Donald Trump 2028 Strategy: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नजर अब केवल आगामी मिडटर्म चुनावों पर नहीं, बल्कि 2028 के राष्ट्रपति चुनाव पर भी है। रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के भविष्य और अगले राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के चयन में निर्णायक भूमिका निभाना चाहते हैं। उनका लक्ष्य पार्टी पर अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखना और अपनी विरासत को आगे बढ़ाना है। 2028 के लिए अभी से रणनीति तैयार समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, ट्रंप की प्राथमिकता रिपब्लिकन पार्टी के अगले राष्ट्रपति उम्मीदवार के चयन में प्रभावी भूमिका निभाना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वह अपनी राजनीतिक विरासत को किसी अन्य नेता के हाथों आसानी से छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं और पार्टी की भविष्य की दिशा तय करने में सक्रिय रहना चाहते हैं। मिडटर्म चुनाव भी अहम ट्रंप चाहते हैं कि रिपब्लिकन पार्टी प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) और सीनेट दोनों में मजबूत प्रदर्शन करे। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि यदि डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस में बढ़त हासिल करती है, तो ट्रंप प्रशासन को अधिक राजनीतिक और संसदीय चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। जांच और टकराव की संभावना रिपोर्ट के अनुसार, यदि डेमोक्रेट्स कांग्रेस पर नियंत्रण हासिल करते हैं, तो ट्रंप के परिवार, कारोबारी गतिविधियों और प्रशासनिक फैसलों की जांच तेज हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे हालात में व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच संवैधानिक टकराव की स्थिति भी बन सकती है। पार्टी पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश अगर रिपब्लिकन पार्टी सीनेट में बहुमत बनाए रखती है और प्रतिनिधि सभा में भी बेहतर प्रदर्शन करती है, तो ट्रंप समर्थक नेताओं का प्रभाव और बढ़ सकता है। इससे पार्टी के भीतर ट्रंप की स्थिति और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है। वेंस और रुबियो पर नजर रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप भविष्य में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो जैसे नेताओं को पार्टी के प्रमुख चेहरों के रूप में आगे बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। माना जा रहा है कि 2028 के संभावित रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए ट्रंप का समर्थन बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। 2028 की तैयारी अभी से राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की रणनीति केवल वर्तमान कार्यकाल तक सीमित नहीं है। उनका फोकस रिपब्लिकन पार्टी के भविष्य, नेतृत्व और 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में अपनी निर्णायक भूमिका सुनिश्चित करने पर है। फिलहाल, यह रिपोर्ट राजनीतिक विश्लेषणों और सलाहकारों के हवाले से सामने आई है, जबकि ट्रंप की ओर से इस रणनीति पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
वॉशिंगटन: अमेरिका के वरिष्ठ रिपब्लिकन सीनेटर और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी सहयोगी लिंडसे ग्राहम का 71 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके कार्यालय के अनुसार, शनिवार शाम एक संक्षिप्त और अचानक आई बीमारी के बाद उनका निधन हुआ। बाद में शुरुआती मेडिकल जांच में मौत का कारण महाधमनी (एओर्टिक) डिसेक्शन बताया गया। ग्राहम के निधन के बाद अमेरिका और इजरायल के नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी, जबकि ईरान से जुड़े कुछ सरकारी मीडिया संस्थानों, सोशल मीडिया खातों और समर्थकों ने उनके निधन पर खुशी जाहिर की। ट्रंप और नेतन्याहू ने दी श्रद्धांजलि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लिंडसे ग्राहम को "महान सीनेटर" और "सच्चा देशभक्त" बताते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि इजरायल ने अपना एक मजबूत मित्र खो दिया है। ईरान से जुड़े मीडिया प्लेटफॉर्म पर अलग प्रतिक्रिया ईरान से जुड़े कुछ समाचार प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया खातों ने ग्राहम के निधन पर जश्न जैसा रुख अपनाया। कुछ पोस्टों में उनके खिलाफ तीखी टिप्पणियां की गईं और उनके लंबे समय से ईरान विरोधी रुख का उल्लेख किया गया। सोशल मीडिया पर कुछ ईरान समर्थक खातों ने ग्राहम की तस्वीर वाला एक ग्राफिक भी साझा किया, जिसमें लाल "X" का निशान लगाया गया था। इन पोस्टों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। निर्वासित