पंजाब में फार्मेसी ऑफिसर परीक्षा पर घमासान, पेपर लीक नहीं बल्कि हाईटेक नकल का मामला चंडीगढ़, एजेंसियां। पंजाब में फार्मेसी ऑफिसर भर्ती परीक्षा को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। 19 जुलाई 2026 को आयोजित भर्ती परीक्षा के दौरान पुलिस ने हाईटेक नकल के एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश किया था। इसके बाद विपक्ष ने सरकार पर परीक्षा व्यवस्था और भर्ती प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। हालांकि, सरकार और पुलिस के मुताबिक प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले लीक नहीं हुआ था। परीक्षा के दौरान पकड़ा गया नकल का रैकेट पुलिस ने परीक्षा केंद्रों पर अभ्यर्थियों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के जरिए नकल कराने की कोशिश का खुलासा किया। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ अभ्यर्थियों के पास छोटे कैमरे और वायरलेस उपकरण पाए गए थे। पुलिस कार्रवाई में कई अभ्यर्थियों और कथित गिरोह से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया गया। मामले में इस्तेमाल किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी बरामद किए गए हैं। विपक्ष ने सरकार को घेरा घटना सामने आने के बाद पंजाब में राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए मामले में जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई की मांग की। विपक्ष ने भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी पंजाब सरकार पर निशाना साधते हुए परीक्षा में गड़बड़ी के मुद्दे को उठाया है। CM भगवंत मान बोले- पेपर लीक नहीं हुआ मुख्यमंत्री भगवंत मान ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पंजाब में पिछले कई वर्षों में कोई भर्ती परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक नहीं हुआ है। शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस ने भी इसे पेपर लीक के बजाय परीक्षा के दौरान पकड़ा गया नकल का मामला बताया है। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र लीक होने की पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल विवाद परीक्षा में पकड़े गए हाईटेक नकल रैकेट और भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर है।
चंडीगढ़, एजेंसियां। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और 1990 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी एनकाउंटरों पर आधारित फिल्म 'सतलुज' ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद अब पंजाब के कई गांवों में बड़े पर्दे पर दिखाई जा रही है। गुरुद्वारों और सार्वजनिक स्थानों पर आयोजित स्क्रीनिंग में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और पीड़ित परिवार शामिल हो रहे हैं। कई दर्शकों का कहना है कि फिल्म ने उन्हें उस दौर की घटनाओं और पीड़ितों के संघर्ष को समझने का अवसर दिया, जबकि कुछ परिवारों का दावा है कि वास्तविक घटनाएं फिल्म में दिखाए गए दृश्यों से भी अधिक भयावह थीं। पीड़ित परिवारों ने सुनाई अपनी आपबीती फिरोजपुर और तरनतारन के कई परिवारों ने आरोप लगाया कि 1990 के दशक में उनके परिजनों की कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ों में मौत हुई थी। कुछ लोगों ने दावा किया कि उनके परिवार के सदस्यों को हिरासत में प्रताड़ित किया गया, लेकिन आज तक न तो शव मिले और न ही मौत से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज। कई पीड़ितों ने कहा कि फिल्म देखने के बाद नई पीढ़ी को उस दौर की घटनाओं का अंदाजा हुआ। गांव-गांव में हो रही स्क्रीनिंग सामाजिक संगठनों और स्थानीय समूहों का कहना है कि अब तक पंजाब के सैकड़ों गांवों में फिल्म की स्क्रीनिंग कराई जा चुकी है। आयोजकों का दावा है कि इसका उद्देश्य युवाओं को पंजाब के इतिहास और जसवंत सिंह खालड़ा के संघर्ष से परिचित कराना है। उनका कहना है कि इस अभियान का किसी राजनीतिक दल या फिल्म निर्माताओं से सीधा संबंध नहीं है। कानूनी विवाद भी तेज फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग को लेकर विवाद भी बढ़ गया है। सुप्रीम कोर्ट के एक अधिवक्ता ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फिल्म की स्क्रीनिंग और सार्वजनिक प्रसारण पर रोक लगाने की मांग की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि फिल्म को आवश्यक प्रक्रिया का पालन किए बिना प्रदर्शित किया जा रहा है और इसकी सामग्री पर भी सवाल उठाए गए हैं। फिलहाल इस मामले में अदालत का अंतिम निर्णय आना बाकी है।
