रांची: राजेंद्र आर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार की दिशा में बड़ा फैसला लिया गया है। संस्थान में एमबीबीएस की सीटें 180 से बढ़ाकर 250 और पीजी की सीटें 176 से बढ़ाकर 275 कर दी गयी हैं। इस तरह एमबीबीएस में 70 और पीजी में 99 सीटों की बढ़ोतरी हुई है। मेडिकल छात्रों की बढ़ती संख्या और मरीजों के बढ़ते दबाव को देखते हुए अब रिम्स के पुराने भवनों और अन्य आधारभूत सुविधाओं का भी विस्तार किया जायेगा। इसको लेकर बुधवार को स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह की अध्यक्षता में बैठक हुई। बैठक में रिम्स के पुराने आईपीडी, ओपीडी और एकेडमिक ब्लॉक के जीर्णोद्धार और विस्तार पर विस्तार से चर्चा हुई। इसके अलावा नॉर्थ और साउथ कैंपस में स्थित हॉस्टल और क्वार्टरों के जीर्णोद्धार का भी निर्णय लिया गया। इन सभी कार्यों के लिए सेंट्रल स्पॉन्सर्ड स्कीम के तहत करीब 380 करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार करने पर सहमति बनी है। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि बढ़ती छात्र संख्या और मरीजों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आधारभूत संरचना को मजबूत करने की दिशा में तेजी से काम किया जाए। पोस्ट-पीजी की सीटें 11 से बढ़ाकर 100 करने की तैयारी रिम्स में पोस्ट-पीजी मेडिकल शिक्षा के विस्तार की भी तैयारी है। बैठक में पोस्ट-पीजी सीटों की संख्या 11 से बढ़ाकर 100 करने के लिए डीपीआर तैयार करने पर सहमति बनी। इसके लिए जरूरी आधारभूत सुविधाओं और संसाधनों का भी आकलन किया जायेगा। वहीं, एमबीबीएस सीटों में बढ़ोतरी के प्रस्ताव को लेकर नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) से सैद्धांतिक सहमति मिलने की जानकारी बैठक में दी गयी। सीटों में वृद्धि के बाद रिम्स में मेडिकल शिक्षा के लिए अधिक छात्रों को अवसर मिलेगा। पीजी हॉस्टल और स्टेडियम का भी होगा विकास रिम्स में पीजी और पोस्ट-पीजी छात्रों के लिए हॉस्टल सुविधाओं को बेहतर करने की योजना है। इसके साथ ही स्टेडियम कॉम्प्लेक्स के विकास का प्रस्ताव भी तैयार किया जायेगा। इन परियोजनाओं को पीपीपी मोड पर विकसित करने की योजना है। इन कार्यों पर करीब 450 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। अधिकारियों ने रिम्स की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हॉस्टल, खेल सुविधाओं और अन्य आधारभूत संरचनाओं के विस्तार की कार्ययोजना तैयार करने पर जोर दिया। मरीजों के एडमिशन और डिस्चार्ज की व्यवस्था होगी व्यवस्थित बैठक में रिम्स में मरीजों के एडमिशन और डिस्चार्ज की व्यवस्था को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिये गये। अपर मुख्य सचिव ने कहा कि ऐसे मरीज जिन्हें अस्पताल में भर्ती रखकर उपचार या निगरानी की आवश्यकता नहीं है, उन्हें अनावश्यक रूप से लंबे समय तक वार्ड में नहीं रखा जाना चाहिए। इसके लिए डिस्चार्ज के स्पष्ट मानदंड और एसओपी तैयार करने का निर्देश दिया गया। इसका उद्देश्य अस्पताल में बेड की उपलब्धता बढ़ाना और गंभीर मरीजों को समय पर उपचार की सुविधा उपलब्ध कराना है। बिना रेफरल आने वाले मरीजों की भर्ती व्यवस्था को भी बेहतर तरीके से नियंत्रित करने पर जोर दिया गया। 2014 की नियमावली में होगा बदलाव बैठक में रिम्स की वर्ष 2014 में लागू नियमावली की भी समीक्षा की गयी। अधिकारियों को इसे वर्तमान जरूरतों और संस्थान के बदलते स्वरूप के अनुसार पुनर्गठित करने का निर्देश दिया गया। इसके अलावा रिम्स में चिकित्सकों समेत सभी स्वीकृत और कार्यरत पदों की समीक्षा करने को कहा गया है। संस्थान में बढ़ते काम और मरीजों की संख्या के अनुरूप पद संरचना को भी दोबारा व्यवस्थित किया जायेगा। बैठक में अपर सचिव शशि प्रकाश सिंह, रिम्स के कार्यकारी निदेशक डॉ डीके सिन्हा, सहायक निदेशक बाघमारे प्रसाद कृष्ण समेत स्वास्थ्य विभाग और रिम्स के कई अधिकारी मौजूद रहे।
