अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर चल रही बातचीत के बीच परमाणु निरीक्षण का मुद्दा एक बार फिर विवाद के केंद्र में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी अंतिम समझौते में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को ईरान के परमाणु ठिकानों की जांच की अनुमति देना अनिवार्य होगा। वहीं, ईरान इस तरह की व्यापक निरीक्षण व्यवस्था को स्वीकार करने से इनकार करता नजर आ रहा है। ट्रंप ने ईरान के दावों को बताया गलत पेंसिल्वेनिया में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरानी अधिकारियों के उन दावों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि तेहरान ने किसी व्यापक अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था को मंजूरी नहीं दी है। ट्रंप ने कहा कि ईरानी अधिकारी इस मुद्दे पर गलत जानकारी दे रहे हैं और उन्हें बातचीत में तय हो रही शर्तों की पूरी जानकारी है। उन्होंने कहा, “निरीक्षण व्यवस्था सौ फीसदी तय है। अगर ऐसा नहीं होता तो मैं अभी बातचीत और बैठकों को रद्द कर देता।” IAEA को मिलेगी परमाणु ठिकानों तक पहुंच अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि भविष्य में IAEA के निरीक्षकों को ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों तक पहुंच मिलेगी और वे मौके पर जाकर जांच कर सकेंगे। ट्रंप के अनुसार, किसी भी समझौते की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र और अंतरराष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था जरूरी है। उन्होंने कहा कि उचित समय आने पर निरीक्षक जमीन पर मौजूद होंगे और समझौते के अनुपालन की पुष्टि करेंगे। निरीक्षण व्यवस्था पर दोनों देशों में मतभेद परमाणु निगरानी को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। अमेरिका का मानना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर किसी भी समझौते में स्वतंत्र जांच और सत्यापन की व्यवस्था जरूरी है। वहीं, ईरान कई बार यह कह चुका है कि उसकी परमाणु गतिविधियां शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हैं और अत्यधिक अंतरराष्ट्रीय निगरानी उसकी संप्रभुता के खिलाफ हो सकती है। ईरान ने ट्रंप और जेडी वेंस के दावों को नकारा ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने अमेरिकी दावों को खारिज करते हुए कहा कि परमाणु स्थलों की जांच को लेकर कोई अंतिम समयसीमा तय नहीं हुई है। उन्होंने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस बयान का भी खंडन किया, जिसमें कहा गया था कि ईरान स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए तैयार हो गया है। बघाई ने कहा कि इस विषय पर अभी कई मुद्दों पर चर्चा बाकी है। परमाणु समझौतों में हमेशा अहम रहा है सत्यापन विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान से जुड़े सभी प्रमुख परमाणु समझौतों में निगरानी और सत्यापन सबसे महत्वपूर्ण तत्व रहे हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी देश चाहते हैं कि यह सुनिश्चित किया जाए कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण और नागरिक उद्देश्यों तक सीमित रहे। दूसरी ओर, ईरान का तर्क रहा है कि सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर उसकी चिंताओं को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। 60 दिनों की समयसीमा में आगे बढ़ रही बातचीत अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए समझौते के तहत कई मुद्दों पर चरणबद्ध बातचीत जारी है। दोनों पक्षों ने 60 दिनों के भीतर व्यापक सहमति बनाने की दिशा में काम करने पर सहमति जताई है। स्विट्जरलैंड में हाल में हुई वार्ता में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी अधिकारियों के बीच परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, क्षेत्रीय सुरक्षा, पुनर्निर्माण और होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य हो रही गतिविधियां वार्ता के बाद अमेरिकी प्रशासन ने दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल परिवहन में तेजी