Women's Health

Postmenopausal woman strengthening bone health through calcium-rich diet, exercise, and sunlight to reduce osteoporosis risk.
Menopause Bone Health: मेनोपॉज के बाद क्यों कमजोर होने लगती हैं महिलाओं की हड्डियां? इन 5 आदतों से घटेगा ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा

Menopause Bone Health Tips: मेनोपॉज महिलाओं के जीवन का एक स्वाभाविक चरण है, लेकिन इसके साथ होने वाले हार्मोनल बदलाव शरीर पर कई तरह के प्रभाव डालते हैं। सबसे अधिक असर हड्डियों की मजबूती पर पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार मेनोपॉज के बाद एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर तेजी से घटता है, जिससे हड्डियों की घनत्व (Bone Density) कम होने लगती है और ऑस्टियोपोरोसिस यानी हड्डियों के कमजोर व खोखले होने का खतरा बढ़ जाता है। अगर समय रहते इस स्थिति पर ध्यान न दिया जाए तो मामूली चोट या हल्की गिरावट भी गंभीर फ्रैक्चर का कारण बन सकती है। हालांकि सही खानपान, नियमित व्यायाम और समय पर जांच कराकर इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। मेनोपॉज के बाद हड्डियां क्यों कमजोर होती हैं? महिलाओं में आमतौर पर 45 से 55 वर्ष की उम्र के बीच मेनोपॉज शुरू होता है। इस दौरान शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर तेजी से कम हो जाता है। यह हार्मोन हड्डियों को मजबूत बनाए रखने और उनके टूटने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विशेषज्ञों के अनुसार मेनोपॉज के बाद शुरुआती 5 से 10 वर्षों में महिलाओं की बोन मिनरल डेंसिटी तेजी से घट सकती है, जिससे फ्रैक्चर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। कमजोर हड्डियों के शुरुआती संकेत यदि मेनोपॉज के बाद ये लक्षण दिखाई दें तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए— लगातार कमर या पीठ में दर्द उम्र बढ़ने के साथ लंबाई कम होना मामूली चोट या गिरने पर हड्डी टूट जाना झुककर चलने की समस्या शरीर में कमजोरी और संतुलन बनाए रखने में कठिनाई किन कारणों से बढ़ता है जोखिम? विशेषज्ञों के अनुसार निम्न कारण हड्डियों को तेजी से कमजोर बना सकते हैं— एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी कैल्शियम और विटामिन D की कमी शारीरिक गतिविधि या व्यायाम का अभाव धूम्रपान और शराब का सेवन परिवार में ऑस्टियोपोरोसिस का इतिहास बढ़ती उम्र के कारण हड्डियों का धीरे-धीरे कमजोर होना मेनोपॉज के बाद हड्डियों को मजबूत रखने के 5 जरूरी उपाय 1. कैल्शियम से भरपूर आहार लें दूध, दही, पनीर, रागी, तिल और हरी पत्तेदार सब्जियां कैल्शियम के अच्छे स्रोत हैं। इन्हें रोजाना भोजन में शामिल करें। 2. विटामिन D की कमी न होने दें सुबह की धूप लेने के साथ विटामिन D युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करें। इससे शरीर कैल्शियम को बेहतर तरीके से अवशोषित कर पाता है। 3. रोजाना व्यायाम करें तेज चलना, योग, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और सीढ़ियां चढ़ना जैसी गतिविधियां हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करती हैं। 4. पर्याप्त प्रोटीन लें प्रोटीन हड्डियों और मांसपेशियों दोनों के लिए जरूरी है। संतुलित मात्रा में दाल, अंडा, दूध, सोया और अन्य प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करें। 5. समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराएं विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार जरूरत पड़ने पर बोन मिनरल डेंसिटी (BMD) टेस्ट कराएं। इससे ऑस्टियोपोरोसिस की शुरुआती पहचान संभव हो सकती है और समय रहते इलाज शुरू किया जा सकता है। लक्षणों को नजरअंदाज न करें मेनोपॉज के बाद कमर दर्द, बार-बार फ्रैक्चर या झुकी हुई पीठ जैसे संकेतों को सामान्य उम्र का असर मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त कैल्शियम और विटामिन D के साथ समय पर मेडिकल जांच महिलाओं की हड्डियों को लंबे समय तक स्वस्थ और मजबूत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।  

surbhi जुलाई 24, 2026 0
Woman consulting a doctor for Hashimoto’s thyroiditis symptoms, highlighting thyroid health, autoimmune disease and hormone imbalance.
महिलाओं में क्यों ज्यादा होता है Hashimoto’s Thyroiditis? जानिए थायरॉइड की इस ऑटोइम्यून बीमारी के लक्षण, कारण और इलाज

