नई दिल्ली, एजेंसियां। 20 जुलाई को दिल्ली में हुए संसद मार्च को लेकर विवाद अब अदालत तक पहुंच गया है। इस मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) से जांच कराने की मांग को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है, जिस पर कल सुनवाई होगी। याचिका में मार्च के दौरान हुई घटनाओं, सुरक्षा व्यवस्था और कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। मार्च के दौरान हुआ था विवाद 20 जुलाई को छात्रों और प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने अपनी मांगों को लेकर संसद की ओर मार्च निकालने की कोशिश की थी। पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोका। इस दौरान कुछ जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव की स्थिति बनी। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उनके साथ सख्ती बरती गई, जबकि पुलिस का कहना है कि संसद क्षेत्र की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाए गए। NIA जांच की मांग क्यों उठी याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से मांग की है कि पूरे मामले की जांच किसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से कराई जाए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मार्च के दौरान हुई घटनाओं की पूरी सच्चाई सामने लाने के लिए विस्तृत जांच जरूरी है। हालांकि, NIA जांच का फैसला अदालत सुनवाई के बाद ही करेगी। हाईकोर्ट के फैसले पर नजर दिल्ली हाईकोर्ट कल इस मामले की सुनवाई करेगा। अदालत याचिका में दिए गए तथ्यों, आरोपों और जांच की आवश्यकता को देखते हुए आगे का रुख तय करेगी। अगर कोर्ट जांच के संबंध में कोई निर्देश देता है तो इससे संसद मार्च विवाद की जांच की दिशा तय हो सकती है। छात्र आंदोलन को लेकर बढ़ी सियासी सरगर्मी NEET और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर चल रहे छात्र आंदोलनों के बीच यह मामला सामने आया है। संसद मार्च के बाद राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। फिलहाल सभी की नजर दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई पर है, जिससे यह साफ होगा कि मामले की जांच किस एजेंसी से होगी और आगे की कानूनी प्रक्रिया क्या होगी।
गुरुग्राम, एजेंसियां। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बुधवार को गुरुग्राम स्थित मेदांता अस्पताल पहुंचकर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक से मुलाकात की। दोनों नेताओं ने डॉक्टरों से वांगचुक के स्वास्थ्य की जानकारी ली और उनके उपचार की समीक्षा की। दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद कराया गया भर्ती सोनम वांगचुक को दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद सफदरजंग अस्पताल से मेदांता अस्पताल स्थानांतरित किया गया था। उनकी पत्नी ने बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की मांग करते हुए अदालत का रुख किया था, जिसके बाद कोर्ट ने अस्पताल बदलने की अनुमति दी। डॉक्टरों की निगरानी में चल रहा उपचार मेदांता अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम वांगचुक के स्वास्थ्य की लगातार निगरानी कर रही है। लंबे समय से जारी अनशन के कारण उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें उन्नत चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। अस्पताल प्रशासन उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। मुलाकात के बाद फिर तेज हुई चर्चा जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह की अस्पताल में मुलाकात के बाद इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। इस बीच, वांगचुक के समर्थकों ने आंदोलन जारी रखने की बात दोहराई है और सरकार से उनकी मांगों पर जल्द सकारात्मक पहल करने की अपील की है।
