क्यूबा और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तनाव को लेकर नई अटकलें तेज हो गई हैं। अमेरिकी गतिविधियों और हालिया राजनीतिक बयानों के बाद यह चर्चा बढ़ गई है कि वॉशिंगटन क्यूबा पर दबाव बढ़ा सकता है या वहां सत्ता परिवर्तन की कोशिश कर सकता है। अमेरिका की ओर से किसी संभावित सैन्य कार्रवाई की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है। राउल कास्त्रो पर हत्या का मामला अमेरिका में राउल कास्त्रो के खिलाफ हत्या से जुड़ा मामला दर्ज किए जाने की खबरों ने तनाव बढ़ा दिया है। उन पर 1996 में दो नागरिक विमानों को गिराने के मामले में आरोप लगाए गए हैं। इन विमानों को कथित तौर पर कास्त्रो विरोधी पायलट उड़ा रहे थे। राउल कास्त्रो, क्यूबा की 1959 की कम्युनिस्ट क्रांति के नेता फिदेल कास्त्रो के छोटे भाई हैं और आज भी क्यूबा की राजनीति में प्रभावशाली माने जाते हैं। ट्रंप का बयान बना चर्चा का केंद्र डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा कि अमेरिका “क्यूबा को आजाद करा रहा है” और वहां के लोगों की मदद करेगा। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका को क्यूबा के हालात की पूरी जानकारी है और वहां अमेरिकी खुफिया एजेंसियां सक्रिय हैं। अमेरिकी विदेश विभाग ने भी सोशल मीडिया पर ट्रंप के बयान को साझा किया। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयान क्यूबा सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं। कैरेबियन सागर में पहुंचा USS Nimitz अमेरिकी नौसेना का विमानवाहक युद्धपोत USS Nimitz और उसका स्ट्राइक ग्रुप कैरेबियन क्षेत्र में पहुंच चुका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस समूह में F/A-18E सुपर हॉर्नेट लड़ाकू विमान, EA-18G ग्रोलर विमान और अन्य सैन्य जहाज शामिल हैं। अमेरिकी साउदर्न कमांड ने इसकी पुष्टि की है। अमेरिका ने इसे नियमित सैन्य तैनाती बताया है, लेकिन समय को देखते हुए इसे क्यूबा पर दबाव बढ़ाने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। क्यूबा के आसपास जासूसी विमानों की उड़ान रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिकी नौसेना के P-8A Poseidon निगरानी विमान लगातार क्यूबा के आसपास उड़ान भर रहे हैं। कुछ विमान क्यूबा से करीब 80 किलोमीटर की दूरी तक पहुंच गए। Flightradar24 और BBC Verify की रिपोर्टों में कहा गया है कि इन विमानों की गतिविधियां समुद्री और सैन्य मूवमेंट पर नजर रखने से जुड़ी हो सकती हैं। अमेरिकी ड्रोन गतिविधियों में बढ़ोतरी इसके अलावा MQ-4C Triton निगरानी ड्रोन भी क्यूबा के आसपास सक्रिय देखे गए हैं। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इन ड्रोन और निगरानी विमानों की उड़ानें क्षेत्रीय समुद्री गतिविधियों की गहन निगरानी का संकेत देती हैं। Center for Strategic and International Studies से जुड़े रक्षा विशेषज्ञ मार्क कैंशियन ने कहा कि अमेरिका संभवतः क्यूबा के आसपास आने-जाने वाले जहाजों और सैन्य गतिविधियों पर करीबी नजर रख रहा है। क्या वाकई सैन्य कार्रवाई संभव है? विशेषज्ञों का मानना है कि अभी तक किसी संभावित हमले की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। अमेरिका और क्यूबा के बीच लंबे समय से राजनीतिक तनाव और प्रतिबंध जारी हैं, लेकिन सैन्य कार्रवाई जैसा कदम बेहद गंभीर माना जाएगा। फिलहाल इन घटनाक्रमों को बढ़ते रणनीतिक दबाव, निगरानी और राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि कैरेबियन क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता जरूर बढ़ा दी है।