देहरादून, एजेंसियां। पंजाबी सिंगर जैस्मीन सैंडलस के 17 जुलाई को देहरादून में आयोजित लाइव कॉन्सर्ट के बाद सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो और तस्वीरें वायरल हो रही हैं। इन पोस्ट में कुछ यूजर्स ने दावा किया कि कार्यक्रम के दौरान सिंगर के साथ कथित छेड़छाड़ हुई। हालांकि, अब तक इस संबंध में जैस्मीन सैंडलस या उनकी टीम की ओर से कोई आधिकारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है, और न ही पुलिस ने ऐसी किसी घटना की पुष्टि की है। अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय और उत्तराखंड अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ यह कार्यक्रम भारत सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय और उत्तराखंड अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ विकास निगम की ओर से आयोजित लोकपर्व के तहत देहरादून के परेड ग्राउंड में हुआ था। शो के दौरान जैस्मीन ने स्वयं कुछ महिला प्रशंसकों को स्टेज के पास बुलाया। कई फैंस ने उनके साथ फोटो खिंचवाई, वीडियो बनाए और उन्हें गुलाब भी भेंट किए। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कई वीडियो इन्हीं पलों के बताए जा रहे हैं, जिन्हें अलग-अलग दावों के साथ साझा किया जा रहा है। कार्यक्रम के दौरान कार्यक्रम के दौरान जैस्मीन ने महिला सुरक्षा और कार्यक्रम में मौजूद लड़कियों की सुरक्षा का भी उल्लेख किया। शो लगभग डेढ़ घंटे तक बिना किसी व्यवधान के चला। पूरे आयोजन के दौरान पुलिस बल और जैस्मीन की निजी सुरक्षा टीम मौके पर मौजूद थी। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद सिंगर बिना किसी शिकायत के अपने अगले कार्यक्रम के लिए रवाना हो गईं। जैस्मीन सैंडलस कहां की रहने वाली है ? जैस्मीन सैंडलस पंजाब के जालंधर की रहने वाली हैं और बचपन से ही संगीत में रुचि रखती थीं। 13 वर्ष की उम्र में उनका परिवार अमेरिका के कैलिफोर्निया चला गया, जहां उन्होंने संघर्ष करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई। शुरुआती दिनों में वे क्लबों के बाहर अपनी म्यूजिक सीडी बेचती थीं। बाद में 'गुलाबी', 'यार ना मिले' और 'इलीगल वेपन' जैसे लोकप्रिय गीतों से उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। फिलहाल, वायरल वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार किसी कथित छेड़छाड़ की पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे मामलों में तथ्य सामने आने तक अपुष्ट दावों से बचना और केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करना आवश्यक है।
मुंबई, एजेंसियां। दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म 'सतलुज' को लेकर पंजाब में विवाद लगातार गहराता जा रहा है। OTT प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद अब इस फिल्म की स्क्रीनिंग गुरुद्वारों और सार्वजनिक स्थानों पर मुफ्त में शुरू हो गई है। गुरदासपुर, मोगा और पठानकोट के कई गुरुद्वारों में संगत के लिए फिल्म दिखाई जा रही है। भारतीय किसान यूनियन और कई सिख संगठनों ने घोषणा की है कि आने वाले दिनों में इसे पंजाब के गांव-गांव तक पहुंचाया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक लोग इसे देख सकें। वहीं, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (DSGMC) ने भी दिल्ली के गुरुद्वारों के साथ-साथ स्कूलों और कॉलेजों में फिल्म की स्क्रीनिंग तथा जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और मानवाधिकारों पर आधारित सेमिनार आयोजित करने का ऐलान किया है। फिल्म को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने अभिनेता दिलजीत दोसांझ पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें "बहुरूपिया" बताया। बिट्टू ने आरोप लगाया कि फिल्म पंजाब या सिख समाज की सेवा के लिए नहीं, बल्कि लोगों के दर्द और भावनाओं को बेचकर आर्थिक लाभ कमाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि दिलजीत परिस्थितियों के अनुसार अपना रुख बदलते हैं और प्रचार पाने के लिए विवादों का सहारा लेते हैं। दूसरी ओर, गुरुद्वारा प्रबंधकों और सिख संगठनों का कहना है कि फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और 1990 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों तथा लावारिस शवों के मामलों की जांच पर आधारित है। उनका आरोप है कि फिल्म को OTT से हटाकर इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को दबाने की कोशिश की गई है। उनका कहना है कि यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फिल्म उपलब्ध नहीं होगी, तो धार्मिक और सामाजिक मंचों के माध्यम से इसे लोगों तक पहुंचाया जाएगा। कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि स्क्रीनिंग का उद्देश्य सामाजिक जागरूकता है और कॉपीराइट सहित अन्य कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन नहीं होता, तो गुरुद्वारों में फिल्म दिखाना अपने आप में गैरकानूनी नहीं माना जाएगा। उधर, केंद्र सरकार ने फिल्म से जुड़े विवाद की समीक्षा के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, आशंका है कि फिल्म के कुछ दृश्य और घटनाएं अलगाववादी तत्वों द्वारा गलत तरीके से इस्तेमाल की जा सकती हैं। समिति फिल्म की सामग्री, तथ्यों और प्रस्तुति का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट देगी। फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा के संघर्ष, कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और उनके रहस्यमय अपहरण एवं हत्या की पृष्ठभूमि को दर्शाती है। यही कारण है कि रिलीज के बाद से यह फिल्म केवल मनोरंजन का विषय नहीं रही, बल्कि इतिहास, राजनीति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों के केंद्र में आ गई है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। पंजाब कांग्रेस में संगठनात्मक बदलाव को लेकर जारी असंतोष के बीच कांग्रेस सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। हालांकि रंधावा ने इस मुलाकात को पूरी तरह गैर-राजनीतिक बताते हुए स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य केवल पंजाब की सुरक्षा और सीमावर्ती जिलों में बिगड़ती कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना था। उन्होंने कहा कि इस बैठक को किसी भी तरह से राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। सीमावर्ती जिलों की सुरक्षा को लेकर उठाए गंभीर मुद्दे रंधावा ने बताया कि उन्होंने 4 जून 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा था, जिसकी प्रति गृह मंत्री अमित शाह को भी भेजी गई थी। पत्र में गुरदासपुर, अमृतसर, तरनतारन और पठानकोट जैसे सीमावर्ती जिलों में बिगड़ती कानून-व्यवस्था, पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद, नार्को-टेररिज्म, गैंगस्टरों की गतिविधियों और पंजाब पुलिस के कथित राजनीतिक इस्तेमाल जैसे गंभीर मुद्दे उठाए गए थे। इसके बाद 23 जून को भेजे गए दूसरे पत्र में उन्होंने गैंगस्टरों की बढ़ती गतिविधियों पर चिंता जताई थी। इन्हीं पत्रों के आधार पर उन्हें गृह मंत्री से मिलने का समय दिया गया। जबरन वसूली और जेलों से चल रहे नेटवर्क पर जताई चिंता बैठक के दौरान रंधावा ने इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB), मिलिट्री इंटेलिजेंस (MI), रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) जैसी एजेंसियों की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि पंजाब में जबरन वसूली, धमकियां और जेलों के भीतर से मोबाइल फोन के जरिए अपराध संचालित होना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि यदि केंद्र सरकार मानती है कि पाकिस्तान इन गतिविधियों में प्रत्यक्ष रूप से शामिल है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है, तो आवश्यक कदम उठाना उसकी जिम्मेदारी है। कांग्रेस के प्रति निष्ठा