अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए नए परमाणु सहयोग समझौते ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छेड़ दी है। इस समझौते के तहत अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब के नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में सहयोग करेंगी। साथ ही, सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) की दिशा में तकनीकी सहायता मिलने का रास्ता भी खुल सकता है। हालांकि अमेरिका का कहना है कि यह समझौता केवल शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम तक सीमित है, लेकिन विशेषज्ञ इसे भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों से जोड़कर देख रहे हैं। क्या है अमेरिका-सऊदी न्यूक्लियर डील? अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान ने शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग से जुड़े समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अलावा दोनों देशों के बीच परमाणु सुरक्षा मानकों को लेकर भी एक अलग समझौता हुआ है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के मुताबिक, इसका उद्देश्य सऊदी अरब में नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को विकसित करना है। हालांकि, समझौते का पूरा मसौदा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। क्यों उठ रहे हैं सवाल? विवाद की सबसे बड़ी वजह यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) है। परमाणु बिजलीघरों के लिए कम स्तर का संवर्धित यूरेनियम इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन यही तकनीक अत्यधिक स्तर तक पहुंचने पर परमाणु हथियार बनाने में भी उपयोगी हो सकती है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ इस समझौते को भविष्य के संभावित परमाणु प्रसार के नजरिए से देख रहे हैं। क्या सऊदी अरब परमाणु बम बना सकेगा? फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि सऊदी अरब परमाणु हथियार विकसित करेगा। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता केवल नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए है और इसमें अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पालन किया जाएगा। हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी देश के पास यदि यूरेनियम संवर्धन की क्षमता होती है तो भविष्य में उसका सैन्य उपयोग पूरी तरह असंभव नहीं माना जा सकता। अभी क्या होगी आगे की प्रक्रिया? समझौते को लागू करने से पहले इसे अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी मिलनी जरूरी है। माना जा रहा है कि रिपब्लिकन बहुमत के कारण इसके पारित होने की संभावना अधिक है, लेकिन कुछ सांसद सुरक्षा और परमाणु प्रसार के मुद्दे पर इसका विरोध कर सकते हैं। ईरान युद्ध के बीच क्यों अहम है यह समझौता? यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और सैन्य कार्रवाई को लेकर तनाव चरम पर है। अमेरिका लगातार ईरान पर परमाणु हथियार विकसित करने की कोशिश का आरोप लगाता रहा है, जबकि ईरान इन आरोपों से इनकार करता है। ऐसे माहौल में सऊदी अरब के साथ परमाणु सहयोग समझौता पश्चिम एशिया में रणनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ सकता है। 5 सवालों में समझें पूरी डील ● अमेरिका और सऊदी के बीच क्या समझौता हुआ? दोनों देशों ने शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा सहयोग और सुरक्षा मानकों से जुड़े समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। ● क्या सऊदी यूरेनियम संवर्धन कर सकेगा? समझौते के तहत नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए तकनीकी सहयोग का रास्ता खुल सकता है। ● क्या इससे परमाणु हथियार बनने का खतरा है? अमेरिका इससे इनकार करता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यही तकनीक भविष्य में हथियार कार्यक्रम का आधार बन सकती है। ● क्या समझौता लागू हो गया है? नहीं। इसे लागू करने से पहले अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक है। ● दुनिया की चिंता क्या है? विशेषज्ञों को आशंका है कि यदि पश्चिम एशिया में अधिक देशों के पास यूरेनियम संवर्धन की क्षमता आती है, तो क्षेत्र में परमाणु हथियारों की नई होड़ शुरू हो सकती है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका और सऊदी अरब के बीच प्रस्तावित नागरिक परमाणु सहयोग समझौते को लेकर अमेरिकी राजनीति में विवाद गहरा गया है। कांग्रेस के कई सांसदों ने इस समझौते की शर्तों, पारदर्शिता और क्षेत्रीय सुरक्षा पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाए हैं। विपक्षी सांसदों ने समझौते की विस्तृत जांच और कांग्रेस में औपचारिक सुनवाई कराने की मांग तेज कर दी है। समझौते की शर्तों पर उठ रहे सवाल कांग्रेस के सदस्यों का कहना है कि यदि सऊदी अरब को परमाणु तकनीक उपलब्ध कराई जाती है, तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उसका उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही हो। सांसदों ने यूरेनियम संवर्धन और परमाणु ईंधन चक्र से जुड़े प्रावधानों पर भी स्पष्ट जानकारी मांगी है। उनका तर्क है कि बिना पर्याप्त सुरक्षा प्रावधानों के किसी भी परमाणु सहयोग समझौते से भविष्य में परमाणु प्रसार का खतरा बढ़ सकता है। ट्रंप प्रशासन पर बढ़ा राजनीतिक दबाव विपक्षी नेताओं ने ट्रंप प्रशासन से मांग की है कि समझौते से जुड़े सभी दस्तावेज और वार्ता का पूरा ब्यौरा कांग्रेस के सामने रखा जाए। उनका कहना है कि इतना महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता बिना संसदीय निगरानी के आगे नहीं बढ़ना चाहिए। कई सांसदों ने यह भी कहा कि समझौते के अंतिम स्वरूप को मंजूरी देने से पहले विशेषज्ञों, सुरक्षा अधिकारियों और परमाणु नीति विशेषज्ञों की राय ली जानी चाहिए। मध्य पूर्व की सुरक्षा पर असर की चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सऊदी अरब को उन्नत परमाणु तकनीक मिलती है, तो इसका प्रभाव पूरे मध्य पूर्व की रणनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है। ईरान के साथ पहले से मौजूद तनाव को देखते हुए कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम क्षेत्र में हथियारों की नई प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे सकता है। हालांकि, समझौते के समर्थकों का कहना है कि इससे अमेरिका और सऊदी अरब के रणनीतिक संबंध मजबूत होंगे तथा ऊर्जा, निवेश और तकनीकी सहयोग को भी नई गति मिलेगी। सुनवाई की मांग हुई तेज अमेरिकी कांग्रेस की संबंधित समितियों में इस मुद्दे पर सार्वजनिक सुनवाई कराने की मांग लगातार बढ़ रही है। सांसद चाहते हैं कि समझौते के कानूनी, रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी सभी पहलुओं की विस्तार से समीक्षा की जाए। यदि आवश्यक हुआ तो समझौते में संशोधन या अतिरिक्त शर्तें भी जोड़ी जा सकती हैं। आगे क्या होगा? अब सबकी नजर अमेरिकी कांग्रेस की आगामी बैठकों पर है, जहां इस प्रस्तावित परमाणु सहयोग समझौते पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। कांग्रेस की समीक्षा और सुनवाई के बाद ही यह तय होगा कि समझौता मौजूदा स्वरूप में आगे बढ़ेगा या इसमें बदलाव किए जाएंगे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।