Supreme Court of India

Supreme Court of India building in New Delhi, where Chief Justice of India Justice Surya Kant has constituted special benches to expedite the hearing of long-pending cases.
सुप्रीम कोर्ट में लंबित 93 हजार मामलों के निपटारे की तैयारी, CJI सूर्यकांत ने बनाई 4 स्पेशल बेंच

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में वर्षों से लंबित मामलों के जल्द निपटारे के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने पुराने मामलों की सुनवाई में तेजी लाने के उद्देश्य से चार विशेष (स्पेशल) बेंचों का गठन किया है। इनमें दो बेंच सिविल मामलों और दो बेंच आपराधिक मामलों की सुनवाई करेंगी। 93 हजार से अधिक मामले अभी भी लंबित एएनआई के अनुसार, सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में इस समय करीब 93,000 मामले लंबित हैं। इनमें से लगभग 35 से 40 प्रतिशत मामले काफी पुराने हैं, जिनका लंबे समय से निपटारा नहीं हो सका है। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था का उद्देश्य इन पुराने मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध कर तेजी से सुनवाई करना है। सिविल और आपराधिक मामलों के लिए अलग-अलग बेंच नई रोस्टर व्यवस्था के तहत: दो स्पेशल बेंच केवल सिविल मामलों की सुनवाई करेंगी। दो स्पेशल बेंच केवल आपराधिक (क्रिमिनल) मामलों पर काम करेंगी। अलग-अलग बेंच बनने से मामलों की सुनवाई अधिक व्यवस्थित होगी और पुराने मामलों के निपटारे की गति बढ़ने की उम्मीद है। पुराने मामलों के बोझ को कम करना लक्ष्य सुप्रीम कोर्ट में वर्षों से लंबित मामलों की बढ़ती संख्या को लेकर लगातार चिंता जताई जाती रही है। नई स्पेशल बेंचों का मुख्य उद्देश्य इसी लंबित बोझ को कम करना और लंबे समय से न्याय का इंतजार कर रहे लोगों को जल्द राहत दिलाना है। इन बेंचों में नियमित रूप से पुराने मामलों की सुनवाई की जाएगी, ताकि न्याय मिलने में हो रही देरी को कम किया जा सके। न्यायिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की पहल कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया को अधिक तेज, व्यवस्थित और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि यह व्यवस्था सफल रहती है, तो सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या घटने के साथ-साथ समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करने में भी मदद मिलेगी। इससे न्यायपालिका में आम लोगों का भरोसा और मजबूत होने की उम्मीद है.  

Deepshikha जुलाई 14, 2026 0
Non Performing Assets
बैंकों ने पहली तिमाही में ₹15,000 करोड़ के नए NPA बिक्री के लिए निकाले, फंसे कर्ज घटाने की कवायद तेज

मुंबई, एजेंसियां। भारतीय बैंकों ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल–जून) में करीब ₹15,000 करोड़ के नए गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) को बिक्री के लिए बाजार में उतारा है। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंक इन फंसे कर्जों को एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों और अन्य निवेशकों को बेचकर अपनी बैलेंस शीट मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।    कुल NPA बिक्री का आंकड़ा ₹50,000 करोड़ के करीब   बैंकिंग क्षेत्र के सूत्रों के मुताबिक, पहली तिमाही में पुराने और नए NPA को मिलाकर लगभग ₹50,000 करोड़ के फंसे कर्ज बिक्री की प्रक्रिया में हैं। इनमें कॉरपोरेट लोन, इंफ्रास्ट्रक्चर, रियल एस्टेट और MSME सेक्टर से जुड़े डिफॉल्ट खाते प्रमुख हैं। इससे बैंकों को खराब ऋण कम करने और पूंजी की स्थिति मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।    ARC कंपनियों की बढ़ी सक्रियता   एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियां इन NPA खातों की खरीद में सक्रिय रुचि दिखा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्याज दरों में स्थिरता और अर्थव्यवस्था में सुधार के चलते कई फंसे हुए खातों की रिकवरी की संभावना बढ़ी है, इसलिए ARC कंपनियां बड़े पैमाने पर इन परिसंपत्तियों की बोली लगाने की तैयारी कर रही हैं।    बैंकों की बैलेंस शीट होगी मजबूत   विशेषज्ञों का कहना है कि NPA की बिक्री से बैंकों की बैलेंस शीट साफ होगी, प्रावधान का बोझ कम होगा और नए कर्ज देने की क्षमता बढ़ेगी। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी बैंकों को समय पर फंसे कर्जों के समाधान और जोखिम प्रबंधन को मजबूत करने पर लगातार जोर दे रहा है।

anjali kumari जुलाई 14, 2026 0
Prescription medicines displayed at a pharmacy counter, highlighting new government restrictions on the sale of medicines containing more than 12% ethyl alcohol.
AI से बन रहीं फर्जी डॉक्टर की पर्चियां! क्या सरकार के नए दवा नियमों के सामने बनेगी नई चुनौती?

