पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से ठीक पहले राज्य में वोटर लिस्ट को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नाम कटने के आरोपों के बीच कई जिलों में उग्र प्रदर्शन देखने को मिले। हालात ऐसे बने कि सड़कों पर टायर जलाकर विरोध किया गया और कई जगह हाईवे तक जाम कर दिए गए। किन-किन जिलों में भड़का विरोध? राज्य के अलग-अलग हिस्सों में जनता का गुस्सा खुलकर सामने आया: मालदा: कालियाचक, जदुपुर और मंगलबाड़ी में लोगों ने दस्तावेज दिखाकर विरोध किया, NH जाम रहा जलपाईगुड़ी: मयनागुड़ी में NH-27 को पूरी तरह ब्लॉक किया गया कूचबिहार: माथाभंगा में ग्रामीणों ने 3 घंटे तक सड़क जाम रखी पूर्वी बर्धमान: शक्तिगढ़ में लोगों ने शांतिपूर्ण मौन मार्च निकाला प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि वैध दस्तावेज होने के बावजूद उनके नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। ममता बनर्जी का बड़ा आरोप इन घटनाओं के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि यह पूरा मामला एक “बड़ी साजिश” का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य राज्य में अशांति फैलाना है। उन्होंने अमित शाह पर निशाना साधते हुए दावा किया कि चुनाव से पहले राष्ट्रपति शासन लगाने की कोशिश की जा रही है। NH-12 पर बढ़ा तनाव NH-12 (कोलकाता-सिलीगुड़ी मार्ग) पर स्थिति सबसे ज्यादा तनावपूर्ण रही। कई घंटों तक यातायात ठप भारी पुलिस और केंद्रीय बल तैनात न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा बढ़ाई गई प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा है कि जब तक सभी पात्र मतदाताओं के नाम सूची में शामिल नहीं किए जाते, आंदोलन जारी रहेगा। चुनाव से पहले बढ़ा सियासी तापमान इस पूरे विवाद ने चुनावी माहौल को और गर्म कर दिया है। विपक्ष और सत्तारूढ़ दल के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज वोटर लिस्ट की विश्वसनीयता पर सवाल प्रशासन पर निष्पक्षता बनाए रखने का दबाव विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले चुनाव में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। निष्कर्ष पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट को लेकर उठा यह विवाद सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक संकट बनता जा रहा है। अब देखना होगा कि सरकार और चुनाव आयोग इस स्थिति को कैसे संभालते हैं और क्या समय रहते समाधान निकल पाता है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट को लेकर विवाद और चिंता दोनों बढ़ते जा रहे हैं। चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, अब तक जांचे गए करीब 32 लाख मामलों में लगभग 40% नाम हटाए गए, यानी करीब 13 लाख वोटर्स को सूची से बाहर कर दिया गया है। इससे पहले Special Intensive Revision (SIR) के दौरान ही करीब 63 लाख नाम हटाए जा चुके थे, और अब कुल हटाए गए नामों का आंकड़ा करीब 76 लाख तक पहुंच गया है। इस मुद्दे पर पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। SIR के बाद आखिर अभी क्या चल रहा है? फिलहाल पश्चिम बंगाल में “Under Adjudication” यानी न्यायिक जांच के दायरे में आए वोटर्स के मामलों का निपटारा जारी है। चुनाव आयोग ने 28 फरवरी को जो पोस्ट-SIR सूची जारी की थी, उसमें 60.06 लाख नाम इस श्रेणी में रखे गए थे। बाद में आयोग ने सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी करनी शुरू की, जिसमें उन्हीं नामों को शामिल या बाहर किया जा रहा है जिन पर न्यायिक अधिकारियों ने फैसला दे दिया है। अभी तक 32 लाख केस निपटाए जा चुके हैं, जबकि करीब 28 लाख मामले अब भी लंबित हैं। वोटर्स की संख्या कितनी घटी? SIR शुरू होने से पहले पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की संख्या करीब 7.66 करोड़ बताई गई थी। ड्राफ्ट रोल के बाद यह घटकर करीब 7.08 करोड़ रह गई। बाद की सूचियों और छंटनी के बाद “कन्फर्म” वोटर्स की संख्या और कम हो गई, जबकि लाखों नाम अभी भी अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे हैं। हटाए गए नामों के पीछे मृत्यु, दूसरे स्थान पर शिफ्ट होना, डुप्लिकेशन, दस्तावेज़ी गड़बड़ी और ‘अनट्रेसएबिलिटी’ जैसी वजहें बताई जा रही हैं। चुनाव आयोग की योजना के मुताबिक, सप्लीमेंट्री लिस्ट हर शुक्रवार जारी की जानी है, ताकि जिन मतदाताओं के मामले क्लियर हो जाएं, उनके नाम फिर से सूची में जोड़े जा सकें। दूसरी ओर, राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कलकत्ता हाईकोर्ट से यह अनुमति मांगी है कि ये सूची रोजाना जारी की जा सके, ताकि प्रक्रिया तेज हो। लेकिन अदालत ने इस मामले की सुनवाई 27 मार्च के बाद करने की बात कही है। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या चुनाव की तारीखों के एलान से पहले सभी लंबित वोटर्स का भविष्य तय हो पाएगा?