आई है और समुद्री गतिविधियां सामान्य होने लगी हैं। अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठनों के अनुसार, क्षेत्र में फंसे हजारों नाविकों और जहाज कर्मियों को सुरक्षित निकालने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। अंतिम समझौते में निरीक्षण बन सकता है सबसे बड़ा मुद्दा विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक शांति समझौते की राह में परमाणु निरीक्षण सबसे संवेदनशील और निर्णायक मुद्दा बन सकता है। ट्रंप के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन किसी भी अंतिम समझौते में निरीक्षण और सत्यापन तंत्र से समझौता करने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तेहरान अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था को लेकर कितना लचीला रुख अपनाता है और क्या दोनों देश किसी साझा समाधान तक पहुंच पाते हैं।
वॉशिंगटन/बर्गेनस्टॉक: अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में हुई दो दिवसीय वार्ता के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दावा किया है कि ईरान अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को दोबारा अपने परमाणु प्रतिष्ठानों तक पहुंच देने पर सहमत हो गया है। यदि यह सहमति औपचारिक रूप लेती है, तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम की अंतरराष्ट्रीय निगरानी फिर से शुरू हो सकेगी। इसी बीच, ट्रंप प्रशासन ने ईरानी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर लगे कुछ प्रतिबंधों में 60 दिनों की अस्थायी छूट देने का फैसला किया है। इस कदम को दोनों देशों के बीच जारी वार्ता को आगे बढ़ाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। अगस्त तक ईरानी तेल निर्यात को मिली राहत अमेरिकी वित्त मंत्रालय की ओर से जारी छूट के तहत अगस्त तक ईरानी कच्चे तेल और उससे जुड़े उत्पादों की बिक्री, परिवहन और कुछ वित्तीय गतिविधियों को सीमित अनुमति दी गई है। यह हाल के वर्षों में ईरान को दी गई सबसे बड़ी आर्थिक रियायतों में से एक मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से ईरान की अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिल सकती है, जो लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में रही है। वेंस का दावा- अमेरिकी किसानों को भी होगा फायदा जेडी वेंस ने कहा कि यदि भविष्य में ईरान की जमी हुई संपत्तियों को जारी किया जाता है, तो उसका एक हिस्सा अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद में इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने कहा, "यदि ईरानी संपत्तियां मुक्त होती हैं, तो इससे अमेरिकी किसानों को लाभ मिलेगा और ईरानी लोगों की खाद्य जरूरतें पूरी करने में भी मदद मिलेगी।" वेंस ने यह भी संकेत दिया कि आगामी 60 दिनों के दौरान तकनीकी स्तर की वार्ताएं जारी रहेंगी, जिनका उद्देश्य एक स्थायी समझौते तक पहुंचना है। IAEA निरीक्षण को लेकर उठे सवाल वेंस के दावों पर कई विशेषज्ञों ने सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना है कि IAEA निरीक्षण की व्यवस्था पहले से ही 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) का हिस्सा थी, जिसे 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समाप्त कर दिया था। कई विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा पहल पुराने ढांचे को ही नए स्वरूप में पुनर्जीवित करने की कोशिश है। वार्ता के दौरान दिखा तनाव स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में हुई वार्ता के दौरान कई बार तनाव की स्थिति भी बनी। