Trump on Iran: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी बातचीत को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच वार्ता सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन अगर बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची तो अमेरिका दोबारा सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान को किसी तरह के दबाव या लालच से नहीं मनाया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कूटनीतिक प्रयास विफल रहे तो अमेरिका पहले की तरह सख्त कदम उठाएगा। "ईरान के साथ हमारी बातचीत अच्छी चल रही है। मुझे उम्मीद है कि कोई समझौता हो जाएगा। लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ, तो हम फिर वही करेंगे जो दो दिन पहले कर रहे थे।" — डोनाल्ड ट्रंप ड्रोन हमलों से फिर बढ़ी चिंता इस बीच 27 जुलाई को सऊदी अरब, जॉर्डन और इराक में ड्रोन हमलों की घटनाएं सामने आईं। इन हमलों के बाद पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच फिलहाल प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई रुकी हुई है, लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता बरकरार है। अमेरिका ने फिलहाल रोके हवाई हमले 25 जुलाई को अमेरिका ने ईरान के खिलाफ करीब दो सप्ताह से जारी हवाई अभियान को रोक दिया था। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सैन्य नेतृत्व ने राष्ट्रपति ट्रंप को बताया कि अभियान से मिलने वाला प्रमुख रणनीतिक लाभ हासिल किया जा चुका है और अब महत्वपूर्ण सैन्य लक्ष्य सीमित रह गए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल डैन केन ने यह भी चेतावनी दी थी कि लगातार हमलों से अमेरिकी सेना के हवाई हथियारों का भंडार तेजी से घट रहा है। इसी कारण फिलहाल अभियान रोकने की सलाह दी गई। ईरान ने बातचीत के रास्ते खुले होने की बात कही वहीं, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि तेहरान ने बातचीत का रास्ता बंद नहीं किया है। उन्होंने बताया कि मध्यस्थ देशों के जरिए दोनों पक्षों के बीच अब भी संदेशों का आदान-प्रदान जारी है। हालांकि उन्होंने उन खबरों का खंडन किया, जिनमें दावा किया गया था कि ईरान ने स्वयं बातचीत की पहल की है। बढ़ते क्षेत्रीय तनाव और कूटनीतिक प्रयासों के बीच अब दुनिया की नजर अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते या आगे की कार्रवाई पर टिकी हुई है।
वॉशिंगटन/तेहरान, एजेंसियां। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित परमाणु समझौते को लेकर विरोधाभासी बयान सामने आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और समझौते की अच्छी संभावना है। वहीं ईरान ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि अमेरिका के साथ फिलहाल कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वार्ता नहीं चल रही है। ट्रंप का दावा- बातचीत सही दिशा में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका कूटनीतिक समाधान चाहता है और यदि ईरान सहयोग करता है तो समझौते का रास्ता खुल सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर आक्रामक रुख अपनाता है, तो अमेरिका सैन्य विकल्प अपनाने से भी पीछे नहीं हटेगा। ईरान का स्पष्ट इनकार ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने ट्रंप के बयान को खारिज करते हुए कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच इस समय किसी भी स्तर पर कोई बातचीत नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि जब तक वाशिंगटन अपने रवैये में बदलाव नहीं लाता और प्रतिबंधों के मुद्दे पर ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक वार्ता की कोई संभावना नहीं है। परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंध बने मुख्य मुद्दे दोनों देशों के बीच विवाद का सबसे बड़ा कारण ईरान का परमाणु कार्यक्रम और उस पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर सख्त नियंत्रण स्वीकार करे, जबकि ईरान पहले आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों के परस्पर विरोधी बयानों से फिलहाल किसी तत्काल समझौते की संभावना कम दिखाई देती है।
तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास एक बार फिर तेज हो गए हैं। हालिया सैन्य टकराव के बाद कतर ने दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए बातचीत बहाल कराने की पहल शुरू की है। इसी सिलसिले में कतर का एक प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार को तेहरान पहुंचा, जहां दोनों पक्षों के बीच रुकी हुई वार्ता को दोबारा शुरू कराने पर जोर दिया जा रहा है। कतर ने संभाली मध्यस्थ की भूमिका मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कतर के वार्ताकार तेहरान पहुंचे हैं ताकि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव को कम किया जा सके। यह पहल ऐसे समय में हुई है, जब हाल के दिनों में सैन्य गतिविधियों में कुछ नरमी देखने को मिली है और कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं फिर से बनती दिखाई दे रही हैं। अमेरिका की सहमति से शुरू हुई पहल रिपोर्ट के मुताबिक, कतर का यह प्रयास अमेरिका के साथ समन्वय में किया जा रहा है। मध्यस्थों का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच बढ़े अविश्वास को कम करना और संवाद की प्रक्रिया को फिर से शुरू करना है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि शुरुआती बातचीत सकारात्मक रहती है, तो आगे व्यापक वार्ता का रास्ता खुल सकता है। कैसे बढ़ा था अमेरिका-ईरान तनाव हालिया तनाव उस समय बढ़ा जब अमेरिका ने ईरान पर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों पर हमलों में शामिल होने का आरोप लगाया। इसके बाद अमेरिकी सेना ने ईरान से जुड़े कई सैन्य ठिकानों पर कार्रवाई की। जवाब में ईरान ने कुवैत, बहरीन और जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिससे पूरे पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया। सैन्य तैयारी के साथ कूटनीति भी जारी अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वॉशिंगटन ने सैन्य विकल्प खुले रखे हैं, लेकिन फिलहाल उसकी प्राथमिकता कूटनीतिक समाधान तलाशना है। अमेरिकी प्रशासन सीमित सैन्य कार्रवाई के बाद तनाव को नियंत्रित रखते हुए बातचीत का अवसर बनाए रखना चाहता है। पुरानी वार्ता को फिर पटरी पर लाने की कोशिश कतर इससे पहले भी अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष वार्ताओं की मेजबानी कर चुका है। हालांकि हालिया सैन्य संघर्ष के बाद बातचीत की प्रक्रिया रुक गई थी। अब क्षेत्रीय देशों की कोशिश है कि दोनों पक्ष एक बार फिर बातचीत की मेज पर लौटें, ताकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को कम किया जा सके और किसी बड़े सैन्य संघर्ष की आशंका को टाला जा सके। क्षेत्रीय स्थिरता पर टिकी नजरें विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में कतर की मध्यस्थता और दोनों देशों की प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि अमेरिका और ईरान के रिश्ते टकराव की दिशा में आगे बढ़ते हैं या फिर कूटनीति के जरिए समाधान का रास्ता निकलता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें तेहरान में चल रही इस नई पहल पर टिकी हैं।