नई दिल्ली,एजेंसियां। दिल्ली हाईकोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधार के समर्थक सोनम वांगचुक को इलाज के लिए मेदांता अस्पताल में स्थानांतरित करने की अनुमति दे दी है। लंबे समय से जारी उनके अनशन के दौरान स्वास्थ्य बिगड़ने पर यह फैसला लिया गया। अदालत के आदेश के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनका उपचार जारी है। स्वास्थ्य बिगड़ने पर अदालत का हस्तक्षेप सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि लगातार अनशन के कारण सोनम वांगचुक की तबीयत खराब हो गई है और उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा की आवश्यकता है। इस पर हाईकोर्ट ने उनकी चिकित्सकीय देखभाल सुनिश्चित करने के लिए मेदांता अस्पताल में स्थानांतरण की अनुमति दे दी। डॉक्टरों की एक टीम उनके स्वास्थ्य की नियमित निगरानी कर रही है। धरनास्थल पर लौटे समर्थक सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाने के बाद उनके समर्थक और प्रदर्शनकारी फिर से अपने धरनास्थल पर लौट आए। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से जारी रहेगा और वे अपनी मांगों को लेकर सरकार से बातचीत चाहते हैं। मौके पर सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया है। सरकार से वार्ता की मांग जारी प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार से जल्द बातचीत शुरू करने और उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेने की अपील की है। वहीं प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। सोनम वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति पर भी अस्पताल और प्रशासन नियमित जानकारी साझा कर रहे हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक की तबीयत अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के 21वें दिन बिगड़ने के बाद दिल्ली पुलिस ने शनिवार तड़के उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। यह कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट के उस निर्देश के बाद की गई, जिसमें उनकी सेहत पर लगातार निगरानी रखने और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय हस्तक्षेप करने को कहा गया था। जंतर-मंतर से अस्पताल ले जाया गया शनिवार सुबह दिल्ली पुलिस और मेडिकल टीम जंतर-मंतर पहुंची, जहां वांगचुक पिछले 21 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे थे। स्वास्थ्य में लगातार गिरावट और डॉक्टरों की सलाह के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया। इस दौरान कुछ समर्थकों ने विरोध भी किया और पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद हुई कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में प्रशासन को निर्देश दिया था कि सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य की नियमित जांच कराई जाए और हालत गंभीर होने पर आवश्यक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। पुलिस का कहना है कि अस्पताल ले जाने का फैसला पूरी तरह मेडिकल सलाह के आधार पर लिया गया। पत्नी ने इलाज को लेकर रखी शर्त अस्पताल में भर्ती किए जाने के बाद वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. आंग्मो ने कहा कि उनकी स्पष्ट सहमति के बिना कोई चिकित्सा प्रक्रिया या उपचार शुरू नहीं किया जाए। उन्होंने दावा किया कि अस्पताल ले जाने से पहले परिवार को पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई। समर्थकों ने आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया वांगचुक को अस्पताल भेजे जाने के बाद उनके समर्थकों ने आंदोलन जारी रखने की घोषणा की है। आंदोलन से जुड़े नेताओं ने कहा कि उनकी मांगें पूरी होने तक विरोध जारी रहेगा और आगामी दिनों में विरोध कार्यक्रमों को और तेज किया जाएगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की लगातार जारी भूख हड़ताल के बीच दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके स्वास्थ्य को लेकर अहम निर्देश जारी किए हैं। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने कहा कि हर नागरिक का जीवन कीमती है और किसी के जीवन को जोखिम में नहीं डाला जा सकता। अदालत ने सरकारी डॉक्टरों को वांगचुक के स्वास्थ्य की नियमित जांच करने तथा चिकित्सकीय आवश्यकता पड़ने पर उचित हस्तक्षेप करने का निर्देश दिया। अदालत ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका का निस्तारण भी कर दिया। सरकार ने कोर्ट को दिया स्वास्थ्य निगरानी का भरोसा सुनवाई के दौरान केंद्र और दिल्ली सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में पेश हुए। उन्होंने अदालत को आश्वासन दिया कि सरकारी चिकित्सकों की टीम सोनम वांगचुक की नियमित स्वास्थ्य जांच करेगी और जरूरत पड़ने पर आवश्यक चिकित्सकीय कदम उठाए जाएंगे। इस आश्वासन के बाद अदालत ने संतोष जताते हुए स्वास्थ्य निगरानी जारी रखने के निर्देश दिए। 19वें दिन भी जारी है भूख हड़ताल सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल गुरुवार को 19वें दिन में प्रवेश कर गई। डॉक्टरों के अनुसार, लंबे उपवास के कारण उनका वजन 9 किलोग्राम से अधिक घट चुका है। चिकित्सकों ने बताया कि लगातार उपवास से उनके ब्लड शुगर का स्तर कम हो रहा है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। हालांकि, फिलहाल वह सक्रिय हैं और डॉक्टरों की टीम लगातार उनकी स्थिति पर नजर बनाए हुए है। 20 जुलाई को संसद मार्च की अपील सोनम वांगचुक ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी एक वीडियो संदेश में कहा कि उनकी तबीयत पूरी तरह ठीक नहीं है, लेकिन स्थिति नियंत्रण में है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक वह अपना अनशन जारी रखेंगे। साथ ही उन्होंने लोगों से 20 जुलाई को संसद तक प्रस्तावित शांतिपूर्ण मार्च में शामिल होने की अपील करते हुए कहा कि आंदोलन को मजबूत करना ही उनके समर्थन का सबसे प्रभावी तरीका होगा।
नई दिल्ली, एजेंसियां। Telegram Ban : दिल्ली हाईकोर्ट ने टेलीग्राम की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें नीट-यूजी पुन: परीक्षा से पहले ऐप पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को चुनौती दी गई थी। जस्टिस तेजस करिया ने IT एक्ट के सेक्शन 69A के तहत जारी ऑर्डर के खिलाफ चुनौती को खारिज करते हुए, 22 जून तक टेलीग्राम को ब्लॉक करने के सरकार के फैसले को बरकरार रखा है। बैन के पीछे वाजिब वजह बैन हटाने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस तेजस करिया ने कहा कि इमरजेंसी हालात को देखते हुए, बैन के पीछे सरकार के बताए कारण काफी थे। प्रतिबंध लगाने के लिए IT एक्ट के सेक्शन 69A के तहत प्रोसीजर का ठीक से पालन किया गया है। कोर्ट का कहना है कि टेलीग्राम पर बैन बिना सोचे-समझे नहीं लगाया गया है, बल्कि उसके पीछे वाजिब कारण हैं। कोर्ट ने टेलीग्राम की इस बात को भी खारिज कर दिया कि प्लेटफॉर्म खुद IT एक्ट के तहत जानकारी के दायरे से बाहर है। 17 जून को हाईकोर्ट का रुख किया था टेलीग्राम ने नीट यूजी एग्जाम से पहले कंपनी को बैन करने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ 17 जून को दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। यह मामला जस्टिस ताजस करिया की बेंच के सामने पेश किया गया था। इससे पहले केंद्र सरकार ने 16 जून को यह फैसला किया था कि 21 जून को आयोजित होने वाली नीट यूजी की परीक्षा के मद्देनजर 22 जून तक टेलीग्राम को बंद रखा जाए।
नई दिल्ली, एजेंसियां। अभिनेता सलमान खान और विवादित फिल्म 'काला हिरण: द बैटल फॉर लिगेसी' को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में फिलहाल कोई अंतरिम राहत नहीं मिली है। दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को फिल्म की शूटिंग, प्रमोशन और रिलीज पर रोक लगाने की मांग वाली सलमान खान की याचिका पर सुनवाई टाल दी। अब इस मामले की अगली सुनवाई 1 जुलाई को रोस्टर बेंच के समक्ष होगी। सलमान खान ने कोर्ट से मांगी थी अंतरिम राहत दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सलमान खान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संदीप