रांची। झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए गुरुवार सुबह से मतदान शुरू हो गया। चुनाव को लेकर विधानसभा परिसर में सुबह से ही राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं। इस बार दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवार मैदान में हैं, जिससे मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। सभी विधायकों के वोट पर राजनीतिक दलों की नजर बनी हुई है। तीन उम्मीदवार मैदान में, एक सीट पर बैजनाथ राम की बढ़त इंडिया गठबंधन की ओर से झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने बैजनाथ राम को उम्मीदवार बनाया है, जबकि कांग्रेस ने प्रणव झा को चुनावी मैदान में उतारा है। दूसरी ओर भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, झामुमो उम्मीदवार बैजनाथ राम की जीत लगभग तय मानी जा रही है। वहीं दूसरी सीट के लिए कांग्रेस के प्रणव झा और भाजपा समर्थित परिमल नाथवानी के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। विधानसभा में किसके पास कितना संख्या बल • एनडीए : 24 • भाजपा : 21 • आजसू पार्टी : 01 • जदयू : 01 • लोजपा-आर : 01 • कुल : 24 विधानसभा परिसर में हलचल • इंडिया गठबंधन : 56 • झामुमो : 34 • कांग्रेस : 16 • राजद : 04 • भाकपा माले : 02
रांची। केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ शनिवार को देवघर स्थित विश्वप्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचे, जहां उन्होंने विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की। दर्शन के बाद उन्होंने देश की सुख-समृद्धि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की। मंदिर परिसर में पूजा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी मौजूद रहे। मोदी के नेतृत्व में विकास की नई ऊंचाइयों का दावा पूजा के बाद मीडिया से बातचीत में संजय सेठ ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लंबे समय तक देश की सेवा कर एक नया इतिहास रचा है। उनके नेतृत्व में भारत विकास, सुशासन और वैश्विक प्रतिष्ठा के नए आयाम स्थापित कर रहा है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंच रहा है और देश निरंतर प्रगति की दिशा में आगे बढ़ रहा है। राज्यसभा चुनाव में जीत का जताया भरोसा झारखंड राज्यसभा चुनाव को लेकर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी समर्थित उम्मीदवार की जीत तय है। उन्होंने विश्वास जताया कि पार्टी के पक्ष में परिणाम आएगा और भाजपा राज्यसभा चुनाव में सफलता हासिल करेगी। राजनीतिक घटनाक्रम पर उन्होंने कहा कि पार्टी पूरी मजबूती के साथ चुनाव लड़ रही है। पश्चिम बंगाल पर हमला, ईवीएम विवाद पर साधी चुप्पी पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए संजय सेठ ने कहा कि वहां की वर्तमान परिस्थितियां राज्य सरकार की नीतियों का परिणाम हैं। हालांकि, राज्य में हजारों ईवीएम मशीनों में आग लगने की घटना से जुड़े सवाल पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया। वहीं, ईरान से जुड़े जहाज पर अमेरिकी कार्रवाई के संबंध में पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि इस विषय पर विदेश मंत्रालय पहले ही अपना पक्ष स्पष्ट कर चुका है, इसलिए वह इस पर कोई अतिरिक्त टिप्पणी नहीं करेंगे।