थायरॉइड से जुड़ी समस्याएं महिलाओं में आम हैं, लेकिन उनमें Hashimoto’s Thyroiditis (हाशिमोटो थायरॉइडिटिस) सबसे अधिक पाई जाने वाली ऑटोइम्यून थायरॉइड बीमारी मानी जाती है। इस बीमारी में शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से थायरॉइड ग्रंथि पर ही हमला करने लगता है, जिससे धीरे-धीरे उसकी कार्यक्षमता कम होने लगती है और हाइपोथायरॉइडिज्म (Hypothyroidism) विकसित हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह बीमारी पुरुषों की तुलना में महिलाओं में 7 से 10 गुना अधिक देखी जाती है। इसके पीछे हार्मोनल बदलाव, आनुवंशिक कारण और इम्यून सिस्टम की कार्यप्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। क्या है Hashimoto’s Thyroiditis? Hashimoto’s Thyroiditis एक क्रोनिक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली थायरॉइड ग्रंथि के खिलाफ एंटीबॉडी बनाती है। ये एंटीबॉडी धीरे-धीरे थायरॉइड कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे थायरॉइड हार्मोन का उत्पादन कम होने लगता है। शुरुआत में कई मरीजों में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन समय के साथ यह बीमारी हाइपोथायरॉइडिज्म का कारण बन सकती है। महिलाओं में यह बीमारी ज्यादा क्यों होती है? स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार महिलाओं में एस्ट्रोजन जैसे हार्मोन इम्यून सिस्टम को अधिक सक्रिय बनाते हैं। यही वजह है कि महिलाओं में ऑटोइम्यून बीमारियों का खतरा पुरुषों की तुलना में अधिक होता है। इन परिस्थितियों में जोखिम और बढ़ सकता है— गर्भावस्था के दौरान प्रसव के बाद मेनोपॉज के समय हार्मोनल बदलाव के दौरान Hashimoto’s Thyroiditis होने के प्रमुख कारण यह बीमारी किसी एक कारण से नहीं होती, बल्कि कई कारकों के संयुक्त प्रभाव से विकसित होती है। मुख्य कारणों में शामिल हैं— परिवार में थायरॉइड या ऑटोइम्यून बीमारी का इतिहास हार्मोनल बदलाव वायरल संक्रमण अत्यधिक आयोडीन का सेवन (कुछ मामलों में) विटामिन D या सेलेनियम की कमी पर्यावरणीय कारण आनुवंशिक संवेदनशीलता इन शुरुआती लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें Hashimoto’s Thyroiditis के लक्षण धीरे-धीरे विकसित होते हैं। इनमें शामिल हैं— हर समय थकान महसूस होना बिना कारण वजन बढ़ना ठंड अधिक लगना बालों का झड़ना त्वचा का रूखा होना कब्ज की समस्या चेहरे या गर्दन में सूजन ध्यान लगाने में कठिनाई याददाश्त कमजोर होना महिलाओं में अनियमित पीरियड्स मूड में बदलाव या अवसाद किन लोगों में ज्यादा रहता है खतरा? इन लोगों में Hashimoto’s Thyroiditis होने का जोखिम अधिक माना जाता है— 30 से 60 वर्ष की महिलाएं परिवार में थायरॉइड रोग का इतिहास टाइप-1 डायबिटीज के मरीज रूमेटाइड आर्थराइटिस से पीड़ित लोग सीलिएक डिजीज के मरीज विटिलिगो या अन्य ऑटोइम्यून बीमारी वाले लोग हाल ही में मां बनी महिलाएं क्या यह बीमारी पूरी तरह ठीक हो सकती है? विशेषज्ञों के अनुसार Hashimoto’s Thyroiditis को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन सही इलाज और नियमित निगरानी से इसे प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। यदि थायरॉइड हार्मोन का स्तर कम हो जाता है, तो डॉक्टर थायरॉइड हार्मोन रिप्लेसमेंट दवा देते हैं, जिससे हार्मोन की कमी पूरी होती है और अधिकांश लक्षणों में सुधार आता है। कुछ मरीजों में थायरॉइड ग्रंथि बड़ी होकर गोइटर (Goiter) का रूप ले सकती है। यदि इससे निगलने, बोलने या सांस लेने में परेशानी हो, तो डॉक्टर सर्जरी की सलाह भी दे सकते हैं। कब डॉक्टर से मिलना चाहिए? यदि लंबे समय तक— लगातार थकान बनी रहे, बिना वजह वजन बढ़ने लगे, बाल तेजी से झड़ने लगें, ठंड अधिक महसूस हो, पीरियड्स अनियमित हो जाएं, तो बिना देरी किए एंडोक्राइनोलॉजिस्ट से सलाह लें और थायरॉइड की जांच कराएं। समय पर पहचान और नियमित उपचार से इस बीमारी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।  

surbhi जुलाई 22, 2026 0
Healthy PCOS-friendly breakfast with oats chilla, eggs, chia pudding and moong dal dosa for hormone balance.
PCOS से हैं परेशान? सुबह खाएं ये 4 सुपरफूड ब्रेकफास्ट, हार्मोन और वजन रहेगा कंट्रोल