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने 12 प्रतिशत से अधिक इथाइल अल्कोहल वाली दवाओं की बिना डॉक्टर की पर्ची बिक्री पर रोक लगा दी है। इस फैसले का चिकित्सा विशेषज्ञों ने स्वागत किया है। हालांकि, डॉक्टरों का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से फर्जी प्रिस्क्रिप्शन तैयार किए जाने की संभावना नए नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए चुनौती बन सकती है। डॉक्टर ने बताया AI से बढ़ी नई चुनौती दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. धीरन गुप्ता ने कहा कि ऑनलाइन फार्मेसी के बढ़ते चलन के बीच AI का दुरुपयोग भी चिंता का विषय है। उनके अनुसार, अब AI की मदद से नकली डॉक्टर की पर्चियां तैयार करना पहले की तुलना में आसान हो गया है। ऐसे में केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि ऑनलाइन दवा बिक्री की प्रभावी निगरानी और सत्यापन व्यवस्था भी जरूरी होगी। बच्चों पर पड़ सकता है गंभीर असर डॉ. गुप्ता ने कहा कि अल्कोहल युक्त दवाओं का असर हमेशा तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन बच्चों में इसका प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि कई बार माता-पिता अनजाने में ऐसी दवाएं बच्चों को दे देते हैं, जिससे भविष्य में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। उन्होंने बच्चों के लिए शुगर-फ्री और कम जोखिम वाले विकल्पों को प्राथमिकता देने की सलाह दी। नए नियमों का स्वागत, लेकिन लागू करना चुनौती डॉ. गुप्ता का कहना है कि सरकार का फैसला सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन इसका प्रभावी पालन सुनिश्चित करना आसान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि इसके लिए सरकार, दवा विक्रेताओं, ऑनलाइन फार्मेसी प्लेटफॉर्म और अभिभावकों सभी को जिम्मेदारी के साथ नियमों का पालन करना होगा। क्या है सरकार का नया नियम? स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 12 प्रतिशत से अधिक इथाइल अल्कोहल वाली दवाओं की बिक्री पर नए प्रतिबंध लागू किए हैं। नए नियमों के तहत: 12% से अधिक इथाइल अल्कोहल वाली दवाएं अब बिना डॉक्टर की पर्ची नहीं बेची जा सकेंगी। ऐसी दवाओं की बिक्री केवल वैध प्रिस्क्रिप्शन के आधार पर होगी। बिना लाइसेंस या निर्धारित प्रक्रिया के इन दवाओं की बिक्री पर रोक रहेगी। क्यों लिया गया यह फैसला? सरकार का कहना है कि कुछ अल्कोहल युक्त दवाओं का दुरुपयोग नशे के उद्देश्य से किए जाने की शिकायतें सामने आ रही थीं। इसी वजह से इन दवाओं की बिक्री को अधिक नियंत्रित करने का निर्णय लिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऑनलाइन प्रिस्क्रिप्शन की डिजिटल जांच और सत्यापन प्रणाली मजबूत नहीं की गई, तो AI से तैयार फर्जी पर्चियां इस व्यवस्था के लिए नई चुनौती बन सकती हैं।  

Deepshikha जुलाई 11, 2026 0
Supreme Court of India building in New Delhi, where a petitioner was escorted out after allegedly creating a disturbance during a court hearing.
Supreme Court में सुनवाई के दौरान हंगामा, याचिकाकर्ता ने फेंके दस्तावेज; सुरक्षाकर्मियों ने कोर्ट से बाहर निकाला