रांची के राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) में विभागाध्यक्षों के रोटेशन की प्रक्रिया पर रोक लगाए जाने के बाद विवाद बढ़ गया है। संस्थान के करीब 60 डॉक्टरों ने इस फैसले का विरोध करते हुए स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य सचिव को पत्र भेजा है। डॉक्टरों ने रोटेशन व्यवस्था को लागू करने की मांग करते हुए एनएमसी की गाइडलाइन, रिम्स शासी परिषद के पुराने फैसले और हाईकोर्ट के निर्देशों का हवाला दिया है। रिम्स शासी परिषद की 52वीं बैठक में वर्ष 2021 में विभागाध्यक्षों के रोटेशन का फैसला लिया गया था। इसके तहत प्रत्येक तीन वर्ष में विभागाध्यक्ष की जिम्मेदारी बदलने की व्यवस्था लागू की गयी थी। इसी आधार पर वर्ष 2021 से अलग-अलग विभागों में रोटेशन के तहत विभागाध्यक्षों की नियुक्ति की जा रही थी। प्रोफेसरों की बारी आते ही प्रक्रिया पर लगी रोक डॉक्टरों का आरोप है कि अब जब रोटेशन के तहत अन्य प्रोफेसरों को विभागाध्यक्ष बनने का अवसर मिलना था, तभी इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी गयी। इससे कई डॉक्टरों में नाराजगी है। करीब 60 डॉक्टरों ने स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी और स्वास्थ्य सचिव डॉ. अजय कुमार सिंह को पत्र भेजकर मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। डॉक्टरों ने अपने पत्र में कहा है कि एनएमसी की गाइडलाइन में विभागाध्यक्ष के पद पर रोटेशन व्यवस्था का प्रावधान है। साथ ही रिम्स की शासी परिषद भी पहले इस संबंध में निर्णय ले चुकी है। ऐसे में अचानक रोटेशन रोकने के फैसले पर उन्होंने सवाल उठाया है। 65वीं जीबी बैठक के बाद लिया गया फैसला सूत्रों के अनुसार, हाल में हुई रिम्स शासी परिषद की 65वीं बैठक में विभागाध्यक्षों के रोटेशन पर रोक लगाने का फैसला लिया गया। इसके बाद रोटेशन के तहत विभागाध्यक्षों की नयी अधिसूचना जारी नहीं करने का निर्देश रिम्स प्रबंधन को दिया गया है। बताया जा रहा है कि कुछ सीनियर डॉक्टरों ने रोटेशन व्यवस्था को लेकर आपत्ति जतायी थी। उनका कहना था कि वे अपने से जूनियर डॉक्टर के अधीन काम करने में असहज महसूस करेंगे। इसके बाद मामले ने तूल पकड़ा और रोटेशन प्रक्रिया पर रोक लगा दी गयी। हाईकोर्ट के निर्देश का भी दिया हवाला डॉक्टरों ने अपने पत्र में वर्ष 2022 में हाईकोर्ट की ओर से रोटेशन प्रक्रिया को लेकर दिये गये निर्देश का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है कि जब एनएमसी की गाइडलाइन और रिम्स जीबी का फैसला पहले से मौजूद है, तो रोटेशन व्यवस्था को बीच में रोकना उचित नहीं है। अब 60 डॉक्टरों के पत्र के बाद रिम्स में विभागाध्यक्षों के रोटेशन को लेकर फैसला अहम हो गया है। डॉक्टरों ने जल्द से जल्द प्रक्रिया बहाल करने और पूर्व निर्धारित नियमों के अनुसार विभागाध्यक्षों की नियुक्ति करने की मांग की है।
रांची। झारखंड में गर्भवती महिलाओं और गर्भस्थ शिशुओं में आनुवंशिक बीमारियों की पहचान को लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हुआ है। राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS), रांची में मेडिकल जेनेटिक काउंसलिंग और प्रीनेटल जेनेटिक जांच से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध हैं। इसके जरिए विशेषज्ञ चिकित्सकीय सलाह के आधार पर गर्भावस्था के दौरान कुछ आनुवंशिक और क्रोमोसोम संबंधी समस्याओं का आकलन किया जा सकता है। RIMS रांची में मेडिकल जेनेटिक काउंसलिंग की सुविधा RIMS के उपलब्ध रिकॉर्ड में मेडिकल जेनेटिक काउंसलिंग के लिए अलग क्लिनिक का उल्लेख है। यहां आनुवंशिक बीमारी के जोखिम, पारिवारिक इतिहास और जांच से जुड़े मामलों में विशेषज्ञ परामर्श दिया जाता है। गर्भावस्था के दौरान आनुवंशिक समस्याओं की पहचान प्रीनेटल जेनेटिक जांच का उद्देश्य गर्भस्थ शिशु में संभावित आनुवंशिक या क्रोमोसोम संबंधी असामान्यताओं की पहचान करना है। ऐसे परीक्षणों में जरूरत के अनुसार अलग-अलग जांच तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। जांच का चयन गर्भवती