PCOS Breakfast Ideas: PCOS से जूझ रही महिलाओं के लिए सही नाश्ता दिनभर की ऊर्जा, ब्लड शुगर कंट्रोल और हार्मोनल संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकता है। जानिए 4 आसान, हाई-प्रोटीन और फाइबर से भरपूर ब्रेकफास्ट ऑप्शंस। आज के समय में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) महिलाओं में तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। इस स्थिति में हार्मोनल असंतुलन, इंसुलिन रेजिस्टेंस, वजन बढ़ना, अनियमित पीरियड्स और बार-बार भूख लगने जैसी समस्याएं देखने को मिल सकती हैं। हालांकि, संतुलित खानपान और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इन लक्षणों को काफी हद तक मैनेज किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, दिन की शुरुआत ऐसे नाश्ते से करनी चाहिए जिसमें प्रोटीन, फाइबर और हेल्दी फैट्स पर्याप्त मात्रा में हों। इससे ब्लड शुगर को स्थिर रखने, लंबे समय तक पेट भरा महसूस कराने और अनहेल्दी क्रेविंग्स को कम करने में मदद मिल सकती है। 1. ओट्स-बेसन चीला अगर आप रोजाना पोहा या सूजी का उपमा खाते हैं, तो उसकी जगह ओट्स और बेसन से बना चीला ट्राई करें। क्यों है फायदेमंद? प्रोटीन और फाइबर से भरपूर लंबे समय तक पेट भरा रखने में मदद ब्लड शुगर तेजी से बढ़ने से बचाने में सहायक कैसे बनाएं? ओट्स का पाउडर, बेसन, प्याज, टमाटर, शिमला मिर्च और हरी मिर्च मिलाकर बैटर तैयार करें। हल्के घी या ऑलिव ऑयल में दोनों तरफ से सेंक लें। अनुमानित पोषण (1 सर्विंग) कैलोरी: 240–270 kcal प्रोटीन: 11–13 ग्राम 2. अंडा भुर्जी और मल्टीग्रेन टोस्ट यदि आप अंडा खाते हैं, तो यह हाई-प्रोटीन नाश्ता बेहतरीन विकल्प हो सकता है। क्यों है फायदेमंद? प्रोटीन और हेल्दी फैट्स का अच्छा स्रोत मांसपेशियों और हार्मोन हेल्थ को सपोर्ट करने में मदद लंबे समय तक एनर्जी बनाए रखने में सहायक कैसे बनाएं? दो अंडों की भुर्जी में प्याज, टमाटर, शिमला मिर्च और हरी सब्जियां मिलाएं। इसे एक स्लाइस मल्टीग्रेन या होल व्हीट टोस्ट के साथ खाएं। अनुमानित पोषण कैलोरी: 300–330 kcal प्रोटीन: 20–22 ग्राम 3. मूंग दाल इडली या डोसा चावल की जगह मूंग दाल से बनी इडली या डोसा बेहतर विकल्प हो सकता है। क्यों है फायदेमंद? कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन से भरपूर इंसुलिन स्पाइक कम करने में मदद पाचन के लिए हल्का कैसे बनाएं? रातभर भिगोई हुई मूंग दाल पीसकर बैटर तैयार करें। इसमें अदरक और हरी मिर्च मिलाकर इडली या डोसा बनाएं। नारियल की चटनी के साथ परोसें। अनुमानित पोषण कैलोरी: 230–260 kcal प्रोटीन: 12–15 ग्राम 4. चिया सीड्स पुडिंग अगर आपको सुबह मीठा खाने की इच्छा होती है, तो यह हेल्दी विकल्प हो सकता है। क्यों है फायदेमंद? ओमेगा-3 और फाइबर से भरपूर सूजन कम करने में सहायक लंबे समय तक पेट भरा रखने में मदद कैसे बनाएं? बादाम या नारियल के दूध में 2–3 चम्मच चिया सीड्स रातभर भिगो दें। सुबह ऊपर से बेरीज, कद्दू के बीज और थोड़ी दालचीनी डालकर खाएं। अनुमानित पोषण कैलोरी: 220–250 kcal प्रोटीन: 8–10 ग्राम PCOS में नाश्ता बनाते समय रखें इन बातों का ध्यान हर नाश्ते में प्रोटीन जरूर शामिल करें। रिफाइंड कार्ब्स और पैकेटबंद फूड्स से दूरी बनाएं। हेल्दी फैट्स जैसे बादाम, अखरोट, अलसी और कद्दू के बीज शामिल करें। पर्याप्त पानी पिएं और नियमित शारीरिक गतिविधि करें। मीठे पेय और अतिरिक्त चीनी का सेवन सीमित रखें। ध्यान दें :- सिर्फ हेल्दी नाश्ता करने से PCOS पूरी तरह ठीक नहीं होता। बेहतर परिणाम के लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार भी जरूरी है।

anmol जुलाई 21, 2026 0
Woman tracking menstrual cycle symptoms linked to PMOS and hormonal health concerns
35 दिनों से लंबी हो रही है पीरियड्स साइकिल? हो सकता है PMOS का संकेत, महिलाओं को नहीं करनी चाहिए यह गलती