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान उस समय असामान्य स्थिति पैदा हो गई, जब एक याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर अदालत में अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और अपने दस्तावेज हवा में उछाल दिए। स्थिति बिगड़ने पर कोर्ट के निर्देश पर सुरक्षाकर्मियों ने उसे कोर्टरूम से बाहर निकाल दिया। सुनवाई के दौरान बढ़ा विवाद यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा था। सुनवाई न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ के समक्ष चल रही थी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, याचिकाकर्ता काला कोट पहनकर अदालत पहुंचा था, हालांकि उसने अधिवक्ताओं वाला बैंड नहीं पहना था। सुनवाई के दौरान उसने अदालत के प्रति आक्रामक रुख अपनाया। जज से कहा- "मैं आपको आदेश देता हूं" सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर कहा, "न्यायिक सेवक महोदय, मैं आपको आदेश देता हूं कि आप लखनऊ के एसीपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दें।" इस पर न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा, "क्या आप हमें आदेश दे रहे हैं?" अभद्र भाषा और दस्तावेज फेंकने का आरोप बताया गया कि इसके बाद याचिकाकर्ता ने कहा कि उसकी ओर से सब कुछ रिकॉर्ड पर है। आरोप है कि उसने इसके बाद अभद्र भाषा का प्रयोग किया और अपने मामले से जुड़े दस्तावेज अदालत कक्ष में हवा में उछाल दिए। स्थिति बिगड़ते देख कोर्ट की सुरक्षा में तैनात कर्मी तुरंत आगे आए और अदालत के निर्देश पर याचिकाकर्ता को कोर्टरूम से बाहर ले गए। सुनवाई सामान्य रूप से जारी रही याचिकाकर्ता को बाहर ले जाने के बाद अदालत की कार्यवाही सामान्य रूप से जारी रही। फिलहाल इस घटना को लेकर पीठ की ओर से खुली अदालत में कोई अलग आदेश पारित नहीं किया गया है। हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने पहुंचा था याचिकाकर्ता इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने आया था। हालांकि सुनवाई के दौरान उसके व्यवहार के कारण कुछ समय के लिए अदालत का माहौल तनावपूर्ण हो गया। घटना के बाद कोर्ट की कार्यवाही बिना किसी अन्य व्यवधान के आगे बढ़ाई गई।  

Deepshikha जुलाई 11, 2026 0
Female IPS Officer
प्रेग्नेंसी बनी विवाद की वजह, मेडिकल फिट महिला IPS अधिकारी को ट्रेनिंग से क्यों रोका? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा सवाल

नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट में एक महिला IPS प्रोबेशनर की ट्रेनिंग को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की नीति पर अहम सवाल उठाए गए। अदालत ने कहा कि यदि कोई महिला अधिकारी चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह फिट है, तो केवल गर्भावस्था या मातृत्व के आधार पर उसे प्रशिक्षण से वंचित करना उचित नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस संबंध में जवाब भी मांगा है।   क्या है पूरा मामला?   मामला वर्ष 2023 बैच की एक महिला IPS अधिकारी का है, जिन्होंने प्रशिक्षण के दौरान गर्भधारण किया और बाद में बच्चे को जन्म दिया। प्रसव के बाद उन्होंने मेडिकल बोर्ड से फिटनेस प्रमाणपत्र प्राप्त किया और प्रशिक्षण में शामिल होने की इच्छा जताई।   हालांकि, गृह मंत्रालय ने 1993 की एक नीति का हवाला देते हुए उन्हें तत्काल प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति नहीं दी। इस नीति के अनुसार, प्रसव के बाद महिला IPS प्रोबेशनर को एक निश्चित अवधि पूरी होने के बाद ही प्रशिक्षण में शामिल किया जाता है।   कैसे पहुंचा मामला सुप्रीम कोर्ट?   महिला अधिकारी ने पहले सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) का रुख किया। CAT ने मेडिकल फिटनेस को आधार मानते हुए उन्हें अंतरिम राहत देते हुए प्रशिक्षण में शामिल करने का आदेश दिया।   इसके बाद केंद्र सरकार ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां CAT के आदेश पर रोक लगा दी गई। इसके बाद महिला अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां मामले की सुनवाई जारी है।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?   सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि यदि कोई महिला अधिकारी चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह फिट है, तो उसे केवल गर्भावस्था या मातृत्व के आधार पर प्रशिक्षण से क्यों रोका जा रहा है।   अदालत ने यह भी कहा कि महिलाओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए बनाई गई नीतियां उनके करियर में बाधा नहीं बननी चाहिए। यदि मेडिकल विशेषज्ञ किसी अधिकारी को सेवा और प्रशिक्षण के लिए फिट घोषित करते हैं, तो ऐसे मामलों में नियमों की निष्पक्ष और व्यावहारिक व्याख्या होनी चाहिए।   केंद्र सरकार का पक्ष   केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि गृह मंत्रालय की 1993 की नीति के तहत प्रसव के बाद महिला IPS प्रोबेशनर के प्रशिक्षण को लेकर निर्धारित दिशा-निर्देश हैं और उसी के अनुरूप निर्णय लिया गया था। सरकार का कहना है कि यह नीति महिला अधिकारियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाई गई है।   अभी अंतिम फैसला नहीं आया   फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई अंतिम निर्णय नहीं सुनाया है। अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और मामले की सुनवाई जारी है। अंतिम फैसला आने के बाद यह तय होगा कि भविष्य में गर्भावस्था या मातृत्व के दौरान और उसके बाद महिला IPS अधिकारियों के प्रशिक्षण से जुड़े नियमों में कोई बदलाव होगा या नहीं।   क्यों अहम है यह मामला?   कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का असर केवल IPS अधिकारियों तक सीमित नहीं रहेगा। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला भविष्य में अन्य केंद्रीय सेवाओं और सरकारी संस्थानों में मातृत्व अवकाश, प्रशिक्षण और महिला अधिकारियों के अधिकारों से जुड़े मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