महिला की स्थिति और डॉक्टर की सलाह के आधार पर किया जाता है। रांची में पहले से चल रहा आनुवंशिक स्क्रीनिंग कार्यक्रम RIMS रांची पहले भी गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं में आनुवंशिक बीमारियों की स्क्रीनिंग से जुड़े ‘उम्मीद’ कार्यक्रम का हिस्सा रहा है। इस पहल के तहत गर्भवती महिलाओं में थैलेसीमिया और अन्य हीमोग्लोबिन संबंधी विकारों की स्क्रीनिंग पर काम किया गया था। समय पर जांच से बेहतर चिकित्सा प्रबंधन आनुवंशिक बीमारी का जोखिम समय रहते सामने आने पर डॉक्टर परिवार को उचित जेनेटिक काउंसलिंग और आगे की जांच के बारे में जानकारी दे सकते हैं। इससे गर्भावस्था और प्रसव के दौरान आवश्यक चिकित्सा व्यवस्था की बेहतर तैयारी में मदद मिल सकती है। हालांकि, प्रीनेटल जेनेटिक जांच हर गर्भवती महिला के लिए अनिवार्य नहीं होती। किसी भी जांच को डॉक्टर की सलाह और उचित जेनेटिक काउंसलिंग के बाद ही कराया जाना चाहिए।
रांची। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) से जुड़े विवाद और कथित अनियमितताओं के बीच राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन (RJDA) ने निष्पक्ष और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली की मांग का समर्थन किया है। एसोसिएशन ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे शांतिपूर्ण आंदोलन के प्रति एकजुटता जताई और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की मांग RJDA ने कहा कि मेडिकल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में प्रवेश पूरी तरह मेरिट आधारित, निष्पक्ष और विश्वसनीय होना चाहिए। संगठन के अनुसार, परीक्षा प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की अनियमितता न केवल लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य को प्रभावित करती है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की गुणवत्ता पर भी असर डाल सकती है। बल प्रयोग की निंदा, निष्पक्ष जांच की मांग एसोसिएशन ने 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और डॉक्टरों पर हुए कथित पुलिस बल प्रयोग की निंदा की। संगठन ने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने वाले छात्रों और चिकित्सा समुदाय के सदस्यों के साथ हिंसा स्वीकार्य नहीं है। साथ ही घायल लोगों के समुचित इलाज और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की गई। सरकार से संवाद और कार्रवाई की अपील RJDA ने सरकार और संबंधित एजेंसियों से प्रदर्शनकारियों के साथ सार्थक संवाद स्थापित करने तथा NEET से जुड़े आरोपों की समयबद्ध और निष्पक्ष जांच कराने की अपील की। संगठन का कहना है कि परीक्षा प्रणाली में भरोसा बनाए रखने के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। न्याय और शैक्षणिक ईमानदारी के प्रति प्रतिबद्धता अपने बयान में एसोसिएशन ने न्याय, शैक्षणिक ईमानदारी और मेडिकल समुदाय की गरिमा व सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। साथ ही सभी पक्षों से शांति बनाए रखने और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का सम्मान करने की अपील की।
रांची। राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) की शासी परिषद की बैठक मंगलवार को स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी की अध्यक्षता में आयोजित हुई। बैठक में रिम्स को अत्याधुनिक, मरीज-केंद्रित और विश्वस्तरीय चिकित्सा संस्थान बनाने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण फैसलों पर मुहर लगी। बैठक में कुल 19 एजेंडों और 5 अतिरिक्त विषयों पर चर्चा की गई। 