साहिबगंज। साहिबगंज जिले के बरहरवा प्रखंड मुख्यालय में शेरशाहबादी जाति प्रमाण पत्र जारी करने की मांग को लेकर पिछले कई दिनों से चल रहा अनिश्चितकालीन धरना मंगलवार को समाप्त हो गया। यह धरना 4 मई 2026 से शेरशाहबादी डेवलपमेंट सोसाइटी के नेतृत्व में जारी था। धरना समाप्त होने के पीछे पूर्व मंत्री आलमगीर आलम और राजमहल विधायक M T Raja द्वारा दिए गए आश्वासन को अहम माना जा रहा है। दोनों नेताओं की मौजूदगी में आंदोलनकारियों और प्रशासन के बीच बातचीत हुई, जिसके बाद धरना समाप्त करने का फैसला लिया गया। जांच समिति बनाने का निर्णय धरना स्थल पर राजमहल एसडीओ सदानंद महतो भी पहुंचे और आंदोलनकारियों से चर्चा की। बातचीत के दौरान यह निर्णय लिया गया कि मामले की जांच के लिए एक विशेष समिति का गठन किया जाएगा। इस समिति में शेरशाहबादी डेवलपमेंट सोसाइटी के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाएगा। समिति पूरे मामले की जांच कर रिपोर्ट तैयार करेगी, जिसे राज्य सरकार को भेजा जाएगा। सरकार को भेजी जाएगी रिपोर्ट पूर्व मंत्री आलमगीर आलम ने कहा कि शेरशाहबादी समाज की मांग को गंभीरता से लिया गया है और इस संबंध में उपायुक्त समेत अन्य अधिकारियों से बातचीत की गई है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि यदि आवश्यक हुआ तो राज्य सरकार कैबिनेट स्तर पर संशोधन कर शेरशाहबादी जाति प्रमाण पत्र फिर से जारी करने की प्रक्रिया शुरू करेगी। बड़ी संख्या में जुटे समाज के लोग धरना समाप्ति के दौरान बड़ी संख्या में शेरशाहबादी डेवलपमेंट सोसाइटी के सदस्य, पदाधिकारी और समाज के लोग मौजूद रहे। आंदोलनकारियों ने कहा कि उन्हें प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से सकारात्मक आश्वासन मिला है, इसलिए फिलहाल आंदोलन स्थगित किया गया है। हालांकि समाज के लोगों ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में फिर से आंदोलन किया जा सकता है।
रांची। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एकसाथ 27 नक्सलियों के सरेंडर पर कहा कि लोग तेजी से मुख्य धारा से जुड़ रहे हैं। यह सरकार मुख्यालय से नहीं, बल्कि राज्य के सुदूर गांवों से चल रही है। स्वर्गीय दुर्गा सोरेन की पुण्यतिथि पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने यह बात कहकर राज्य में हो रहे बड़े बदलाव का संकेत दिया। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार की सोच बिल्कुल स्पष्ट है, हर व्यक्ति का विकास और हर व्यक्ति की भागीदारी। सरकार की नजर और आवाज गांव के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंच रही है। हर व्यक्ति सरकार के साथ जुड़ रहा है। आज उसी का परिणाम है कि लोग तेजी से मुख्यधारा में जुड़ रहे हैं। शहीदों के सपनों का झारखंड इस मौके पर मुख्यमंत्री ने स्वर्गीय दुर्गा सोरेन को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके संघर्षों को याद किया। उन्होंने कहा कि झारखंड राज्य का निर्माण ऐसे ही कर्मठ युवाओं और आंदोलनकारियों की शहादत व लंबे संघर्ष की बदौलत हुआ है। अपने महान नेताओं पर पूरे राज्य को गर्व है और उनके दिखाएं रास्ते पर चलकर ही एक सशक्त और भयमुक्त झारखंड का निर्माण हो रहा है। हमें अपने नेताओं पर गर्व है। इनके मार्गदर्शन और संघर्ष की बदौलत मंजिल पाई। अलग राज्य बना। उन सभी लोगों की शहादत और संघर्ष की बदौलत ये राज्य है। हम निरंतर आगे बढ़ रहे हैं।