anjali kumari जुलाई 9, 2026 0
A symbolic image of the Calcutta High Court, representing the resignation of retired Justice Ranjit Kumar Bag from the SIR Tribunal handling West Bengal voter list cases.
पश्चिम बंगाल: SIR ट्रिब्यूनल से एक और सेवानिवृत्त जज का इस्तीफा, स्वास्थ्य कारणों का दिया हवाला

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहे SIR ट्रिब्यूनल को एक और झटका लगा है। सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजीत कुमार बाग ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए ट्रिब्यूनल से इस्तीफा दे दिया है। इससे पहले भी एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश इस ट्रिब्यूनल से अलग हो चुके हैं। स्वास्थ्य कारणों से दिया इस्तीफा सूत्रों के अनुसार, सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजीत कुमार बाग ने खराब स्वास्थ्य के कारण ट्रिब्यूनल में अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होने का निर्णय लिया। उनके इस्तीफे के बाद ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है। पहले भी दे चुके हैं जज इस्तीफा इससे पहले मई में T. S. Sivagnanam ने भी SIR ट्रिब्यूनल से इस्तीफा दिया था। लगातार दो वरिष्ठ न्यायाधीशों के हटने से ट्रिब्यूनल के कामकाज पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हुआ था गठन SIR ट्रिब्यूनल का गठन Supreme Court of India के निर्देश पर तत्कालीन Calcutta High Court के मुख्य न्यायाधीश Sujoy Paul द्वारा किया गया था। इस ट्रिब्यूनल का उद्देश्य मतदाता सूची से बाहर हुए लोगों के मामलों की जांच करना और उनके दस्तावेजों का सत्यापन कर उचित निर्णय देना है। 27 लाख मामलों के निपटारे की जिम्मेदारी ट्रिब्यूनल के सामने करीब 27 लाख मामलों के निपटारे की जिम्मेदारी है। इनमें उन लोगों के आवेदन शामिल हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हट गए हैं। दस्तावेजों की जांच की जा रही है और कई आवेदकों से फोन के माध्यम से भी संपर्क किया जा रहा है। शिक्षक भर्ती घोटाले की जांच से भी जुड़ा रहा नाम सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजीत कुमार बाग इससे पहले पश्चिम बंगाल के चर्चित शिक्षक भर्ती मामले की जांच से भी जुड़े रहे हैं। उनकी अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट के आधार पर कथित भर्ती अनियमितताओं का मामला सामने आया था, जिसके बाद जांच केंद्रीय एजेंसी को सौंप दी गई थी। ट्रिब्यूनल से उनके इस्तीफे की वजह केवल स्वास्थ्य संबंधी बताई गई है और इसे किसी अन्य विवाद से नहीं जोड़ा गया है।  

Deepshikha जुलाई 2, 2026 0
SC/ST Act ruling
सुप्रीम कोर्ट का फैसला-जमीन विवाद में SC/ST एक्ट के आरोपी को नहीं मिलेगी अग्रिम जमानत