आज की व्यस्त जीवनशैली में महिलाएं अक्सर अपनी सेहत से जुड़े कई संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं। खासतौर पर पीरियड्स में होने वाली अनियमितता को तनाव, काम के दबाव या बदलती दिनचर्या का असर मानकर टाल दिया जाता है। लेकिन अगर आपकी पीरियड्स साइकिल लगातार 35 दिनों से ज्यादा लंबी हो रही है या मासिक धर्म कई महीनों तक नहीं आ रहा है, तो यह पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) का शुरुआती संकेत हो सकता है। महिला स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पहले जिसे PCOS (पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम) के नाम से जाना जाता था, अब कई विशेषज्ञ इसे PMOS के रूप में भी संदर्भित कर रहे हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें हार्मोनल असंतुलन महिलाओं की प्रजनन क्षमता, मेटाबॉलिज्म और संपूर्ण स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। क्या है PMOS? PMOS एक हार्मोनल और मेटाबोलिक समस्या है, जिसमें ओवरीज में कई छोटे फॉलिकल्स विकसित हो जाते हैं और ओव्यूलेशन की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसके कारण पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं, वजन बढ़ सकता है और शरीर में कई अन्य बदलाव दिखाई देने लगते हैं। नई दिल्ली स्थित कैपिटल हेल्थ क्लिनिक की डायरेक्टर और महिला स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. बिमलप्रीत मोहन के अनुसार, कई युवा महिलाएं पीरियड्स की अनियमितता को सामान्य मान लेती हैं, जबकि यह शरीर में चल रहे हार्मोनल असंतुलन का संकेत हो सकता है। PMOS के प्रमुख लक्षण 1. 35 दिनों से लंबी पीरियड्स साइकिल यह PMOS का सबसे सामान्य और शुरुआती संकेत माना जाता है। पीरियड्स के बीच का अंतर 35 दिनों से अधिक होना, महीनों तक मासिक धर्म न आना या ब्लीडिंग का पैटर्न अनियमित होना हार्मोनल गड़बड़ी का संकेत हो सकता है। 2. बिना वजह वजन बढ़ना विशेष रूप से पेट और कमर के आसपास तेजी से वजन बढ़ना PMOS से जुड़ा आम लक्षण है। कई बार डाइट और एक्सरसाइज के बावजूद वजन कम नहीं होता। 3. लगातार मुंहासे होना अगर टीनएज के बाद भी चेहरे पर बार-बार मुंहासे निकल रहे हैं, खासकर ठुड्डी और जॉलाइन के आसपास, तो यह हार्मोनल असंतुलन की ओर इशारा कर सकता है। 4. चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल होंठों के ऊपर, ठुड्डी, छाती, पेट या पीठ पर अत्यधिक बाल उगना शरीर में एंड्रोजन हार्मोन के बढ़े स्तर का संकेत हो सकता है। 5. बालों का झड़ना सिर के बाल पतले होना, हेयरलाइन चौड़ी होना या जरूरत से ज्यादा बाल झड़ना भी PMOS से जुड़ा महत्वपूर्ण लक्षण माना जाता है। 6. गर्भधारण में परेशानी अनियमित ओव्यूलेशन के कारण कई महिलाओं को कंसीव करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। हालांकि समय पर उपचार से इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए? यदि आपको निम्न में से कोई समस्या लगातार दिखाई दे रही है, तो तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए— तीन महीने से अधिक समय तक अनियमित पीरियड्स लगातार मुंहासों की समस्या चेहरे या शरीर पर अत्यधिक बाल बिना कारण तेजी से वजन बढ़ना बालों का अत्यधिक झड़ना गर्भधारण में कठिनाई क्या PMOS को रोका जा सकता है? हालांकि आनुवंशिक और हार्मोनल कारणों को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नियमित व्यायाम करें संतुलित और पौष्टिक भोजन लें प्रोसेस्ड फूड्स से दूरी बनाएं तनाव कम करने के लिए योग और मेडिटेशन करें पर्याप्त नींद लें समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराएं विशेषज्ञों का मानना है कि PMOS का समय पर पता लगने और सही इलाज मिलने पर महिलाएं सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकती हैं। इसलिए पीरियड्स से जुड़े किसी भी असामान्य बदलाव को नजरअंदाज करना भविष्य में बड़ी समस्या का कारण बन सकता है।  

surbhi जून 25, 2026 0
Doctor explaining ovarian cancer myths and symptoms to women during a health awareness consultation.
हर ओवेरियन सिस्ट कैंसर नहीं होती! जानिए महिलाओं में फैली 5 बड़ी गलतफहमियों की सच्चाई