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में आई तकनीकी गड़बड़ी को लेकर चुनाव आयोग (EC) ने सफाई दी है। आयोग ने बुधवार को स्वीकार किया कि डिस्प्ले एरर के कारण कई मतदाताओं का नाम “जांच के दायरे में” दिख रहा था, जबकि वे पहले से ही फाइनल वोटर लिस्ट में शामिल थे। क्या थी गड़बड़ी? मंगलवार शाम को जब लोगों ने EPIC नंबर के जरिए अपना वोटर स्टेटस चेक किया, तो: उनके नाम के आगे “जांच के दायरे में” दिख रहा था यह समस्या उन वोटरों के साथ भी हुई, जिनका नाम पहले से फाइनल लिस्ट में था 2 घंटे में ठीक हुई समस्या चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक: यह पूरी तरह तकनीकी (टेक्निकल) गड़बड़ी थी टेक्निकल टीम ने करीब 2 घंटे में इसे ठीक कर दिया फिलहाल आयोग इस मामले की जांच कर रहा है TMC ने उठाए सवाल इस गड़बड़ी पर सत्ताधारी पार्टी TMC (तृणमूल कांग्रेस) ने सवाल उठाए: पार्टी ने कहा कि इससे ऐसा लग रहा था जैसे सभी वोटरों पर शक किया जा रहा है हालांकि, चुनाव आयोग ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह सिर्फ एक डिस्प्ले एरर था, किसी भी तरह की जांच या कार्रवाई से इसका कोई संबंध नहीं है। क्या है स्थिति अब? तकनीकी समस्या को ठीक कर दिया गया है वोटर स्टेटस अब सामान्य रूप से दिख रहा है आयोग मामले की विस्तृत जांच कर रहा है
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर चल रहे विवाद के बीच Supreme Court of India ने एक नई याचिका पर सुनवाई करने की सहमति दे दी है। यह मामला स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान कुछ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने से जुड़ा है। याचिका में दावा किया गया है कि कई ऐसे लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए हैं जो पहले चुनावों में वोट डाल चुके हैं, लेकिन अब उनके दस्तावेजों को स्वीकार नहीं किया जा रहा है। मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील Menaka Guruswamy ने अदालत से कहा कि कई मतदाताओं के पास वैध दस्तावेज मौजूद हैं, इसके बावजूद Election Commission of India ने उन्हें स्वीकार नहीं किया और उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। उन्होंने अदालत से इस मामले की जल्द सुनवाई की मांग की। इस पर सुनवाई कर रहे मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की पीठ ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट सीधे तौर पर न्यायिक अधिकारियों के फैसलों पर अपील की तरह नहीं बैठ सकता। हालांकि वकील ने दलील दी कि कानून की धारा 23 और 24 के तहत अपील का प्रावधान मौजूद है और इस मामले को मुख्य याचिका के साथ जोड़ा जा सकता है। अदालत ने इस दलील पर विचार करते हुए कहा कि इस याचिका पर मंगलवार को मुख्य मामले के साथ सुनवाई की जाएगी। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।