रांची। रांची के ओरमांझी थाना क्षेत्र स्थित डाहु गांव के एक बहुचर्चित जमीन विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी सुमन महतो उर्फ सुमन कुमार को बड़ा झटका दिया है। शीर्ष अदालत ने झारखंड हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने सुनाया है। यह मूल विवाद ग्राम डाहु इलाके में एक जमीन को लेकर है। शिकायतकर्ता (पीड़ित पक्ष) का आरोप था कि कोर्ट के आदेश से मिली जमीन पर उनके कब्जे को सुमन महतो और उनके परिवार द्वारा बाधित किया गया, जिसके बाद इस मामले में SC/ST एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इससे पहले 12 मई, 2026 को झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस राजेश कुमार ने याचिका खारिज करते हुए कहा था कि मामला प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होता है और SC/ST एक्ट की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप नहीं करेगा सुप्रीम कोर्ट झारखंड हाईकोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ सुमन महतो ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट किया कि SC/ST एक्ट की धारा 18 के कड़े प्रावधानों को देखते हुए वे हाईकोर्ट के आदेश में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच के पुराने आपराधिक मुकदमों और विवाद को संज्ञान में लिया और अदालत ने सुमन महतो को 4 सप्ताह के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण करने और नियमित जमानत के लिए आवेदन करने की छूट दी है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया है कि परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आरोपी की नियमित जमानत याचिका पर उसी दिन विचार कर फैसला सुनाया जाए।

anjali kumari जून 20, 2026 0
Jharkhand Weather
झारखंड में लू का अलर्ट, 3 से 5 डिग्री चढ़ेगा पारा

रांची। झारखंड में मौसम तेजी से बदल रहा है। तेज धूप अब झुलसाने लगी है। आने वाले दिनों में गर्मी और बढ़ेगी। अगले पांच दिनों में तापमान और बढ़ने की चेतवानी मौसम विभाग ने जारी की है। इसे देखते हुए राज्य के कई जिलों में लू को लेकर अलर्ट जारी किया गया है।    17-18 अप्रैल को लू का असर अगले पांच दिनों में अधिकतम तापमान में तीन से पांच डिग्री सेल्सियस और बढ़ने की संभावना है। इसे देखते हुए मौसम विभाग ने 17 और 18 अप्रैल को रांची, खूंटी, पश्चिम सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, सिमडेगा, गुमला, लोहरदगा, लातेहार, पलामू, गढ़वा, चतरा और सरायकेला-खरसांवा में लू चलने की संभावना जताई है। झारखंड में 42 डिग्री सेल्सियस पार जाएगा पारा 17 अप्रैल को राज्य के उत्तर-पूर्वी भागों में आंशिक बादल छाए रहने के साथ कहीं-कहीं गर्जन के साथ बारिश होने की संभावना है। बाकी जगहों में भी कहीं-कहीं बादल छाए रह सकते हैं। 19 अप्रैल से आसमान साफ रहेगा और मौसम शुष्क बना रहेगा। इसके बाद पारा 42 डिग्री तक जा सकता है।  40 डिग्री पहुंचा पारा सरायकेला का अधिकतम तापमान मंगलवार को 40.6 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया। राज्य के अन्य जिलों का तापमान भी 40 डिग्री के आसपास पहुंच गया है। इससे पहले 4 अप्रैल को सरायकेला का तापमान 40.3 और मेदिनीनगर का तापमान 30 मार्च और 4 अप्रैल को 40.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था।   राजधानी समेत अन्य जिलों का हाल रांची का अधिकतम तापमान 35.2 डिग्री सेल्सियस रहा। इसमें पिछले 24 घंटे में 0.4 डिग्री सेल्सियस की कमी दर्ज की गई, वहीं जमशेदपुर का अधिकतम तापमान 39 डिग्री सेल्सियस, मेदिनीनगर का 39.8 डिग्री सेल्सियस और बोकारो का 39.1 डिग्री सेल्सियस रहा। हजारीबाग का अधिकतम तापमान 36.2 डिग्री सेल्सियस, गुमला का 35.5 डिग्री सेल्सियस और पाकुड़ का 37.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।

Unknown अप्रैल 15, 2026 0
Supreme Court of India hearing Sabarimala case
सबरीमाला विवाद: “धर्म पर फैसला जज नहीं, संप्रदाय करेगा”– सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बड़ी बहस