सेठी ने दलील दी कि फिल्म निर्माता अभिनेता की अनुमति के बिना उनके जीवन और सार्वजनिक छवि का व्यावसायिक इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि फिल्म का टीजर पहले ही जारी किया जा चुका है और निर्माताओं को ऐसा करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। उन्होंने कोर्ट से तत्काल अंतरिम रोक लगाने की मांग की। निर्माताओं ने जवाब दाखिल करने के लिए मांगा समय फिल्म निर्माताओं की ओर से पेश वकील ने अदालत से जवाब दाखिल करने के लिए समय देने का अनुरोध किया। उनका कहना था कि उन्हें याचिका की प्रति हाल ही में प्राप्त हुई है, इसलिए जवाब तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय आवश्यक है। वहीं, सलमान खान के वकील ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि प्रतिवादियों को पहले ही विधिवत नोटिस भेजा जा चुका है और इसकी जानकारी अदालत को भी दी गई थी। धमकियों का भी किया गया जिक्र सुनवाई के दौरान फिल्म निर्माताओं के वकील ने अदालत को बताया कि फिल्म से जुड़े विवाद के कारण उन्हें जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं और इस संबंध में एफआईआर भी दर्ज कराई गई है। दूसरी ओर, सलमान पक्ष ने कहा कि अभिनेता की पहचान और छवि का बिना अनुमति इस्तेमाल लगातार जारी है, जिससे उनके व्यक्तित्व अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने सलमान खान के वकील को सभी आवश्यक दस्तावेज प्रतिवादियों को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। इसके साथ ही मामले की अगली सुनवाई 1 जुलाई के लिए निर्धारित कर दी गई, जहां अदालत अंतरिम राहत और अन्य कानूनी पहलुओं पर विस्तार से विचार करेगी।
नई दिल्ली, एजेंसियां। मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम ने दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसके तहत NEET-UG री-एग्जाम से पहले एप पर अस्थायी रोक लगाई गई है। कोर्ट ने बुधवार को मामले की सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने मंगलवार को सरकार की तरफ से टेलीग्राम पर बैन की जानकारी दी थी। यह रोक 22 जून 2026 तक लागू रहेगी। टेलीग्राम का मैसेज-एडिटिंग फीचर भी 30 जून तक बंद किया गया है। टेलीग्राम ने की सरकार के फैसले की आलोचना टेलीग्राम CEO ने सरकार के फैसले की आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि इस फैसले से भारत के 15 करोड़ से ज्यादा टेलीग्राम यूजर्स को सजा मिली है, न कि उन लोगों को जिन्होंने पेपर लीक की थी। इस बैन से कुछ भी नहीं रुकेगा। लीक करने वाले दूसरे एप्स पर शिफ्ट हो जाएंगे। गूगल और एप्पल ने प्ले स्टोर से टेलीग्राम हटाया देश में पहली बार किसी एप को पेपर लीक की आशंका के कारण बैन किया गया है। सरकार का कहना है कि कुछ लोग इस एप का इस्तेमाल पेपर लीक की अफवाह फैलाने और छात्रों से ठगी करने के लिए कर रहे थे। NTA के महानिदेशक अभिषेक सिंह ने कहा कि ‘कोई विकल्प’ नहीं बचा था, क्योंकि जालसाज इसका दुरुपयोग कर रहे थे। सरकार के आदेश पर गूगल और एप्पल ने प्ले स्टोर से भी टेलीग्राम एप हटा दिया है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। नीट री-एग्जाम को पारदर्शी बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध का मामला अब अदालत की चौखट पर पहुंच गया है, जहां आज इस पर अहम सुनवाई होनी है। मेडिकल प्रवेश परीक्षा 'नीट' (NEET) को लेकर चल रहा तनाव अब शिक्षा जगत से निकलकर डिजिटल दुनिया की दहलीज तक पहुंच गया है। नीट री-एग्जाम के दौरान किसी भी तरह की धांधली और पेपर लीक जैसी अफवाहों पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार ने एक सख्त कदम उठाते हुए लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी है। सरकार के इस अप्रत्याशित फैसले ने टेक जगत में खलबली मचा दी है। सरकारी आदेश के जारी होते ही इस प्रतिबंध का व्यापक असर दिखने लगा है। टेक दिग्गज गूगल ने त्वरित कार्रवाई करते हुए भारत में अपने प्ले स्टोर