200 नए वेंटिलेटर और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं को मंजूरी बैठक में रिम्स के लिए 200 अत्याधुनिक वेंटिलेटर खरीदने, रोबोटिक सर्जरी की शुरुआत और मेडिकल शिक्षा को आधुनिक बनाने के लिए स्मार्ट क्लासरूम स्थापित करने को मंजूरी दी गई। इसके अलावा अस्पताल की जरूरत के अनुसार आवश्यक चिकित्सा उपकरणों और मशीनों की शीघ्र खरीद सुनिश्चित करने तथा लंबित खरीद आदेश तत्काल जारी करने के निर्देश दिए गए। इंफ्रास्ट्रक्चर होगा और आधुनिक शासी परिषद ने रिम्स के सभी यूजी और पीजी छात्रावासों को पीपीपी मॉडल पर संचालित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने, पूरे परिसर के शौचालयों को एयरपोर्ट की तर्ज पर आधुनिक बनाने और मुख्य प्रवेश द्वार को हाईटेक स्वरूप देने का निर्णय लिया। साथ ही ऑर्थोपेडिक वार्ड के पूर्ण पुनर्निर्माण और एमबीबीएस सीटें बढ़ने के अनुरूप नए भवन, छात्रावास और अन्य आधारभूत सुविधाओं के विस्तार के लिए तकनीकी आकलन कराने का निर्देश भी दिया गया। मरीजों के बेहतर इलाज पर विशेष जोर बैठक में मरीजों के समग्र उपचार के लिए रिहैबिलिटेशन सेंटर स्थापित करने, थैलेसीमिया मरीजों के लिए ब्लड बैंक को सशक्त बनाने, बच्चों में आनुवंशिक बीमारियों की शीघ्र पहचान के लिए जेनेटिक स्क्रीनिंग व्यवस्था को मजबूत करने और स्टेम सेल संरक्षण के लिए पीपीपी मॉडल पर निजी भागीदारी की संभावना पर विचार किया गया। वहीं ऑन्कोलॉजी विभाग के लिए रेडियोथेरेपी मशीन की खरीद प्रक्रिया तेज करने और अस्पताल प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए आवश्यकता अनुसार हॉस्पिटल मैनेजरों की नियुक्ति का भी निर्णय लिया गया। समयबद्ध क्रियान्वयन पर स्वास्थ्य मंत्री का जोर स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने कहा कि रिम्स में अब केवल योजनाएं नहीं बनेंगी, बल्कि उनका समयबद्ध क्रियान्वयन भी सुनिश्चित होगा। उन्होंने अधिकारियों को विकास कार्यों में किसी भी प्रकार की लापरवाही या अनावश्यक देरी नहीं होने देने के निर्देश देते हुए कहा कि सरकार का लक्ष्य रिम्स को आधुनिक तकनीक, बेहतर संसाधनों और उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाओं से लैस कर देश के अग्रणी चिकित्सा संस्थानों में शामिल करना है।
रांची। झारखंड के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थान राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में फेयरवेल पार्टी के दौरान अनुशासनहीनता का गंभीर मामला सामने आया है। वर्ष 2020 बैच के एमबीबीएस छात्रों के लिए आयोजित विदाई समारोह में देर रात कथित तौर पर शराब और बीयर पार्टी हुई तथा कुछ छात्रों ने नशे की हालत में जमकर हुड़दंग मचाया। घटना के दौरान ऑडिटोरियम में सुरक्षा के लिए लगाए गए फायर एक्सटिंग्विशर (अग्निशमन यंत्र) को उतारकर उसकी पूरी गैस हवा में छोड़ दी गई, जिससे संस्थान की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। सुबह ऑडिटोरियम में बिखरी मिलीं शराब और बीयर की बोतलें घटना का खुलासा मंगलवार सुबह उस समय हुआ, जब ऑडिटोरियम की सुरक्षा में तैनात एसएपी (SAP) के जवान ड्यूटी पर पहुंचे। उन्होंने परिसर में शराब और बीयर की खाली बोतलें बिखरी हुई देखीं। साथ ही, सुरक्षा के लिए लगाया गया फायर एक्सटिंग्विशर पूरी तरह खाली मिला। बताया गया कि यह विदाई समारोह वर्ष 2023 बैच के छात्रों द्वारा आयोजित किया गया था। कार्यक्रम से पहले छात्रों ने रिम्स प्रशासन को लिखित और मौखिक रूप से शांतिपूर्ण एवं अनुशासित आयोजन का आश्वासन दिया था, जिसके बाद उन्हें ऑडिटोरियम उपलब्ध कराया गया था। रिम्स प्रशासन ने कहा- यह अनुशासन का गंभीर उल्लंघन मामले को गंभीरता से लेते हुए रिम्स के जनसंपर्क पदाधिकारी (पीआरओ) डॉ. शिशिर कुमार ने कहा कि संस्थान जैसे प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में इस तरह की घटना पूरी तरह अस्वीकार्य है। उन्होंने इसे "अनुशासन का घोर उल्लंघन" बताते हुए कहा कि घटना में शामिल छात्रों की पहचान की जा रही है और उनके खिलाफ संस्थान के नियमों के तहत सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। सुरक्षा व्यवस्था पर भी उठे सवाल फायर एक्सटिंग्विशर की गैस निकाल दिए जाने से सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि आपात स्थिति में यही उपकरण आग पर तत्काल काबू पाने का पहला साधन होता है। ऐसे में इसके साथ छेड़छाड़ न केवल अनुशासनहीनता बल्कि गंभीर लापरवाही भी मानी जाती है। घटना के बाद रिम्स प्रशासन ने भविष्य में ऐसे आयोजनों की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को और सख्त करने के संकेत दिए हैं।