युवराज रजा पहलवी ने जताया दुख ईरान के निर्वासित युवराज रजा पहलवी ने ग्राहम के निधन पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ग्राहम ईरानी जनता की स्वतंत्रता के समर्थक थे और लोकतंत्र समर्थक ईरानियों के बीच उनका सम्मान था। ईरान सरकार के मुखर आलोचक थे ग्राहम लिंडसे ग्राहम लंबे समय से ईरान की मौजूदा सरकार के आलोचक रहे थे। वे ईरान के खिलाफ कड़े अमेरिकी रुख के समर्थक माने जाते थे और कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरानी विपक्ष तथा लोकतांत्रिक बदलाव के समर्थन में बयान दे चुके थे। लंबे राजनीतिक करियर का हुआ अंत दक्षिण कैरोलिना से रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम 2002 से अमेरिकी सीनेट के सदस्य थे। इससे पहले वे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के सदस्य भी रह चुके थे। विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा मामलों में उनकी सक्रिय भूमिका के कारण वे रिपब्लिकन पार्टी के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे। उनके निधन से अमेरिकी राजनीति में एक महत्वपूर्ण आवाज का अंत माना जा रहा है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान नीति के मोर्चे पर बड़ी राजनीतिक जीत मिली है। अमेरिकी सीनेट ने उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रपति की ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने की शक्तियों पर कांग्रेस का नियंत्रण बढ़ाना था। मतदान के दौरान दो रिपब्लिकन सीनेटरों के अंतिम समय में रुख बदलने से ट्रंप प्रशासन को राहत मिल गई। प्रस्ताव के रुकने के बाद ट्रंप ने इसे ईरान के लिए "कड़ा संदेश" बताया और अपने सहयोगी सांसदों का धन्यवाद किया। ट्रंप ने जताई खुशी, बोले- ईरान के लिए चेतावनी सीनेट में मतदान के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, "वाह! सीनेट ने ईरान पर अपना वोट बदल दिया। रैंड पॉल और बिल कैसिडी ने अपना रुख बदला। नेता जॉन थ्यून, लिंडसे ग्राहम, बर्नी मोरेनो और सभी का धन्यवाद। यह वोट ईरान के लिए एक चेतावनी है।" ट्रंप का कहना है कि राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव अमेरिका की कूटनीतिक और रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता था। राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों पर लगाम लगाने की कोशिश नाकाम सीनेट में पेश किए गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान से पहले कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी आवश्यक हो। सीनेट ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और इस तरह राष्ट्रपति की मौजूदा युद्ध शक्तियों को सीमित करने की कोशिश फिलहाल विफल हो गई। दो रिपब्लिकन सांसदों ने बदला फैसला इस मतदान का सबसे बड़ा मोड़ दो रिपब्लिकन सांसदों के रुख बदलने से आया। सीनेटर रैंड पॉल ने इस बार 'प्रेजेंट' वोट किया, यानी उन्होंने पक्ष या विपक्ष में मतदान नहीं किया। सीनेटर बिल कैसिडी ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के खिलाफ मतदान किया। अंतिम मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका और परिणाम 47-50-1 रहा। रैंड पॉल बोले- शांति वार्ता के लिए दिया राष्ट्रपति को मौका मतदान से पहले रैंड पॉल ने सोशल मीडिया पर कहा कि उनकी युद्ध शक्तियों को लेकर राय नहीं बदली है। उन्होंने लिखा कि उनका 'प्रेजेंट' वोट राष्ट्रपति को स्थायी शांति के लिए बातचीत करने की अधिक गुंजाइश देने के उद्देश्य से है। बिल कैसिडी ने पहले उठाए सवाल, फिर बदला रुख सीनेटर बिल कैसिडी ने पहले ट्रंप प्रशासन से ईरान संघर्ष को लेकर कई सवाल पूछे थे। उनका कहना था कि सांसदों और जनता को युद्ध की वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए। बाद में उन्होंने बताया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने उन्हें विस्तृत जानकारी दी, जिससे उनकी कई चिंताएं दूर हो गईं। इसके बाद उन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। कुछ रिपब्लिकन ने किया समर्थन, डेमोक्रेट में भी दिखी अलग राय रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स और लिसा मुर्कोव्स्की ने राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को सीमित करने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं डेमोक्रेटिक सीनेटर जॉन फेटरमैन ने प्रस्ताव का विरोध किया। इससे साफ हुआ कि ईरान नीति को लेकर मतभेद केवल पार्टी लाइनों तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्रपति की शक्तियों पर बहस जारी अमेरिका में राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों का तर्क है कि यदि कोई फैसला अमेरिका को