दोहा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल थानी से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने अमेरिका और ईरान के बीच जारी वार्ता में कतर की सक्रिय मध्यस्थता की भूमिका की सराहना की। अमेरिका-ईरान वार्ता को फिर से शुरू कराने में कतर की अहम भूमिका जानकारी के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बाद वार्ता को फिर से शुरू कराने में कतर की कूटनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, कतर ने पर्दे के पीछे रहकर संवाद को पुनर्जीवित करने में अहम योगदान दिया। ऊर्जा, व्यापार और निवेश पर भी हुई चर्चा बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने भारत और कतर के बीच द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा की। इसमें ऊर्जा, व्यापार, निवेश और लोगों के बीच संपर्क जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से बातचीत हुई। साथ ही क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी विचार साझा किए गए। पश्चिम एशिया में बदलते हालात पर नजर जयशंकर की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। हाल ही में अमेरिका-ईरान के बीच नए समझौते के बाद तनाव कम करने और बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिशें तेज हुई हैं। 11 जुलाई को हो सकती है अगली तकनीकी बैठक रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका-ईरान वार्ता का अगला तकनीकी दौर 11 जुलाई को हो सकता है। इस बैठक में सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य में शांति बनाए रखने जैसे विषय शामिल होंगे।
तेल अवीव: इजराइल ने अमेरिकी मीडिया में प्रकाशित उस रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें दावा किया गया था कि अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के दौरान ईरान के वरिष्ठ वार्ताकारों को निशाना बनाने की योजना बनाई जा रही थी। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने इस रिपोर्ट को "पूरी तरह झूठा" और "फेक न्यूज" करार दिया है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी बयान में कहा कि रिपोर्ट का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। रिपोर्ट में क्या कहा गया था? अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने कुछ वर्तमान और पूर्व अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दावा किया था कि इजराइल कथित तौर पर ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ को निशाना बनाने की योजना बना सकता था। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों नेता ईरान की ओर से युद्धविराम और शांति वार्ता में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। अमेरिका की चिंता का दावा रिपोर्ट में कहा गया था कि अप्रैल में चल रही वार्ताओं के दौरान अमेरिकी अधिकारियों को आशंका थी कि यदि ईरानी वार्ताकारों पर हमला हुआ तो शांति प्रक्रिया पूरी तरह पटरी से उतर सकती है और क्षेत्र में संघर्ष दोबारा तेज हो सकता है। इसी कारण अमेरिका ने कथित तौर पर क्षेत्र के कुछ देशों के माध्यम से ईरान को संभावित खतरे के प्रति सतर्क करने का प्रयास किया था। संघर्ष और खुफिया सहयोग को लेकर भी दावा रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि 28 फरवरी को शुरू हुए सैन्य अभियान में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौत हुई थी तथा इस अभियान में अमेरिकी खुफिया जानकारी का उपयोग किया गया। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ट्रंप-नेतन्याहू संबंधों का भी जिक्र रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अमेरिका और इजराइल के करीबी संबंधों के बावजूद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जून 2026 के दौरान लेबनान और ईरान से जुड़े मुद्दों पर कई मौकों पर प्रधानमंत्री नेतन्याहू की सार्वजनिक आलोचना की थी। इसके आधार पर रिपोर्ट में संकेत दिया गया कि क्षेत्रीय तनाव और शांति वार्ता को लेकर दोनों सहयोगी देशों के बीच कुछ मतभेद उभर सकते हैं। इजराइल ने किया स्पष्ट इनकार इजराइली सरकार ने इन सभी दावों को पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा कि रिपोर्ट में प्रकाशित जानकारी तथ्यात्मक रूप से गलत है और इसका वास्तविक घटनाओं से कोई संबंध नहीं है। फिलहाल इस मामले पर अमेरिका या ईरान की ओर से कोई नया आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
यरुशलम/नई दिल्ली: Sharren Haskel ने कहा है कि ईरान पर भरोसा करना आसान नहीं है और भारत सहित सभी लोकतांत्रिक देशों को सतर्क रहना चाहिए। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु एवं क्षेत्रीय तनाव से जुड़े मुद्दों पर बातचीत जारी है। अमेरिका-ईरान वार्ता पर जताया संदेह समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, शैरेन हैस्केल ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए अमेरिका-ईरान वार्ता से बहुत अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती। उन्होंने ईरान को एक आक्रामक शासन बताते हुए कहा कि केवल बातचीत पर्याप्त नहीं है, बल्कि भरोसा तभी कायम हो सकता है जब उसके व्यवहार में वास्तविक बदलाव दिखाई दे। इजराइल लंबे समय से लगाता रहा है आरोप इजराइल लगातार ईरान पर आरोप लगाता रहा है कि वह पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ाने, विभिन्न सशस्त्र समूहों का समर्थन करने और अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर, ईरान इन आरोपों को खारिज करता रहा है और कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है तथा इजराइल क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है। दोनों देशों के बीच तनाव 1979 की Iranian Revolution के बाद से लगातार बना हुआ है और हाल के वर्षों में कई बार सैन्य टकराव भी देखने को मिले हैं। भारत का संतुलित रुख भारत ने अब तक पश्चिम एशिया के मुद्दों पर संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई है। भारत के इजराइल के साथ रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में मजबूत संबंध हैं। वहीं ईरान भारत की ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है। इसी कारण भारत दोनों देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखते हुए किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करने से बचता रहा है। वैश्विक नजर अमेरिका-ईरान वार्ता पर अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ता का उद्देश्य क्षेत्रीय तनाव कम करना और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े विवादों का समाधान तलाशना है। इजराइल लगातार इस प्रक्रिया को लेकर अपनी आशंकाएं व्यक्त करता रहा है। शैरेन हैस्केल का ताजा बयान भी इसी नीति को दोहराता है कि स्थायी भरोसे के लिए केवल कूटनीतिक बातचीत नहीं, बल्कि ईरान के व्यवहार में ठोस बदलाव आवश्यक है।
यरुशलम: Benjamin Netanyahu ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि आवश्यकता पड़ी तो इजरायल दोबारा सैन्य कार्रवाई करने से नहीं हिचकेगा। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय तनाव को लेकर कूटनीतिक बातचीत जारी है। तुर्की की सरकारी समाचार एजेंसी अनादोलु के अनुसार, एक इंटरव्यू में नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल अपनी सुरक्षा के मामले में किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं रहेगा और ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने को तैयार है। 'जरूरत पड़ी तो तीसरी बार भी करेंगे कार्रवाई' नेतन्याहू ने दावा किया कि ईरान के खिलाफ पहले की गई सैन्य कार्रवाइयों ने इजरायल को संभावित परमाणु खतरे से बचाया। उन्होंने कहा कि यदि इजरायल की सुरक्षा को फिर से खतरा महसूस हुआ, तो ईरान के खिलाफ एक और सैन्य अभियान शुरू किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इजरायल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेगा और किसी भी संभावित खतरे का जवाब देने के लिए तैयार रहेगा। अमेरिका-ईरान वार्ता के बीच बढ़ा तनाव नेतन्याहू का बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने और परमाणु मुद्दों पर सहमति बनाने के प्रयास जारी हैं। दोनों पक्ष संघर्षविराम को व्यापक राजनीतिक समझौते में बदलने की दिशा में बातचीत कर रहे हैं। इन वार्ताओं में क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों में संभावित राहत और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं। इजरायल ने दोहराया अपना रुख इजरायल पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि वह ऐसे किसी भी समझौते से स्वयं को बाध्य नहीं मानेगा, जो उसकी दृष्टि में ईरान की सैन्य या परमाणु क्षमताओं को बढ़ावा देता हो। इजरायली नेतृत्व का कहना है कि देश की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और आवश्यकता पड़ने पर वह एकतरफा कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रखता है। ट्रंप ने संयम बरतने की अपील की वहीं, Donald Trump ने सार्वजनिक रूप से सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि पश्चिम एशिया में दोबारा सैन्य तनाव बढ़ना किसी के हित में नहीं होगा और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