दोहराई, विवादों पर चुप्पी रंधावा ने कांग्रेस के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि वह पार्टी द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारियों का पूरी ईमानदारी से निर्वहन कर रहे हैं। वहीं, पंजाब कांग्रेस में संगठनात्मक फेरबदल और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की नाराजगी से जुड़े सवालों पर उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। ऐसे में उनकी अमित शाह से मुलाकात ने भले ही राजनीतिक अटकलों को हवा दी हो, लेकिन रंधावा ने इसे पूरी तरह सुरक्षा और जनहित से जुड़ा मुद्दा बताया है।
यूपीएससी 2025 के नतीजों में पंजाब की बेटियों के शानदार प्रदर्शन ने राज्य में चल रहे बुनियादी शैक्षिक सुधारों और नई शिक्षण विधियों की सफलता पर मुहर लगा दी है। नई दिल्ली, एजेंसियां। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) 2025 के नतीजों में पंजाब के युवाओं, विशेषकर बेटियों के बेहतरीन प्रदर्शन ने सबका ध्यान खींचा है। यह सफलता केवल छात्रों की व्यक्तिगत कड़ी मेहनत का परिणाम नहीं है, बल्कि यह राज्य की शिक्षा व्यवस्था में जमीनी स्तर पर आ रहे एक बड़े बदलाव का सीधा रिफ्लेक्शन है। पंजाब के सरकारी स्कूल अब एक नए दौर से गुजर रहे हैं, जहां इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर पढ़ाने के तरीकों तक में बड़े पैमाने पर सुधार किए जा रहे हैं। दशकों से शिक्षा के क्षेत्र में ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच एक गहरी खाई रही है, जिसके कारण गांव के बच्चे अक्सर पिछड़ जाते थे। लेकिन अब यह खाई तेजी से पट रही है। आंकड़ों के अनुसार, राज्य के 99.9 प्रतिशत सार्वजनिक स्कूलों का विद्युतीकरण (Electrification) पूरा हो चुका है। इसके साथ ही, 80 प्रतिशत से अधिक स्कूलों को आधुनिक 'स्मार्ट क्लासरूम' में तब्दील कर दिया गया है। इन बुनियादी सुविधाओं ने सरकारी स्कूलों के छात्रों को निजी स्कूलों के बच्चों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रतिस्पर्धा करने के योग्य बना दिया है। बुनियादी ढांचे के अलावा, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए सबसे बड़ा कदम प्राथमिक स्तर पर उठाया गया है। इसके लिए 'मिशन समर्थ' (Mission Samarth) की शुरुआत की गई है, जो पूरी तरह से कौशल-आधारित शिक्षा (Skills-based education) पर केंद्रित है। इस मिशन के तहत TaRL (Teaching at Right Level) पद्धति का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका अर्थ है कि शिक्षक पहले छात्रों की सीखने की क्षमता और उनके वर्तमान स्तर का मूल्यांकन करते हैं, और फिर उसी स्तर के अनुसार उन्हें शिक्षा और सपोर्ट दिया जाता है। इस वैज्ञानिक तरीके से यह सुनिश्चित हो रहा है कि क्लास में कोई भी बच्चा पढ़ाई में पीछे न रहे। इन्हीं मजबूत नींव का असर अब देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में देखने को मिल रहा है। लड़कियों का इन परीक्षाओं में सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित करना यह साबित करता है कि जब समान अवसर मिलते हैं, तो प्रतिभा किसी भी जेंडर या पृष्ठभूमि की मोहताज नहीं होती। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने यूपीएससी के सफल उम्मीदवारों को बधाई देते हुए इस बात पर जोर दिया कि लड़कियों की यह सफलता वास्तविक महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है। सरकार की प्राथमिकता अब स्पष्ट है—शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा बेहतरीन माहौल तैयार करना जहां समाज के हर तबके के बच्चे को आगे बढ़ने का समान और निष्पक्ष मौका मिल सके। प्राथमिक शिक्षा से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं तक का यह सफर एक सशक्त और समृद्ध पंजाब के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
