वॉशिंगटन/तेहरान, एजेंसियां। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित परमाणु समझौते को लेकर विरोधाभासी बयान सामने आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और समझौते की अच्छी संभावना है। वहीं ईरान ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि अमेरिका के साथ फिलहाल कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वार्ता नहीं चल रही है। ट्रंप का दावा- बातचीत सही दिशा में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका कूटनीतिक समाधान चाहता है और यदि ईरान सहयोग करता है तो समझौते का रास्ता खुल सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर आक्रामक रुख अपनाता है, तो अमेरिका सैन्य विकल्प अपनाने से भी पीछे नहीं हटेगा। ईरान का स्पष्ट इनकार ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने ट्रंप के बयान को खारिज करते हुए कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच इस समय किसी भी स्तर पर कोई बातचीत नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि जब तक वाशिंगटन अपने रवैये में बदलाव नहीं लाता और प्रतिबंधों के मुद्दे पर ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक वार्ता की कोई संभावना नहीं है। परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंध बने मुख्य मुद्दे दोनों देशों के बीच विवाद का सबसे बड़ा कारण ईरान का परमाणु कार्यक्रम और उस पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर सख्त नियंत्रण स्वीकार करे, जबकि ईरान पहले आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों के परस्पर विरोधी बयानों से फिलहाल किसी तत्काल समझौते की संभावना कम दिखाई देती है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ प्रस्तावित असैन्य परमाणु समझौते को लेकर नई शर्त रख दी है। ट्रंप ने कहा कि यह समझौता तभी लागू होगा, जब सऊदी अरब इजरायल के साथ राजनयिक संबंध सामान्य करेगा और अब्राहम समझौते (Abraham Accords) में शामिल होगा। इस बयान के बाद मध्य पूर्व की कूटनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। सऊदी अरब के सामने बड़ी कूटनीतिक चुनौती सऊदी अरब लंबे समय से कहता रहा है कि वह फिलिस्तीन मुद्दे के समाधान और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र की दिशा में ठोस प्रगति के बिना इजरायल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित नहीं करेगा। ऐसे में ट्रंप की नई शर्त ने प्रस्तावित परमाणु समझौते के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। व्हाइट हाउस ने भी स्पष्ट किया है कि यदि सऊदी अरब अब्राहम समझौते में शामिल नहीं होता, तो यह परमाणु समझौता आगे नहीं बढ़ेगा। मध्य पूर्व की राजनीति पर पड़ सकता है बड़ा असर विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह कदम मध्य पूर्व की रणनीतिक राजनीति को नया मोड़ दे सकता है। इजरायल ने इस शर्त का स्वागत किया है, जबकि सऊदी अरब की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। यदि दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य होते हैं तो यह क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा सहयोग और अमेरिका की पश्चिम एशिया नीति के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जाएगा। हालांकि फिलिस्तीन मुद्दे को लेकर सऊदी रुख में बदलाव की संभावना फिलहाल कम मानी जा रही है।
तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच जारी परमाणु वार्ता के बीच ईरान ने अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण को लेकर नया रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि उसके परमाणु ठिकानों तक पहुंच केवल अंतिम समझौते के बाद ही दी जाएगी। तेहरान ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक अमेरिका प्रतिबंधों और दंडात्मक उपायों को हटाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक किसी भी प्रकार के निरीक्षण की अनुमति नहीं दी जाएगी। IAEA प्रमुख की मांग को किया खारिज ईरान के उप विदेश मंत्री Kazem Gharibabadi ने बुधवार को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी International Atomic Energy Agency के महानिदेशक Rafael Grossi की उस टिप्पणी को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने ईरान के परमाणु स्थलों के निरीक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया था। गरीबाबादी ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में परमाणु प्रतिष्ठानों