मुंबई,एजेंसियां। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में बुधवार को हुई भारी बारिश ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया। लगातार हो रही बारिश के कारण कई निचले इलाकों में जलभराव की स्थिति बन गई, जिससे सड़क यातायात बाधित रहा और लोगों को आवागमन में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। अंधेरी सबवे में करीब पांच फीट पानी भर जाने के कारण प्रशासन को एहतियातन इसे यातायात के लिए बंद करना पड़ा। लोकल ट्रेन सेवा पर पड़ा असर भारी बारिश का असर मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन सेवा पर भी देखने को मिला। वेस्टर्न, सेंट्रल और हार्बर लाइन की कई ट्रेनें देरी से चलीं। हार्बर लाइन पर ओवरहेड इलेक्ट्रिक (OHE) वायर में तकनीकी खराबी आने से कई लोकल ट्रेनें बीच रास्ते में ही रुक गईं। सुबह के व्यस्त समय में आई इस समस्या से हजारों यात्रियों को परेशानी उठानी पड़ी। रेलवे की तकनीकी टीम ने मौके पर पहुंचकर मरम्मत कार्य शुरू किया, जिसके बाद धीरे-धीरे सेवाएं सामान्य करने का प्रयास किया गया। बालकनी गिरने से व्यक्ति की मौत दक्षिण मुंबई के बाबुलनाथ रोड स्थित MHADA की 'सूर्यप्रकाश' इमारत में मंगलवार देर रात तीसरी मंजिल की बालकनी का एक हिस्सा अचानक गिर गया। हादसे में 51 वर्षीय संतोष रामचंद्र भारस्कर गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद फायर ब्रिगेड, पुलिस, एम्बुलेंस और नगर निगम की टीम मौके पर पहुंची तथा सुरक्षा के मद्देनजर आवश्यक कदम उठाए गए। कई जिलों में ऑरेंज अलर्ट भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने मुंबई, ठाणे, पालघर, रायगढ़, रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। विभाग ने अगले चार से पांच दिनों तक भारी बारिश, तेज हवाओं और कुछ स्थानों पर बिजली गिरने की चेतावनी दी है। प्रशासन ने नागरिकों से अनावश्यक यात्रा से बचने, जलभराव वाले क्षेत्रों से दूर रहने और मौसम विभाग की सलाह का पालन करने की अपील की है। वहीं, रेलवे, नगर निगम और आपदा प्रबंधन विभाग को किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए अलर्ट मोड पर रखा गया है।
तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच जारी परमाणु वार्ता के बीच ईरान ने अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण को लेकर नया रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि उसके परमाणु ठिकानों तक पहुंच केवल अंतिम समझौते के बाद ही दी जाएगी। तेहरान ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक अमेरिका प्रतिबंधों और दंडात्मक उपायों को हटाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक किसी भी प्रकार के निरीक्षण की अनुमति नहीं दी जाएगी। IAEA प्रमुख की मांग को किया खारिज ईरान के उप विदेश मंत्री Kazem Gharibabadi ने बुधवार को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी International Atomic Energy Agency के महानिदेशक Rafael Grossi की उस टिप्पणी को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने ईरान के परमाणु स्थलों के निरीक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया था। गरीबाबादी ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में परमाणु प्रतिष्ठानों या वहां मौजूद परमाणु सामग्री तक किसी भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी की पहुंच देने की कोई योजना नहीं है। स्विट्जरलैंड में नहीं हुई मुलाकात सोशल मीडिया पर जारी अपने बयान में ईरानी उप विदेश मंत्री ने दावा किया कि ग्रोसी के अनुरोध के बावजूद स्विट्जरलैंड में उनकी कोई बैठक नहीं हुई। उन्होंने कहा कि जिन परमाणु ठिकानों पर हाल के महीनों में हमले हुए हैं, वहां निरीक्षण की अनुमति देने का सवाल अभी विचाराधीन भी नहीं है। इन मुद्दों पर फैसला केवल अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक और अंतिम समझौते के तहत ही लिया जाएगा। प्रतिबंध हटाने को बनाया शर्त गरीबाबादी ने कहा कि निरीक्षण व्यवस्था पर सहमति तभी बन सकती है, जब दूसरी ओर से सभी आर्थिक प्रतिबंधों और अन्य दंडात्मक उपायों को समाप्त करने के लिए व्यावहारिक और भरोसेमंद कदम उठाए जाएं। उन्होंने संकेत दिया कि ईरान किसी भी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं करेगा, जिसमें केवल निगरानी और निरीक्षण की शर्तें हों, लेकिन प्रतिबंधों में राहत का स्पष्ट प्रावधान न हो। परमाणु डील पर बढ़ सकता है गतिरोध विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की इस नई शर्त से परमाणु वार्ता और जटिल हो सकती है। अमेरिका लंबे समय से इस बात पर जोर देता रहा है कि किसी भी समझौते में स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था अनिवार्य होगी, ताकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी सुनिश्चित की जा सके। दूसरी ओर, तेहरान का कहना है कि निरीक्षण और सत्यापन की प्रक्रिया को प्रतिबंधों में राहत से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 'मीडिया दबाव से नहीं बदलेगा ईरान का रुख' ईरानी उप विदेश मंत्री ने अपने बयान में पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि मीडिया के जरिए दबाव बनाने या राजनीतिक माहौल तैयार करने की कोशिशों से ईरान अपनी नीति नहीं बदलेगा। उन्होंने कहा, "मीडिया के शोर-शराबे और दबाव की राजनीति के जरिए इन मुद्दों को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। किसी भी निर्णय का आधार केवल अंतिम समझौता और पारस्परिक प्रतिबद्धताओं का पालन होगा।" अंतिम समझौते पर टिकी निगाहें अमेरिका और ईरान के बीच जारी वार्ता का उद्देश्य परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े विवादों का स्थायी समाधान तलाशना है। निरीक्षण व्यवस्था को लेकर सामने आए नए मतभेदों ने यह संकेत दिया है कि दोनों पक्षों के बीच अभी भी कई अहम मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु निरीक्षण और प्रतिबंधों में राहत का मुद्दा आने वाले दौर की वार्ताओं में सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर चल रही बातचीत के बीच परमाणु निरीक्षण का मुद्दा एक बार फिर विवाद के केंद्र में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी अंतिम समझौते में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को ईरान के परमाणु ठिकानों की जांच की अनुमति देना अनिवार्य होगा। वहीं, ईरान इस तरह की व्यापक निरीक्षण व्यवस्था को स्वीकार करने से इनकार करता नजर आ रहा है। ट्रंप ने ईरान के दावों को बताया गलत पेंसिल्वेनिया में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरानी अधिकारियों के उन दावों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि तेहरान ने किसी व्यापक अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था को मंजूरी नहीं दी है। ट्रंप ने कहा कि ईरानी अधिकारी इस मुद्दे