रांची। राजधानी रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में चूहों का बढ़ता आतंक अस्पताल प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। हालात ऐसे हैं कि चूहे अस्पताल के कंट्रोल रूम, निदेशक कार्यालय, रेडियोलॉजी, ऑन्कोलॉजी विभाग, केंद्रीय किचन, स्टोर रूम और बीएसएनएल टेलीफोन नेटवर्क तक में नुकसान पहुंचा रहे हैं। कई विभागों में टेलीफोन के तार कुतर दिए गए हैं, जबकि मरीजों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली सिरिंज, ग्लव्स और अन्य चिकित्सा सामग्री भी क्षतिग्रस्त हो रही है। लगातार बढ़ती समस्या को देखते हुए रिम्स प्रबंधन ने करीब डेढ़ वर्ष बाद फिर से पेस्ट कंट्रोल कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। ऑन्कोलॉजी विभाग में दवाएं और मेडिकल सामग्री हुई खराब हाल ही में ऑन्कोलॉजी विभाग के चौथे तल स्थित स्टोर रूम की जांच के दौरान कई कार्टन चूहों द्वारा कुतरे हुए मिले। इनमें सिरिंज, ग्लव्स और अन्य जरूरी चिकित्सा सामग्री शामिल थी। विभाग की सिस्टर इंचार्ज के अनुसार, खराब हो चुकी सामग्री हटाकर दोबारा नई सामग्री मंगानी पड़ी। उन्होंने बताया कि स्टोर रूम में चूहों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन वैकल्पिक भंडारण की व्यवस्था नहीं होने से महंगी दवाओं और उपकरणों को सुरक्षित रखना मुश्किल हो गया है। ऐसी स्थिति अन्य विभागों के स्टोर रूम में भी देखने को मिल रही है। संचार व्यवस्था और किचन भी चूहों के निशाने पर चूहों ने अस्पताल की संचार व्यवस्था को भी प्रभावित किया है। कंट्रोल रूम और बीएसएनएल नेटवर्क बॉक्स में केबल तथा टेलीफोन तार कुतरने से कई फोन लाइनें बंद हो गई हैं। इससे विभिन्न विभागों के बीच समन्वय में परेशानी हो रही है और बार-बार मरम्मत पर अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ रहा है। वहीं केंद्रीय किचन में रखे राशन और खाद्य सामग्री को भी चूहे लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। निदेशक कार्यालय में भी फाइलों और अन्य सामान को नुकसान पहुंचने की शिकायतें सामने आई हैं। दो साल से नहीं हुआ नियमित पेस्ट कंट्रोल अस्पताल अधिकारियों के अनुसार, पिछले करीब दो वर्षों से नियमित पेस्ट कंट्रोल नहीं होने के कारण चूहों की संख्या तेजी से बढ़ी है। पहले भी मरीजों को चूहों द्वारा काटे जाने की घटनाएं राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी थीं। अब रिम्स प्रबंधन ने सबसे अधिक प्रभावित विभागों में प्राथमिकता के आधार पर पेस्ट कंट्रोल कराने और बाद में पूरे अस्पताल परिसर में अभियान चलाने का निर्णय लिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पेस्ट कंट्रोल पर्याप्त नहीं होगा। वार्डों में भोजन करने पर सख्ती, कचरे का समय पर निस्तारण, स्टोर रूम की नियमित सफाई, खाद्य सामग्री का सुरक्षित भंडारण और पाइपलाइन व केबल डक्ट के छिद्रों को सील करने जैसे उपाय भी जरूरी हैं। इन कदमों से ही अस्पताल में मरीजों, कर्मचारियों और चिकित्सा उपकरणों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।
रांची। झारखंड के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल संस्थान राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स), रांची में एमबीबीएस की सीटों की संख्या 180 से बढ़ाकर 250 कर दी गई है। नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) ने रिम्स के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही चालू शैक्षणिक सत्र से संस्थान में 250 छात्रों का नामांकन किया जाएगा। सीटों में 70 की बढ़ोतरी को राज्य की चिकित्सा शिक्षा के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। झारखंड