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कुछ बयानों और लेबनान से जुड़े मुद्दों पर ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अस्थायी रूप से बैठक छोड़ने की चेतावनी दी थी। उपराष्ट्रपति वेंस के हस्तक्षेप के बाद दोनों पक्ष दोबारा बातचीत की मेज पर लौटे और वार्ता आगे बढ़ सकी। पाकिस्तान और कतर ने निभाई अहम भूमिका पूरी बातचीत के दौरान पाकिस्तान और कतर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। दोनों देशों ने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद बनाए रखने और संभावित समझौते की दिशा में माहौल तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इजरायल समर्थक खेमे में बढ़ी चिंता ईरानी तेल प्रतिबंधों में ढील और परमाणु निगरानी को लेकर चल रही वार्ता ने अमेरिका के इजरायल समर्थक राजनीतिक वर्ग में चिंता बढ़ा दी है। कई नेताओं का मानना है कि प्रतिबंधों में राहत से ईरान को आर्थिक मजबूती मिल सकती है, जिसका क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, अगले 60 दिन अमेरिका और ईरान के रिश्तों के लिए निर्णायक माने जा रहे हैं। यदि दोनों पक्ष बातचीत को आगे बढ़ाने में सफल रहते हैं, तो पश्चिम एशिया में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक नई शुरुआत हो सकती है।
बर्गेनस्टॉक (स्विट्जरलैंड): मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में स्थायी शांति बहाल करने के उद्देश्य से स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में अमेरिका और ईरान के बीच अहम शांति वार्ता शुरू हो गई है। इस बातचीत में पाकिस्तान और कतर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी तनाव, परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जा रही है। बैठक के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने वार्ता को "ऐतिहासिक अवसर" करार देते हुए कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका, ईरान के साथ अपने संबंधों को नई और सकारात्मक दिशा देने के लिए तैयार है। ईरान के सामने अमेरिका की बड़ी शर्त जेडी वेंस ने स्पष्ट किया कि अमेरिका, ईरान के साथ संबंध सामान्य करने और दोस्ती का नया अध्याय शुरू करने को तैयार है, लेकिन इसके लिए तेहरान को दो महत्वपूर्ण शर्तों को स्थायी रूप से स्वीकार करना होगा— क्षेत्र में अस्थिरता और संघर्ष फैलाने वाली नीतियों का त्याग। परमाणु हथियार हासिल करने की महत्वाकांक्षा को हमेशा के लिए छोड़ना। वेंस ने कहा कि यदि ईरान इन दोनों मुद्दों पर सकारात्मक और स्थायी कदम उठाता है, तो वाशिंगटन उसके साथ रिश्तों को पूरी तरह बदलने के लिए तैयार है। होर्मुज जलडमरूमध्य और परमाणु मुद्दे पर प्रगति का दावा अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने जैसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक लक्ष्यों की दिशा में पहले ही महत्वपूर्ण प्रगति हो चुकी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह वार्ता मध्य पूर्व में स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए नए रास्ते खोलेगी। पाकिस्तान की मध्यस्थता की सराहना जेडी वेंस ने इस शांति वार्ता को संभव बनाने में पाकिस्तान की भूमिका की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की कूटनीतिक कोशिशों ने अमेरिका और ईरान को बातचीत की मेज तक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वेंस ने आसिम मुनीर को "एक महान सैन्य नेता और कुशल राजनयिक" बताया। भारतीय पत्नी और पाकिस्तानी जनरल का किया जिक्र हल्के-फुल्के अंदाज में जेडी वेंस ने कहा कि उनकी जिंदगी में दो बेहद महत्वपूर्ण लोग हैं—एक उनकी भारतीय मूल की पत्नी उषा वेंस और दूसरे पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर। उन्होंने कहा कि पिछले तीन महीनों में उनकी जनरल मुनीर के साथ लगातार बातचीत हुई है और क्षेत्रीय शांति स्थापित करने के प्रयासों में उनका सहयोग महत्वपूर्ण रहा है। मिडिल ईस्ट में शांति और ऊर्जा सुरक्षा पर नजर वेंस ने उम्मीद जताई कि स्विट्जरलैंड में जारी यह वार्ता मध्य पूर्व में तनाव कम करने, तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने और वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगी। विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता सफल रहती है, तो न केवल क्षेत्रीय संघर्ष कम हो सकते हैं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