पर गलत जानकारी दे रहे हैं और उन्हें बातचीत में तय हो रही शर्तों की पूरी जानकारी है। उन्होंने कहा, “निरीक्षण व्यवस्था सौ फीसदी तय है। अगर ऐसा नहीं होता तो मैं अभी बातचीत और बैठकों को रद्द कर देता।” IAEA को मिलेगी परमाणु ठिकानों तक पहुंच अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि भविष्य में IAEA के निरीक्षकों को ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों तक पहुंच मिलेगी और वे मौके पर जाकर जांच कर सकेंगे। ट्रंप के अनुसार, किसी भी समझौते की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र और अंतरराष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था जरूरी है। उन्होंने कहा कि उचित समय आने पर निरीक्षक जमीन पर मौजूद होंगे और समझौते के अनुपालन की पुष्टि करेंगे। निरीक्षण व्यवस्था पर दोनों देशों में मतभेद परमाणु निगरानी को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। अमेरिका का मानना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर किसी भी समझौते में स्वतंत्र जांच और सत्यापन की व्यवस्था जरूरी है। वहीं, ईरान कई बार यह कह चुका है कि उसकी परमाणु गतिविधियां शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हैं और अत्यधिक अंतरराष्ट्रीय निगरानी उसकी संप्रभुता के खिलाफ हो सकती है। ईरान ने ट्रंप और जेडी वेंस के दावों को नकारा ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने अमेरिकी दावों को खारिज करते हुए कहा कि परमाणु स्थलों की जांच को लेकर कोई अंतिम समयसीमा तय नहीं हुई है। उन्होंने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस बयान का भी खंडन किया, जिसमें कहा गया था कि ईरान स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए तैयार हो गया है। बघाई ने कहा कि इस विषय पर अभी कई मुद्दों पर चर्चा बाकी है। परमाणु समझौतों में हमेशा अहम रहा है सत्यापन विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान से जुड़े सभी प्रमुख परमाणु समझौतों में निगरानी और सत्यापन सबसे महत्वपूर्ण तत्व रहे हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी देश चाहते हैं कि यह सुनिश्चित किया जाए कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण और नागरिक उद्देश्यों तक सीमित रहे। दूसरी ओर, ईरान का तर्क रहा है कि सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर उसकी चिंताओं को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। 60 दिनों की समयसीमा में आगे बढ़ रही बातचीत अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए समझौते के तहत कई मुद्दों पर चरणबद्ध बातचीत जारी है। दोनों पक्षों ने 60 दिनों के भीतर व्यापक सहमति बनाने की दिशा में काम करने पर सहमति जताई है। स्विट्जरलैंड में हाल में हुई वार्ता में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी अधिकारियों के बीच परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, क्षेत्रीय सुरक्षा, पुनर्निर्माण और होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य हो रही गतिविधियां वार्ता के बाद अमेरिकी प्रशासन ने दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल परिवहन में तेजी आई है और समुद्री गतिविधियां सामान्य होने लगी हैं। अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठनों के अनुसार, क्षेत्र में फंसे हजारों नाविकों और जहाज कर्मियों को सुरक्षित निकालने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। अंतिम समझौते में निरीक्षण बन सकता है सबसे बड़ा मुद्दा विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक शांति समझौते की राह में परमाणु निरीक्षण सबसे संवेदनशील और निर्णायक मुद्दा बन सकता है। ट्रंप के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन किसी भी अंतिम समझौते में निरीक्षण और सत्यापन तंत्र से समझौता करने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तेहरान अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था को लेकर कितना लचीला रुख अपनाता है और क्या दोनों देश किसी साझा समाधान तक पहुंच पाते हैं।
वॉशिंगटन/बर्गेनस्टॉक: अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में हुई दो दिवसीय वार्ता के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दावा किया है कि ईरान अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को दोबारा अपने परमाणु प्रतिष्ठानों तक पहुंच देने पर सहमत हो गया है। यदि यह सहमति औपचारिक रूप लेती है, तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम की अंतरराष्ट्रीय निगरानी फिर से शुरू हो सकेगी। इसी बीच, ट्रंप प्रशासन ने ईरानी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर लगे कुछ प्रतिबंधों में 60 दिनों की अस्थायी छूट देने का फैसला किया है। इस कदम को दोनों देशों के बीच जारी वार्ता को आगे बढ़ाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। अगस्त तक ईरानी तेल निर्यात को मिली राहत अमेरिकी वित्त मंत्रालय की ओर से जारी छूट के तहत अगस्त तक ईरानी कच्चे तेल और उससे जुड़े उत्पादों की बिक्री, परिवहन और कुछ वित्तीय गतिविधियों को सीमित अनुमति दी गई है। यह हाल के वर्षों में ईरान को दी गई सबसे बड़ी आर्थिक रियायतों में से एक मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से ईरान की अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिल सकती है, जो लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में रही है। वेंस का दावा- अमेरिकी किसानों को भी होगा फायदा जेडी वेंस ने कहा कि यदि भविष्य में ईरान की जमी हुई संपत्तियों को जारी किया जाता है, तो उसका एक हिस्सा अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद में इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने कहा, "यदि ईरानी संपत्तियां मुक्त होती हैं, तो इससे अमेरिकी किसानों को लाभ मिलेगा और ईरानी लोगों की खाद्य जरूरतें पूरी करने में भी मदद मिलेगी।" वेंस ने यह भी संकेत दिया कि आगामी 60 दिनों के दौरान तकनीकी स्तर की वार्ताएं जारी रहेंगी, जिनका उद्देश्य एक स्थायी समझौते तक पहुंचना है। IAEA निरीक्षण को लेकर उठे सवाल वेंस के दावों पर कई विशेषज्ञों ने सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना है कि IAEA निरीक्षण की व्यवस्था पहले से ही 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) का हिस्सा थी, जिसे 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समाप्त कर दिया था। कई विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा पहल पुराने ढांचे को ही नए स्वरूप में पुनर्जीवित करने की कोशिश है। वार्ता के दौरान दिखा तनाव स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में हुई वार्ता के दौरान कई बार तनाव की स्थिति भी बनी। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कुछ बयानों और लेबनान से जुड़े मुद्दों पर ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अस्थायी रूप से बैठक छोड़ने की चेतावनी दी थी। उपराष्ट्रपति वेंस के हस्तक्षेप के बाद दोनों पक्ष दोबारा बातचीत की मेज पर लौटे और वार्ता आगे बढ़ सकी। पाकिस्तान और कतर ने निभाई अहम भूमिका पूरी बातचीत के दौरान पाकिस्तान और कतर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। दोनों देशों ने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद बनाए रखने और संभावित समझौते की दिशा में माहौल तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इजरायल समर्थक खेमे में बढ़ी चिंता ईरानी तेल प्रतिबंधों में ढील और परमाणु निगरानी को लेकर चल रही वार्ता ने अमेरिका के इजरायल समर्थक राजनीतिक वर्ग में चिंता बढ़ा दी है। कई नेताओं का मानना है कि प्रतिबंधों में राहत से ईरान को आर्थिक मजबूती मिल सकती है, जिसका क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, अगले 60 दिन अमेरिका और ईरान के रिश्तों के लिए निर्णायक माने जा रहे हैं। यदि दोनों पक्ष बातचीत को आगे बढ़ाने में सफल रहते हैं, तो पश्चिम एशिया में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक नई शुरुआत हो सकती है।