केरल के Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश को लेकर Supreme Court of India में चल रही सुनवाई के दौरान मंगलवार को अहम संवैधानिक बहस देखने को मिली। त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील Abhishek Manu Singhvi ने दलील दी कि “किसी धर्म की प्रथा सही है या नहीं, यह तय करने का अधिकार उस संप्रदाय के पास होना चाहिए, न कि जजों के पास।” “धर्म समुदाय की आस्था से तय होगा” सिंघवी ने कोर्ट में कहा कि धर्म कोई व्यक्तिगत विचार नहीं, बल्कि एक समुदाय की साझा आस्था (System of Belief) है। उन्होंने जोर देकर कहा: किसी एक व्यक्ति के अधिकार को पूरे समुदाय की आस्था पर हावी नहीं होने दिया जा सकता धार्मिक प्रथाओं का मूल्यांकन उसी समुदाय के नजरिए से होना चाहिए कोर्ट को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन-सी प्रथा “सही” या “गलत” है उन्होंने यह भी कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 सभी धार्मिक प्रथाओं को संरक्षण देता है, चाहे वे “essential” (जरूरी) हों या नहीं। ‘Essential Practice Test’ पर सवाल सुनवाई के दौरान “Essential Religious Practices” (जरूरी धार्मिक प्रथाएं) के सिद्धांत पर भी बहस हुई। सिंघवी ने कहा कि: संविधान में “essential” शब्द का जिक्र नहीं है कोर्ट को सिर्फ यह देखना चाहिए कि कोई प्रथा धर्म से जुड़ी है या नहीं यह तय करना कि वह प्रथा कितनी जरूरी है, न्यायपालिका के दायरे से बाहर होना चाहिए वहीं, जजों ने सवाल उठाया कि अगर यह टेस्ट हटा दिया जाए, तो यह कैसे तय होगा कि कौन-सी प्रथा संवैधानिक संरक्षण के योग्य है। धार्मिक बनाम सेक्युलर गतिविधियों पर बहस सुनवाई के दौरान जस्टिसों ने यह अहम सवाल उठाया कि कौन-सी गतिविधि धार्मिक है और कौन-सी सेक्युलर (गैर-धार्मिक)। उदाहरण के तौर पर: पूजा के लिए सामग्री खरीदना श्रद्धालुओं के लिए बस की व्यवस्था करना सिंघवी ने जवाब दिया कि हर मामले को अलग-अलग परिस्थितियों में देखना होगा। उन्होंने कहा कि जहां धार्मिक आस्था जुड़ी हो, वहां हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, लेकिन अगर उसमें भ्रष्टाचार या प्रशासनिक गड़बड़ी हो, तो राज्य दखल दे सकता है। पुजारियों की नियुक्ति पर भी चर्चा अर्चकों (पुजारियों) की नियुक्ति को लेकर भी कोर्ट में बहस हुई। सिंघवी ने कहा कि धार्मिक योग्यता जरूरी होनी चाहिए लेकिन केवल वंश या परंपरा के आधार पर नियुक्ति सही नहीं जजों ने इस पर टिप्पणी की कि नियुक्ति प्रक्रिया भले सेक्युलर हो, लेकिन नियुक्त व्यक्ति का कार्य धार्मिक होता है– इसलिए दोनों के बीच संतुलन जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के सामने बड़े सवाल यह मामला सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है। संविधान पीठ कई बड़े मुद्दों पर फैसला करेगी, जैसे: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश पारसी महिलाओं का अग्नि मंदिर में प्रवेश दाऊदी बोहरा समुदाय में खतना प्रथा धार्मिक मामलों में जेंडर आधारित भेदभाव पिछले फैसले और मौजूदा स्थिति 1991 में केरल हाईकोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई थी 2018 में Supreme Court of India ने इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए बैन हटा दिया अब पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 9 जजों की संविधान पीठ इन जटिल सवालों पर फैसला करेगी कोर्ट की अहम टिप्पणियां सुनवाई के दौरान जजों ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए: क्या कोर्ट तय कर सकता है कि क्या धार्मिक है और क्या नहीं? क्या किसी गैर-भक्त को धार्मिक परंपराओं को चुनौती देने का अधिकार है? क्या मंदिरों में प्रवेश रोकना समाज को बांटता है? जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि धार्मिक स्थलों में प्रतिबंध समाज को विभाजित कर सकते हैं और इससे धर्म की व्यापकता प्रभावित हो सकती है। सबरीमाला मामला अब सिर्फ एक मंदिर या परंपरा का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और न्यायपालिका की सीमाओं जैसे बड़े संवैधानिक सवालों का केंद्र बन चुका है। Supreme Court of India का आने वाला फैसला न सिर्फ इस मामले की दिशा तय करेगा, बल्कि देश में धर्म और संविधान के बीच संतुलन की नई परिभाषा भी तय कर सकता है।  

surbhi अप्रैल 15, 2026 0
Lalu Prasad Yadav
लालू प्रसाद यादव को सुप्रीम कोर्ट से झटका, CBI जांच पर नहीं मिली राहत