या वहां मौजूद परमाणु सामग्री तक किसी भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी की पहुंच देने की कोई योजना नहीं है। स्विट्जरलैंड में नहीं हुई मुलाकात सोशल मीडिया पर जारी अपने बयान में ईरानी उप विदेश मंत्री ने दावा किया कि ग्रोसी के अनुरोध के बावजूद स्विट्जरलैंड में उनकी कोई बैठक नहीं हुई। उन्होंने कहा कि जिन परमाणु ठिकानों पर हाल के महीनों में हमले हुए हैं, वहां निरीक्षण की अनुमति देने का सवाल अभी विचाराधीन भी नहीं है। इन मुद्दों पर फैसला केवल अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक और अंतिम समझौते के तहत ही लिया जाएगा। प्रतिबंध हटाने को बनाया शर्त गरीबाबादी ने कहा कि निरीक्षण व्यवस्था पर सहमति तभी बन सकती है, जब दूसरी ओर से सभी आर्थिक प्रतिबंधों और अन्य दंडात्मक उपायों को समाप्त करने के लिए व्यावहारिक और भरोसेमंद कदम उठाए जाएं। उन्होंने संकेत दिया कि ईरान किसी भी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं करेगा, जिसमें केवल निगरानी और निरीक्षण की शर्तें हों, लेकिन प्रतिबंधों में राहत का स्पष्ट प्रावधान न हो। परमाणु डील पर बढ़ सकता है गतिरोध विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की इस नई शर्त से परमाणु वार्ता और जटिल हो सकती है। अमेरिका लंबे समय से इस बात पर जोर देता रहा है कि किसी भी समझौते में स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था अनिवार्य होगी, ताकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी सुनिश्चित की जा सके। दूसरी ओर, तेहरान का कहना है कि निरीक्षण और सत्यापन की प्रक्रिया को प्रतिबंधों में राहत से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 'मीडिया दबाव से नहीं बदलेगा ईरान का रुख' ईरानी उप विदेश मंत्री ने अपने बयान में पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि मीडिया के जरिए दबाव बनाने या राजनीतिक माहौल तैयार करने की कोशिशों से ईरान अपनी नीति नहीं बदलेगा। उन्होंने कहा, "मीडिया के शोर-शराबे और दबाव की राजनीति के जरिए इन मुद्दों को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। किसी भी निर्णय का आधार केवल अंतिम समझौता और पारस्परिक प्रतिबद्धताओं का पालन होगा।" अंतिम समझौते पर टिकी निगाहें अमेरिका और ईरान के बीच जारी वार्ता का उद्देश्य परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े विवादों का स्थायी समाधान तलाशना है। निरीक्षण व्यवस्था को लेकर सामने आए नए मतभेदों ने यह संकेत दिया है कि दोनों पक्षों के बीच अभी भी कई अहम मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु निरीक्षण और प्रतिबंधों में राहत का मुद्दा आने वाले दौर की वार्ताओं में सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
वॉशिंगटन/बर्गेनस्टॉक: स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच हुई तनावपूर्ण वार्ता के एक दिन बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान को कड़ी चेतावनी दी है। ट्रंप ने साफ कहा कि यदि ईरान अंतरिम शांति समझौते के तहत किए गए वादों का पालन नहीं करता है, तो अमेरिका सख्त जवाबी कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा, "अगर ईरान समझौते की शर्तों का पालन नहीं करता या उसका रवैया ठीक नहीं रहता, तो हम वही करेंगे जो जरूरी होगा।" उनके इस बयान को तेहरान के लिए स्पष्ट चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। पहले दौर की वार्ता में दिखा था तनाव स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में अमेरिका और ईरान के बीच पहले दौर की बातचीत के दौरान भी तनाव देखने को मिला। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर ट्रंप की टिप्पणी पर ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने नाराजगी जताई और कुछ समय के लिए वार्ता कक्ष छोड़कर बाहर चला गया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद दोनों देशों के बीच हाल ही में हुए अंतरिम समझौते के भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे थे। जेडी वेंस बोले- मजबूत समझौते की नींव पड़ी शुरुआती तनाव के बावजूद वार्ता बाद में पटरी पर लौटती दिखाई दी। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि ईरानी अधिकारियों के साथ हुई बातचीत ने अंतिम समझौते के लिए मजबूत आधार तैयार किया है। ईरान ने उन रिपोर्टों को खारिज कर दिया, जिनमें दावा किया गया था कि वार्ता का दायरा उसके परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) तक बढ़ा दिया गया है। ईरान को आर्थिक राहत, प्रतिबंधों में मिली छूट अंतरिम समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान को सीमित आर्थिक राहत देने का फैसला किया है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय (US Treasury Department) ने 21 अगस्त तक कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी छूट प्रदान की है। इस फैसले के बाद ईरान को तेल और उससे जुड़े उत्पादों के निर्यात की अनुमति मिल गई है। साथ ही उसे इन निर्यातों के बदले भुगतान प्राप्त करने की भी मंजूरी दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्रतिबंधों से जूझ रही ईरानी अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिल सकती है। पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में हुई बातचीत अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में आयोजित की गई। दोनों देशों ने पिछले सप्ताह हुए अंतरिम समझौते को आगे बढ़ाने के लिए 60 दिनों का रोडमैप तैयार करने पर सहमति जताई है। इस रोडमैप का उद्देश्य स्थायी समझौते की दिशा में आगे बढ़ना, क्षेत्रीय तनाव कम करना और लंबित विवादित मुद्दों का समाधान निकालना है। दोनों पक्षों ने बातचीत जारी रखने और कूटनीतिक माध्यमों से समाधान तलाशने की प्रतिबद्धता भी दोहराई है। 60 दिन की राहत, लेकिन दबाव बरकरार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका द्वारा दी गई 60 दिनों की राहत ईरान को आर्थिक और कूटनीतिक अवसर प्रदान करती है, लेकिन ट्रंप की चेतावनी यह भी स्पष्ट करती है कि वाशिंगटन समझौते के उल्लंघन पर कठोर रुख अपनाने से पीछे नहीं हटेगा। ऐसे में आने वाले दो महीने अमेरिका-ईरान संबंधों और मध्य-पूर्व की स्थिरता के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं।
ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। एक तरफ दोनों देशों के बीच युद्ध टालने को लेकर बातचीत तेज हो गई है, वहीं दूसरी तरफ संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर भी अटकलें जारी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों ने इस संकट को लेकर सस्पेंस और बढ़ा दिया है। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत “निर्णायक मोड़” पर पहुंच चुकी है और अगले कुछ दिन बेहद अहम होंगे। ईरान ने कहा- बातचीत के विकल्प खुले ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने कहा कि तेहरान की ओर से बातचीत के सभी रास्ते अब भी खुले हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि ईरान ने हमेशा अपने वादों का सम्मान किया है और युद्ध टालने के लिए हर संभव प्रयास किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दबाव बनाकर ईरान को झुकाने की कोशिश सफल नहीं होगी। उनके मुताबिक, समस्या का समाधान केवल सम्मानजनक बातचीत से ही निकल सकता है। परमाणु कार्यक्रम बना सबसे बड़ा विवाद पिछले कुछ दिनों में दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत और प्रस्तावों का आदान-प्रदान हुआ, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सहमति नहीं बन पाई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने अपने प्रस्ताव में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़ी शर्तें रखीं, जिन्हें तेहरान ने खारिज कर दिया। इसके बाद ईरान ने पाकिस्तान के मध्यस्थों के जरिए अमेरिका को 14 बिंदुओं वाला नया प्रस्ताव भेजा। वॉशिंगटन इस प्रस्ताव से भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। ऐसे में दोनों देशों के बीच तनाव और अनिश्चितता अभी बनी हुई है। ट्रंप ने टाला सैन्य हमला ट्रंप ने बताया कि उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमले को फिलहाल रोक दिया है। उनके अनुसार सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं ने बातचीत को मौका देने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों को उम्मीद है कि जल्द कोई समझौता हो सकता है। हालांकि ट्रंप ने यह भी साफ किया कि किसी भी समझौते की स्थिति में ईरान को परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी। “जरूरत पड़ी तो बड़ा हमला करेंगे” अमेरिकी राष्ट्रपति ने चेतावनी देते हुए कहा कि वह युद्ध नहीं चाहते, लेकिन यदि बातचीत विफल रही तो अमेरिका “एक और बड़ा हमला” करने के लिए तैयार है। ट्रंप के मुताबिक, सैन्य कार्रवाई को लेकर अंतिम फैसला अगले कुछ दिनों में लिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि शुक्रवार, शनिवार, रविवार या अगले सप्ताह की शुरुआत तक स्थिति स्पष्ट हो सकती है। दुनिया की नजर मध्य पूर्व पर मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार नजर बनाए हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते तो क्षेत्र में बड़ा सैन्य संघर्ष छिड़ सकता है। वहीं कई अरब देश दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कर हालात को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं।