अमृतसर: पंजाब के अमृतसर में ऑपरेशन ब्लू स्टार की 42वीं बरसी के अवसर पर श्री अकाल तख्त साहिब में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और समर्थक एकत्र हुए। इस दौरान जरनैल सिंह भिंडरावाले की पुण्यतिथि भी मनाई गई। समारोह से जुड़ा एक वीडियो सामने आया है, जिसमें लोगों के बीच भिंडरावाले के पोस्टर वितरित किए जाते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो, जिसे समाचार एजेंसी ANI ने जारी किया है, में एक व्यक्ति हाथ में पोस्टरों का बंडल लिए लोगों को पोस्टर बांटता नजर आता है। कई लोग इन पोस्टरों को हाथ में लेकर परिसर में मौजूद दिखाई देते हैं। हर वर्ष आयोजित होता है स्मरण कार्यक्रम भिंडरावाले के समर्थक हर वर्ष जून महीने में उनकी पुण्यतिथि और ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी के अवसर पर अमृतसर पहुंचते हैं। इस मौके पर धार्मिक कार्यक्रमों के साथ उन्हें श्रद्धांजलि भी दी जाती है। क्या था ऑपरेशन ब्लू स्टार? ऑपरेशन ब्लू स्टार भारतीय इतिहास की सबसे चर्चित और विवादित सैन्य कार्रवाइयों में से एक माना जाता है। यह अभियान 1 जून से 10 जून 1984 के बीच चलाया गया था। इसका उद्देश्य अमृतसर स्थित Golden Temple परिसर में मौजूद हथियारबंद उग्रवादियों को बाहर निकालना था। 1983 में Jarnail Singh Bhindranwale अपने समर्थकों के साथ स्वर्ण मंदिर परिसर में आकर रहने लगे थे। उस दौरान अलग खालिस्तान की मांग और बढ़ती उग्रवादी गतिविधियों को लेकर केंद्र सरकार और भिंडरावाले के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया। बढ़ते तनाव के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi ने जून 1984 में सेना को अभियान चलाने का आदेश दिया। ऑपरेशन के दौरान भिंडरावाले मारे गए थे। बरसी के दौरान सुरक्षा व्यवस्था कड़ी बरसी कार्यक्रम को देखते हुए अमृतसर और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है। प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया है और पूरे कार्यक्रम पर नजर रखी जा रही है।
राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों के विलय पर सियासी घमासान आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों, जिनमें राघव चड्ढा भी शामिल हैं, के बीजेपी में विलय को मंजूरी मिलने के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस घटनाक्रम पर कांग्रेस ने बीजेपी पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस नेता अजय माकन ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने पंजाब के जनादेश का अनादर किया है और इससे राज्य में अलगाववादी ताकतों को बल मिल सकता है। "पंजाब में वही हुआ, जो अलगाववादी चाहते थे" अजय माकन ने कहा कि पंजाब जैसे संवेदनशील और सीमावर्ती राज्य में यह राजनीतिक बदलाव गंभीर चिंता का विषय है। उनके मुताबिक, अलगाववादी ताकतें लंबे समय से यह प्रचार करती रही हैं कि पंजाब के लोगों की आवाज को दबाया जाता है। माकन ने आरोप लगाया कि बीजेपी का यह कदम उसी नैरेटिव को मजबूती देता है। 6 फीसदी वोट, लेकिन 86 फीसदी राज्यसभा सीटें कांग्रेस नेता ने कहा कि 2021 के पंजाब विधानसभा चुनाव में बीजेपी को केवल 6.6 प्रतिशत वोट और दो सीटें मिली थीं। इसके बावजूद अब पंजाब से राज्यसभा की सात में से छह सीटों पर बीजेपी का प्रभाव हो गया है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक जनादेश के साथ अन्याय बताया। AAP पर भी साधा निशाना अजय माकन ने आम आदमी पार्टी पर भी जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि AAP अब आम आदमी की नहीं, बल्कि अरबपतियों की पार्टी बन चुकी है। माकन के अनुसार, बीजेपी में शामिल हुए सातों सांसदों की औसत घोषित संपत्ति 800 करोड़ रुपये से अधिक है। केजरीवाल पर लगाए गंभीर आरोप कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि अरविंद केजरीवाल ने पार्टी के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर धनाढ्य लोगों को राज्यसभा भेजा। उन्होंने यह भी कहा कि AAP को कांग्रेस का वोट काटने के लिए खड़ा किया गया था, लेकिन अब उसका "मुखौटा" उतर चुका है। INDIA गठबंधन पर भी उठे सवाल माकन ने स्वीकार किया कि कांग्रेस और AAP के बीच पहले भी वैचारिक मतभेद रहे हैं। हालांकि, गठबंधन की मजबूरियों के चलते दोनों दल साथ आए थे। अब इस घटनाक्रम के बाद INDIA गठबंधन के भीतर भी नई बहस शुरू होने की संभावना है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।