वॉशिंगटन/बर्गेनस्टॉक: स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच हुई तनावपूर्ण वार्ता के एक दिन बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान को कड़ी चेतावनी दी है। ट्रंप ने साफ कहा कि यदि ईरान अंतरिम शांति समझौते के तहत किए गए वादों का पालन नहीं करता है, तो अमेरिका सख्त जवाबी कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा, "अगर ईरान समझौते की शर्तों का पालन नहीं करता या उसका रवैया ठीक नहीं रहता, तो हम वही करेंगे जो जरूरी होगा।" उनके इस बयान को तेहरान के लिए स्पष्ट चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। पहले दौर की वार्ता में दिखा था तनाव स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में अमेरिका और ईरान के बीच पहले दौर की बातचीत के दौरान भी तनाव देखने को मिला। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर ट्रंप की टिप्पणी पर ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने नाराजगी जताई और कुछ समय के लिए वार्ता कक्ष छोड़कर बाहर चला गया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद दोनों देशों के बीच हाल ही में हुए अंतरिम समझौते के भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे थे। जेडी वेंस बोले- मजबूत समझौते की नींव पड़ी शुरुआती तनाव के बावजूद वार्ता बाद में पटरी पर लौटती दिखाई दी। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि ईरानी अधिकारियों के साथ हुई बातचीत ने अंतिम समझौते के लिए मजबूत आधार तैयार किया है। ईरान ने उन रिपोर्टों को खारिज कर दिया, जिनमें दावा किया गया था कि वार्ता का दायरा उसके परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) तक बढ़ा दिया गया है। ईरान को आर्थिक राहत, प्रतिबंधों में मिली छूट अंतरिम समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान को सीमित आर्थिक राहत देने का फैसला किया है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय (US Treasury Department) ने 21 अगस्त तक कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी छूट प्रदान की है। इस फैसले के बाद ईरान को तेल और उससे जुड़े उत्पादों के निर्यात की अनुमति मिल गई है। साथ ही उसे इन निर्यातों के बदले भुगतान प्राप्त करने की भी मंजूरी दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्रतिबंधों से जूझ रही ईरानी अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिल सकती है। पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में हुई बातचीत अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में आयोजित की गई। दोनों देशों ने पिछले सप्ताह हुए अंतरिम समझौते को आगे बढ़ाने के लिए 60 दिनों का रोडमैप तैयार करने पर सहमति जताई है। इस रोडमैप का उद्देश्य स्थायी समझौते की दिशा में आगे बढ़ना, क्षेत्रीय तनाव कम करना और लंबित विवादित मुद्दों का समाधान निकालना है। दोनों पक्षों ने बातचीत जारी रखने और कूटनीतिक माध्यमों से समाधान तलाशने की प्रतिबद्धता भी दोहराई है। 60 दिन की राहत, लेकिन दबाव बरकरार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका द्वारा दी गई 60 दिनों की राहत ईरान को आर्थिक और कूटनीतिक अवसर प्रदान करती है, लेकिन ट्रंप की चेतावनी यह भी स्पष्ट करती है कि वाशिंगटन समझौते के उल्लंघन पर कठोर रुख अपनाने से पीछे नहीं हटेगा। ऐसे में आने वाले दो महीने अमेरिका-ईरान संबंधों और मध्य-पूर्व की स्थिरता के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं।
Donald Trump Iran Warning: मध्य पूर्व में शांति बहाली की कोशिशों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में अमेरिका, ईरान, पाकिस्तान और कतर के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन इसी दौरान ट्रंप ने ईरान को सीधे सैन्य कार्रवाई की चेतावनी देकर तनाव बढ़ा दिया है। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर दी धमकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक सख्त पोस्ट साझा करते हुए कहा कि ईरान को लेबनान में सक्रिय अपने समर्थित सशस्त्र गुटों और प्रॉक्सी संगठनों को तुरंत हिंसक गतिविधियां रोकने के लिए कहना चाहिए। ट्रंप ने लिखा, "यदि ईरान ने अपने भारी भुगतान पाने वाले प्रॉक्सी संगठनों को तबाही मचाने से नहीं रोका, तो अमेरिका फिर से बड़ा हमला करेगा। यह हमला पिछले सप्ताह की कार्रवाई से भी कहीं अधिक भीषण होगा।" शांति वार्ता के बीच बढ़ा कूटनीतिक दबाव ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए महत्वपूर्ण वार्ता चल रही है। इस बैठक में पाकिस्तान और कतर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं और परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा तथा आर्थिक प्रतिबंधों जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है। ट्रंप की नई चेतावनी ने इस शांति प्रक्रिया पर अनिश्चितता के बादल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति का यह बयान ईरान पर अतिरिक्त कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है। लेबनान में ईरान समर्थित गुटों को लेकर अमेरिका चिंतित अमेरिका लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि ईरान लेबनान में सक्रिय अपने समर्थित संगठनों, विशेष रूप से हिज्बुल्लाह, के जरिए क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करता है। वॉशिंगटन का मानना है कि इन संगठनों की गतिविधियां न केवल इजरायल बल्कि पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा के लिए चुनौती हैं। ट्रंप ने अपने संदेश में स्पष्ट संकेत दिया कि यदि ईरान ने इन समूहों पर नियंत्रण नहीं किया, तो अमेरिका सैन्य विकल्प अपनाने से पीछे नहीं हटेगा। वार्ता पर पड़ सकता है असर विश्लेषकों का कहना है कि एक तरफ शांति वार्ता और दूसरी तरफ सैन्य कार्रवाई की खुली चेतावनी, दोनों मिलकर अमेरिका-ईरान संबंधों को और जटिल बना सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ईरान ट्रंप की चेतावनी पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या स्विट्जरलैंड में जारी वार्ता किसी ठोस समझौते तक पहुंच पाती है। मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच ट्रंप का यह बयान एक बार फिर इस क्षेत्र की नाजुक स्थिति को उजागर करता है।