पटना, एजेंसियां। बिहार में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं, जहां मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार जल्द ही मंत्रिमंडल विस्तार की तैयारी में है। इस विस्तार में कई नए चेहरों को मौका मिलने की संभावना जताई जा रही है, खासकर भारतीय जनता पार्टी के कुछ युवा और प्रभावशाली विधायकों के नाम चर्चा में हैं। बीजेपी के तीन प्रमुख दावेदार कैबिनेट में शामिल होने की रेस में सबसे चर्चित नामों में Anand Mishra, Kumar Shailendra और Sanjeev Chaurasia शामिल हैं। ये तीनों विधायक अपनी अलग पहचान और राजनीतिक पृष्ठभूमि के कारण पार्टी नेतृत्व की नजर में अहम माने जा रहे हैं। आनंद मिश्रा: प्रशासनिक अनुभव और तेज छवि बक्सर से विधायक आनंद मिश्रा पूर्व आईपीएस अधिकारी रह चुके हैं और असम कैडर में अपनी कड़क कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ की छवि और प्रशासनिक अनुभव उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाता है। राजनीति में आने के बाद उन्होंने अपनी लोकप्रियता और संगठनात्मक क्षमता से पार्टी नेतृत्व का ध्यान आकर्षित किया है। कुमार शैलेंद्र: अनुभवी और प्रभावशाली नेता भागलपुर के बिहपुर से विधायक कुमार शैलेंद्र तीन बार चुनाव जीत चुके हैं। उनकी मजबूत पकड़ और क्षेत्र में विकास कार्यों के कारण वे एक अनुभवी नेता के रूप में देखे जाते हैं। राजनीतिक बयानबाजी और स्पष्ट रुख के कारण भी वे अक्सर चर्चा में रहते हैं। संजीव चौरसिया: लगातार जीत और संगठन से जुड़ाव दीघा से विधायक संजीव चौरसिया लगातार तीन चुनाव जीत चुके हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनके करीबी संबंध और मजबूत जनाधार उन्हें पार्टी के भीतर एक प्रभावशाली नेता बनाते हैं। कैबिनेट विस्तार से नए समीकरण मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर यह भी माना जा रहा है कि सहयोगी दलों के साथ संतुलन साधने के लिए नए चेहरों को मौका दिया जा सकता है। इससे न केवल सरकार की कार्यशैली में नई ऊर्जा आएगी, बल्कि आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक समीकरण भी मजबूत होंगे।
नई दिल्ली, एजेंसियां। हाल ही में राघव चड्डा ने आम आदमी पार्टी (AAP) छोड़कर भाजपा (BJP) में शामिल होने के अपने फैसले पर विस्तृत सफाई दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर जारी वीडियो में कहा कि पार्टी का मौजूदा स्वरूप पहले जैसा नहीं रहा और उसका आंतरिक माहौल “टॉक्सिक” हो गया है। ‘पार्टी कुछ भ्रष्ट लोगों के हाथ में सिमट गई’ राघव चड्ढा ने आरोप लगाया कि AAP में अब काम करने और अपनी बात रखने की आज़ादी नहीं रह गई थी। उनके अनुसार, पार्टी कुछ “भ्रष्ट और समझौता करने वाले लोगों” के नियंत्रण में आ गई है। उन्होंने यह भी कहा कि सांसदों को संसद में बोलने से रोका जाता था और सक्रिय योगदान देने में बाधाएं डाली जाती थीं। तीन विकल्पों में से चुना नया रास्ता चड्ढा ने बताया कि उनके सामने तीन विकल्प थे राजनीति छोड़ना, पार्टी के भीतर रहकर सुधार की कोशिश करना, या किसी नए मंच के साथ आगे बढ़ना। उन्होंने तीसरा विकल्प चुना। उनका कहना है कि कई वर्षों से उन्हें महसूस हो रहा था कि “सही व्यक्ति गलत पार्टी में है।” सात सांसदों के फैसले का हवाला उन्होंने कहा कि केवल उन्होंने ही नहीं, बल्कि छह अन्य सांसदों ने भी पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया। चड्ढा ने तर्क दिया कि “एक या दो लोग गलत हो सकते हैं, लेकिन सात लोग गलत नहीं हो सकते,” जिससे यह संकेत मिलता है कि असंतोष व्यापक था। जनता से किया वादा राघव चड्ढा ने जनता को आश्वासन दिया कि पार्टी बदलने के बावजूद वे लोगों के मुद्दे पहले की तरह उठाते रहेंगे, बल्कि अब उन्हें समाधान तक पहुंचाने की बेहतर स्थिति में होंगे। उन्होंने अपने निर्णय की तुलना एक “टॉक्सिक कार्यस्थल” छोड़ने से की, जहां काम करना मुश्किल हो जाता है।