के छात्रों को मिलेगा बड़ा लाभ एमबीबीएस सीटों में वृद्धि से सबसे अधिक लाभ झारखंड के छात्रों को मिलेगा। अब तक राज्य के कई मेधावी विद्यार्थी सीटों की कमी के कारण दूसरे राज्यों के मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेने को मजबूर होते थे। नई व्यवस्था लागू होने के बाद हर वर्ष 70 अतिरिक्त छात्रों को राज्य में ही मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। इससे न केवल छात्रों का आर्थिक बोझ कम होगा, बल्कि राज्य में भविष्य के डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ेगी। सात साल की मेहनत के बाद मिली सफलता रिम्स में वर्ष 2019 से पहले एमबीबीएस की केवल 150 सीटें थीं। तत्कालीन निदेशक डॉ. डी.के. सिंह ने पहली बार सीटों की संख्या 250 करने का प्रस्ताव नेशनल मेडिकल कमीशन को भेजा था। हालांकि उस समय आयोग ने केवल 30 अतिरिक्त सीटों की अनुमति दी थी, जिससे कुल सीटें 180 हो गई थीं। इसके बाद रिम्स प्रशासन ने लगातार अस्पताल की आधारभूत संरचना, शिक्षकों की नियुक्ति, प्रयोगशालाओं, क्लासरूम, हॉस्टल और अन्य आवश्यक सुविधाओं का विस्तार किया। करीब सात वर्षों के लगातार प्रयास और संसाधनों के विकास के बाद अब प्रभारी निदेशक डॉ. डी.के. सिन्हा के कार्यकाल में एनएमसी ने 250 सीटों पर नामांकन की मंजूरी दे दी है। इस फैसले से राज्य में चिकित्सा शिक्षा को नई मजबूती मिलेगी और भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अधिक प्रशिक्षित डॉक्टर तैयार हो सकेंगे।
रांची। मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और गुणवत्तापूर्ण सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से रिम्स (राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान) के निदेशक प्रो. डॉ. डी. के. सिन्हा ने मंगलवार को सेंट्रल किचन और मेडिसिन विभाग का औचक निरीक्षण किया। इस दौरान चिकित्सा अधीक्षक प्रो. डॉ. हिरेन्द्र बिरुआ, उप चिकित्सा अधीक्षक सहित कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। निरीक्षण के दौरान अस्पताल की व्यवस्थाओं, भोजन की गुणवत्ता और विभागीय कार्यप्रणाली की गहन समीक्षा की गई। सेंट्रल किचन की सफाई पर जताई नाराजगी निरीक्षण के दौरान निदेशक ने भोजन तैयार करने की प्रक्रिया, खाद्य सामग्री के भंडारण, रसोईघर की स्वच्छता और भोजन वितरण व्यवस्था का जायजा लिया। किचन के कुछ हिस्सों में सफाई व्यवस्था संतोषजनक नहीं मिलने पर उन्होंने नाराजगी जताई और संबंधित अधिकारियों को तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए। साथ ही सभी रिकॉर्ड और व्यवस्थाओं को नियमित रूप से अपडेट रखने पर भी जोर दिया। मरीजों को मिले पौष्टिक और सुरक्षित भोजन डॉ. सिन्हा ने स्पष्ट किया कि अस्पताल में भर्ती प्रत्येक मरीज को निर्धारित मानकों के अनुरूप स्वच्छ, पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उन्होंने संबंधित एजेंसी और अधिकारियों को खाद्य सुरक्षा के सभी मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। साथ ही चेतावनी दी कि यदि भोजन की गुणवत्ता या स्वच्छता में किसी भी प्रकार की लापरवाही पाई गई तो संबंधित लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। मेडिसिन विभाग की कार्यप्रणाली की भी समीक्षा सेंट्रल किचन के निरीक्षण के बाद निदेशक ने मेडिसिन विभाग का भी दौरा किया। उन्होंने विभाग में उपलब्ध चिकित्सकीय सुविधाओं, संसाधनों और मरीजों के इलाज की व्यवस्था की समीक्षा की। विभागाध्यक्ष के अवकाश पर रहने के कारण उन्होंने मौजूद चिकित्सकों और अधिकारियों से मरीजों की संख्या, उपचार व्यवस्था और सामने आ रही चुनौतियों पर चर्चा की। बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं पर जोर निदेशक ने चिकित्सकों से मरीजों को समयबद्ध, संवेदनशील और गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराने की अपील की। उन्होंने कहा कि मेडिसिन विभाग किसी भी अस्पताल की रीढ़ होता है, इसलिए इसे संसाधनों से मजबूत बनाना आवश्यक है। रिम्स प्रबंधन ने भी भरोसा दिलाया कि निरीक्षण के दौरान सामने आई कमियों को जल्द दूर किया जाएगा, ताकि मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के साथ सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराया जा सके।