भारत समेत दुनिया भर में महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के बाद ओवेरियन कैंसर सबसे गंभीर और आम कैंसरों में गिना जाता है। यह बीमारी अंडाशय (Ovary) से शुरू होती है और समय पर पहचान न होने पर जानलेवा साबित हो सकती है। हालांकि, आज भी ओवेरियन कैंसर को लेकर महिलाओं के बीच कई गलत धारणाएं प्रचलित हैं, जिनकी वजह से सही समय पर जांच और इलाज में देरी हो सकती है। आइए जानते हैं ओवेरियन कैंसर से जुड़े 5 बड़े मिथक और उनकी सच्चाई। मिथक 1: ओवेरियन कैंसर सिर्फ अधिक उम्र की महिलाओं को होता है बहुत सी महिलाओं का मानना है कि यह बीमारी केवल बुजुर्ग महिलाओं को होती है। जबकि सच्चाई यह है कि उम्र बढ़ने के साथ जोखिम जरूर बढ़ता है, लेकिन कम उम्र की महिलाएं भी इसकी शिकार हो सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी उम्र की महिला में ओवेरियन कैंसर विकसित हो सकता है। इसलिए केवल उम्र के आधार पर खतरे को नजरअंदाज करना सही नहीं है। मिथक 2: HPV या Pap Smear टेस्ट से ओवेरियन कैंसर का पता चल जाता है यह एक आम गलतफहमी है। HPV टेस्ट और Pap Smear मुख्य रूप से सर्वाइकल कैंसर (गर्भाशय ग्रीवा कैंसर) की जांच के लिए किए जाते हैं। फिलहाल ऐसा कोई नियमित स्क्रीनिंग टेस्ट उपलब्ध नहीं है, जो शुरुआती अवस्था में ओवेरियन कैंसर की सटीक पहचान कर सके। इसलिए इन टेस्टों को ओवेरियन कैंसर की जांच मानना गलत है। मिथक 3: टैल्कम पाउडर से ओवेरियन कैंसर होता है कई वर्षों से टैल्कम पाउडर और ओवेरियन कैंसर के संबंध को लेकर बहस चल रही है। कुछ पुरानी रिसर्च में संभावित संबंध की बात कही गई थी, लेकिन हाल की बड़ी स्टडी में दोनों के बीच कोई मजबूत वैज्ञानिक संबंध साबित नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस विषय पर अभी भी शोध जारी है और केवल टैल्कम पाउडर को कैंसर का कारण मान लेना सही नहीं होगा। मिथक 4: केवल अल्ट्रासाउंड या CA-125 टेस्ट से कैंसर की पुष्टि हो जाती है अल्ट्रासाउंड और CA-125 ब्लड टेस्ट महत्वपूर्ण जांच हैं, लेकिन अकेले इनके आधार पर ओवेरियन कैंसर की पुष्टि नहीं की जा सकती। CA-125 का स्तर कई अन्य सामान्य स्थितियों में भी बढ़ सकता है, जबकि कुछ कैंसर मरीजों में यह सामान्य भी रह सकता है। अंतिम पुष्टि के लिए बायोप्सी और पैथोलॉजी जांच की आवश्यकता होती है। मिथक 5: हर ओवेरियन सिस्ट कैंसर बन जाती है यह सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक है। अधिकांश ओवेरियन सिस्ट सामान्य (Benign) होती हैं और कई मामलों में बिना इलाज के अपने आप ठीक भी हो जाती हैं। डॉक्टर सिस्ट का आकार, महिला की उम्र, लक्षण और अन्य जांच रिपोर्टों के आधार पर तय करते हैं कि सर्जरी की जरूरत है या नहीं। हर सिस्ट कैंसर में नहीं बदलती। क्यों जरूरी है सही जानकारी? ओवेरियन कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य समस्याओं जैसे पेट फूलना, पेट दर्द, भूख कम लगना या बार-बार पेशाब आने जैसे हो सकते हैं। इसलिए किसी भी लगातार बने रहने वाले लक्षण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। समय पर पहचान और सही जानकारी ही इस गंभीर बीमारी से बचाव और सफल इलाज की सबसे बड़ी कुंजी है।  

surbhi जून 19, 2026 0
Woman holding her lower abdomen during period cramps while reviewing pain relief medication options
पीरियड्स के दर्द में क्या आप गलत दवा ले रही हैं? अध्ययन में हुआ बड़ा खुलासा