बर्गेनस्टॉक (स्विट्जरलैंड): अमेरिका और ईरान के बीच रविवार (21 जून) को स्विट्जरलैंड में शुरू हुई बहुप्रतीक्षित वार्ता की शुरुआत ही तनावपूर्ण माहौल में हुई। बातचीत शुरू होने से पहले ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ प्रस्तावित संयुक्त फोटो सेशन और हाथ मिलाने के कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिया। इसके कुछ देर बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से सैन्य कार्रवाई की नई चेतावनी पर नाराजगी जताते हुए ईरानी प्रतिनिधिमंडल बैठक स्थल से बाहर निकल गया। इस घटनाक्रम का वीडियो सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा तेज हो गई है। बर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में हुई पहली बैठक अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता का पहला दौर स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में आयोजित किया गया। बैठक में अमेरिका, ईरान, पाकिस्तान और कतर के प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए। पाकिस्तान और कतर इस पूरी प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। यह वार्ता हाल ही में हुए 'इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन' (MoU) के तहत शुरू हुई है, जिसके अनुसार अगले 60 दिनों तक दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत होगी। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा की जानी है। हाथ मिलाने और फोटो सेशन से ईरान का इनकार ईरानी समाचार एजेंसी के अनुसार, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल और आयोजकों ने बातचीत शुरू होने से पहले दोनों पक्षों के नेताओं के बीच हाथ मिलाने और संयुक्त फोटो सेशन की व्यवस्था की थी। ईरान के मुख्य वार्ताकार और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ तथा विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इसमें हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। दोनों नेता निर्धारित फोटो सेशन से पहले ही बैठक कक्ष से बाहर निकल गए। कैमरे में कैद हुआ पूरा घटनाक्रम सामने आए वीडियो में देखा जा सकता है कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कमरे से बाहर निकलने से ठीक पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से संक्षिप्त बातचीत की। इसके बाद वह अचानक मुड़े और पूरे ईरानी प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक कक्ष से बाहर चले गए। यह पूरा घटनाक्रम कैमरे में रिकॉर्ड हो गया, जिससे वार्ता की शुरुआत में ही दोनों पक्षों के बीच मौजूद अविश्वास और तनाव उजागर हो गया। ट्रंप की चेतावनी से बढ़ी नाराजगी सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से सैन्य कार्रवाई संबंधी हालिया बयान ने ईरानी पक्ष की नाराजगी बढ़ा दी। ईरान का मानना है कि कूटनीतिक बातचीत के दौरान इस तरह की सार्वजनिक चेतावनियां वार्ता के माहौल को प्रभावित करती हैं और आपसी भरोसे को कमजोर करती हैं। आगे की बातचीत पर दुनिया की नजर शुरुआती तनाव के बावजूद दोनों पक्षों के बीच वार्ता प्रक्रिया पूरी तरह बंद नहीं हुई है। मध्यस्थ देशों पाकिस्तान और कतर की कोशिश है कि बातचीत का अगला दौर सकारात्मक माहौल में आगे बढ़े। विशेषज्ञों का मानना है कि स्विट्जरलैंड में शुरू हुई यह वार्ता पश्चिम एशिया की राजनीति, ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजारों के भविष्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।
नई दिल्ली: महिला टी20 वर्ल्ड कप 2026 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मिली हार ने भारतीय टीम की सेमीफाइनल की राह मुश्किल कर दी है। पाकिस्तान और नीदरलैंड्स को हराकर शानदार शुरुआत करने वाली टीम इंडिया तीसरे मुकाबले में प्रोटियाज टीम के सामने टिक नहीं सकी। अब सिर्फ एक हार ने ग्रुप-1 के समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। ग्रुप-1 में कैसी है स्थिति? ग्रुप-1 में ऑस्ट्रेलिया लगातार तीन जीत के साथ शीर्ष पर है। भारत ने तीन मैचों में दो जीत हासिल की हैं और फिलहाल दूसरे स्थान पर मौजूद है। दक्षिण अफ्रीका और बांग्लादेश के अंक समान हैं, लेकिन बेहतर नेट रन रेट के कारण अफ्रीकी टीम को बढ़त हासिल