रांची। झारखंड की वित्तीय स्थिति को लेकर राज्य की राजनीति तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने राज्य सरकार पर बजट के सही उपयोग में असफल रहने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सरकार संसाधनों की कमी का हवाला देती है, जबकि उपलब्ध धनराशि का भी पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। बड़ा बजट, लेकिन अधूरा खर्च प्रतुल शाहदेव के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में राज्य सरकार का कुल बजट लगभग 1.45 लाख करोड़ रुपये था। इसके बावजूद सरकार करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये ही खर्च कर सकी। उन्होंने कहा कि यह स्थिति बताती है कि सरकार योजनाएं तो बनाती है, लेकिन उन्हें प्रभावी ढंग से लागू नहीं कर पाती। 15 प्रतिशत बजट का उपयोग नहीं बीजेपी प्रवक्ता ने दावा किया कि कुल बजट का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा खर्च ही नहीं हुआ। उनके मुताबिक यह केवल वित्तीय आंकड़ा नहीं, बल्कि विकास कार्यों में सुस्ती और प्रशासनिक कमजोरी का संकेत है। उन्होंने इसे जनता के हितों की अनदेखी बताया। अहम विभागों में भी खर्च सीमित शाहदेव ने कहा कि स्कूली शिक्षा, पंचायती राज, नगर विकास, कृषि और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विभागों में बजट का उपयोग अपेक्षित स्तर तक नहीं हुआ। कई विभागों में खर्च 50 से 70 प्रतिशत के बीच ही सीमित रहने की बात कही गई। उनका कहना है कि ऐसे में विकास योजनाओं की रफ्तार प्रभावित होना स्वाभाविक है। जनता पर पड़ रहा सीधा असर उन्होंने आरोप लगाया कि इस वित्तीय अव्यवस्था का असर आम जनता, कर्मचारियों और पेंशनभोगियों पर पड़ रहा है। पेंशन भुगतान में देरी और कर्मचारियों के वेतन में विलंब जैसी समस्याएं इसी का परिणाम हैं। बीजेपी ने सरकार पर दोहरे रवैये का आरोप लगाते हुए कहा कि राज्य को मजबूत वित्तीय प्रबंधन और स्पष्ट नीति की जरूरत है।
रांची। वित्तीय वर्ष 2025-26 समाप्त होने के साथ ही झारखंड सरकार के खर्च और राजस्व संग्रह को लेकर कई अहम बातें सामने आई हैं। जानकारी के अनुसार, राज्य सरकार अपने कुल बजट का केवल 80 फीसदी ही खर्च कर पाई, जबकि लगभग 29 हजार करोड़ रुपये सरेंडर करने पड़े। वित्तीय वर्ष के अंतिम दिन सरकारी खजाने से करीब 3,616 करोड़ रुपये निकाले गए, जबकि पूरे मार्च महीने में लगभग 19 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए। खर्च में कमी, केंद्र पर जिम्मेदारी वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि योजना मद की लगभग 80 प्रतिशत राशि खर्च की गई है। उनका दावा है कि यदि केंद्र सरकार से समय पर सहयोग मिलता, तो सरकार बजट के अनुरूप और बेहतर खर्च कर सकती थी। उन्होंने बताया कि राज्य को करीब 13,000 करोड़ रुपये अनुदान और टैक्स हिस्सेदारी के रूप में नहीं मिले, जिससे योजनाओं के क्रियान्वयन पर असर पड़ा। बीजेपी ने सरकार को घेरा बजट के अनुरूप खर्च नहीं होने पर विपक्षी दल भाजपा ने सरकार पर निशाना साधा है। भाजपा प्रवक्ता प्रदीप सिन्हा ने कहा कि राज्य सरकार भारी-भरकम बजट बनाकर जनता को भ्रमित करती है, लेकिन जमीन पर खर्च और विकास कार्यों में गंभीर कमी दिखती है। उनका आरोप है कि केंद्र