे थे, अब संसद की सत्ता समीकरण को प्रभावित करने की स्थिति में पहुंच गई है। बागी सांसदों के विलय, दलबदल विरोधी कानून, पार्टी की मान्यता और चुनाव चिह्न को लेकर अंतिम फैसला संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के बाद ही सामने आएगा। लेकिन फिलहाल, एनसीपीआई भारतीय राजनीति का सबसे चर्चित और रहस्यमय राजनीतिक नाम बन चुकी है।  

Deepshikha जून 16, 2026 0
Rebel TMC MPs announce merger with NCPI and prepare legal battle over Trinamool Congress's ‘Jora Phool’ election symbol.
ममता बनर्जी से छिन सकता है तृणमूल का चुनाव चिह्न, दीदी के करीबी अरूप बोले- 'खेला होबे'

  कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। Mamata Banerjee के नेतृत्व वाली All India Trinamool Congress (टीएमसी) के 20 बागी सांसदों ने पार्टी से अलग होकर Nationalist Citizens Party of India (एनसीपीआई) में विलय का ऐलान कर दिया है। इतना ही नहीं, बागी गुट अब तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न 'जोड़ाफूल' (दो फूल) पर भी दावा करने की तैयारी में है। तृणमूल के बागी सांसद Arup Chakraborty ने सोमवार को दावा किया कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी है, बल्कि पार्टी को "सुधारने" की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "एक नया खेल शुरू हो गया है… खेला होबे।" 'हम ही असली तृणमूल हैं' अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि बागी सांसद ही असली तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके पास पार्टी के 20 सांसदों का समर्थन है। उन्होंने कहा, "हमने तृणमूल नहीं छोड़ी है। हम तृणमूल में ही हैं और पार्टी को ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी को नुकसान क्यों पहुंचा, इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। हमारे पास 20 सांसद हैं, इसलिए हम चुनाव चिह्न के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।" उन्होंने यह भी दावा किया कि इस राजनीतिक बदलाव से पश्चिम बंगाल में विकास और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। ममता बनर्जी पर साधा निशाना अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि ममता बनर्जी डरी हुई हैं और पार्टी की बैठक तक बुलाने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया, "ममता बनर्जी चुनाव से पहले अपने क्षेत्र में एक बैठक भी नहीं कर सकीं। पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक चर्चा समाप्त हो चुकी है।" 20 सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का किया ऐलान रविवार को बागी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने Om Birla से मुलाकात कर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की। सांसदों ने घोषणा की कि वे एनसीपीआई में विलय कर चुके हैं और एक अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता चाहते हैं। एनसीपीआई एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, जिसने वर्ष 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया था। टीएमसी ने बताया गैरकानूनी कदम तृणमूल कांग्रेस ने बागी सांसदों के कदम को संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत अवैध बताया है। Sagarika Ghose ने कहा कि केवल सांसदों के समूह का अलग होना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, "दलबदल विरोधी कानून के तहत पहले संसद के बाहर मौजूद पूरी राजनीतिक पार्टी का विलय या विभाजन होना चाहिए। केवल सांसदों का समूह अलग होकर किसी अन्य पार्टी में शामिल नहीं हो सकता।" 'असली तृणमूल वही है जिसकी अध्यक्ष ममता हैं' तृणमूल के वरिष्ठ नेता Sougata Roy ने कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस वही है, जिसकी अध्यक्ष ममता बनर्जी हैं और जिसका चुनाव चिह्न 'जोड़ाफूल' है। उन्होंने आरोप लगाया कि बागी सांसदों ने मतदाताओं के साथ विश्वासघात किया है। सौगत रॉय ने कहा, "तृणमूल के टिकट पर जीतकर सांसद बने लोगों ने एक अज्ञात पार्टी में शामिल होकर एनडीए का समर्थन करने का फैसला किया है। यह जनता के जनादेश के साथ धोखा है।" सुदीप बंद्योपाध्याय भी बागी गुट में शामिल छह बार के सांसद Sudip Bandyopadhyay भी बागी गुट में शामिल हो गए हैं। उन्होंने दावा किया कि बागी समूह ही असली तृणमूल कांग्रेस है और वह चुनाव चिह्न तथा पार्टी की मान्यता के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेगा। विधानसभा से संसद तक छिड़ी नियंत्रण की जंग तृणमूल पर नियंत्रण की लड़ाई केवल संसद तक सीमित नहीं है। हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी पार्टी के 80 में से 64 विधायकों ने अलग समूह के रूप में मान्यता हासिल करने का दावा किया है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति में बड़ा पुनर्संयोजन देखने को मिल सकता है। क्या ममता बनर्जी से छिन सकता है तृणमूल का चुनाव चिह्न? राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी राजनीतिक दल का चुनाव चिह्न तभी दूसरे गुट को मिल सकता है जब पार्टी में वास्तविक विभाजन, संगठनात्मक समर्थन और निर्वाचन आयोग के समक्ष पर्याप्त कानूनी आधार साबित हो। इसलिए बागी सांसदों के दावे के बावजूद अंतिम फैसला Election Commission of India और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। फिलहाल इतना तय है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुआ यह नया 'खेला' पश्चिम बंगाल की राजनीति को आने वाले महीनों में पूरी तरह बदल सकता है।  