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे अमेरिकी नौसेना के तीन युद्धपोतों पर हमला किया गया. हालांकि उन्होंने कहा कि अमेरिकी जहाज सुरक्षित रहे, लेकिन जवाबी कार्रवाई में ईरानी हमलावरों को भारी नुकसान पहुंचाया गया. ट्रंप का दावा- अमेरिकी जहाजों पर हुआ हमला ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करते हुए कहा कि अमेरिकी नौसेना के तीन आधुनिक डेस्ट्रॉयर युद्धपोत सफलतापूर्वक होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे थे, तभी उन पर हमला किया गया. उनके मुताबिक, अमेरिकी सेना ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की और हमलावरों को भारी नुकसान पहुंचाया. हालांकि ट्रंप ने यह साफ नहीं किया कि हमला किस प्रकार का था और इसमें कितना नुकसान हुआ. अमेरिकी रक्षा विभाग की ओर से भी इस घटना को लेकर विस्तृत जानकारी अभी सामने नहीं आई है. ईरान को दी बड़ी धमकी ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर तेहरान जल्द किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करता, तो अमेरिका भविष्य में और ज्यादा कठोर तथा हिंसक कार्रवाई कर सकता है. उन्होंने कहा कि अमेरिका अब भी डील के लिए तैयार है, लेकिन ईरान को तेजी से फैसला लेना होगा. ट्रंप के इस बयान के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात जल्द नियंत्रित नहीं हुए, तो इसका असर वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है. संघर्ष विराम के बाद फिर बढ़ा तनाव यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब 8 अप्रैल को लागू संघर्ष विराम के बाद क्षेत्र में हालात कुछ शांत माने जा रहे थे. अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई के बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव कुछ कम हुआ था, लेकिन अब फिर हालात बिगड़ते नजर आ रहे हैं. ईरान की सेना ने आरोप लगाया है कि अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य में मौजूद एक ईरानी तेल टैंकर और दूसरे जहाज को निशाना बनाया. ईरानी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि अमेरिकी कार्रवाई संघर्ष विराम का उल्लंघन है. ईरान का पलटवार का दावा ईरानी सेना के संयुक्त कमांड ने कहा कि उसने जवाबी कार्रवाई करते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य के पूर्वी हिस्से और चाबहार बंदरगाह के दक्षिण में मौजूद अमेरिकी सैन्य जहाजों को निशाना बनाया. इसके अलावा ईरान ने अमेरिका पर किश्म द्वीप और बंदर खमीर व सीरिक जैसे तटीय इलाकों में हवाई हमले करने का भी आरोप लगाया है. ईरान का कहना है कि इन हमलों में नागरिक क्षेत्रों को भी नुकसान पहुंचा. परमाणु विवाद बना बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच जारी यह तनाव परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद से भी जुड़ा हुआ है. वॉशिंगटन अभी भी ईरान से अपने प्रस्ताव पर जवाब का इंतजार कर रहा है. अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर नई शर्तों को स्वीकार करे, जबकि तेहरान कई मुद्दों पर अब भी सख्त रुख अपनाए हुए है. वैश्विक बाजार पर पड़ सकता है असर होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापार मार्गों में गिना जाता है. यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव सीधे कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित करता है. विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच हालात और बिगड़ते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है.
ईरान को सीधी सैन्य चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी नौसेना को आदेश दिया है कि अगर ईरान की छोटी नौकाएं हॉरमुज जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंग बिछाने की कोशिश करें, तो उन्हें तुरंत "shoot and kill" किया जाए। यह आदेश ऐसे समय आया है जब ईरान ने एक बार फिर इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया है। क्यों अहम है हॉरमुज जलडमरूमध्य? हॉरमुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक कच्चे तेल और गैस व्यापार का लगभग 20% इसी रास्ते से गुजरता है। यहां किसी भी तनाव का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों पर पड़ता है। इसी वजह से अमेरिका और ईरान के बीच यह टकराव वैश्विक चिंता का विषय बन गया है। ट्रंप ने क्या कहा? ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा: "मैंने अमेरिकी नौसेना को आदेश दिया है कि हॉरमुज में बारूदी सुरंग बिछाने वाली किसी भी छोटी नौका को तुरंत मार गिराया जाए।" उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी माइंस्वीपर्स फिलहाल जलडमरूमध्य को सुरक्षित बनाने में जुटे हैं। अमेरिकी सेना ने ईरानी तेल टैंकर भी पकड़ा तनाव को और बढ़ाते हुए अमेरिकी सेना ने भारतीय महासागर में ईरानी तेल तस्करी से जुड़े एक और टैंकर को जब्त कर लिया। बताया जा रहा है कि यह जहाज चीन की ओर जा रहा था और पहले भी अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आ चुका था। ईरान ने भी दिखाई ताकत एक दिन पहले ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने हॉरमुज में तीन मालवाहक जहाजों को निशाना बनाया था, जिनमें से दो को कब्जे में ले लिया गया। ईरानी न्यायपालिका के प्रमुख ने इसे "इस्लामी ईरान की ताकत का प्रदर्शन" बताया। बातचीत पर अभी भी संशय हालांकि पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता कराने की कोशिश जारी है, लेकिन फिलहाल कोई बैठक तय नहीं हो सकी है। ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले नाकेबंदी हटाए। अमेरिका चाहता है कि ईरान पहले समुद्री मार्ग पूरी तरह खोले। लेबनान में सीजफायर बढ़ाया गया ट्रंप ने साथ ही घोषणा की कि इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच लागू युद्धविराम को तीन सप्ताह के लिए बढ़ा दिया गया है। हालांकि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर उल्लंघन के आरोप लगाए हैं। वैश्विक बाजारों पर असर संभव हॉरमुज में बढ़ते तनाव से: तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है शिपिंग बीमा महंगा हो सकता है वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है दुनिया की नजरें अब इस क्षेत्र पर टिकी हैं।
मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं। Gulf of Oman में United States और Iran के बीच सीधा सैन्य टकराव जैसी स्थिति बन गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका द्वारा ईरानी मर्चेंट शिप पर कार्रवाई के बाद तेहरान ने जवाबी कदम उठाते हुए अमेरिकी युद्धपोतों की ओर ड्रोन भेजे हैं। क्या हुआ ओमान की खाड़ी में? ईरानी मीडिया के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार: अमेरिकी सेना ने ईरान के एक व्यापारिक जहाज़ को निशाना बनाया जहाज़ को रोककर उसे वापस ईरानी समुद्री सीमा में भेजने की कोशिश की गई इस कार्रवाई को ईरान ने “उकसावे वाली” कार्रवाई बताया इसके जवाब में: ईरान की सेना और Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) ने अमेरिकी युद्धपोतों की दिशा में ड्रोन तैनात किए IRGC का दावा है कि अमेरिकी नौसेना को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है, जिससे स्थिति और धुंधली बनी हुई है। होर्मुज और खाड़ी की रणनीतिक अहमियत Strait of Hormuz और Gulf of Oman वैश्विक तेल व्यापार के सबसे अहम मार्गों में गिने जाते हैं। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है यहां किसी भी तरह का सैन्य टकराव सीधे तेल कीमतों और सप्लाई पर असर डाल सकता है इसी वजह से इस क्षेत्र में बढ़ती हर गतिविधि को वैश्विक स्तर पर गंभीरता से देखा जा रहा है। जहाज़ ‘टूस्का’ पर कार्रवाई अमेरिका ने एक और बड़ा दावा करते हुए कहा कि उसने ‘टूस्का’ नाम के ईरानी जहाज़ को रोक लिया है। United States Central Command (CENTCOM) के अनुसार कई बार चेतावनी देने के बाद भी जहाज़ नहीं रुका इसके बाद अमेरिकी युद्धपोत USS Spruance ने उसके इंजन रूम पर फायरिंग की जहाज़ को निष्क्रिय कर अमेरिका ने अपने कब्जे में ले लिया इस कार्रवाई की पुष्टि Donald Trump ने भी की है। ईरान का पलटवार और आरोप ईरान ने इस पूरी घटना को “समुद्री डकैती” करार दिया है। तेहरान का कहना है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा है IRGC ने चेतावनी दी है कि अगर नाकेबंदी जारी रही तो होर्मुज पूरी तरह बंद रहेगा साथ ही, ईरान ने कुछ विदेशी टैंकरों को भी रास्ते से वापस भेजा है, जिससे तनाव और बढ़ गया है। सीजफायर पर भी सवाल ईरान ने आरोप लगाया है कि 8 अप्रैल को घोषित युद्धविराम का अमेरिका ने उल्लंघन किया है। तेहरान का कहना है कि पहले अमेरिका