पटना, एजेंसियां। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को ‘लैंड फॉर जॉब्स’ मामले में बड़ा झटका लगा है। Supreme Court of India ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने Central Bureau of Investigation (CBI) की जांच रद्द करने की मांग की थी।    कोर्ट ने क्या कहा? सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने साफ किया कि इस स्तर पर जांच में हस्तक्षेप करना उचित नहीं है। हालांकि कोर्ट ने लालू यादव को राहत देते हुए कहा कि वे ट्रायल के दौरान भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A से जुड़े कानूनी मुद्दे उठा सकते हैं। साथ ही निचली अदालत को मामले की सुनवाई मेरिट के आधार पर करने का निर्देश दिया गया है।   धारा 17A पर विवाद यह मामला मुख्य रूप से Prevention of Corruption Act की धारा 17A से जुड़ा है। इस प्रावधान के तहत किसी सरकारी अधिकारी के फैसलों की जांच से पहले पूर्व स्वीकृति जरूरी होती है। लालू यादव के वकील Kapil Sibal ने दलील दी कि बिना मंजूरी के जांच अवैध है, लेकिन कोर्ट ने इस पर फिलहाल अंतिम निर्णय नहीं दिया।   CBI का पक्ष CBI की ओर से दलील दी गई कि इस मामले में पूर्व स्वीकृति जरूरी नहीं थी, क्योंकि आरोपित गतिविधियां आधिकारिक कर्तव्यों के दायरे में नहीं आतीं। कोर्ट ने माना कि इन पहलुओं की जांच ट्रायल कोर्ट में बेहतर तरीके से हो सकती है।    क्या है ‘लैंड फॉर जॉब्स’ मामला? यह मामला 2004-2009 के दौरान रेलवे में भर्ती घोटाले से जुड़ा है, जब लालू यादव रेल मंत्री थे। आरोप है कि नौकरी देने के बदले जमीन ली गई। इस केस में Rabri Devi, Tejashwi Yadav और Misa Bharti समेत कई लोगों पर आरोप तय हो चुके हैं।

Unknown अप्रैल 13, 2026 0
Supreme Court of India hearing West Bengal SIR voter list case ahead of elections today
सुप्रीम कोर्ट में आज बंगाल SIR मामले की सुनवाई, चुनाव से पहले अहम फैसला संभव

Supreme Court of India आज West Bengal में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। यह मामला विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बेहद अहम माना जा रहा है। किस पीठ के सामने होगी सुनवाई? सुनवाई मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और जस्टिस Joymalya Bagchi की पीठ के सामने होगी। 13 अप्रैल की कार्यसूची में इस मामले को सूचीबद्ध किया गया है। चुनाव आयोग पहले ही दे चुका है अंतिम सूची Election Commission of India ने 9 अप्रैल को पहले चरण के मतदान के लिए मतदाता सूची को अंतिम रूप दे दिया है। बंगाल में चुनाव: 23 और 29 अप्रैल मतगणना: 4 मई SIR और ‘स्थगन’ का मतलब क्या? मतदाता सूची के “स्थगन” का मतलब है कि अब इस चुनाव के लिए नई एंट्री नहीं की जा सकती। यानी जो नाम सूची में नहीं है, वह इस बार वोट नहीं डाल सकेगा। मालदा केस पर भी सुनवाई कोर्ट Malda में SIR प्रक्रिया के दौरान सात न्यायिक अधिकारियों के ‘घेराव’ मामले पर भी सुनवाई करेगा। इस मामले में पहले ही National Investigation Agency (NIA) को जांच सौंपने का आदेश दिया जा चुका है।  

surbhi अप्रैल 13, 2026 0
Supreme Court allows passive euthanasia for Ghaziabad man Harish Rana after 13 years in unconscious state.
सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा को दी पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति, 13 साल से अचेत बेटे के लिए माता-पिता ने लगाई थी गुहार