Deepshikha जून 16, 2026 0
Security personnel deployed outside NCPI office in Howrah after 22 rebel TMC MPs claimed to join the little-known political party.
TMC के 22 बागी सांसदों के एनसीपीआई में शामिल होने के बाद संकराईल स्थित पार्टी कार्यालय की सुरक्षा बढ़ी, केंद्रीय बल तैनात

  हावड़ा: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए बड़े घटनाक्रम के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 22 बागी सांसदों के नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल होने के दावे के बाद हावड़ा जिले के संकराईल स्थित पार्टी कार्यालय की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। किसी भी अप्रिय घटना और संभावित राजनीतिक तनाव को देखते हुए कार्यालय के बाहर केंद्रीय बलों की तैनाती की गई है। हावड़ा के हाटगाछा-बाणीपुर इलाके में स्थित एनसीपीआई कार्यालय के बाहर सोमवार से सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। अचानक चर्चा में आया छोटा राजनीतिक दल एनसीपीआई अब तक एक अपेक्षाकृत छोटी और गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के रूप में जानी जाती रही है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस के 22 बागी सांसदों के इसमें शामिल होने के दावे के बाद यह पार्टी अचानक पश्चिम बंगाल की राजनीति के केंद्र में आ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बागी सांसदों का दावा औपचारिक रूप से आगे बढ़ता है, तो इससे पश्चिम बंगाल की सियासत में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। पहले एनजीओ का कार्यालय था वर्तमान पार्टी ऑफिस जानकारी के अनुसार, जिस भवन को वर्तमान में एनसीपीआई का पार्टी कार्यालय बनाया गया है, वहां पहले एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) का कार्यालय संचालित होता था। बाद में इसे पार्टी के कार्यालय के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। अचानक बढ़ी राजनीतिक गतिविधियों और मीडिया की नजरों के बाद इस कार्यालय की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है। 2022 से मौजूद है पार्टी कार्यालय एनसीपीआई नेता शिउली कुंडू की बड़ी बेटी दीपनिता कुंडू ने बताया कि पार्टी का कार्यालय वर्ष 2022 से संकराईल में संचालित हो रहा है। उन्होंने कहा, "हमारा पार्टी कार्यालय 2022 से यहां है। वर्ष 2023 में मैंने एनसीपीआई की उम्मीदवार के रूप में संकराईल के जोरहाट ग्राम पंचायत चुनाव में हिस्सा लिया था, लेकिन चुनाव हार गई थी।" दीपनिता ने कहा कि पार्टी लंबे समय से संगठन विस्तार का प्रयास कर रही थी, लेकिन किसी ने कल्पना नहीं की थी कि एक दिन यह राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक चर्चा का विषय बन जाएगी। पंचायत चुनाव में उतारे थे उम्मीदवार त्रिपुरा में पंजीकृत एनसीपीआई ने वर्ष 2023 में पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में भी अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। पार्टी को उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। पार्टी का संगठन सीमित क्षेत्रों तक ही सिमटा रहा और उसका राजनीतिक प्रभाव बेहद कम माना जाता था। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भी नहीं मिली सफलता एनसीपीआई ने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चार सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनमें चावमानु, अंबासा और कैलाशहर जैसी सीटें शामिल थीं। लेकिन पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। अधिकांश सीटों पर उसके उम्मीदवारों को नोटा (NOTA) के बराबर या उससे भी कम वोट मिले। उस समय पार्टी को एक छोटे क्षेत्रीय दल के रूप में देखा जाता था। अब सबसे ज्यादा सांसदों वाली पार्टी बनने का दावा राजनीतिक घटनाक्रम ने तब नया मोड़ ले लिया, जब तृणमूल कांग्रेस के 22 बागी सांसदों ने एनसीपीआई में शामिल होने का दावा किया। यदि यह दावा संवैधानिक और संसदीय प्रक्रियाओं में स्वीकार होता है, तो एक ऐसी पार्टी, जिसका चुनावी प्रदर्शन अब तक बेहद सीमित रहा है, अचानक लोकसभा में महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करा सकती है। इसी संभावना को देखते हुए संकराईल स्थित पार्टी कार्यालय के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई है और प्रशासन किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह सतर्क है। राजनीतिक महत्व तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ती असंतुष्टि, बागी सांसदों के अलग गुट के दावे और एनसीपीआई जैसे छोटे दल का अचानक राष्ट्रीय राजनीति में उभरना पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए एक बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। आने वाले दिनों में लोकसभा में मान्यता, अलग बैठने की व्यवस्था और संभावित राजनीतिक पुनर्संरचना को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।  