मासिक धर्म के दौरान होने वाला दर्द लाखों महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करता है। हालांकि, एक नए अध्ययन में सामने आया है कि कई महिलाएं पीरियड्स के दर्द से राहत पाने के लिए ऐसी दवा का इस्तेमाल कर रही हैं, जो हमेशा सबसे प्रभावी विकल्प नहीं हो सकती। इंग्लैंड में किए गए एक बड़े शोध के अनुसार, पीरियड्स से जुड़े दर्द के लिए सबसे अधिक खरीदी जाने वाली दवा पैरासिटामोल है, जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि कई मामलों में इबुप्रोफेन अधिक असरदार साबित हो सकती है। करोड़ों खरीदारी रिकॉर्ड के विश्लेषण में सामने आई जानकारी शोधकर्ताओं ने 2006 से 2015 के बीच एक प्रमुख रिटेल चेन के 21.1 करोड़ से अधिक लेनदेन और 34 लाख ग्राहकों के खरीदारी डेटा का अध्ययन किया। अध्ययन में पाया गया कि मासिक धर्म से जुड़े उत्पादों जैसे सैनिटरी पैड और टैम्पोन के साथ खरीदे गए दर्द निवारक उत्पादों में पैरासिटामोल आधारित दवाओं की हिस्सेदारी लगभग दो-तिहाई थी, जबकि इबुप्रोफेन आधारित दवाएं केवल एक-तिहाई थीं। यह अध्ययन PLOS Digital Health जर्नल में प्रकाशित हुआ है। पीरियड्स के दर्द में इबुप्रोफेन क्यों हो सकती है ज्यादा प्रभावी? विशेषज्ञों के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान गर्भाशय की मांसपेशियां सिकुड़ती हैं ताकि उसकी आंतरिक परत बाहर निकल सके। इस प्रक्रिया में शरीर में प्रोस्टाग्लैंडिन नामक रसायन बनता है, जो ऐंठन और दर्द का प्रमुख कारण माना जाता है। इबुप्रोफेन एक नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग (NSAID) है, जो प्रोस्टाग्लैंडिन के निर्माण को कम करने में मदद करती है। इसी वजह से यह पीरियड्स के दौरान होने वाली ऐंठन और मांसपेशियों के दर्द में अधिक प्रभावी मानी जाती है। वहीं, पैरासिटामोल मुख्य रूप से मस्तिष्क में दर्द के संकेतों को कम करने का काम करती है। इसलिए यह सिरदर्द और बुखार जैसी स्थितियों में अधिक उपयोगी मानी जाती है। पीरियड दर्द पर अभी भी सीमित है शोध अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं का कहना है कि महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े दर्द और उसके उपचार पर अपेक्षाकृत कम शोध हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस विषय पर जागरूकता बढ़ाने और सही दवा के चयन के बारे में जानकारी देने की आवश्यकता है। कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए? सामान्य पीरियड दर्द मासिक धर्म का एक सामान्य हिस्सा हो सकता है, लेकिन यदि दर्द इतना अधिक हो कि दैनिक गतिविधियां प्रभावित होने लगें या दर्द लगातार असामान्य रूप से बना रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक पीरियड दर्द एंडोमेट्रियोसिस, फाइब्रॉइड्स या अन्य स्त्री रोग संबंधी समस्याओं का संकेत भी हो सकता है। दवा लेने से पहले रखें इन बातों का ध्यान हालांकि इबुप्रोफेन कई महिलाओं के लिए प्रभावी विकल्प हो सकती है, लेकिन यह हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होती। कुछ लोगों में इसके दुष्प्रभाव या स्वास्थ्य संबंधी जोखिम हो सकते हैं। इसलिए किसी भी दर्द निवारक दवा का उपयोग करने से पहले पैक पर दी गई जानकारी पढ़ना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है। नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी दवा का सेवन चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही करें।  

surbhi जून 16, 2026 0
Woman over 50 performing light exercise and stretching as part of a beginner fitness routine
50 की उम्र के बाद पहली बार एक्सरसाइज़ शुरू करनी है? जानिए महिलाओं के लिए सुरक्षित और असरदार फिटनेस प्लान