बड़े सैन्य संघर्ष की ओर ले जा सकता है, तो उसमें कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी अनिवार्य होनी चाहिए। वहीं ट्रंप समर्थकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के समय राष्ट्रपति के पास त्वरित निर्णय लेने की पर्याप्त संवैधानिक शक्तियां बनी रहनी चाहिए। ईरान को लेकर जारी तनाव के बीच सीनेट का यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक जीत माना जा रहा है, जबकि राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में बहस आगे भी जारी रहने के संकेत हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। अमेरिकी संसद के दोनों सदनों ने एक ऐसे प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसमें ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को सीमित करने और राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों पर नियंत्रण लगाने की मांग की गई है। खास बात यह रही कि ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के कई सांसदों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। सीनेट में 50-48 वोट से पारित हुआ प्रस्ताव अमेरिकी सीनेट में युद्ध शक्तियों (War Powers) से जुड़े इस प्रस्ताव के पक्ष में 50 वोट पड़े, जबकि 48 सांसदों ने इसका विरोध किया। मतदान के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के चार सीनेटरों ने पार्टी लाइन से हटकर प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया। वहीं, दो रिपब्लिकन सांसद मतदान के समय अनुपस्थित रहे। यह प्रस्ताव राष्ट्रपति को कांग्रेस की मंजूरी के बिना किसी बड़े सैन्य संघर्ष को आगे बढ़ाने से रोकने की मंशा से लाया गया है। प्रस्ताव के पारित होने को ट्रंप प्रशासन की विदेश और सुरक्षा नीति के लिए एक राजनीतिक चुनौती माना जा रहा है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी मिला समर्थन इससे पहले अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी यह प्रस्ताव पारित हो चुका है। वहां इसके समर्थन में 215 वोट पड़े, जबकि विरोध में 208 सांसदों ने मतदान किया। हाउस में भी चार रिपब्लिकन सांसदों ने डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर प्रस्ताव का समर्थन किया था। ट्रंप की पार्टी में बढ़ी असहमति रिपब्लिकन पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद खुलकर सामने आए हैं। कई सांसदों का मानना है कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना राष्ट्रपति को व्यापक सैन्य कार्रवाई का अधिकार नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर ट्रंप समर्थक नेताओं का कहना है कि राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में त्वरित निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। क्या ट्रंप पर पड़ेगा कोई असर? हालांकि यह प्रस्ताव राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इसका तत्काल कानूनी प्रभाव सीमित है। यह एक ‘कॉनकरेंट रिजॉल्यूशन’ है, जिसे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं होती और यह सीधे कानून का रूप भी नहीं लेता। व्हाइट हाउस ने प्रस्ताव को प्रतीकात्मक बताते हुए कहा है कि इसका प्रशासन की सैन्य नीति पर कोई बाध्यकारी प्रभाव नहीं पड़ेगा। प्रशासन का तर्क है कि राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों को इस तरह के प्रस्तावों से सीमित नहीं किया जा सकता। अदालत तक पहुंच सकता है मामला संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति और कांग्रेस की युद्ध संबंधी शक्तियों को लेकर लंबे समय से विवाद बना हुआ है। ऐसे में यदि इस प्रस्ताव को लेकर टकराव बढ़ता है तो मामला अदालतों तक पहुंच सकता है। व्हाइट हाउस पहले ही इस तरह के प्रस्तावों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठा चुका है। ईरान के साथ जारी है कूटनीतिक बातचीत यह राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर बातचीत जारी है। दोनों देशों के बीच हाल के हफ्तों में कई दौर की वार्ताएं हुई हैं और कूटनीतिक प्रयास तेज हुए हैं। ऐसे में अमेरिकी संसद का यह संदेश संकेत देता है कि कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग मध्य पूर्व में किसी नए सैन्य संघर्ष से बचने के पक्ष में है। अमेरिकी राजनीति में बढ़ी हलचल विश्लेषकों का मानना है कि प्रस्ताव के पक्ष में रिपब्लिकन सांसदों का मतदान ट्रंप के लिए केवल राजनीतिक झटका नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति का संकेत भी है। आने वाले दिनों में ईरान नीति और सैन्य शक्तियों के मुद्दे पर अमेरिका की राजनीति में बहस और तेज होने की संभावना है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।