बर्गेनस्टॉक (स्विट्जरलैंड): मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में स्थायी शांति बहाल करने के उद्देश्य से स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में अमेरिका और ईरान के बीच अहम शांति वार्ता शुरू हो गई है। इस बातचीत में पाकिस्तान और कतर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी तनाव, परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जा रही है। बैठक के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने वार्ता को "ऐतिहासिक अवसर" करार देते हुए कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका, ईरान के साथ अपने संबंधों को नई और सकारात्मक दिशा देने के लिए तैयार है। ईरान के सामने अमेरिका की बड़ी शर्त जेडी वेंस ने स्पष्ट किया कि अमेरिका, ईरान के साथ संबंध सामान्य करने और दोस्ती का नया अध्याय शुरू करने को तैयार है, लेकिन इसके लिए तेहरान को दो महत्वपूर्ण शर्तों को स्थायी रूप से स्वीकार करना होगा— क्षेत्र में अस्थिरता और संघर्ष फैलाने वाली नीतियों का त्याग। परमाणु हथियार हासिल करने की महत्वाकांक्षा को हमेशा के लिए छोड़ना। वेंस ने कहा कि यदि ईरान इन दोनों मुद्दों पर सकारात्मक और स्थायी कदम उठाता है, तो वाशिंगटन उसके साथ रिश्तों को पूरी तरह बदलने के लिए तैयार है। होर्मुज जलडमरूमध्य और परमाणु मुद्दे पर प्रगति का दावा अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने जैसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक लक्ष्यों की दिशा में पहले ही महत्वपूर्ण प्रगति हो चुकी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह वार्ता मध्य पूर्व में स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए नए रास्ते खोलेगी। पाकिस्तान की मध्यस्थता की सराहना जेडी वेंस ने इस शांति वार्ता को संभव बनाने में पाकिस्तान की भूमिका की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की कूटनीतिक कोशिशों ने अमेरिका और ईरान को बातचीत की मेज तक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वेंस ने आसिम मुनीर को "एक महान सैन्य नेता और कुशल राजनयिक" बताया। भारतीय पत्नी और पाकिस्तानी जनरल का किया जिक्र हल्के-फुल्के अंदाज में जेडी वेंस ने कहा कि उनकी जिंदगी में दो बेहद महत्वपूर्ण लोग हैं—एक उनकी भारतीय मूल की पत्नी उषा वेंस और दूसरे पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर। उन्होंने कहा कि पिछले तीन महीनों में उनकी जनरल मुनीर के साथ लगातार बातचीत हुई है और क्षेत्रीय शांति स्थापित करने के प्रयासों में उनका सहयोग महत्वपूर्ण रहा है। मिडिल ईस्ट में शांति और ऊर्जा सुरक्षा पर नजर वेंस ने उम्मीद जताई कि स्विट्जरलैंड में जारी यह वार्ता मध्य पूर्व में तनाव कम करने, तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने और वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगी। विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता सफल रहती है, तो न केवल क्षेत्रीय संघर्ष कम हो सकते हैं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि यदि उनके देश की जल सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ, तो पाकिस्तान सैन्य कार्रवाई जैसे विकल्पों पर विचार कर सकता है। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब पाकिस्तान पहले से ही गंभीर जल संकट और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। भारत द्वारा पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल समझौते को स्थगित किए जाने के फैसले का असर पाकिस्तान के कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों पर दिखाई देने लगा है। क्या है विवाद की वजह? अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने 1960 के सिंधु जल समझौते को निलंबित कर दिया था। भारत ने स्पष्ट किया था कि जब तक सीमा पार आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह फैसला लागू रहेगा। हाल ही में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल के उस बयान के बाद पाकिस्तान की चिंता और बढ़ गई, जिसमें संकेत दिया गया था कि आने वाले वर्षों में पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी के उपयोग को लेकर भारत अपनी रणनीति मजबूत कर सकता है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर क्यों है असर? सिंधु नदी प्रणाली पाकिस्तान के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। देश की लगभग 80 प्रतिशत खेती इसी जल स्रोत पर निर्भर है। कृषि क्षेत्र— पाकिस्तान की GDP में लगभग 23 प्रतिशत योगदान देता है। कुल कार्यबल के 40 प्रतिशत से अधिक लोगों को रोजगार देता है। ग्रामीण आबादी के बड़े हिस्से की आजीविका का आधार है। कपास और टेक्सटाइल उद्योग पर बढ़ी चिंता पाकिस्तान का टेक्सटाइल उद्योग उसकी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र है। देश के कुल निर्यात का लगभग आधा हिस्सा इसी सेक्टर से आता है और इससे अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा अर्जित होती है। कपास की खेती के लिए सिंधु नदी का पानी बेहद महत्वपूर्ण है। यदि पानी की उपलब्धता प्रभावित होती है, तो इसका असर कपास उत्पादन और उससे जुड़े पूरे टेक्सटाइल उद्योग पर पड़ सकता है। बढ़ सकता है क्षेत्रीय तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि जल सुरक्षा से जुड़े मुद्दे दक्षिण एशिया में संवेदनशील विषय हैं और दोनों देशों के बीच किसी भी प्रकार का तनाव क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। ऐसे मामलों में कूटनीतिक संवाद और अंतरराष्ट्रीय समझौतों की भूमिका अहम मानी जाती है।
वॉशिंगटन/बर्गेनस्टॉक: स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही महत्वपूर्ण वार्ता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी सैन्य चेतावनी दी है। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को बंद करने की कोशिश की, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। ट्रंप के इस बयान ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है। ईरान को ट्रंप की सीधी चेतावनी फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल को चेतावनी देते हुए कहा, "अगर तुम होर्मुज बंद करने की कोशिश करोगे, तो अपने देश तक भी वापस नहीं पहुंच पाओगे।" उनके इस बयान को ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे सख्त चेतावनियों में से एक माना जा रहा है। ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका किसी भी कीमत पर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार को बाधित नहीं होने देगा। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिका का सख्त रुख ट्रंप ने कहा कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ता विफल हो जाती है, तो वाशिंगटन होर्मुज जलडमरूमध्य पर सीधे नियंत्रण स्थापित करने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर सकता है। उन्होंने कहा, "जरूरत पड़ी तो हम होर्मुज का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकते हैं।" ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ऐसी स्थिति में अमेरिका वहां से गुजरने वाले जहाजों पर टैक्स या टोल लगाने का कदम उठा सकता है। जहाजों पर 20 प्रतिशत तक टोल लगाने की चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि यदि ईरान समझौते के रास्ते पर नहीं आता है, तो होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर उनके तेल कार्गो के मूल्य का लगभग 20 प्रतिशत तक टोल लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसा कदम वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। लेबनान और हिज्बुल्लाह का भी किया जिक्र ट्रंप ने ईरान से लेबनान में सक्रिय संगठन हिज्बुल्लाह पर नियंत्रण रखने की भी मांग की। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय संघर्षों को बढ़ाने वाली गतिविधियों पर रोक लगनी चाहिए और ईरान को अपने सहयोगी समूहों की गतिविधियों को नियंत्रित करना होगा। स्विट्जरलैंड में जारी है अहम वार्ता अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक मुद्दों पर महत्वपूर्ण बातचीत चल रही है। हालांकि, ट्रंप के ताजा बयान के बाद इन वार्ताओं के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। विश्लेषकों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ट्रंप की चेतावनी केवल ईरान पर दबाव बनाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा मार्गों पर अमेरिकी रणनीतिक पकड़ को मजबूत करने का भी संकेत है।