अक्सर महिलाएं घर के कामकाज को ही पर्याप्त शारीरिक गतिविधि मान लेती हैं और अपने लिए नियमित व्यायाम का समय नहीं निकाल पातीं। लेकिन 45 से 50 वर्ष की उम्र के बाद शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव, बढ़ता वजन, मांसपेशियों की कमजोरी और मेनोपॉज से जुड़ी समस्याएं यह एहसास दिलाती हैं कि फिट रहने के लिए सिर्फ घरेलू कामकाज पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर किसी महिला ने कभी नियमित एक्सरसाइज़ नहीं की है, तो 50 की उम्र के आसपास भी इसकी शुरुआत की जा सकती है। हालांकि शुरुआत धीरे-धीरे और सही मार्गदर्शन में करनी चाहिए। इस उम्र में लक्ष्य तेजी से वजन घटाना नहीं, बल्कि शरीर को मजबूत, सक्रिय और लचीला बनाना होना चाहिए। 50 के बाद क्यों जरूरी हो जाती है एक्सरसाइज़? उम्र बढ़ने के साथ शरीर की मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं। नई मसल्स बनने की क्षमता भी कम हो जाती है। वहीं मेनोपॉज के दौरान हार्मोनल बदलावों के कारण वजन बढ़ना, थकान, नींद की समस्या, मूड स्विंग्स और हड्डियों की कमजोरी जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं। नियमित एक्सरसाइज़ से: मांसपेशियां मजबूत होती हैं हड्डियों का स्वास्थ्य बेहतर रहता है वजन नियंत्रित करने में मदद मिलती है ऊर्जा का स्तर बढ़ता है बैलेंस और फ्लेक्सिबिलिटी बेहतर होती है तनाव और चिंता कम हो सकती है नींद की गुणवत्ता में सुधार आता है पहले 2 हफ्ते: धीरे-धीरे शुरुआत करें यदि आपने कभी एक्सरसाइज़ नहीं की है, तो शुरुआत हल्की गतिविधियों से करें। रोजाना 15-20 मिनट वॉक आरामदायक गति से चलें। सांस बहुत ज्यादा नहीं फूलनी चाहिए। धीरे-धीरे चलने की स्पीड बढ़ाएं। पर्याप्त पानी पीते रहें। बैलेंस एक्सरसाइज़ एक पैर पर खड़े होकर संतुलन बनाने की कोशिश करें। शुरुआत 10 सेकंड से करें। धीरे-धीरे इसे 30 सेकंड तक बढ़ाएं। दोनों पैरों से अभ्यास करें। तीसरे से आठवें हफ्ते तक अब वॉक का समय बढ़ाकर कम से कम 30 मिनट कर दें। इसके साथ ये आसान एक्सरसाइज़ शुरू करें: 1. चेयर लेग रेज कुर्सी पर बैठकर एक-एक पैर उठाएं और नीचे रखें। 2. डबल लेग रेज दोनों पैरों को साथ उठाकर नीचे लाएं। 3. आर्म स्ट्रेच और शोल्डर सर्कल हाथ ऊपर उठाकर स्ट्रेच करें और गोल-गोल घुमाएं। 4. वॉल पुश-अप्स दीवार के सहारे पुश-अप्स करें। 5. मार्चिंग एक ही जगह पर खड़े होकर 5 मिनट मार्च करें। 6. बैलेंस ट्रेनिंग एक पैर पर 30 सेकंड तक खड़े रहने का अभ्यास जारी रखें। 8 हफ्तों बाद: फ्लेक्सिबिलिटी और मोबिलिटी पर फोकस जब शरीर एक्टिव महसूस होने लगे तो थोड़ी उन्नत एक्सरसाइज़ जोड़ सकते हैं। लेग लिफ्ट्स साइड लेग मूवमेंट्स दोनों पैरों की कंट्रोल्ड रेज शुरुआती प्लैंक प्लैंक की शुरुआत कुछ सेकंड से करें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। 12 हफ्तों बाद: स्ट्रेंथ ट्रेनिंग शामिल करें अब हल्के वजन के डंबल्स का इस्तेमाल शुरू किया जा सकता है। क्या करें? बाइसेप कर्ल ट्राइसेप एक्सटेंशन शोल्डर एक्सरसाइज़ साइड रेज 1 से 3 किलो वजन पर्याप्त होता है। इसके अलावा: 30-45 मिनट डांस वर्कआउट नियमित वॉक बैलेंस ट्रेनिंग जारी रखें डाइट का भी रखें विशेष ध्यान फिटनेस केवल एक्सरसाइज़ से नहीं आती, सही पोषण भी उतना ही जरूरी है। हर मील में प्रोटीन शामिल करें पनीर दाल राजमा छोले दही सोया अंडे मछली या चिकन (यदि नॉनवेज खाती हैं) सुबह की अच्छी शुरुआत भीगे हुए बादाम अखरोट किशमिश टोंड दूध फल और सलाद बढ़ाएं दिन में 1-2 मौसमी फल भरपूर सलाद हरी सब्जियां इन बातों का ध्यान रखें नाश्ते के साथ चाय न पिएं आयरन और कैल्शियम की जांच कराएं विटामिन-D का स्तर जांचें जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लें 50 की उम्र में कितना प्रोटीन जरूरी? विशेषज्ञों के अनुसार: 55 किलो वजन वाली महिला को प्रतिदिन लगभग 55-65 ग्राम प्रोटीन लेना चाहिए। उम्र बढ़ने के साथ प्रोटीन की जरूरत भी बढ़ती है क्योंकि यह मांसपेशियों और हड्डियों की मजबूती बनाए रखने में मदद करता है। कब डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है? यदि आपको इनमें से कोई समस्या है: हाई ब्लड प्रेशर डायबिटीज हार्ट डिजीज घुटनों का गंभीर दर्द कमर दर्द बार-बार चक्कर आना तो एक्सरसाइज़ शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह अवश्य लें। विशेषज्ञों का मानना है कि फिटनेस की शुरुआत करने के लिए कभी देर नहीं होती। 45-50 की उम्र में भी नियमित वॉक, हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और संतुलित आहार अपनाकर महिलाएं अपनी ऊर्जा, ताकत और जीवन की गुणवत्ता में बड़ा सुधार ला सकती हैं।  

surbhi जून 3, 2026 0
Woman craving chocolate during periods due to hormonal changes and nutritional needs
पीरियड्स में चॉकलेट की क्रेविंग क्यों होती है? जानिए शरीर क्या संकेत देता है