से टेलीग्राम ऐप को हटा दिया है, जबकि एप्पल भी जल्द ही अपने ऐप स्टोर से इसे ब्लॉक करने की तैयारी में है। सरकार का इस बैन के पीछे स्पष्ट तर्क है कि परीक्षा जैसे अत्यधिक संवेदनशील समय में सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल फर्जी प्रश्न पत्र और भ्रामक जानकारियां तेजी से फैलाने के लिए किया जाता है। ऐसे में परीक्षा को बिना किसी रुकावट और पूरी पारदर्शिता के साथ संपन्न कराने के लिए इस तरह का 'डिजिटल ब्लैकआउट' एक जरूरी एहतियाती कदम है। दूसरी ओर, सरकार की इस कार्रवाई के खिलाफ टेलीग्राम ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए कानूनी लड़ाई का रास्ता चुना है। कंपनी ने इस अस्थायी बैन को चुनौती देने के लिए सीधे दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। टेलीग्राम प्रबंधन का तर्क है कि इस फैसले के कारण भारत में मौजूद उसके करोड़ों सामान्य यूज़र्स को बेवजह भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ऐप का दावा है कि एक विशिष्ट परीक्षा के लिए पूरे प्लेटफॉर्म को बंद कर देना करोड़ों लोगों के संचार माध्यम को बाधित करने जैसा है। मामले की गंभीरता और करोड़ों यूज़र्स के हितों के टकराव को ध्यान में रखते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका पर त्वरित सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। बुधवार, 17 जून 2026 को अदालत इस हाई-प्रोफाइल मामले पर अपना रुख स्पष्ट करेगी। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि न्यायालय परीक्षा की शुचिता बनाए रखने की सरकारी चिंता और डिजिटल प्लेटफॉर्म के संचालन अधिकारों के बीच कैसे संतुलन स्थापित करता है।
मुंबई, एजेंसियां। बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान ने विवादित फिल्म 'काला हिरण: द बैटल फॉर लेगेसी' के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। अभिनेता ने फिल्म के टीजर, प्रचार सामग्री और रिलीज पर अंतरिम रोक लगाने की मांग करते हुए अदालत में याचिका दायर की है। यह फिल्म कथित तौर पर 1998 के चर्चित काला हिरण शिकार मामले से प्रेरित बताई जा रही है। इसी दिन फिल्म का फर्स्ट लुक भी जारी किया गया, जिसके बाद विवाद और गहरा गया। व्यक्तित्व अधिकारों के उल्लंघन का लगाया आरोप याचिका में सलमान खान का कहना है कि फिल्म निर्माता उनकी अनुमति के बिना उनके व्यक्तित्व अधिकारों (Personality Rights) का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका आरोप है कि फिल्म की प्रचार सामग्री, पोस्टर और मुख्य किरदार की प्रस्तुति उन्हें आसानी से पहचानने योग्य बनाती है। याचिका में यह भी कहा गया है कि फिल्म के मुख्य पात्र का लुक, नाम और अभिनेता के चर्चित नीले ब्रेसलेट जैसी चीजें सीधे तौर पर उनकी छवि से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं। अदालत से अंतरिम राहत की मांग सलमान खान ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया है कि मामले पर अंतिम फैसला आने तक फिल्म के निर्माण, प्रचार, वितरण, स्ट्रीमिंग और रिलीज पर अस्थायी रोक लगाई जाए। याचिका में निर्माता अमित जानी, जानी फायरफॉक्स फिल्म्स, निर्देशक भरत श्रीनेत और परियोजना से जुड़े अन्य लोगों को पक्षकार बनाया गया है। अभिनेता का कहना है कि फिल्म की रिलीज से उनकी प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है और 1998 के मामले से जुड़ी कानूनी कार्यवाही पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। फर्स्ट लुक रिलीज के बाद बढ़ा विवाद फिल्म का फर्स्ट लुक जारी होने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ दर्शकों ने फिल्म के कथित संदर्भों पर सवाल उठाए हैं, जबकि सलमान खान के प्रशंसकों ने भी आपत्ति जताई है। अब सभी की नजर दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी है, जहां यह तय होगा कि फिल्म की रिलीज और प्रचार पर अंतरिम रोक लगाई जाएगी या नहीं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।