Deepshikha जून 16, 2026 0
Mamata banerjee
ममता बनर्जी को बड़ा झटका? TMC के 12 सांसद हो सकते है BJP में शामिल

कोलकाता, एजेंसियां।  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर अंदरूनी संकट की चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक गलियारों में दावा किया जा रहा है कि पार्टी के कई सांसद भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संपर्क में हैं और आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकता है।   सूत्रों के अनुसार, लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 29 सांसदों में से करीब 12 सांसद भाजपा में शामिल होने या समर्थन देने की तैयारी में हैं। इसके अलावा पांच से छह अन्य सांसदों से भी बातचीत चलने की चर्चा है। हालांकि इन दावों की अभी तक किसी भी पक्ष ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।   दल-बदल कानून से बचने की रणनीति राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए कम से कम 19 से 20 सांसदों को एक साथ लाने की रणनीति बनाई जा रही है। माना जा रहा है कि तृणमूल नेतृत्व को भी संभावित टूट की जानकारी मिल चुकी है और पार्टी को एकजुट रखने के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। चर्चा यह भी है कि इस संभावित बदलाव में ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के करीबी माने जाने वाले कुछ सांसदों के नाम भी शामिल हो सकते हैं।   भाजपा की नजर राज्यसभा सांसदों पर भी लोकसभा में भाजपा के पास फिलहाल 240 सांसद हैं और केंद्र सरकार सहयोगी दलों के समर्थन से चल रही है। ऐसे में यदि तृणमूल के सांसद बड़ी संख्या में भाजपा के साथ आते हैं, तो भाजपा की ताकत और बढ़ सकती है तथा सहयोगी दलों पर निर्भरता कम हो सकती है। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा की नजर अब राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों पर भी है। पार्टी के भीतर संगठनात्मक व्यवस्था और आइपैक की भूमिका को लेकर असंतोष की भी चर्चा हो रही है। हालांकि अभी तक पूरे मामले पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

Unknown मई 26, 2026 0
AAP internal conflict
दल-बदल पर सियासी संग्राम, AAP ने बागी सांसदों की सदस्यता रद्द करने की उठाई मांग