अपनी नाकेबंदी हटाए तभी किसी भी तरह की बातचीत संभव होगी यानी कूटनीतिक रास्ते फिलहाल कमजोर पड़ते दिख रहे हैं। क्या बढ़ सकता है युद्ध? विशेषज्ञ मानते हैं कि हालात बेहद नाजुक हैं: दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं छोटे-छोटे टकराव बड़े संघर्ष में बदल सकते हैं ड्रोन, नौसैनिक कार्रवाई और नाकेबंदी–तीनों मिलकर जोखिम बढ़ा रहे हैं ओमान की खाड़ी में हुआ यह घटनाक्रम सिर्फ एक क्षेत्रीय झड़प नहीं, बल्कि वैश्विक संकट का संकेत हो सकता है। एक ओर अमेरिका अपनी सैन्य ताकत दिखा रहा है, तो दूसरी ओर ईरान भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि: क्या यह टकराव कूटनीति से सुलझेगा या फिर मिडिल ईस्ट एक बड़े युद्ध की ओर बढ़ रहा है
अमेरिका और Iran के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर है। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump बातचीत और समझौते के संकेत दे रहे हैं, तो दूसरी ओर अमेरिकी सेना ने ईरान के समुद्री रास्तों पर भारी सैन्य घेराबंदी कर दी है। United States Central Command (CENTCOM) के मुताबिक, इस मिशन में 10,000 से ज्यादा सैनिक, 12 से अधिक युद्धपोत और 100 से ज्यादा लड़ाकू विमान तैनात किए गए हैं। समुद्र में अमेरिका की ताकत का प्रदर्शन इस ऑपरेशन में एयरक्राफ्ट कैरियर USS Abraham Lincoln और गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर USS Delbert D. Black जैसे अत्याधुनिक युद्धपोत शामिल हैं, जो ईरान के बंदरगाहों और तटीय इलाकों पर कड़ी नजर रख रहे हैं। CENTCOM का कहना है कि कोई भी जहाज अगर ईरानी बंदरगाहों की ओर जाता है या वहां से निकलता है, तो उसे रोका जाएगा और जांच की जाएगी। होर्मुज जलडमरूमध्य खुला, लेकिन निगरानी कड़ी जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन ने स्पष्ट किया है कि Strait of Hormuz को बंद नहीं किया गया है। यह घेराबंदी केवल ईरान के बंदरगाहों और तटीय सीमा तक सीमित है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में भी अमेरिकी सेना पूरी तरह सक्रिय है और हर संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। ‘डार्क फ्लीट’ पर भी शिकंजा अमेरिका ने उन जहाजों पर भी कार्रवाई के संकेत दिए हैं, जिन्हें ‘डार्क फ्लीट’ कहा जाता है। ये ऐसे जहाज होते हैं जो अंतरराष्ट्रीय नियमों को दरकिनार कर गुप्त रूप से ईरानी तेल की ढुलाई करते हैं। ट्रंप बोले- ईरान डील के लिए तैयार इसी बीच ट्रंप ने दावा किया कि ईरान अब समझौते के लिए पहले से ज्यादा तैयार है। उन्होंने कहा, “ईरान आज उन शर्तों को मानने को तैयार है, जिनके लिए वह पहले राजी नहीं था।” ट्रंप ने साफ किया कि किसी भी संभावित डील की सबसे अहम शर्त यह होगी कि ईरान परमाणु हथियार न बनाए। सीजफायर टूटा तो फिर जंग राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी भी दी कि अगर बातचीत असफल रही, तो युद्ध दोबारा शुरू हो सकता है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना पूरी तरह तैयार है और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जाएगी।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच United States Navy ने ईरान के समुद्री रास्तों पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी है। United States Central Command (CENTCOM) द्वारा जारी वीडियो में अमेरिकी जंगी जहाज USS Michael Murphy (DDG-112) को ओमान की खाड़ी में एक मर्चेंट शिप को रोकते हुए देखा गया। नेवी अधिकारियों ने जहाज के क्रू को निर्देश दिया कि वे अब अमेरिकी निगरानी में अगले बंदरगाह तक जाएंगे। इस ऑपरेशन के दौरान हेलिकॉप्टर भी ऊपर से लगातार नजर रख रहे थे। 