रांची। रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में इलाज के लिए आने वाले न्यूरो मरीजों के लिए अच्छी खबर है। मरीजों की लगातार बढ़ती संख्या और बेड की कमी को देखते हुए न्यूरोसर्जरी विभाग में 70 नए बेड जोड़ने का निर्णय लिया गया है। इस पहल से विभाग की क्षमता में बड़ा इजाफा होगा और मरीजों को समय पर भर्ती एवं बेहतर इलाज की सुविधा मिल सकेगी। हर दिन बड़ी संख्या में पहुंचते हैं मरीज रिम्स झारखंड का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल होने के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों के मरीजों के लिए भी प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र है। न्यूरोसर्जरी विभाग में प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। कई बार बेड उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीजों और उनके परिजनों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। गंभीर मरीजों को अस्थायी व्यवस्था के तहत इलाज कराना पड़ता था, जिससे परेशानी और बढ़ जाती थी। गंभीर बीमारियों के इलाज में होगी सुविधा न्यूरोसर्जरी विभाग में ब्रेन ट्यूमर, सिर की गंभीर चोट, रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याएं और अन्य जटिल न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का इलाज किया जाता है। नए बेड जुड़ने से मरीजों को जल्द भर्ती करने में मदद मिलेगी और इलाज में देरी की संभावना कम होगी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इससे गंभीर मरीजों को सबसे अधिक लाभ मिलेगा। स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की दिशा में कदम रिम्स प्रशासन पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार पर लगातार काम कर रहा है। विभिन्न विभागों में बेड बढ़ाने, नए आईसीयू शुरू करने और आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में कई योजनाएं लागू की जा रही हैं। न्यूरोसर्जरी विभाग में 70 अतिरिक्त बेड जोड़ना इसी प्रयास का हिस्सा है। मरीजों और परिजनों में बढ़ी उम्मीद नई व्यवस्था की जानकारी सामने आने के बाद मरीजों और उनके परिजनों में राहत की उम्मीद जगी है। लंबे समय से बेड की कमी से जूझ रहे लोगों का मानना है कि इस फैसले से अस्पताल में भर्ती प्रक्रिया आसान होगी और मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी। रिम्स की यह पहल राज्य के स्वास्थ्य ढांचे को और मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
रांची। झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स में कैंसर मरीजों के लिए जल्द ही PET स्कैन मशीन लगाने की तैयारी तेज हो गई है। लगभग छह महीने से चल रही टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब परियोजना को अमलीजामा पहनाने की दिशा में तेजी से काम किया जा रहा है। यह सुविधा पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर संचालित होगी। रिम्स प्रबंधन का मानना है कि इसके शुरू होने से राज्य के हजारों कैंसर मरीजों को राहत मिलेगी, जिन्हें अब तक जांच के लिए दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता था। रिम्स निदेशक डॉ. राजकुमार ने बताया कि PET स्कैन सुविधा शुरू होने के बाद आयुष्मान भारत योजना और बीपीएल श्रेणी के मरीजों को 25 हजार से 45 हजार रुपये तक की महंगी जांच नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएगी। वहीं सामान्य वर्ग के मरीजों के लिए यह जांच लगभग पांच हजार रुपये में कराने की योजना बनाई गई है। वर्तमान में निजी अस्पतालों में PET स्कैन की लागत काफी अधिक होने के कारण गरीब और मध्यम वर्गीय मरीजों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। क्या