  देश में इच्छामृत्यु को लेकर एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सामने आया है। Supreme Court of India ने गाजियाबाद के 31 वर्षीय Harish Rana को पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी है। यह देश के उन दुर्लभ मामलों में से एक माना जा रहा है, जहां लंबे समय से अचेत अवस्था में जी रहे मरीज के लिए अदालत ने मानवीय आधार पर ऐसा फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि हरीश राणा के ठीक होने की कोई चिकित्सकीय संभावना नहीं बची है और उन्हें जीवनरक्षक उपकरणों पर बनाए रखना केवल पीड़ा को लंबा करने जैसा है।   13 साल से अचेत अवस्था में जीवन गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में हैं। वर्ष 2013 में हुए एक हादसे के बाद से वे बिस्तर पर पड़े हैं और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हैं। डॉक्टरों के मुताबिक उनके मस्तिष्क को इतनी गंभीर चोट पहुंची थी कि उनके दिमाग की नसें लगभग निष्क्रिय हो चुकी हैं। वर्तमान में उनकी स्थिति ऐसी है कि वे न बोल सकते हैं, न सुन सकते हैं और न ही किसी चीज़ को महसूस कर पाते हैं। कभी-कभी पलक झपकना ही उनके जीवित होने का एकमात्र संकेत माना जाता है।   एक हादसे ने बदल दी पूरी जिंदगी हरीश राणा कभी एक होनहार और ऊर्जा से भरे युवा थे। वे Chandigarh University में सिविल इंजीनियरिंग के छात्र थे। पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें बॉडीबिल्डिंग का भी शौक था और वे अपनी फिटनेस को लेकर बेहद सजग रहते थे। लेकिन 20 अगस्त 2013 को हुई एक दुर्घटना ने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया। उस दिन वे अपने पीजी (पेइंग गेस्ट) की चौथी मंजिल से अचानक नीचे गिर गए। इस हादसे में उनके सिर पर गंभीर चोट आई, जिसके बाद वे कोमा जैसी स्थिति में चले गए।   बेटे को बचाने के लिए माता-पिता का लंबा संघर्ष हादसे के बाद हरीश के पिता अशोक राणा और उनकी मां ने बेटे को बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। इलाज के लिए उन्हें देश के कई बड़े अस्पतालों में ले जाया गया। हरीश का इलाज Postgraduate Institute of Medical Education and Research (पीजीआई चंडीगढ़), All India Institute of Medical Sciences (एम्स, नई दिल्ली) और कई निजी अस्पतालों में कराया गया। परिवार ने वर्षों तक उम्मीद नहीं छोड़ी, लेकिन डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि हरीश के ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है।   माता-पिता की पीड़ा और अदालत का दरवाजा समय के साथ-साथ बेटे की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। 100 प्रतिशत दिव्यांगता से जूझ रहे अपने बेटे की दशा देखकर माता-पिता मानसिक रूप से टूट चुके थे। आखिरकार उन्होंने भारी मन से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अदालत से पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति देने की अपील की। उनका कहना था कि बेटे को इस तरह पीड़ा भरे जीवन में बनाए रखना मानवीय नहीं है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हरीश के माता-पिता से सीधे बातचीत भी की और उनकी भावनाओं तथा परिस्थितियों को समझने की कोशिश की। सभी मेडिकल रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय पर विचार करने के बाद अदालत ने यह फैसला सुनाया।   क्या होता है पैसिव यूथेनेशिया पैसिव यूथेनेशिया का मतलब होता है कि मरीज को जीवित रखने के लिए दिए जा रहे कृत्रिम जीवनरक्षक उपकरण या उपचार को हटा लिया जाए, ताकि प्राकृतिक रूप से जीवन की प्रक्रिया समाप्त हो सके। भारत में यह बेहद संवेदनशील और कानूनी रूप से नियंत्रित प्रक्रिया है, जिसे केवल विशेष परिस्थितियों में अदालत की अनुमति से ही लागू किया जा सकता है।   एक परिवार की पीड़ा की कहानी हरीश राणा का मामला केवल कानूनी या चिकित्सकीय बहस नहीं, बल्कि एक परिवार के लंबे संघर्ष और भावनात्मक पीड़ा की कहानी भी है। पिछले 13 वर्षों से माता-पिता ने उम्मीद के सहारे बेटे की देखभाल की, लेकिन जब सभी रास्ते बंद हो गए तो उन्होंने भारी मन से उसे इस अंतहीन पीड़ा से मुक्त करने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश में इच्छामृत्यु से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।  

surbhi मार्च 11, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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शेयर बाजार में गिरावट, Sensex 71 अंक टूटा; Nifty 24,400 के नीचे बंद

abhishek singh अगस्त 14, 2026 0