नई दिल्ली, एजेंसियां।  आम आदमी पार्टी (AAP) के सात राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने के फैसले के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। इस घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए AAP नेता Sanjay Singh ने शनिवार को कहा कि पार्टी जल्द ही राज्यसभा के सभापति को पत्र लिखेगी और इन सभी बागी सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग करेगी।   संजय सिंह ने कहा  संजय सिंह ने कहा कि यह मामला सीधे तौर पर दल-बदल विरोधी कानून का उल्लंघन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत संसद में किसी भी प्रकार के विभाजन या अलग गुट को मान्यता नहीं दी गई है, भले ही उसमें दो-तिहाई सदस्य शामिल क्यों न हों। ऐसे में इन सांसदों का भाजपा में शामिल होना पूरी तरह ‘अवैधानिक’ और ‘अवैध’ है।   AAP का आरोप AAP का आरोप है कि यह कदम लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है। पार्टी का कहना है कि वह इस मुद्दे को गंभीरता से उठाएगी और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई सुनिश्चित करने की कोशिश करेगी।   क्या है मामला? दरअसल, शुक्रवार को AAP के सात राज्यसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होकर भाजपा में शामिल होने की घोषणा की थी, जिससे राजनीतिक माहौल गरमा गया। इन सांसदों में Raghav Chadha, Sandeep Pathak और Ashok Mittal सहित अन्य नेता शामिल बताए जा रहे हैं। AAP का मानना है कि सांसदों का यह कदम न केवल पार्टी के खिलाफ है, बल्कि संविधान के प्रावधानों की भी अनदेखी करता है। अब निगाहें राज्यसभा के सभापति के फैसले पर टिकी हैं, जो इस मामले में आगे की कार्रवाई तय करेंगे।

Unknown अप्रैल 25, 2026 0
TMC councillor joins BJP in Jalpaiguri ahead of West Bengal elections amid political tensions
बंगाल चुनाव: उत्तर बंगाल में TMC को झटका, पूर्वी रॉय प्रधान BJP में शामिल

जलपाईगुड़ी: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) को उत्तर बंगाल में बड़ा झटका लगा है। हल्दिबारी नगरपालिका की पार्षद पूर्वी रॉय प्रधान ने पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है। चुनाव से एक सप्ताह पहले हुए इस घटनाक्रम को भाजपा के लिए क्षेत्र में मजबूती के तौर पर देखा जा रहा है। टिकट से नाराज़गी बनी वजह मेखलीगंज विधानसभा सीट से परेश चंद्र अधिकारी को फिर से उम्मीदवार बनाए जाने पर पूर्वी रॉय नाराज़ थीं। शिक्षक भर्ती घोटाले में उनका नाम सामने आने के बाद भी टिकट दिए जाने पर उन्होंने सवाल उठाए और पार्टी छोड़ने का फैसला किया। पति पहले ही BJP में शामिल पूर्वी रॉय के पति अर्घ्य रॉय प्रधान, जो मेखलीगंज से पूर्व विधायक रह चुके हैं, हाल ही में भाजपा में शामिल हो चुके हैं। उन्होंने शुभेंदु अधिकारी की मौजूदगी में भाजपा का झंडा थामा था। अब पूर्वी रॉय ने भी उसी राह पर चलते हुए पार्टी बदल ली। TMC ने बताया ‘स्वार्थी’ तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेता अमिताभ बिश्वास ने इस घटनाक्रम को ज्यादा महत्व देने से इनकार किया। उनका कहना है कि इससे पार्टी को कोई नुकसान नहीं होगा और चुनावी नतीजों पर इसका असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने पति-पत्नी को “स्वार्थी” बताते हुए आरोप लगाया कि वे भविष्य में महिला आरक्षण लागू होने के बाद चुनावी फायदा उठाना चाहते हैं। पूर्वी रॉय ने लगाए गंभीर आरोप वहीं, पूर्वी रॉय ने पार्टी छोड़ने के पीछे अपनी अलग दलील दी है। उनका कहना है कि वह ऐसे उम्मीदवार के लिए प्रचार नहीं कर सकतीं, जिन पर शैक्षणिक भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों। उन्होंने कहा कि “राज्य में हजारों युवाओं का भविष्य प्रभावित हुआ है, इसलिए मैं इस फैसले के खिलाफ हूं।” राजनीतिक असर पर नजर हल्दिबारी नगरपालिका की सभी 11 सीटों पर अब तक TMC का कब्जा रहा है। ऐसे में चुनाव से पहले इस तरह का दलबदल स्थानीय राजनीति में हलचल जरूर पैदा कर सकता है। अब देखना होगा कि इस घटनाक्रम का उत्तर बंगाल, खासकर कूचबिहार और मेखलीगंज क्षेत्र के चुनावी समीकरणों पर कितना असर पड़ता है।  

surbhi अप्रैल 16, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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