है PET स्कैन और क्यों है जरूरी PET स्कैन यानी पोजिट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी एक आधुनिक जांच तकनीक है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से कैंसर की पहचान, उसके फैलाव और इलाज के प्रभाव की निगरानी के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया में मरीज को विशेष रेडियो ट्रेसर इंजेक्शन के माध्यम से दिया जाता है, जिसके बाद मशीन शरीर के अंदर सक्रिय कोशिकाओं की गतिविधियों की तस्वीर तैयार करती है। इससे डॉक्टरों को यह समझने में मदद मिलती है कि कैंसर शरीर के किस हिस्से में और कितनी तेजी से फैल रहा है। कैंसर के अलावा हृदय और मस्तिष्क संबंधी कई गंभीर बीमारियों की जांच में भी PET स्कैन उपयोगी माना जाता है। अब तक झारखंड के मरीजों को PET स्कैन के लिए कोलकाता, दिल्ली, भुवनेश्वर या निजी संस्थानों पर निर्भर रहना पड़ता था। इससे मरीजों का समय और पैसा दोनों खर्च होते थे, जबकि कई जरूरतमंद मरीज आर्थिक तंगी के कारण जांच तक नहीं करा पाते थे। भुगतान व्यवस्था बनी चिंता का विषय रिम्स में पहले से PPP मोड पर MRI, CT स्कैन और एक्स-रे जैसी सेवाएं संचालित हो रही हैं। हालांकि संचालकों का कहना है कि करोड़ों रुपये के लंबित भुगतान के कारण गरीब मरीजों की मुफ्त जांच सेवाएं प्रभावित हुई हैं। Indian Medical Association के सचिव Dr. Pradeep Singh ने कहा कि सरकार को नई मशीन लगाने के साथ-साथ उसकी दीर्घकालिक संचालन व्यवस्था और समयबद्ध भुगतान प्रणाली भी सुनिश्चित करनी होगी। राज्य में तेजी से बढ़ रहे कैंसर के मामले ऑन्कोलॉजिस्ट रोहित झा के अनुसार, झारखंड में हर साल 35 से 40 हजार नए कैंसर मरीज सामने आ रहे हैं। तंबाकू सेवन, प्रदूषण, खराब जीवनशैली और देर से जांच इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर स्क्रीनिंग और आधुनिक जांच सुविधाओं के विस्तार से कैंसर पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।
रांची। राजधानी रांची समेत पूरे झारखंड में लगातार बढ़ रही गर्मी और हीट वेव को देखते हुए रिम्स प्रशासन अलर्ट मोड में आ गया है। लू और हीट स्ट्रोक के मामलों में बढ़ोतरी की आशंका को देखते हुए अस्पताल में मरीजों के इलाज के लिए विशेष तैयारियां की गई हैं। रिम्स प्रबंधन ने बताया कि गर्मी के इस दौर में आम लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। रिम्स के अनुसार, हीट स्ट्रोक से प्रभावित मरीजों का इलाज मुख्य रूप से मेडिसीन और पीडियाट्रिक्स विभाग में किया जाएगा। मरीज की स्थिति और लक्षणों के आधार पर उपचार की व्यवस्था की गई है। अस्पताल प्रशासन ने यह भी कहा है कि यदि आने वाले दिनों में मरीजों की संख्या बढ़ती है, तो अलग से डेडिकेटेड बेड की व्यवस्था भी की जा सकती है। बच्चों और बुजुर्गों को ज्यादा खतरा डॉक्टरों का कहना है कि तेज गर्मी और लगातार बढ़ते तापमान के कारण बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों में हीट स्ट्रोक का खतरा अधिक रहता है। ऐसे में इन वर्गों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। रिम्स प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि बिना जरूरी काम के दोपहर के समय घर से बाहर न निकलें। धूप से बचाव के लिए जरूरी सलाह अस्पताल प्रबंधन ने आम लोगों को पर्याप्त मात्रा में पानी पीने, हल्के और ढीले सूती कपड़े पहनने तथा बाहर निकलते समय सिर और शरीर को ढककर रखने की सलाह दी है। तेज धूप में निकलने पर छाता, गमछा या टोपी का इस्तेमाल करने को कहा गया है। इसके अलावा शरीर में पानी की कमी से बचने के लिए ओआरएस, नींबू पानी और अन्य तरल पदार्थ लेने की सलाह भी दी गई है। रिम्स प्रशासन ने कहा कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करना बेहद जरूरी है, ताकि हीट वेव के खतरे से बचा जा सके। लगातार बढ़ती गर्मी को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग भी स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।