पीरियड्स के दौरान या उससे पहले अचानक चॉकलेट, चिप्स, नमकीन स्नैक्स या मीठी चीजें खाने की इच्छा होना महिलाओं में बेहद सामान्य बात है। अक्सर इसे सिर्फ मूड स्विंग या भावनात्मक बदलाव से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे शरीर की वास्तविक पोषण संबंधी जरूरतें और हार्मोनल परिवर्तन भी जिम्मेदार होते हैं। रेनबो हॉस्पिटल के रोजवॉक की सीनियर कंसल्टेंट-OBGY और इंफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉ. वैशाली शर्मा के मुताबिक, पीरियड्स के दौरान होने वाली फूड क्रेविंग्स शरीर का एक प्राकृतिक संकेत हैं। ये हार्मोन, ब्रेन केमिस्ट्री, पोषण की जरूरतों और भावनात्मक बदलावों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम होती हैं। पीरियड्स के दौरान क्यों बढ़ती है क्रेविंग? मासिक धर्म चक्र के ल्यूटियल फेज में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन के स्तर में तेजी से बदलाव आता है। इसका असर मस्तिष्क में मौजूद सेरोटोनिन नामक केमिकल पर पड़ता है, जो मूड और मानसिक संतुलन को नियंत्रित करता है। जब सेरोटोनिन का स्तर कम होता है, तब शरीर शुगर और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर खाद्य पदार्थों की मांग करता है। यही कारण है कि इस दौरान मीठा, चॉकलेट और कंफर्ट फूड्स खाने की इच्छा बढ़ जाती है। चॉकलेट की क्रेविंग का क्या मतलब है? चॉकलेट, विशेष रूप से डार्क चॉकलेट, मैग्नीशियम का अच्छा स्रोत होती है। मैग्नीशियम मांसपेशियों को आराम देने, मूड को संतुलित रखने और थकान कम करने में मदद करता है। पीरियड्स के दौरान कुछ महिलाओं में मैग्नीशियम का स्तर कम हो सकता है, जिससे चॉकलेट खाने की इच्छा बढ़ती है। इसके अलावा चॉकलेट खाने से डोपामाइन और सेरोटोनिन जैसे "फील-गुड" हार्मोन रिलीज होते हैं, जो तनाव, चिड़चिड़ापन और थकान को कम करने में मदद करते हैं। नमकीन चीजें खाने की इच्छा क्यों होती है? कई महिलाओं को पीरियड्स के दौरान चिप्स, अचार, फ्राइज या अन्य नमकीन स्नैक्स खाने का मन करता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह शरीर में फ्लूइड बैलेंस और इलेक्ट्रोलाइट्स के बदलाव का संकेत हो सकता है। हालांकि अत्यधिक नमक का सेवन ब्लोटिंग और वॉटर रिटेंशन को बढ़ा सकता है। ऐसे में प्रोसेस्ड स्नैक्स की बजाय रोस्टेड नट्स, बीज और घर के बने हेल्दी स्नैक्स बेहतर विकल्प हो सकते हैं। मीठा और कार्बोहाइड्रेट की क्रेविंग क्यों होती है? पीरियड्स के दौरान कई महिलाओं को केक, पेस्ट्री, ब्रेड, पास्ता या अन्य कार्बोहाइड्रेट युक्त चीजें खाने का मन करता है। ये खाद्य पदार्थ ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ाकर अस्थायी रूप से ऊर्जा और बेहतर मूड का एहसास कराते हैं। लेकिन यह असर ज्यादा देर तक नहीं रहता और बाद में थकान व चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है। इसलिए ओट्स, साबुत अनाज, फल और शकरकंद जैसे कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट बेहतर विकल्प माने जाते हैं। रेड मीट या आयरन युक्त भोजन की इच्छा क्यों होती है? जिन महिलाओं को ज्यादा ब्लीडिंग होती है, उनमें आयरन की कमी होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में शरीर आयरन से भरपूर खाद्य पदार्थों की मांग कर सकता है। पालक, दालें, फलियां, खजूर, चुकंदर और लीन मीट जैसे खाद्य पदार्थ आयरन की कमी को पूरा करने में मदद कर सकते हैं। इमोशनल ईटिंग और वास्तविक जरूरत में फर्क समझना जरूरी विशेषज्ञों का कहना है कि हर क्रेविंग सिर्फ पोषण की कमी का संकेत नहीं होती। तनाव, चिंता, मूड स्विंग और भावनात्मक बदलाव भी खाने की इच्छा को प्रभावित करते हैं। ऐसे में संतुलन बनाए रखना सबसे जरूरी है। अपनी पसंदीदा चीजें सीमित मात्रा में खाना गलत नहीं है, लेकिन अत्यधिक सेवन से बचना चाहिए। क्रेविंग कम करने के लिए अपनाएं ये आसान उपाय दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद लें। नियमित व्यायाम करें। संतुलित और पौष्टिक भोजन लें। भोजन छोड़ने की आदत से बचें। अधिक प्रोसेस्ड और जंक फूड का सेवन कम करें। विशेषज्ञों के अनुसार, कभी-कभार होने वाली क्रेविंग सामान्य है। लेकिन यदि अत्यधिक खाने की इच्छा, गंभीर मूड स्विंग, अत्यधिक थकान, चक्कर या भारी ब्लीडिंग जैसी समस्याएं लगातार बनी रहें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।  

surbhi मई 30, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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kalpana जुलाई 21, 2026 0