से मिली राशि भी राज्य सरकार पूरी तरह खर्च नहीं कर पा रही है। कुछ विभागों ने किया बेहतर प्रदर्शन हालांकि, राजस्व वसूली के मामले में कुछ विभागों ने अच्छा प्रदर्शन किया। खान विभाग ने रिकॉर्ड 18,508 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया, जिसमें 7,454.30 करोड़ रुपये सेस और 11,054.27 करोड़ रुपये रॉयल्टी से प्राप्त हुए। उत्पाद विभाग ने शराब से 4,020 करोड़ रुपये कमाए, जो लक्ष्य से 135 करोड़ अधिक है। वहीं, परिवहन विभाग ने 2,196.66 करोड़ रुपये की वसूली की। बड़ा बजट, अधूरा खर्च राज्य सरकार ने 2025-26 के लिए 1.45 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया था। इसमें महिला एवं बाल विकास और मैया सम्मान योजना पर सबसे अधिक आवंटन किया गया था, लेकिन खर्च में कमी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के दौरान बुधवार को राज्य के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी साइकिल चलाकर विधानसभा पहुंचे। मंत्री के इस अंदाज ने राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ आम लोगों का भी ध्यान खींचा। विधानसभा परिसर पहुंचने के बाद उन्होंने कहा कि साइकिल से आने का उद्देश्य सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना भी है। फिटनेस के लिए साइकिलिंग को बताया बेहतर विकल्प स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अपनी सेहत को नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे में साइकिल चलाना एक आसान और प्रभावी व्यायाम हो सकता है। उन्होंने कहा कि पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच साइकिल एक सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल साधन भी है। नियमित रूप से साइकिल चलाने से शरीर फिट रहता है और कई बीमारियों का खतरा भी कम हो जाता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने दैनिक जीवन में साइकिलिंग को शामिल करें। स्वास्थ्य बजट पर सकारात्मक चर्चा की उम्मीद इरफान अंसारी ने बताया कि बुधवार को विधानसभा में स्वास्थ्य विभाग के बजट पर भी चर्चा प्रस्तावित है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सदन में इस विषय पर सकारात्मक और सार्थक बहस होगी। मंत्री ने कहा कि सरकार का लक्ष्य राज्य के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है और बजट में कई ऐसे प्रस्ताव लाए जाएंगे जो स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने में मदद करेंगे। महंगाई को लेकर जताई चिंता इस दौरान मंत्री ने देश में बढ़ती महंगाई का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि एलपीजी गैस सहित कई जरूरी वस्तुओं की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जिससे आम लोगों, खासकर महिलाओं को काफी परेशानी हो रही है। उनके अनुसार महंगाई का असर सीधे तौर पर आम परिवारों के बजट पर पड़ रहा है। रामनवमी के मुद्दे पर भाजपा पर हमला रामनवमी जुलूस में डीजे बजाने को लेकर चल रहे विवाद पर भी स्वास्थ्य मंत्री ने भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर भाजपा का धरना और विरोध केवल राजनीतिक नाटक है। मंत्री ने कहा कि भारत सभी धर्मों और समुदायों का देश है और समाज में आपसी भाईचारा तथा सौहार्द बनाए रखना सबसे जरूरी है। उन्होंने लोगों से अपील की कि धार्मिक आयोजनों को राजनीति से दूर रखते हुए शांति और सद्भाव के साथ मनाया जाए।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।