है। वहीं पाकिस्तान और नीदरलैंड्स की लगातार तीन हार के बाद उनकी नॉकआउट की उम्मीदें लगभग खत्म हो चुकी हैं। भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता? आईसीसी के नियमों के अनुसार प्रत्येक ग्रुप से सिर्फ दो टीमें ही नॉकआउट चरण में पहुंचेंगी। भारत को अब अपने बचे हुए मुकाबले बांग्लादेश और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेलने हैं। अगर भारतीय टीम बांग्लादेश को हराने में सफल रहती है लेकिन ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ हार जाती है, तो उसके कुल 6 अंक होंगे। दूसरी ओर दक्षिण अफ्रीका के सामने बांग्लादेश और नीदरलैंड्स जैसी अपेक्षाकृत कमजोर टीमें हैं। यदि प्रोटियाज टीम दोनों मुकाबले जीत लेती है, तो वह 8 अंकों के साथ सेमीफाइनल में जगह बना सकती है और भारत बाहर हो सकता है। हालांकि अगर ऑस्ट्रेलिया अपने आगामी मैचों में हारती है या अन्य परिणाम भारत के पक्ष में जाते हैं, तो टीम इंडिया के लिए उम्मीदें बनी रह सकती हैं। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मैच का हाल भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 159 रन का लक्ष्य रखा था। जवाब में दक्षिण अफ्रीका ने अनुभवी बल्लेबाज मारिजाम काप की शानदार 81 रन की पारी की बदौलत लक्ष्य को 5 गेंद शेष रहते और 6 विकेट से हासिल कर लिया। मैच के दौरान राधा यादव ने मारिजाम काप के दो अहम कैच छोड़े, जब वह 27 और 66 रन के निजी स्कोर पर थीं। यही चूक अंत में भारतीय टीम पर भारी पड़ गई। अब टीम इंडिया के लिए हर मुकाबला करो या मरो जैसा बन गया है और सेमीफाइनल की उम्मीदों को जिंदा रखने के लिए अगले मैचों में जीत बेहद जरूरी होगी।
बर्गेनस्टॉक/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance स्विट्जरलैंड पहुंच गए हैं। दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच होने वाली इस वार्ता में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, जमे हुए वित्तीय संसाधनों, लेबनान युद्धविराम और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। ईरान की ओर से प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व Mohammad Bagher Ghalibaf कर रहे हैं। इसके अलावा ईरानी विदेश मंत्री Abbas Araghchi और केंद्रीय बैंक के गवर्नर भी वार्ता में शामिल हैं। ईरान को मिल सकता है 6 अरब डॉलर का फंड रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ईरान के कुछ फ्रीज किए गए फंड जारी करने पर विचार कर रहा है। शुरुआती चरण में कतर में जमा करीब 6 अरब डॉलर की राशि को मानवीय जरूरतों से जुड़ी खरीदारी के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। इसके बदले अमेरिका चाहता है कि ईरान संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निरीक्षकों को अपने परमाणु ठिकानों के निरीक्षण की अनुमति दे। यही इस वार्ता के प्रमुख एजेंडों में शामिल है। ट्रंप-पेजेशकियन समझौते के बाद पहली बड़ी वार्ता यह बैठक अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और ईरानी राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian के बीच हुए अंतरिम समझौते के बाद आयोजित की जा रही है। समझौते में 60 दिनों की वार्ता अवधि तय की गई है, जिसका उद्देश्य लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करना और स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ना है। जेडी वेंस बोले- वास्तविक ढांचा तैयार करना लक्ष्य स्विट्जरलैंड रवाना होने से पहले जेडी वेंस ने कहा कि उनका उद्देश्य केवल बातचीत करना नहीं, बल्कि भविष्य की वार्ताओं के लिए एक "वास्तविक और व्यावहारिक ढांचा" तैयार करना है। उन्होंने उम्मीद जताई कि परमाणु मुद्दे और लेबनान युद्धविराम जैसे संवेदनशील विषयों पर प्रगति संभव है। पाकिस्तान भी निभा रहा मध्यस्थ की भूमिका सूत्रों के मुताबिक, वार्ता में मध्यस्थ के रूप में Shehbaz Sharif और Asim Munir भी मौजूद हैं। वार्ता स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में आयोजित होने की संभावना है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी बनी रहेगी नजर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक Strait of Hormuz को लेकर भी तनाव बना हुआ है। ईरान पहले कह चुका है कि उसकी मंजूरी के बिना कोई जहाज इस मार्ग से नहीं गुजर सकता। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि जलडमरूमध्य खुला है और जहाजों की आवाजाही जारी है। डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कहा है कि 60 दिनों के युद्धविराम के दौरान और उसके बाद भी इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर कोई टोल नहीं लगाया जाएगा। इजरायल से वार्ता प्रभावित होने की आशंका अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने आशंका जताई है कि Benjamin Netanyahu की नीतियां और लेबनान में जारी सैन्य गतिविधियां अमेरिका-ईरान वार्ता को प्रभावित कर सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्विट्जरलैंड में होने वाली यह वार्ता पश्चिम एशिया की राजनीति, परमाणु कूटनीति और वैश्विक ऊर्जा बाजारों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
पेरिस/वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच 14 सूत्रीय ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ (एमओयू) पर हस्ताक्षर होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि ईरान के पास सीमित संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें रहने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम, संवर्धित यूरेनियम भंडार और जमी हुई ईरानी संपत्तियों को लेकर भी अपेक्षाकृत नरम बयान दिए हैं। ट्रंप का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि युद्ध की शुरुआत में अमेरिका और इजराइल दोनों ईरान के मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करने की बात कर रहे थे। ‘दूसरे देशों के पास हैं तो ईरान के पास भी कुछ मिसाइलें हो सकती हैं’ फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के इतर पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि यदि क्षेत्र के अन्य देशों के पास बैलिस्टिक मिसाइलें हैं तो ईरान के पास भी सीमित संख्या में ऐसी मिसाइलें होना पूरी तरह अनुचित नहीं है। ट्रंप ने कहा, “अगर दूसरे देशों के पास बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, तो ईरान के पास कुछ मिसाइलें होने से उन्हें पूरी तरह रोकना थोड़ा अनुचित होगा।” उन्होंने सऊदी अरब और कतर का उदाहरण देते हुए कहा कि क्षेत्रीय संतुलन को देखते हुए ईरान के पास भी कुछ मिसाइलें रहने दी जा सकती हैं। ‘मिसाइलें समस्या नहीं, परमाणु हथियार ज्यादा खतरनाक’ ट्रंप ने मिसाइल कार्यक्रम और परमाणु हथियारों के बीच अंतर करते हुए कहा कि बैलिस्टिक मिसाइलें सीमित नुकसान पहुंचा सकती हैं, लेकिन परमाणु हथियारों की विनाशकारी क्षमता कहीं अधिक है। उन्होंने कहा, “मिसाइलें किसी छोटे इलाके को नुकसान पहुंचा सकती हैं, लेकिन वे दुनिया को तबाह नहीं करतीं, जैसा कि परमाणु हथियार कर सकते हैं।” युद्ध के दौरान था मिसाइल कार्यक्रम खत्म करने का लक्ष्य 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था, तब ट्रंप प्रशासन का स्पष्ट रुख था कि ईरान की मिसाइल क्षमता और परमाणु कार्यक्रम दोनों को कमजोर करना आवश्यक है। उस समय ट्रंप ने कहा था कि: ईरान की मिसाइल इंडस्ट्री को पूरी तरह नष्ट किया जाएगा। परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने के लिए कठोर कदम उठाए जाएंगे। ताजा बयान संकेत देता है कि वॉशिंगटन अब इस मुद्दे पर पहले जैसी कठोर स्थिति में नहीं है। इसके बावजूद ट्रंप ने कहा कि अगले 60 दिनों तक चलने वाली वार्ताओं में मिसाइल कार्यक्रम पर चर्चा जारी रहेगी। यूरेनियम भंडार तुरंत सौंपने की शर्त नहीं एमओयू के अनुसार, ईरान को अपने उच्च स्तर तक संवर्धित यूरेनियम भंडार को तत्काल सौंपने की बाध्यता नहीं दी गई है। समझौते में कहा गया है कि: इस मुद्दे का समाधान अगले 60 दिनों में तैयार किए जाने वाले अलग तंत्र के तहत होगा। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में संवर्धित यूरेनियम को कम स्तर पर लाने की प्रक्रिया पर चर्चा की जाएगी। ट्रंप ने इस मुद्दे को भी अधिक महत्व नहीं देते हुए कहा, “यह सामग्री अब उतनी मूल्यवान नहीं है, लेकिन मनोवैज्ञानिक तौर पर हम उसे हासिल करना चाहेंगे।” उन्होंने दावा किया कि पहले हुए हमलों के बाद संवर्धित सामग्री मलबे के नीचे दब चुकी है और उसे कोई छू भी नहीं सकता। जमी हुई ईरानी संपत्तियों को लौटाने के संकेत ट्रंप ने यह भी स्वीकार किया कि अमेरिका को ईरान की कुछ जमी हुई संपत्तियां वापस करनी पड़ सकती हैं। उन्होंने कहा, “हमने उनका काफी पैसा रोका हुआ है। वह उनका अपना पैसा है। मुझे लगता है कि हमें उसे वापस करना होगा।” ट्रंप के अनुसार, यदि अमेरिका ऐसा नहीं करता है तो वैश्विक निवेशकों का डॉलर पर भरोसा प्रभावित हो सकता है। 300 अरब डॉलर के रिकंस्ट्रक्शन फंड को मिली मान्यता अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका ने ईरान के प्रस्तावित 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण (Reconstruction) फंड को मान्यता दे दी है। हालांकि इस फंड के वित्तपोषण और धन के स्रोत को लेकर अभी कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। राष्ट्रपतियों ने समझौते पर किए हस्ताक्षर फ्रांस के वर्साय पैलेस में डील पर हस्ताक्षर करने के कुछ घंटों बाद ईरानी विदेश मंत्रालय ने घोषणा की कि एमओयू के अंतिम मसौदे पर दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने आधिकारिक हस्ताक्षर कर दिए हैं। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा, “इस्लामाबाद एमओयू का पाठ राष्ट्रपतियों के हस्ताक्षर के साथ अंतिम रूप ले चुका है। अब समझौते के क्रियान्वयन की परीक्षा शुरू होगी।” इससे पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने डिजिटल रूप से दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे, जिसकी निगरानी स्वयं डोनाल्ड ट्रंप ने की थी। समझौते के बाद बदलते संकेत ट्रंप के ताजा बयानों ने यह संकेत दिया है कि अमेरिका-ईरान संबंधों में टकराव की जगह अब चरणबद्ध कूटनीतिक समाधान की दिशा में बढ़ने की कोशिश हो रही है। बैलिस्टिक मिसाइलों, परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों में राहत को लेकर आने वाले 60 दिनों की बातचीत इस समझौते की वास्तविक दिशा तय करेगी।
तेल अवीव: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते को लेकर इजराइल में बढ़ती राजनीतिक नाराजगी के बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दो टूक कहा है कि ईरान को कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि चाहे कोई समझौता हो या न हो, इजराइल अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। नेतन्याहू ने कहा, "ईरान के पास कभी परमाणु हथियार नहीं होंगे, न आज और न कल। हमने अपने देश पर मंडरा रहे विनाश के तत्काल खतरे को टाल दिया है और इजराइल को पूर्ण विनाश से बचाया है।" विपक्ष और सहयोगियों के निशाने पर नेतन्याहू प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है, जब उन्हें विपक्ष के साथ-साथ अपनी सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार के सहयोगियों की आलोचना का भी सामना करना पड़ रहा है। इजराइल में कई राजनीतिक दलों का मानना है कि अमेरिका-ईरान समझौते से क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट का हमला इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदार Naftali Bennett ने नेतन्याहू सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार का कार्यकाल राजनीतिक विभाजन, 7 अक्टूबर के नरसंहार और अब ईरान मुद्दे पर ऐतिहासिक विफलता से चिह्नित रहा है। बेनेट ने दावा किया कि यदि वह सत्ता में होते तो कूटनीतिक और सुरक्षा मामलों में अलग रणनीति अपनाते। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ उनके संबंध केवल इजराइल के राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए जाते। ट्रंप से मतभेद की अटकलों पर दिया जवाब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के साथ मतभेद की चर्चाओं पर नेतन्याहू ने कहा कि कुछ मुद्दों पर दोनों नेताओं के विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन इजराइल के सुरक्षा हित सर्वोपरि हैं। उन्होंने कहा, "ऐसे अवसर आते हैं जब राष्ट्रपति ट्रंप और मेरे विचार पूरी तरह समान नहीं होते, लेकिन इजराइल की सुरक्षा की समझदारी से रक्षा की जानी चाहिए।" लेबनान और सीरिया में सुरक्षा क्षेत्र बनाए रखेगा इजराइल प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने दक्षिणी लेबनान से सेना हटाने की संभावना को भी खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि इजराइल ने गाजा, लेबनान और सीरिया में सुरक्षा क्षेत्र स्थापित किए हैं और जरूरत पड़ने तक वहां अपनी उपस्थिति बनाए रखेगा। नेतन्याहू ने कहा, "हमने इजराइल के चारों ओर गहरे सुरक्षा क्षेत्र बनाए हैं। हमने सीरिया में असद की सेना के हथियारों को नष्ट किया है। अपने देश की सुरक्षा के लिए हम इन क्षेत्रों में तब तक बने रहेंगे, जब तक इसकी आवश्यकता होगी।" समझौते को लेकर जारी है सियासी बहस विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिणी लेबनान और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे अमेरिका-ईरान समझौते के कार्यान्वयन में बाधा बन सकते हैं। ऐसे में इजराइल के भीतर यह बहस तेज हो गई है कि क्या यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थिरता लाएगा या नए सुरक्षा संकट पैदा करेगा।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान ने कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाने पर सहमति दे दी है। इसके साथ ही उन्होंने उन रिपोर्टों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि अमेरिका शांति समझौते के तहत ईरान को 300 मिलियन अमेरिकी डॉलर देने जा रहा है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए लिखा, "ईरान कभी भी परमाणु हथियार न बनाने पर सहमत हो गया है।" उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका द्वारा ईरान को 300 मिलियन डॉलर दिए जाने की खबर पूरी तरह फर्जी है और इसे डेमोक्रेट्स द्वारा फैलाया जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से फिर शुरू हुई जहाजों की आवाजाही अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू हो गई है और कई तेल टैंकर सुरक्षित रूप से इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजर रहे हैं। ट्रंप ने कहा कि यह घटनाक्रम अमेरिका और ईरान के बीच 107 दिनों तक चले संघर्ष को समाप्त करने के उद्देश्य से हुए डिजिटल शांति समझौते के बाद सामने आया है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है और इसके खुलने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार को राहत मिलने की उम्मीद है। शुक्रवार को हो सकती है अंतिम डील ट्रंप ने बताया कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में होने वाली बैठक में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे। इस दौरान अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर औपचारिक रूप से आमने-सामने हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। 'होर्मुज हमेशा के लिए शुल्क मुक्त रहेगा' 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' को दिए एक साक्षात्कार में ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ हुए समझौते से यह सुनिश्चित होगा कि होर्मुज जलडमरूमध्य हमेशा के लिए शुल्क मुक्त रहेगा और अंतरराष्ट्रीय जहाजों की निर्बाध आवाजाही जारी रहेगी। रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गलीबाफ के साथ एक कार्यढांचा समझौते (Framework Agreement) पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर भी किए हैं। वैश्विक बाजार की नजर अंतिम समझौते पर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर हो जाते हैं, तो इससे पश्चिम एशिया में तनाव कम हो सकता है, वैश्विक तेल आपूर्ति स्थिर हो सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऊर्जा कीमतों पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों पर अभी भी आगे की वार्ताओं की जरूरत बनी हुई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।