10 हजार सैनिक और 100 से ज्यादा विमान तैनात CENTCOM के मुताबिक, इस घेराबंदी में अमेरिका ने भारी सैन्य ताकत तैनात की है: 10,000 से अधिक सैनिक 12+ युद्धपोत 100+ लड़ाकू विमान इस मिशन का नेतृत्व एयरक्राफ्ट कैरियर USS Abraham Lincoln (CVN-72) कर रहा है, जो अरब सागर में मौजूद है। इस पर F-35C स्टील्थ फाइटर, F/A-18 जेट्स और आधुनिक हेलिकॉप्टर तैनात हैं। इसके अलावा गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर USS Delbert D. Black (DDG-119) भी संदिग्ध जहाजों पर नजर बनाए हुए है। होर्मुज जलडमरूमध्य खुला, सिर्फ ईरानी पोर्ट्स पर पाबंदी अमेरिकी सेना ने साफ किया है कि Strait of Hormuz को बंद नहीं किया गया है। यह कार्रवाई केवल Iran के बंदरगाहों और उसकी तटीय सीमा तक सीमित है। ट्रम्प का सख्त संदेश अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा: “हमारी नेवी शानदार काम कर रही है। अब कोई भी जहाज हमारी मंजूरी के बिना ईरान की सीमा में घुसने की सोच भी नहीं सकता।” बातचीत फेल होने के बाद बढ़ा तनाव रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता बेनतीजा रही, जिसके बाद यह सख्त कदम उठाया गया। हालांकि, दोनों देशों के बीच फिलहाल दो हफ्ते का सीजफायर लागू है। जमीनी हकीकत भी अलग शिपिंग डेटा के अनुसार, घेराबंदी के बावजूद कुछ जहाज–जिनमें ईरानी टैंकर भी शामिल हैं–इस मार्ग से गुजरने में सफल रहे हैं। इससे स्थिति की जटिलता और बढ़ गई है। ईरान के खिलाफ अमेरिका की यह समुद्री घेराबंदी क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकती है। हालांकि, अमेरिका इसे सुरक्षा और रणनीतिक कदम बता रहा है, लेकिन इससे वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका बनी हुई है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और लाल सागर में हमलों के बीच अमेरिका ने अपनी नौसैनिक रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। दुनिया के सबसे ताकतवर युद्धपोतों में शामिल USS George H. W. Bush (CVN-77) अब सीधा रास्ता छोड़कर अफ्रीका का लंबा चक्कर लगाते हुए मिडिल ईस्ट की ओर बढ़ रहा है। क्यों बदला गया रास्ता? माना जा रहा है कि यह फैसला लाल सागर में बढ़ते खतरे को देखते हुए लिया गया है। Houthi movement द्वारा ड्रोन और मिसाइल हमलों के कारण यह इलाका बेहद संवेदनशील हो गया है। 2024–25 में कई जहाजों पर हमले बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री रास्ते पर खतरा अमेरिकी और व्यापारिक जहाज निशाने पर इसी वजह से अमेरिकी नौसेना ने जोखिम भरे रेड सी रूट से बचने का विकल्प चुना। कौन सा रास्ता अपना रहा है युद्धपोत? यह परमाणु ऊर्जा से चलने वाला एयरक्राफ्ट कैरियर: अफ्रीका के दक्षिणी छोर से होकर Cape of Good Hope के रास्ते अटलांटिक से हिंद महासागर में प्रवेश करेगा हाल ही में इसे Namibia के तट के पास देखा गया। मिडिल ईस्ट में बढ़ेगी अमेरिकी ताकत माना जा रहा है कि यह जहाज मिडिल ईस्ट में पहले से तैनात USS Abraham Lincoln (CVN-72) के साथ मिलकर ऑपरेशन को और मजबूत करेगा। यह तैनाती ऐसे समय हो रही है जब Iran के साथ तनाव चरम पर है Strait of Hormuz के आसपास सैन्य गतिविधियां बढ़ रही हैं कितना लंबा हो गया सफर? सामान्य रूट (रेड सी): ~8,000–9,000 नॉटिकल माइल नया रूट (अफ्रीका के जरिए): ~13,000–15,000 नॉटिकल माइल यानी करीब डेढ़ गुना लंबा सफर, जो खतरे की गंभीरता को दिखाता है। क्या यह ‘डर’ है या रणनीति? पेंटागन ने आधिकारिक तौर पर कारण नहीं बताया है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इसे “रणनीतिक एहतियात” मानते हैं, न कि सीधे तौर पर डर। लाल सागर अब दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री इलाकों में बदल चुका है अमेरिका का यह कदम दिखाता है कि हूती हमलों और क्षेत्रीय तनाव ने वैश्विक समुद्री सुरक्षा को गंभीर चुनौती दी है। सुपरपावर भी अब जोखिम से बचने के लिए अपने रास्ते बदलने को मजबूर है–जो मिडिल ईस्ट संकट की गंभीरता को दर्शाता है।
वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका का एक बेहद महंगा और एडवांस जासूसी ड्रोन हादसे का शिकार हो गया है। अमेरिकी नेवी ने पुष्टि की है कि MQ-4C Triton ड्रोन फारस की खाड़ी में क्रैश हो गया। इसकी कीमत करीब 200–240 मिलियन डॉलर (करीब 1600–2000 करोड़ रुपये) बताई जा रही है। होर्मुज स्ट्रेट के पास हुआ हादसा ड्रोन 9 अप्रैल को होर्मुज जलडमरूमध्य के पास ऑपरेशन के दौरान अचानक गायब हो गया। ड्रोन ने “कोड 7700” इमरजेंसी सिग्नल भेजा इसके बाद संपर्क पूरी तरह टूट गया बाद में पुष्टि हुई कि यह समुद्र में क्रैश हो गया अमेरिकी नेवल कमांड ने 14 अप्रैल को इसकी आधिकारिक पुष्टि की। F-35 से भी महंगा ड्रोन यह MQ-4C Triton ड्रोन अमेरिका के सबसे एडवांस निगरानी सिस्टम में शामिल है। लंबी दूरी तक समुद्री निगरानी में सक्षम घंटों तक ऊंचाई पर उड़ान भर सकता है हाई-टेक सेंसर और सर्विलांस सिस्टम से लैस इसकी कीमत दो F-35 Lightning II लड़ाकू विमानों से भी ज्यादा बताई जा रही है। ईरान पर शक, लेकिन पुष्टि नहीं ड्रोन के क्रैश होने के बाद कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। क्या तकनीकी खराबी थी? या किसी हमले में गिराया गया? कुछ रिपोर्ट्स में आशंका जताई जा रही है कि इसे ईरान ने निशाना बनाया हो सकता है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ‘क्लास A मिशैप’ माना गया हादसा अमेरिकी नियमों के अनुसार, 2.5 मिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान होने पर उसे “Class A Mishap” कहा जाता है। इस मामले में: नुकसान 240 मिलियन डॉलर से ज्यादा इसे बेहद गंभीर सैन्य हादसा माना जा रहा है बढ़ सकता है तनाव यह घटना ऐसे समय पर हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच पहले से ही तनाव चरम पर है। अगर यह साबित होता है कि ड्रोन को गिराया गया, तो क्षेत्र में हालात और बिगड़ सकते हैं। फिलहाल, अमेरिका इस पूरे मामले की जांच कर रहा है।
वॉशिंगटन: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि ईरानी तेल ले जा रहे चीनी जहाजों को रोका जाएगा। यह कार्रवाई वैश्विक ऊर्जा सप्लाई के सबसे अहम रास्ते Strait of Hormuz पर लागू की जा रही है। 10,000 सैनिक और नेवल शिप्स तैनात अमेरिकी सेना ने नाकाबंदी को लागू करने के लिए: 10,000 से ज्यादा सैनिक करीब 12 नौसैनिक जहाज (Naval Ships) तैनात किए हैं। सेना के अनुसार, नाकाबंदी के पहले 24 घंटों में एक भी जहाज होर्मुज स्ट्रेट पार नहीं कर पाया। 6 व्यापारिक जहाजों को वापस लौटने का आदेश दिया गया हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में 4 जहाजों के गुजरने का दावा भी किया गया हर देश के जहाजों पर लागू नियम अमेरिका की यह कार्रवाई: ईरान के बंदरगाहों में जाने या निकलने वाले सभी जहाजों पर लागू जहाज किसी भी देश का हो, नियम समान रहेगा बातचीत की कोशिश भी जारी तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं: वॉशिंगटन में लेबनान-इजराइल सीजफायर पर पहले दौर की बातचीत हुई इसे सकारात्मक बताया गया, अगली बैठक की तैयारी जारी 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स 1. छूट खत्म होने की चेतावनी अमेरिकी ट्रेजरी ने कहा कि ईरानी तेल बिक्री पर दी गई अस्थायी छूट जल्द खत्म होगी। 2. यूरोप का अलग मिशन यूरोपीय देश होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बहाल करने के लिए नया अंतरराष्ट्रीय मिशन बना रहे हैं–खास बात, इसमें अमेरिका शामिल नहीं है। 3. कनाडा की मदद Canada ने Lebanon के लिए 40 मिलियन डॉलर की सहायता का ऐलान किया। 4. हिजबुल्लाह के हमले Hezbollah ने दावा किया कि उसने 24 घंटे में 34 हमले किए, जिनमें Israel के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। 5. ट्रंप का बयान अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत अगले 2 दिनों में फिर शुरू हो सकती है। होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिकी नाकाबंदी ने वैश्विक तेल सप्लाई और समुद्री व्यापार को सीधे प्रभावित किया है। जहां एक ओर सैन्य दबाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक बातचीत की कोशिशें भी जारी हैं–आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाएंगे, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।
मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर पहुंच गया है। United States ने Strait of Hormuz समेत Iran के बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकेबंदी लागू कर दी है। इसके साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने सख्त चेतावनी जारी की है। ट्रंप की सीधी धमकी Truth Social पर पोस्ट करते हुए ट्रंप ने कहा: “अगर कोई जहाज हमारी नाकेबंदी के पास भी आता है, तो उसे तुरंत खत्म कर दिया जाएगा” “उसी तरीके से, जैसे हम समुद्र में ड्रग तस्करों की नावों को नष्ट करते हैं” यह बयान साफ तौर पर अमेरिका के आक्रामक रुख को दर्शाता है। ‘ईरान की नौसेना तबाह हो चुकी’ ट्रंप ने दावा किया: ईरान की नौसेना लगभग पूरी तरह नष्ट हो चुकी है 158 जहाज तबाह कर दिए गए हैं बचे हुए जहाज छोटे “फास्ट अटैक क्राफ्ट” हैं, जिनसे अमेरिका को कोई खास खतरा नहीं नाकेबंदी कब और कैसे लागू हुई? United States Central Command (CENTCOM) के मुताबिक: नाकेबंदी सोमवार शाम 7:30 बजे (IST) से लागू हुई यह सभी देशों के जहाजों पर समान रूप से लागू होगी जो भी पोत ईरानी बंदरगाहों में प्रवेश करेगा या बाहर निकलेगा, वह इस कार्रवाई के दायरे में आएगा किन जहाजों को मिली छूट? अमेरिका ने स्पष्ट किया: जो जहाज गैर-ईरानी बंदरगाहों के बीच यात्रा कर रहे हैं उन्हें होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी जाएगी पृष्ठभूमि: फेल हुई वार्ता यह कदम उस समय उठाया गया जब Islamabad में अमेरिका और ईरान के बीच हुई लंबी वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हो गई। इसके बाद क्षेत्र में सैन्य तनाव और बढ़ गया है। क्या हो सकता है आगे? विशेषज्ञों के मुताबिक: यह कदम वैश्विक तेल सप्लाई को प्रभावित कर सकता है खाड़ी क्षेत्र में सैन्य टकराव की आशंका बढ़ सकती है बड़े देशों के बीच प्रत्यक्ष संघर्ष का खतरा भी बन सकता है फिलहाल, दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि Iran इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या कूटनीतिक रास्ता निकलेगा या हालात और बिगड़ेंगे।
ईरान के साथ कूटनीतिक बातचीत नाकाम रहने के बाद अमेरिका ने अब सैन्य दबाव बढ़ाने का रास्ता अपना लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने Strait of Hormuz में ‘नेवी ब्लॉकेड’ लागू करने का ऐलान किया है। इस फैसले ने न सिर्फ मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ा दिया है, बल्कि यह भी सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह कदम अमेरिकी सैनिकों के लिए नया खतरा पैदा कर सकता है। शनिवार को JD Vance की अगुवाई में एक अमेरिकी कूटनीतिक टीम ने ईरान के साथ तनाव कम करने और संभावित समझौते की दिशा में बातचीत की थी। इस्लामाबाद में करीब 20 घंटे तक चली इस वार्ता से उम्मीदें तो जगी थीं, लेकिन अंततः कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया। इसके बाद ट्रंप ने रविवार को ट्रुथ सोशल पर कई पोस्ट करते हुए अपनी रणनीति सार्वजनिक की। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका ईरान के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी करेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि जो भी जहाज होर्मुज़ स्ट्रेट में “गैरकानूनी टोल” देगा, उसे खुले समुद्र में सुरक्षित मार्ग नहीं मिलेगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी सेना सहयोगी देशों के जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्र में सक्रिय रहेगी और बारूदी सुरंगों को हटाने का अभियान जारी रखेगी। ट्रंप ने यह संकेत भी दिया कि जरूरत पड़ने पर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू की जा सकती है। हालांकि, इस सख्त रुख के पीछे की कूटनीतिक विफलता भी कम अहम नहीं है। वार्ता से जुड़े एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, बातचीत सिर्फ ईरान के परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं थी। कई अन्य मुद्दों पर भी गहरे मतभेद थे, जिनमें होर्मुज़ क्षेत्र पर ईरान का प्रभाव और क्षेत्रीय प्रॉक्सी संगठनों को उसका समर्थन शामिल है। यमन में हूती विद्रोही और लेबनान में हिज़्बुल्लाह जैसे समूहों को लेकर अमेरिका की चिंताएं लंबे समय से बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज़ स्ट्रेट में किसी भी तरह की नाकेबंदी या सैन्य गतिविधि बेहद संवेदनशील मामला है। यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का टकराव न सिर्फ क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह रणनीति अमेरिकी सैनिकों को सीधे खतरे में डाल सकती है। कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान इस कदम को उकसावे के रूप में देखता है, तो वह जवाबी कार्रवाई कर सकता है। ऐसी स्थिति में अमेरिकी नौसेना और वहां तैनात सैनिक सीधे निशाने पर आ सकते हैं। छोटे स्तर की झड़प भी बड़े सैन्य संघर्ष का रूप ले सकती है, जिससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है। इसके अलावा, इस फैसले का आर्थिक असर भी कम नहीं होगा। होर्मुज़ स्ट्रेट में किसी भी तरह की बाधा से वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे कीमतों में तेजी आ सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है। ट्रंप का यह कदम एक हाई-रिस्क रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। इससे ईरान पर दबाव तो जरूर बढ़ेगा, लेकिन इसके साथ ही अमेरिकी सैनिकों और पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र की सुरक्षा पर भी गंभीर खतरे मंडरा सकते हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह टकराव कूटनीति की ओर लौटता है या किसी बड़े सैन्य संघर्ष में बदल जाता है।
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका के सबसे उन्नत विमानवाहक पोत USS Gerald R. Ford को बड़ा झटका लगा है। दुनिया के सबसे महंगे और अत्याधुनिक युद्धपोतों में शामिल इस ‘समुद्री दैत्य’ पर लगी आग ने इसकी संचालन व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया है। 30 घंटे की मशक्कत के बाद बुझी आग रिपोर्ट्स के मुताबिक, जहाज के मुख्य लॉन्ड्री सेक्शन में आग लगी, जिसे बुझाने में चालक दल को करीब 30 घंटे का समय लगा। आग पर काबू पा लिया गया, लेकिन धुएं के कारण कई सैनिकों को सांस लेने में परेशानी हुई कुछ को मामूली चोटों के चलते इलाज देना पड़ा जहाज की रोजमर्रा की सुविधाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं 600 से ज्यादा सैनिकों की दिनचर्या प्रभावित इस हादसे के बाद: 600 से अधिक नौसैनिकों के सोने की व्यवस्था प्रभावित कई सैनिकों को फर्श और टेबल पर सोने को मजबूर होना पड़ा लॉन्ड्री सेक्शन जलने से कपड़े धोने की सुविधा ठप करीब 4,500 सैनिक और पायलट इस पोत पर तैनात हैं, जो पहले ही लंबे समय से लगातार मिशन पर हैं। 11 महीने की लंबी तैनाती से बढ़ा दबाव यह एयरक्राफ्ट कैरियर पिछले साल जून से लगातार समुद्र में तैनात है और इसकी तैनाती अब 11वें महीने में पहुंच चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी लंबी तैनाती: तकनीकी समस्याओं को बढ़ाती है चालक दल की कार्यक्षमता पर असर डालती है मानसिक और शारीरिक थकान पैदा करती है अगर यह मिशन और लंबा चला, तो यह वियतनाम युद्ध के बाद की सबसे लंबी तैनाती का रिकॉर्ड तोड़ सकता है। टॉयलेट से लेकर बेसिक सुविधाओं तक संकट The Wall Street Journal की रिपोर्ट के अनुसार: सैनिकों को टॉयलेट के लिए 45 मिनट तक लाइन में लगना पड़ रहा है साफ-सफाई और बुनियादी सुविधाएं प्रभावित हैं कई तकनीकी खामियां पहले से ही सामने आ रही थीं क्या अब भी यह ऑपरेशनल ‘महाबली’ है? US Central Command का कहना है कि: आग से जहाज की मुख्य युद्ध प्रणाली को नुकसान नहीं हुआ पोत अभी भी पूरी तरह ऑपरेशनल है हालांकि जमीनी स्थिति यह संकेत देती है कि लगातार दबाव और आंतरिक समस्याएं इसकी क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। दुनिया का सबसे एडवांस एयरक्राफ्ट कैरियर USS Gerald R. Ford की प्रमुख खासियत: इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एयरक्राफ्ट लॉन्च सिस्टम (EMALS) रोजाना 160–220 उड़ानों का संचालन 75 से ज्यादा लड़ाकू विमान तैनात दो परमाणु रिएक्टर, 25 साल तक बिना ईंधन ऑपरेशन लगभग 13.3 बिलियन डॉलर की लागत यह युद्धपोत अमेरिका की नौसैनिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है, लेकिन मौजूदा हालात इसकी तैयारियों और रखरखाव पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।