Iran ने अमेरिका के साथ जारी तनाव खत्म करने के लिए एक नया चरणबद्ध प्रस्ताव दिया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump इससे संतुष्ट नहीं बताए जा रहे हैं। इससे युद्धविराम और कूटनीतिक समाधान की उम्मीदों को झटका लगा है। ईरान ने क्या प्रस्ताव दिया? ईरान की तीन-स्तरीय योजना में शामिल हैं: पहले अमेरिका-इज़राइल के साथ युद्धविराम फिर Strait of Hormuz में नौवहन बहाल करना और समुद्री नाकेबंदी हटाना उसके बाद परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन पर बातचीत तेहरान चाहता है कि परमाणु मुद्दे पर चर्चा युद्ध खत्म होने और समुद्री विवाद सुलझने के बाद हो। अमेरिका क्यों नाराज? वॉशिंगटन का कहना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अलग नहीं किया जा सकता। ट्रंप प्रशासन चाहता है कि किसी भी समझौते की शुरुआत ही परमाणु हथियारों के मुद्दे से हो। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने साफ कहा कि ऐसा कोई भी समझौता स्वीकार्य नहीं होगा जो ईरान को परमाणु हथियार बनाने की क्षमता दे। होर्मुज बना वैश्विक चिंता का केंद्र Strait of Hormuz से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है। यहां जारी तनाव से वैश्विक तेल कीमतों में तेज उछाल आया है और महंगाई बढ़ने की आशंका गहरा गई है। कूटनीति की राह कठिन प्रस्ताव पर गतिरोध के कारण इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता भी टल गई। इस बीच ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान, ओमान और रूस का दौरा किया है। फिलहाल, दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हैं, जिससे निकट भविष्य में समझौते की संभावना कमजोर दिख रही है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच United States और Iran के बीच दूसरी शांति वार्ता (Peace Talk-2) को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। पहले दौर की बातचीत भले ही बेनतीजा रही थी, लेकिन अब दोनों देशों के बीच समझौते की संभावनाएं फिर से मजबूत होती दिख रही हैं। ट्रंप का बड़ा बयान अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा: “ईरान समझौते के लिए उत्सुक है” “हमें उनकी तरफ से संदेश मिला है” “नाकेबंदी जारी रहेगी, अभी कोई ढील नहीं” उन्होंने दोहराया कि: ईरान को कभी भी परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं होगी शर्तें नहीं मानी गईं तो कोई समझौता नहीं होगा वेंस बोले–‘प्रगति हुई है’ अमेरिकी उपराष्ट्रपति J. D. Vance ने Fox News को बताया: परमाणु मुद्दे पर बातचीत में “कुछ प्रगति” हुई है अमेरिका इस प्रक्रिया को एक बड़े समझौते के साथ खत्म करना चाहता है “अब आगे बढ़ने के लिए कदम ईरान को उठाना होगा” क्या झुका ईरान? रिपोर्ट्स के मुताबिक: ईरान यूरेनियम संवर्धन पर कुछ नरमी दिखाने को तैयार हुआ है पहले जहां पूरी तरह इनकार था, अब सीमित और नियंत्रित कमी पर सहमति के संकेत हैं यही वजह है कि बातचीत का रास्ता फिर से खुलता दिख रहा है। कब और कहां हो सकती है अगली बैठक? रिपोर्ट्स के अनुसार: अगला दौर 16 अप्रैल के आसपास हो सकता है संभावित जगहें: Geneva Islamabad हालांकि, अभी आधिकारिक तौर पर तारीख और स्थान तय नहीं हुए हैं। कौन कर रहा है मध्यस्थता? खबरों के मुताबिक: Turkey दोनों देशों के बीच दूरी कम करने की कोशिश कर रहा है क्षेत्रीय मध्यस्थ भी लगातार बातचीत में लगे हैं क्यों फेल हुई थी पहली वार्ता? पहले दौर में मुख्य विवाद: अमेरिका की मांग: 20 साल तक यूरेनियम संवर्धन बंद उच्च स्तर का भंडार देश से बाहर हटाना ईरान का प्रस्ताव: सीमित अवधि में नियंत्रित कमी इसी मतभेद के चलते समझौता नहीं हो पाया था। क्या आगे बन सकता है समझौता? ताजा संकेत बताते हैं कि: दोनों पक्ष अब कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन नाकेबंदी और सैन्य दबाव अभी भी जारी है अगर ईरान अपनी शर्तों में और नरमी दिखाता है, तो आने वाले दिनों में एक बड़ा समझौता संभव हो सकता है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजर इस संभावित Peace Talk-2 पर टिकी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।