बर्गेनस्टॉक (स्विट्जरलैंड): अमेरिका और ईरान के बीच रविवार (21 जून) को स्विट्जरलैंड में शुरू हुई बहुप्रतीक्षित वार्ता की शुरुआत ही तनावपूर्ण माहौल में हुई। बातचीत शुरू होने से पहले ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ प्रस्तावित संयुक्त फोटो सेशन और हाथ मिलाने के कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिया। इसके कुछ देर बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से सैन्य कार्रवाई की नई चेतावनी पर नाराजगी जताते हुए ईरानी प्रतिनिधिमंडल बैठक स्थल से बाहर निकल गया। इस घटनाक्रम का वीडियो सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा तेज हो गई है। बर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में हुई पहली बैठक अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता का पहला दौर स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में आयोजित किया गया। बैठक में अमेरिका, ईरान, पाकिस्तान और कतर के प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए। पाकिस्तान और कतर इस पूरी प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। यह वार्ता हाल ही में हुए 'इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन' (MoU) के तहत शुरू हुई है, जिसके अनुसार अगले 60 दिनों तक दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत होगी। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा की जानी है। हाथ मिलाने और फोटो सेशन से ईरान का इनकार ईरानी समाचार एजेंसी के अनुसार, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल और आयोजकों ने बातचीत शुरू होने से पहले दोनों पक्षों के नेताओं के बीच हाथ मिलाने और संयुक्त फोटो सेशन की व्यवस्था की थी। ईरान के मुख्य वार्ताकार और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ तथा विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इसमें हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। दोनों नेता निर्धारित फोटो सेशन से पहले ही बैठक कक्ष से बाहर निकल गए। कैमरे में कैद हुआ पूरा घटनाक्रम सामने आए वीडियो में देखा जा सकता है कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कमरे से बाहर निकलने से ठीक पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से संक्षिप्त बातचीत की। इसके बाद वह अचानक मुड़े और पूरे ईरानी प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक कक्ष से बाहर चले गए। यह पूरा घटनाक्रम कैमरे में रिकॉर्ड हो गया, जिससे वार्ता की शुरुआत में ही दोनों पक्षों के बीच मौजूद अविश्वास और तनाव उजागर हो गया। ट्रंप की चेतावनी से बढ़ी नाराजगी सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से सैन्य कार्रवाई संबंधी हालिया बयान ने ईरानी पक्ष की नाराजगी बढ़ा दी। ईरान का मानना है कि कूटनीतिक बातचीत के दौरान इस तरह की सार्वजनिक चेतावनियां वार्ता के माहौल को प्रभावित करती हैं और आपसी भरोसे को कमजोर करती हैं। आगे की बातचीत पर दुनिया की नजर शुरुआती तनाव के बावजूद दोनों पक्षों के बीच वार्ता प्रक्रिया पूरी तरह बंद नहीं हुई है। मध्यस्थ देशों पाकिस्तान और कतर की कोशिश है कि बातचीत का अगला दौर सकारात्मक माहौल में आगे बढ़े। विशेषज्ञों का मानना है कि स्विट्जरलैंड में शुरू हुई यह वार्ता पश्चिम एशिया की राजनीति, ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजारों के भविष्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।
नई दिल्ली: महिला टी20 वर्ल्ड कप 2026 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मिली हार ने भारतीय टीम की सेमीफाइनल की राह मुश्किल कर दी है। पाकिस्तान और नीदरलैंड्स को हराकर शानदार शुरुआत करने वाली टीम इंडिया तीसरे मुकाबले में प्रोटियाज टीम के सामने टिक नहीं सकी। अब सिर्फ एक हार ने ग्रुप-1 के समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। ग्रुप-1 में कैसी है स्थिति? ग्रुप-1 में ऑस्ट्रेलिया लगातार तीन जीत के साथ शीर्ष पर है। भारत ने तीन मैचों में दो जीत हासिल की हैं और फिलहाल दूसरे स्थान पर मौजूद है। दक्षिण अफ्रीका और बांग्लादेश के अंक समान हैं, लेकिन बेहतर नेट रन रेट के कारण अफ्रीकी टीम को बढ़त हासिल है। वहीं पाकिस्तान और नीदरलैंड्स की लगातार तीन हार के बाद उनकी नॉकआउट की उम्मीदें लगभग खत्म हो चुकी हैं। भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता? आईसीसी के नियमों के अनुसार प्रत्येक ग्रुप से सिर्फ दो टीमें ही नॉकआउट चरण में पहुंचेंगी। भारत को अब अपने बचे हुए मुकाबले बांग्लादेश और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेलने हैं। अगर भारतीय टीम बांग्लादेश को हराने में सफल रहती है लेकिन ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ हार जाती है, तो उसके कुल 6 अंक होंगे। दूसरी ओर दक्षिण अफ्रीका के सामने बांग्लादेश और नीदरलैंड्स जैसी अपेक्षाकृत कमजोर टीमें हैं। यदि प्रोटियाज टीम दोनों मुकाबले जीत लेती है, तो वह 8 अंकों के साथ सेमीफाइनल में जगह बना सकती है और भारत बाहर हो सकता है। हालांकि अगर ऑस्ट्रेलिया अपने आगामी मैचों में हारती है या अन्य परिणाम भारत के पक्ष में जाते हैं, तो टीम इंडिया के लिए उम्मीदें बनी रह सकती हैं। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मैच का हाल भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 159 रन का लक्ष्य रखा था। जवाब में दक्षिण अफ्रीका ने अनुभवी बल्लेबाज मारिजाम काप की शानदार 81 रन की पारी की बदौलत लक्ष्य को 5 गेंद शेष रहते और 6 विकेट से हासिल कर लिया। मैच के दौरान राधा यादव ने मारिजाम काप के दो अहम कैच छोड़े, जब वह 27 और 66 रन के निजी स्कोर पर थीं। यही चूक अंत में भारतीय टीम पर भारी पड़ गई। अब टीम इंडिया के लिए हर मुकाबला करो या मरो जैसा बन गया है और सेमीफाइनल की उम्मीदों को जिंदा रखने के लिए अगले मैचों में जीत बेहद जरूरी होगी।
बर्गेनस्टॉक/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance स्विट्जरलैंड पहुंच गए हैं। दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच होने वाली इस वार्ता में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, जमे हुए वित्तीय संसाधनों, लेबनान युद्धविराम और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। ईरान की ओर से प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व Mohammad Bagher Ghalibaf कर रहे हैं। इसके अलावा ईरानी विदेश मंत्री Abbas Araghchi और केंद्रीय बैंक के गवर्नर भी वार्ता में शामिल हैं। ईरान को मिल सकता है 6 अरब डॉलर का फंड रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ईरान के कुछ फ्रीज किए गए फंड जारी करने पर विचार कर रहा है। शुरुआती चरण में कतर में जमा करीब 6 अरब डॉलर की राशि को मानवीय जरूरतों से जुड़ी खरीदारी के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। इसके बदले अमेरिका चाहता है कि ईरान संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निरीक्षकों को अपने परमाणु ठिकानों के निरीक्षण की अनुमति दे। यही इस वार्ता के प्रमुख एजेंडों में शामिल है। ट्रंप-पेजेशकियन समझौते के बाद पहली बड़ी वार्ता यह बैठक अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और ईरानी राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian के बीच हुए अंतरिम समझौते के बाद आयोजित की जा रही है। समझौते में 60 दिनों की वार्ता अवधि तय की गई है, जिसका उद्देश्य लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करना और स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ना है। जेडी वेंस बोले- वास्तविक ढांचा तैयार करना लक्ष्य स्विट्जरलैंड रवाना होने से पहले जेडी वेंस ने कहा कि उनका उद्देश्य केवल बातचीत करना नहीं, बल्कि भविष्य की वार्ताओं के लिए एक "वास्तविक और व्यावहारिक ढांचा" तैयार करना है। उन्होंने उम्मीद जताई कि परमाणु मुद्दे और लेबनान युद्धविराम जैसे संवेदनशील विषयों पर प्रगति संभव है। पाकिस्तान भी निभा रहा मध्यस्थ की भूमिका सूत्रों के मुताबिक, वार्ता में मध्यस्थ के रूप में Shehbaz Sharif और Asim Munir भी मौजूद हैं। वार्ता स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में आयोजित होने की संभावना है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी बनी रहेगी नजर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक Strait of Hormuz को लेकर भी तनाव बना हुआ है। ईरान पहले कह चुका है कि उसकी मंजूरी के बिना कोई जहाज इस मार्ग से नहीं गुजर सकता। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि जलडमरूमध्य खुला है और जहाजों की आवाजाही जारी है। डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कहा है कि 60 दिनों के युद्धविराम के दौरान और उसके बाद भी इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर कोई टोल नहीं लगाया जाएगा। इजरायल से वार्ता प्रभावित होने की आशंका अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने आशंका जताई है कि Benjamin Netanyahu की नीतियां और लेबनान में जारी सैन्य गतिविधियां अमेरिका-ईरान वार्ता को प्रभावित कर सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्विट्जरलैंड में होने वाली यह वार्ता पश्चिम एशिया की राजनीति, परमाणु कूटनीति और वैश्विक ऊर्जा बाजारों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
वॉशिंगटन/बेरूत: पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी शांति समझौते को अंतिम रूप देने के लिए स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित उच्चस्तरीय वार्ता फिलहाल टल गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपना स्विट्जरलैंड दौरा रद्द कर दिया है। इस बीच इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हवाई हमले तेज कर दिए हैं, जिनमें कम से कम 16 लोगों की मौत हो गई है। ताजा घटनाक्रम ने अमेरिका-ईरान शांति पहल और पश्चिम एशिया में युद्धविराम की उम्मीदों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्साय समझौते के बाद भी नहीं रुके इजरायली हमले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मौजूदगी में बुधवार को फ्रांस के वर्साय महल में अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रारंभिक 14-सूत्रीय समझौता हुआ था। इस समझौते का उद्देश्य पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को रोकना और सभी मोर्चों पर तत्काल सैन्य कार्रवाई समाप्त करना था। समझौते के कुछ ही घंटों बाद इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर ताबड़तोड़ हवाई हमले शुरू कर दिए। इन हमलों में 16 लोगों के मारे जाने की खबर है। नेतन्याहू ने पीछे हटने से किया इनकार इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक हिजबुल्लाह का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, तब तक इजरायली सेना लेबनान में अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखेगी। नेतन्याहू के इस रुख ने युद्धविराम और क्षेत्रीय शांति की संभावनाओं को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। स्विट्जरलैंड में होने वाली तकनीकी वार्ता टली अमेरिका और ईरान के बीच हुए प्रारंभिक समझौते को स्थायी शांति समझौते में बदलने के लिए शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में तकनीकी स्तर की वार्ता प्रस्तावित थी। इस बैठक का नेतृत्व अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को करना था, लेकिन उन्होंने अपना स्विट्जरलैंड दौरा रद्द कर दिया, जिसके बाद यह वार्ता अनिश्चितकाल के लिए टाल दी गई। व्हाइट हाउस ने बताई 'लॉजिस्टिक्स' समस्या व्हाइट हाउस ने जेडी वेंस का दौरा रद्द होने के पीछे व्यवस्थागत और लॉजिस्टिक्स संबंधी कारणों का हवाला दिया है। हिजबुल्लाह समर्थक मीडिया संस्थान अल-मायादीन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने लेबनान पर इजरायल के लगातार हो रहे हमलों के विरोध में अपने प्रतिनिधिमंडल को स्विट्जरलैंड भेजने से इनकार कर दिया है। इजरायल को जेडी वेंस की दोटूक चेतावनी शांति समझौते के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायल को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि इस समय दुनिया में केवल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ही ऐसे नेता हैं जो इजरायल के प्रति सबसे अधिक सहानुभूति रखते हैं। वेंस के बयान को इजरायल के आक्रामक सैन्य रुख पर अमेरिकी असंतोष और युद्ध रोकने के बढ़ते दबाव के रूप में देखा जा रहा है। अधर में लटका 60 दिनों का युद्धविराम बुधवार को हुए समझौते के तहत कम-से-कम 60 दिनों के लिए संघर्षविराम बढ़ाने पर सहमति बनी थी। लेकिन लेबनान में जारी इजरायली हमलों और स्विट्जरलैंड वार्ता के टलने से पूरा शांति समझौता संकट में पड़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लेबनान में हिंसा नहीं रुकी, तो पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने की यह बड़ी कूटनीतिक पहल पूरी तरह विफल हो सकती है। पश्चिम एशिया में फिर बढ़ा अनिश्चितता का माहौल अमेरिका-ईरान समझौते के बावजूद लेबनान में जारी संघर्ष और इजरायल के सख्त रुख ने क्षेत्र में तनाव को फिर बढ़ा दिया है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच कोई नया कूटनीतिक रास्ता निकलेगा या पश्चिम एशिया एक बार फिर व्यापक संघर्ष की ओर बढ़ेगा।
एवियन/वॉशिंगटन: फ्रांस में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि तेहरान के साथ प्रस्तावित समझौता अभी अंतिम रूप में नहीं पहुंचा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल एक मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) है और यदि उन्हें इसकी शर्तें पसंद नहीं आईं या ईरान ने अपेक्षित व्यवहार नहीं किया, तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई करने से नहीं हिचकेगा। ट्रंप ने कहा, "यह कोई अंतिम समझौता नहीं है। अगर मुझे यह पसंद नहीं आया या ईरान ने सही तरीके से व्यवहार नहीं किया, तो हम फिर से उन पर कार्रवाई करेंगे।" उन्होंने ईरान पर पिछले 47 वर्षों से क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा करने का आरोप लगाते हुए कहा कि अब उसे अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा। व्हाइट हाउस ने समझौते को बताया रणनीतिक सफलता व्हाइट हाउस की ओर से रिपब्लिकन सांसदों और ट्रंप समर्थकों को भेजे गए एक दस्तावेज में दावा किया गया है कि प्रस्तावित समझौते से अमेरिका अपने प्रमुख रणनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने में सफल रहा है। दस्तावेज के अनुसार, समझौते के प्रमुख बिंदु हैं— • ईरान परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। • होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री आवाजाही सामान्य बनी रहेगी। • पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। समझौते की गोपनीयता पर उठ रहे सवाल अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते का पूरा विवरण अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसके चलते अमेरिकी राजनीतिक हलकों में कई सवाल उठ रहे हैं। कई रिपब्लिकन नेताओं ने भी माना है कि शर्तों को गोपनीय रखने से भ्रम और अटकलें बढ़ी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक समझौते का पूरा दस्तावेज सामने नहीं आता, तब तक यह स्पष्ट नहीं हो सकेगा कि दोनों देशों ने किन शर्तों पर सहमति बनाई है और उनकी वास्तविक प्रतिबद्धताएं क्या हैं। दुनिया की नजरें अमेरिका-ईरान वार्ता पर अमेरिका और ईरान के बीच जारी वार्ता पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं, क्योंकि इसका सीधा असर पश्चिम एशिया की स्थिरता, वैश्विक तेल बाजार और होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर पड़ सकता है। ट्रंप के ताजा बयान से यह भी संकेत मिला है कि कूटनीतिक बातचीत के साथ-साथ सैन्य विकल्प अभी भी अमेरिकी रणनीति का हिस्सा बने हुए हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।